Dhokhaghadi karne wale vikreta - 3 in Hindi Horror Stories by Abhishek Chaturvedi books and stories PDF | धोखाधड़ी करने वाले विक्रेता - भाग 3

Featured Books
Categories
Share

धोखाधड़ी करने वाले विक्रेता - भाग 3

धोखाधड़ी करने वाले विक्रेता: हिस्सा-3 (अनन्त का अभिशाप)

'अनंत विंटेज पैलेस' को सील किए हुए छह महीने बीत चुके थे। दुकान के लोहे के दरवाज़ों पर लगी सरकारी मुहर पर धूल जम चुकी थी, लेकिन बनारस की गलियों में सन्नाटा अब भी उस दुकान के पास आकर गहरा हो जाता था। 
लोग उस रास्ते से गुजरने से कतराते थे, क्योंकि अक्सर रात के सन्नाटे में वहॉं से किसी के पत्थर घिसने की आवाज़ें आती थीं, जैसे कोई आज भी वर्कशॉप में नक़ली गहने तराश रहा हो।


रहस्य की नई दस्तक:-
शहर में एक नया जॉंच अधिकारी आया, राजन। 
राजन तार्किक और विज्ञान में भरोसा रखने वाला इंसान था। उसने विनायक के इस्तीफ़े और अभिषेक की मौत की फाइलों को 'वहम' मानकर ख़ारिज कर दिया था।
"कॉंच का हार गला नहीं जलाता, हवलदार। या तो वहॉं कोई एसिड था, या फिर किसी ने अभिषेक को ज़हर दिया था," राजन ने फाइल बंद करते हुए कहा।

उसने तय किया कि वह उस रात 'अनंत विंटेज पैलेस' के अंदर अकेला रुकेगा ताकि इस 'भूतिया' कहानी का सच सामने ला सके।


खौफ़नाक रात:-
रात के 12 बज रहे थे। राजन ने सील तोड़ी और दुकान के अंदर दाख़िल हुआ। अंदर की हवा भारी और ठंडी थी। टॉर्च की रोशनी में पुरानी मूर्तियॉं और खंडहर जैसे फर्नीचर किसी मरे हुए इन्सान के अवशेष लग रहे थे।
राजन सीधा अभिषेक की उसी वर्कशॉप में गया। वहॉं मेज पर सब कुछ वैसा ही था, औजार, रसायन और कुछ आधे तराशे हुए पत्थर।

 तभी, कमरे के कोने में रखे एक पुराने ग्रामोफोन से खुद-ब-खुद संगीत बजने लगा। वह एक पुराना उर्दू गीत था, जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते थे।

"कौन है वहॉं?" राजन ने अपनी पिस्टल निकाली थी।

तभी, वर्कशॉप के शीशे में उसे एक परछाई दिखी। वह अभिषेक था। लेकिन वह अभिषेक नहीं जो तस्वीरों में दिखता था—उसका चेहरा आधा जला हुआ था और गले में वही चमकता हुआ अभिशप्त हार लिपटा हुआ था।


रूहानी सौदा:-
"तुम यहॉं सच ढूंढने आए हो?" अभिषेक की रूह की आवाज़ सीधे राजन के दिमाग़ में गूंजी। "सच बहुत महॅंगा है, इंस्पेक्टर। क्या तुम इसकी क़ीमत चुका पाओगे?"

राजन ने गोली चलाई, लेकिन गोली दीवार के पार निकल गई। अभिषेक की रूह धीरे-धीरे उसकी तरफ़ बढ़ी। "मैंने मायरा को धोखा दिया था, लेकिन अब मुझे समझ आया... मायरा कोई रूह नहीं थी।

 वो इस 'अनंत' दुकान की भूख थी। यह दुकान सिर्फ़ उन लोगों को अपनी ओर खींचती है जिनके मन में लालच होता है।"

तभी वर्कशॉप की अलमारियॉं अपने आप खुलने लगीं। हज़ारों कीमती गहने हवा में तैरने लगे। लेकिन जैसे ही राजन ने उन्हें छूने की कोशिश की, वे सब इंसानी हड्डियों और दॉंतों में बदल गए।


अन्तिम फैसला:-
अचानक, दुकान का फर्श धंसने लगा। नीचे एक गहरी खाई थी जिसमें अनगिनत लाशें दबी हुई थीं—ये उन सभी विक्रेताओं की थीं जिन्होंने सदियों से यहां बैठकर झूठ बेचा था।
अभिषेक की रूह ने राजन का हाथ पकड़ा। "वो देखो... अगली जगह तुम्हारी है।"
राजन ने देखा कि वहॉं एक नेमप्लेट पहले से तैयार थी, जिस पर लिखा था- 'राजन:-सत्य का सौदागर'।

डर के मारे राजन की चीख निकल गई। उसने अपनी जेब से माचिस निकाली और पास ही रखे रसायनों के डिब्बों पर फेंक दी। पल भर में पूरी वर्कशॉप आग की लपटों में घिर गई। वह आग सामान्य नहीं थी,वो नीले रंग की थी, जो शायद रूहों को भी जला देने की ताक़त रखती थी।


राख का सन्नाटा:-
जब सुबह हुई, 'अनंत विंटेज पैलेस' पूरी तरह राख हो चुका था। राजन दुकान के बाहर बेहोश मिला। उसके बाल पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे और उसकी याद्दाश्त जा चुकी थी। वो सिर्फ़ एक ही शब्द दोहरा रहा था - "धोखा... अनन्त धोखा।"

पुलिस को राख के ढेर में अभिषेक का कंकाल मिला, लेकिन उसके गले में कोई हार नहीं था। वहॉं सिर्फ एक छोटा-सा पत्थर पड़ा था, जिस पर 'अभि' ख़ुदा हुआ था।

'नूर-ए-मोहब्बत' का हार कभी मिला ही नहीं। लोग कहते हैं कि वो हार अब भी बनारस की किसी गुमनाम गली में किसी नए 'धोखेबाज़ विक्रेता' का इंतज़ार कर रहा है, ताकि एक बार फिर प्यार और मौत का नया सौदा किया जा सके।
लेखक: अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'
जानिए अगला रहस्य अगली भाग में