डर स्वेच्छा से बनाया हुआ वो धागा है जो हमें
शर्म और झिझक से बाँधता है।
मुझे गाँव पसंद है पर मैं डरता हूँ उनकी सोच से,
रीति-रिवाज से, कुंठित विचार से।
हालाँकि गाँव में डर हवा की तरह नहीं फैलता,
वो कपड़े की तरह सिला जाता है—
कभी माँ की हिदायत में,
कभी पिता की चुप्पी में,
और कभी-कभी भूख से मुँह में आए उल्टी के भाव में।
आधे पानी में डूबे मेढ़ पर बहुत-सी कहानियाँ साँस लेती और घोंट दी जाती हैं।
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मिशा अभी-अभी ही ग्यारह की हुई होगी,
पर उसके सपने आसमान से आगे के हैं।
“मिशा ओ मिशा,
जल्दी आ, अब्बा को रोटी पहुँचा आ।”
चौंकते हुए मिशा—
“हाँ, आई माँ।”
माँ ताना कसते हुए—
“आख़िर क्या है उस मेढ़ पर जो तू सुबह-शाम वहाँ बैठकर देखती है?”
मिशा हँसते हुए—
“अरे माई, आप नहीं समझोगी। वहाँ एक सपना रोज़
उगता है सूरज की तरह और डूब जाता है।
हाहा, आप नहीं समझोगी।”
“अच्छा ठीक है मेरी अम्मा, ये रोटी ले, अब्बा को दे आ।”
माँ हल्की मुस्कान भरते हुए।
मिशा हँसती-खेलती बहुत नादान लड़की थी।
वो अनजान थी दुनिया के छल से, झूठ से, सोच से।
“पता है अब्बा, मुझे डॉक्टर बनना है।
फिर इस गाँव में कोई भी निमोनिया से नहीं मरेगा।”
मिशा तेज़ी से बोलती हुई।
“हाँ हाँ, क्यों नहीं। खूब मन लगाकर पढ़ाई करो।
बेटा, देखना एक दिन तुम ज़रूर बनोगी।”
अब्बा मिशा के सिर को सहलाते हुए।
समय बहुत जल्दी गुज़र जाता है।
अभी-अभी मिशा ग्यारह की हुई थी और देखो, सोलह भी हो गए। (अब्बा मिशा की माँ से कहते हुए)
“बस ये जल्दी से बड़ी हो जाए, पढ़-लिख ले, और हम इसका ब्याह कर देंगे।”
माँ हल्की साँस भरते हुए।
“अब्बा,
नहीं-नहीं, मेरी बिटिया पहले डॉक्टर बनेगी।
डॉक्टर ने जो कहा था… भूल गए क्या?”
माँ की आवाज़ फुसफुसाहट थी,
पर उसमें वर्षों का भय था।
मिशा के जन्म के समय
दाई ने कुछ अलग-सा नोट किया था।
डॉक्टर ने भी कहा था—
“बच्ची थोड़ी भिन्न है…
शरीर की बनावट साधारण नहीं है…
समय पर समझदारी से फैसला करना होगा।”
गाँव में “भिन्न” शब्द
रोग से भी बड़ा अपराध होता है।
अब्बा
आँसू पोंछते हुए—
“हे प्रभु, क्या-क्या दिन दिखा रहा तू।”
अब्बा ने उस रात देर तक कुछ नहीं खाया।
माँ चूल्हे के पास बैठी राख कुरेदती रही।
मिशा अब सोलह की थी।
देह लंबी हो गई थी,
पर भीतर वही मेढ़ वाली बच्ची थी।
उसने खुद को आईने में देखना शुरू किया।
उसे लगता—
वो बाकी लड़कियों जैसी क्यों नहीं है?
