Invisible Drink - 25 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | अदृश्य पीया - 25

Featured Books
  • نیلا آسمان

    نیلا آسمانخوابوں، جدوجہد اور امید کی کہانیباب 1 — آسمان کو د...

  • Safar e Raigah - 24

     Me aaj koi Manzar post karne aayi hu me ye bata ne aayi hu...

  • Safar e Raigah - 23

    منظر ۔آیت اپنے کمرے میں داخل ہوئی تو مبشرہ اسے دیکھ کر مسکرا...

  • Safar e Raigah - 22

        منظر ۔آیت نے ایک گہری سانس لی اور اپنی نظریں ڈھلتے ہوئے...

  • یادوں کا جام پیو

    یادوں کا گلاس بھرو محبت میں نشہ آور یادوں کا گلاس بھرو۔ بلان...

Categories
Share

अदृश्य पीया - 25

(सुबह का वक्त। कौशिक की हथेली में नए फ्लैट की चमचमाती चाबी है।)
(वो चाबी को एक पल देखता है जैसे पुरानी ज़िंदगी को अलविदा कह रहा हो।)

कौशिक (धीरे से) बोला - 
“चलो सुनीति…यहाँ से फिर शुरू करते हैं।”

(सुनीति उसकी बाँह पकड़ लेती है।)

सुनीति (मुस्कुराकर) बोली - 
“इस बार भागकर नहीं… ज़िंदगी की ओर चलते हुए।”

(दरवाज़ा खुलता है।)
(खुली बालकनी,साफ़ दीवारें,खाली कमरा पर उम्मीदों से भरा हुआ।)
(सुनीति अंदर कदम रखती है। थोड़ा रुककर फर्श पर हाथ रखती है।)

सुनीति बोली - 
“यह घर…डर से नहीं बना,सपनों से भरेगा।”

(कौशिक हल्की हँसी के साथ कहता है।)

कौशिक बोला - 
“और अब कोई नहीं कहेगा—
इस घर में भूत रहता है।”

(दोनों हँस पड़ते हैं।)
(लैपटॉप खुला हुआ है। वीडियो कॉल चल रही है।)
(स्क्रीन पर ऑफिस के लोग।)

मैनेजर (स्क्रीन से) —
“Kaushik, Suniti—
great work as always.
Work from home में भी आप दोनों ने कमाल किया है।”

(कौशिक और सुनीति एक-दूसरे की ओर देखते हैं।)
(एक अनकहा सच—
कि जब वो अदृश्य थे, तब भी उनकी मेहनत दिख रही थी।)

सुनीति (कॉन्फ़िडेंट आवाज़ में) बोली - 
“Thank you sir.
अब हम और बेहतर करेंगे।”

(कॉल खत्म होती है।)
(लैपटॉप बंद।)

कौशिक बोला - 
“किसी को शक तक नहीं हुआ।”

सुनीति बोली - 
“शायद इसलिए…क्योंकि हमने कभी काम से खुद को गायब नहीं होने दिया।”

(दोनों मुस्कुराते हैं।)
(सुनीति दीवार पर छोटी-सी फोटो टाँगती है उनकी शादी की।)
(कौशिक पर्दे लगाता है। थोड़ा टेढ़ा हो जाता है।)

सुनीति (हँसते हुए) बोली - 
“सीधे लगाओ—
नई ज़िंदगी है।”

कौशिक बोला - 
“परफेक्ट नहीं…पर हमारी है।”

(शाम का वक्त। दोनों बालकनी में खड़े हैं।)
(नीचे ज़िंदगी चल रही है—गाड़ियाँ, बच्चे, आवाज़ें।)

सुनीति (गहरी साँस लेकर) बोली - 
“इतनी आवाज़ें…इतनी ज़िंदगी…
कभी लगा था ये सब हमारे लिए नहीं रहा।”

कौशिक बोला - 
“लेकिन हम लौट आए, बिना किसी को बताए कि हम कहीं गए भी थे।”

(वो उसका हाथ थाम लेता है।)

सुनीति बोली - 
“अब अगर ज़िंदगी मुश्किल हो भी…तो हम छुपेंगे नहीं।”

कौशिक बोला - 
“और अगर कभी अंधेरा आया…तो साथ मिलकर उसे देखेंगे।”

(सूरज धीरे-धीरे ढलता है। नई खिड़की से आती रोशनी उनके चेहरों पर पड़ती है।)

नई छत थी…पर कहानी वही थी—
संघर्ष, प्यार और साथ।
वो अदृश्य होकर भी ज़िम्मेदार रहे, और अब दृश्य होकर ज़िंदगी को जीने के लिए तैयार थे।

(सुबह की हल्की धूप। नई खिड़की से रोशनी अंदर आती है।)
(अलार्म बजता है।)

(सुनीति करवट बदलकर कौशिक की ओर देखती है—
वो चैन से सो रहा है।)

सुनीति (मुस्कुराकर, धीमे से) बोली - 
“अब डर नहीं लगता…”

(वो उसका माथा सहलाती है।)
(दोनों तैयार हो रहे हैं। कौशिक टाई ठीक कर रहा है।)

कौशिक बोला - 
“आज लेट मत करना,शाम की चाय साथ पीनी है।”

सुनीति बोली - 
“अब रोज़ साथ ही तो है।”

(दरवाज़ा बंद होता है। लिफ्ट में दोनों साथ खड़े हैं—
बिल्कुल आम कपल की तरह।)
(ऑफिस का माहौल। कौशिक अपने डेस्क पर। सुनीति मीटिंग रूम में।)
(लोग काम में व्यस्त हैं। कोई नहीं जानता कि ये दोनों कभी दुनिया से गायब हो चुके थे।)

मैनेजर (दूर से) बोला - 
“Good work, Kaushik!”

(कौशिक हल्की मुस्कान देता है।)
(शाम। फ्लैट का दरवाज़ा खुलता है।)
(सुनीति सैंडल उतारते हुए थकान से आँखें मूँद लेती है।)

सुनीति बोली - 
“दिन कितना लंबा था…”

(कौशिक उसकी ओर बढ़ता है।)

कौशिक बोला - 
“अब खत्म हुआ।”

(वो उसे हल्के से अपनी बाहों में ले लेता है।)

(रसोई में चाय बन रही है। भाप उठती है।)
(सुनीति सब्ज़ी काट रही है।)

कौशिक (मज़ाक में) बोला - 
“याद है…जब हम दिखाई भी नहीं देते थे,
तब भी साथ थे?”

सुनीति (हँसते हुए) बोली - 
“अब दिखाई देते हैं…तो ज़्यादा सुकून है।”

(रात। कमरे में हल्की रोशनी।)
(दोनों बिस्तर पर लेटे हैं।)
(सुनीति धीरे-धीरे कौशिक के करीब सिमट जाती है।)

सुनीति बोली - 
“अब डर नहीं लगता,नींद खुलने पर आप गायब नहीं मिलोगे।”

(कौशिक उसे कसकर थाम लेता है।)

कौशिक बोला - 
“अब कहीं नहीं जाऊँगा।”

(दोनों एक-दूसरे की बाहों में। साँसों की लय एक-सी।)
(कोई कैमिकल नहीं, कोई मशीन नहीं, कोई अदृश्य डर नहीं।)
(बस…साथ और भरोसा।)

अब उनकी ज़िंदगी किसी चमत्कार पर नहीं टिकी थी, बल्कि रोज़मर्रा के भरोसे पर।
काम, घर और नींद—
सब साधारण था, और यही सबसे बड़ी जीत थी।