शुरू करने से पहले एक शेर याद आता है।
ऐसे रिश्तों के लिए, जिनकी कोई परिभाषा नहीं होती—
Gulzar
“दिल में कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं,
जिनका नाम नहीं होता…
पर एहसास उनकी मौजूदगी का
हर वक्त होता है।
धीरे-धीरे राघव बदलने लगा। पहले जहाँ संस्कार की बातें उसे अच्छी लगती थीं, अब वही बातें उसे कभी-कभी दिखावा लगने लगीं। संस्कार को यह बदलाव महसूस हो रहा था, लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है।
एक दिन ऑफिस में एक छोटी सी बात पर दोनों के बीच बहस हो गई। बात बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन उस दिन पहली बार उनकी बातचीत में खामोशी आ गई। और सच तो यह है कि रिश्ते अक्सर बड़े झगड़ों से नहीं टूटते, बल्कि छोटी-छोटी गलतफहमियों से धीरे-धीरे कमजोर हो जाते हैं।
कुछ दिनों बाद ऑफिस में एक मीटिंग हुई। मीटिंग के दौरान सीनियर मैनेजर ने अचानक एक पुरानी बात का जिक्र किया—“अगर उस समय संस्कार अपना नाम वापस नहीं लेता तो आज इस प्रोजेक्ट की जगह पर राघव नहीं होता।” यह सुनकर राघव एकदम चुप हो गया। उसे पहली बार पता चला कि जिस मौके ने उसकी ज़िंदगी बदल दी थी, उसके पीछे संस्कार का फैसला था। उस पल उसके मन में बहुत सारी बातें घूमने लगीं—लोगों की बातें, अपने शक और संस्कार का हर बार उसके लिए पीछे हट जाना। तब उसे एहसास हुआ कि उसने अपने सबसे सच्चे दोस्त को ही गलत समझ लिया।
उस शाम ऑफिस लगभग खाली हो चुका था। राघव ने देखा—संस्कार अपनी मेज की दराज धीरे-धीरे खाली कर रहा है। वह अपने कागज़, किताबें और छोटी-छोटी चीज़ें बैग में रख रहा था।
राघव ने धीरे से पूछा—“ये सब क्यों समेट रहा है?”
संस्कार कुछ पल चुप रहा, फिर हल्की सी मुस्कान के साथ बोला—“बस… कहीं और जाना है।”
राघव ने हैरानी से पूछा—“मतलब?”
संस्कार खिड़की के बाहर देखते हुए बोला—“ऑफिस छोड़ रहा हूँ… दूसरे शहर जा रहा हूँ।” कमरे में एक अजीब सी खामोशी छा गई।
राघव के पास बहुत सारे सवाल थे, लेकिन शब्द जैसे कहीं खो गए थे। वह बस इतना ही कह पाया—“मुझे बताया भी नहीं?”
संस्कार मुस्कुराया और बोला—“सोचा… बताने से क्या बदल जाता।” उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी, बस एक थकान थी। जैसे अब उसे किसी से कोई उम्मीद नहीं रही हो। वह अपना बैग उठाकर दरवाज़े की तरफ बढ़ गया। दरवाज़े तक पहुँचकर एक पल के लिए रुका, पीछे मुड़कर राघव की तरफ देखा और बस इतना कहा—“
ख़याल रखना अपना।” और फिर वह धीरे-धीरे वहाँ से चला गया।
संस्कार के जाने के बाद ऑफिस वही था, लोग वही थे, काम भी वही था… लेकिन राघव को सब कुछ बदल गया सा लगने लगा। कभी-कभी वह अनजाने में उस खाली कुर्सी की तरफ देख लेता जहाँ संस्कार बैठा करता था। धीरे-धीरे उसे संस्कार की छोटी-छोटी बातें याद आने लगीं—उसका बिना वजह हँसना, हर मौके पर राघव का नाम आगे करना और हर बार वही कहना—“तेरे लिए नहीं करूंगा तो किसके लिए करूंगा?” अब जब भी राघव यह वाक्य याद करता, उसकी आँखें खुद-ब-खुद नम हो जातीं। क्योंकि उसे अब समझ आ चुका था कि कभी-कभी लोग हमें धोखा नहीं देते… हम खुद अपने भरोसे को कमजोर कर देते हैं। ऐसे ही लम्हों में Gulzar की एक पंक्ति फिर याद आती है—
“दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन, बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए।
” समय के साथ सब कुछ सामान्य हो गया, लेकिन राघव के दिल में एक खाली जगह हमेशा के लिए रह गई। क्योंकि कुछ रिश्ते जिंदगी से चले जाते हैं, लेकिन दिल से कभी नहीं जाते। और संस्कार… अब उसकी जिंदगी में कोई इंसान नहीं रहा था। वो बस एक याद बन चुका था।