कुछ अनुपात अलग थे,
कुछ बदलाव देर से थे।
पर उससे बड़ा फर्क
उसके मन में था।
धीरे-धीरे उसको समझ आने लगा
वो अलग क्यों है।
जब उसकी कक्षा की
एक लड़की राधा नज़दीक होती थी तो वो
बहुत खुश रहती थी।
उसके मन में कभी
आकर्षण नहीं आया लड़कों के लिए पर
वो राधा के साथ कुछ अलग रहने लगी थी।
उसका स्पर्श, उसकी नज़दीकी
उसके लिए हर सुख से अलग था।
स्कूल की किताबों के बीच
उसे राधा की मुस्कान याद आती।
राधा जब उसके बालों में उँगली फिराती
तो मिशा के भीतर
कोई शांत धूप उतरती।
“राधा, मुझे तुम पसंद हो।
क्या ये मेरा अपराध है?”
मिशा डरते हुए।
“नहीं, ये अपराध नहीं,
क्योंकि मुझे भी यही अहसास होता है
जब तुम पास होती हो।
शायद यही प्रेम है।”
राधा नज़दीक, बहुत नज़दीक आती हुई।
दोनों के बीच फासला एक इंच कम होने वाला था कि
घंटी बज गई।
मिशा और राधा हँसते हुए स्वेच्छा से
उस चुंबन को अधूरा छोड़ गईं
वहीं चबूतरे पर।
मिशा और राधा एक ऐसे प्रेम की बुनियाद रच रही थीं जो शायद हर पितृसत्ता की जड़ें खोद देता।
खैर, मिशा पहले से अधिक खुश दिखने लगी।
अम्मा और अब्बा देख थोड़े डरे, पर उनकी आँखों में उम्मीद थी
सब कुछ सही होने की।
पर गंतव्य को कुछ और ही मंज़ूर था।
एक दिन तालाब पर
दो औरतों ने देख लिया—
राधा और मिशा साथ बैठी थीं,
हाथ थोड़े पास,
नज़रें थोड़ी गहरी।
फुसफुसाहट शुरू हुई—
“वैसी है…”
“जन्म से ही कुछ गड़बड़ थी…”
“इसीलिए माँ-बाप छिपा रहे थे…”
मिशा को पता भी नहीं चला
कि उसके नाम के आगे
एक नया शब्द जुड़ गया—
“अशुभ।”
सब कुछ इतना जल्दी हो गया कि न मिशा कुछ समझ पाई न राधा।
वो दोनों बस खड़ी रहीं डर में, शर्म में, झिझक में।
उनकी हँसी जैसे अमावस्या की रात में गुम हो गई हो।
वो न रो पाईं, न चीख पाईं और न भाग पाईं।
माँ ने एक रात उसे पास बिठाया—
“तू राधा से थोड़ा दूर रहा कर।”
“क्यों माई?”
माँ की आँखें भर आईं—
“क्योंकि लोग समझेंगे नहीं।”
“पर हमने क्या किया है?”
माँ के पास जवाब नहीं था।
सिर्फ भय था—
जो पीढ़ियों से सिला गया था।
समय ने दौड़ लगाई।
सोलह अठारह में बदल गया।
मिशा अब और स्पष्ट थी अपने भीतर।
उसे डॉक्टर बनने का सपना अब भी था,
पर उससे भी बड़ा सपना था—
अपने प्रेम को न छुपाना।
एक शाम
मेढ़ पर उसने राधा से कहा—
“अगर मैं अलग हूँ,
तो क्या तुम फिर भी साथ रहोगी?”
राधा ने बिना सोचे उसका हाथ पकड़ लिया—
“तू अलग नहीं है… तू बस तू है।”
वही क्षण था
जब किसी ने दूर से देख लिया।
पंचायत बैठी।
पुरुषों की भीड़।
आँखों में नैतिकता का उन्माद लिए —
“यह गाँव की इज़्ज़त का सवाल है।”
“ऐसी लड़कियाँ अपशगुन होती हैं।”
“आज नहीं रोका तो कल और फैलेंगी।”
अब्बा काँपते हुए बोले—
“बच्ची है… समझा देंगे…”
पर भीड़ को समझ नहीं चाहिए था।
उसे उदाहरण चाहिए था।
एक रात भीड़ घर के बाहर जमा हुई।
उस रात हवा भारी थी।
आकाश में बादल थे,
पर बारिश नहीं आई।
माँ चीखी—
“मेरी बच्ची है!”
