peace peace in Hindi Short Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | शान्ति शान्ति

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शान्ति शान्ति

                            ​शान्ति शान्ति                                                        कमल चोपड़ा                      ​                 

            उसके नुचे हुए पंख, घायल देह और उखड़ी हुई साँसें देखकर उसके साथी दहल उठे— "हे महाश्वेत कपोत-श्रेष्ठ, कहें कि आपकी यह दशा क्यों और कैसे हुई? आप तो शान्ति का संदेश फैलाने गए थे?"​कराहते हुए घायल सफेद कबूतर ने कहा— "साथियो, हे पवनप्रिय मित्रो! मुझे अपनी यात्रा बीच में ही स्थगित कर वापिस लौटना पड़ा। प्रेम शान्ति और अहिंसा का संदेश देने गया था मैं तो उलटा मेरी वजह से तो.... हुआ यह कि शान्ति संदेश देने के लिए मैंने इसी देश के एक छोटे से जनपद को चुना और एक मकान की मुंडेर पर जा बैठा। मकान वहाँ के मेन बाज़ार के चौराहे पर था। बाज़ार चहल-पहल और रोशनियों से भरा हुआ था। अचानक एक गोली आकर मुझे लगी। गोली चलने के हल्के धमाके ने लोगों को भी थर्रा दिया। लोगों ने मुझे घायल होकर चौराहे पर गिरते हुए देखा। एक निशानची को लोगों ने धर दबोचा जिसने यह गोली चलाई थी। अपनी सफाई में बंदूकची झुंझला रहा था— "उसने कहा मेरा क्या कसूर है? मुझे तो विधायक जी ने भेजा है। अभी कुछ देर पहले विधायक जी यहाँ से गुज़रे थे। उनकी नज़र इस कबूतर पर पड़ गई थी। वे तुरन्त घर पहुँचे और मुझे इसे मार कर लाने का हुक्म दिया। उन्होंने यह भी कहा कि इसे असली गोली नहीं पत्थर की गोली मारना, बारूद की गोली से यह खाने लायक नहीं बचेगा।​"सुना है कबूतर का माँस कमज़ोरी और लकवे में बहुत फायदेमंद होता है। जंगली ना सही सफेद ही सही कसूर तो मुझे यहाँ भेजनेवाले का है।"​आपे से बाहर हुए जा रहे थे लोग— "इस निरीह निर्दोष बेज़ुबान पक्षी को तुमने मारा है, निर्दयी हिंसक हत्यारे तुम हो...."​संयोग से बंदूकची दूसरे धर्म का था। लोग बट गए। कुछ लोगों ने उसे पीटना शुरू कर दिया। बात बढ़ती चली गई और बंदूकची के मज़हब के लोगों ​की दुकानें लूटी जाने लगीं। घर जलाए जाने लगे और मारकाट होने लगी। वे लोग जो स्नेह, सद्भाव, शान्ति और अहिंसा के प्रेमी थे और जो एक पक्षी पर होती हुई हिंसा को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे, वे अब स्वयं हिंसक होकर मारकाट मचा रहे थे। बात धर्म की आ जाती है तो जाने क्यों लोग अपना विवेक खो बैठते हैं...? पीढ़ियों से हम अहिंसा संदेश फैला रहे हैं लेकिन आज काम....? ताकि कोई हिंसा न करे इसलिए लोग खुद ही हिंसा करने लगते हैं।​वहाँ उपस्थित सभी पक्षी दहल उठे— "क्या शान्ति और अहिंसा का संदेश इतना कठिन हो गया है?"​प्रश्न सन्नाटे और खामोशी में डूबी सभा को और भी दहला गया। काफी देर आँखें बन्द रहने के बाद सफेद कबूतर ने फिर कहा— "नहीं, मेरे शांतिप्रिय मित्रो, मैं जब चौराहे पर घायल अवस्था में पड़ा था तो एक बच्चा मुझे उठाकर अपनी छत पर ले आया। उसने मुझे दवा-पानी दिया। ज़ख्मों पर फाहा लगाया। दूर से आती गोलियों की आवाजों से मेरी रूह काँप उठती। मुझे डरकर फड़फड़ाता हुआ देख कर बच्चा मुंडेर पर जाता और चीखकर कहता — 'बन्द करो ये लड़ाई, इधर एक सफेद कबूतर डर रहा है।' शाम तक ठीक होकर मैं वापिस जाने के लिए उड़ा तो बच्चे की आँखों में पवित्र चमक थी। उसने हाथ हिलाकर मुझे विदा किया। फिर वैसा ही हुआ जैसा कि पहले ही होना था। रास्ते में एक जगह कुछ लोग लड़-झगड़ रहे थे। मेरा मन भारी हो आया। तभी एक आदमी की नज़र मुझ पर पड़ी। वह चहका— 'वो देखो सफेद कबूतर! अहा कितना सफेद और सुन्दर।' लड़ना भूलकर वे लोग उल्लसित हो उठे। मुझे लगा मेरी यात्रा अकारण नहीं गई है। तो मेरे शांतिप्रिय मित्रो, जान लो कि हिंसा और शांति का संदेश देना कठिन अवश्य है पर असंभव नहीं।"