भीड़ के हाथों में सिर्फ़ मशालें नहीं थीं,
उनके भीतर वर्षों की विरासत थी —
वही विरासत जो डर को संस्कार कहती है।
मिशा बाहर आई।
उसके कदम काँप नहीं रहे थे।
शायद डर बहुत पहले ही जल चुका था।
“मैंने क्या किया?”
उसने पूछा।
भीड़ में से कोई आगे नहीं आया।
क्योंकि प्रश्न व्यक्ति से था,
और उत्तर व्यवस्था से चाहिए था।
अब्बा उसके आगे खड़े हुए —
पहली बार इतने सीधे।
पर व्यवस्था की देह भारी होती है,
उन्हें धक्का दे दिया गया।
माँ का हाथ हवा में छूट गया।
वो पकड़ नहीं पाईं अपनी ही संतान को।
जब आग सुलगाई गई
तो पहले कपड़ा जला,
फिर घर की बांस की खपच्चियाँ,
फिर वह सपना
जो आधे पानी में डूबी मेढ़ पर उगता था।
मिशा ने चीखा नहीं।
सिर्फ़ एक बार मेढ़ की ओर देखा।
उस नज़र में
न रोष था
न विनती —
सिर्फ़ यह सवाल था:
क्या अलग होना
इतना असहनीय है?
लपटें उठीं।
और उस रात
गाँव की नैतिकता ने
अपनी ही छाया जला दी।
पंचायत ने निर्णय लिख दिया—
“आत्मदाह।”
अब्बा चुप थे।
उनकी पीठ झुक गई थी।
माँ की आँखें सूख गई थीं।
सब धीरे धीरे शांत हो गया
राधा उस दिन बचकर शहर भाग आई।
राधा शहर भागी नहीं थी,
वह जीवित रहने के लिए गई थी।
वर्षों बाद वह लौटी —
कलेक्टर बनकर नहीं,
बल्कि एक हस्ताक्षर लेकर।
गाँव के बाहर
मेढ़ के पास
एक सरकारी बोर्ड लगा:
“यहाँ आवासीय विद्यालय का निर्माण होगा।”
लोग समझ नहीं पाए
कि यह सिर्फ़ इमारत नहीं है।
यह निगरानी की जगह पर
संभावना का रोपण है।
अगले दिन उस मेढ़ पर कोई सपना देख रहा था
राधा गई पास बैठी और उसको मिशा कह कर
गले से लगा लिया ।
वो बच्ची हँस पड़ी उसकी हँसी में
राधा को मिशा नजर आई।
राधा उस शाम
उसी मेढ़ पर बैठी रही,
पानी अब भी आधा था।
सीमा अब भी थी।
पर इस बार
उसने मिट्टी में उँगली से लिखा —
“भिन्न होना अपराध नहीं है।”
और पहली बार
मेढ़ ने किसी शब्द को
घोंटा नहीं।
बल्कि एक कविता के रूप में उभर आई
कुछ सीमाएँ
खेत बचाने के लिए बनती हैं,
कुछ मन बाँधने के लिए।
मेढ़
दो ज़मीनों के बीच
बस थोड़ी-सी ऊँचाई है —
पर लोग उसे दीवार बना देते हैं।
तुम्हारी मुस्कान
उस मेढ़ पर उगती धूप थी।
वो धूप
न नियम पूछती थी
न लिंग,
न परंपरा।
हुसैन होता तो
उसे रेखा से बाहर बहती आकृति कहता,
रविदास
उसे सहज मनुष्यता,
और पिकासो
उसे अपूर्णता की पूर्णता।
पर मैं कहूंगी
उसे साहस।
क्योंकि तुमने
मेढ़ पर खड़े होकर
डर को नाम दिया,
और प्रेम को स्वीकार।
और शायद इसी कारण
आज भी
जब कोई बच्ची
आधे पानी में डूबी उस मेढ़ को देखती है,
वहाँ एक सपना उगता है
जो इस बार
डूबने से इनकार करता है।
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