MTNL ki ghanti - 4 in Hindi Drama by kalpita books and stories PDF | MTNL की घंटी - 4

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MTNL की घंटी - 4

प्लीज़… बस आप एक काम कर दीजिए… कान्हा के कान पर रिसीवर रख दीजिए… आप सुन रहे हैं ना?”
महक लगभग चीख पड़ी थी। उसकी आवाज़ में उतावलापन भी था और ममता भी।
देव कुछ पल चुप रहा… फिर गहरी साँस लेकर बोला—
“ठीक है… रखता हूँ।”
बहुत मुश्किल से उसने रिसीवर उठाया और काँपते हाथों से कान्हा के कान के पास ले गया।
दूसरे हाथ से उसने कान्हा को अपने सीने से कसकर लगाया हुआ था… जैसे टूटते हुए पल को थाम रहा हो।
महक ने बिना एक पल गँवाए गाना शुरू कर दिया—
“यशोमती मैया से बोले नंदलाला…
राधा क्यों गोरी… मैं क्यों काला…”
उसकी आवाज़ फोन की तारों से होती हुई सीधे कान्हा तक पहुँच रही थी—
हर शब्द में ममता थी… हर सुर में दुलार…
धीरे-धीरे कान्हा का काँपता शरीर शांत होने लगा…
तेज़ चलती साँसें थमने लगीं…
चेहरे पर छाई बेचैनी… सुकून में बदलने लगी।
पास खड़े दीनू काका ने राहत की साँस ली।
उन्होंने जल्दी से दलिया का कटोरा उठाया और एक-एक चम्मच कान्हा को खिलाने लगे।
दवा भी दे दी गई।
देव अब भी उसे थामे बैठा था…
रिसीवर अब भी कान्हा के कान पर टिका था।
कुछ देर बाद… जब महक की आवाज़ थमी…
तो देव खुद को रोक नहीं पाया।
“ह… हेलो…” उसकी आवाज़ भर्रा गई थी।
“अब… अब कैसा है कान्हा?”
महक ने धीमे से पूछा—जैसे अपने शब्दों से उसके आँसू पोंछ रही हो।
“जी… अब वो बेहतर है… सच कहूँ तो… मैं ज़िंदगी भर आपका एहसान नहीं चुका पाऊँगा…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी, “आप समझ भी नहीं सकतीं… आपने आज क्या किया है…”
महक की आँखें भी नम हो गईं।
उसने खुद को सँभालते हुए पूछा—
“कान्हा… आपका बेटा है?”
“हाँ… मेरी ज़िंदगी है वो…”
देव ने धीरे से कहा, “तेरह साल का है… लेकिन बचपन से ‘क्लोनिक सीज़र’ से जूझ रहा है… अचानक दौरे पड़ते हैं… चल भी नहीं पाता…”
वो रुक गया। शब्द जैसे गले में अटक गए।
महक के दिल में टीस उठी—
“प्लीज़… आप खुद को संभालिए…”
कुछ पल की खामोशी के बाद उसने पूछा—
“और… उसकी माँ?”
देव हल्का सा हँसा… मगर वो हँसी दर्द से भीगी हुई थी—
“सिर्फ नाम की माँ है… ऐसी माँ से तो बेहतर था… कि होती ही नहीं…”
महक चुप रही… फिर धीरे से बोली—
“ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?”
देव ने गहरी साँस ली… जैसे किसी पुराने ज़ख्म को फिर से खोल रहा हो—
“वो कभी बच्चा चाहती ही नहीं थी… उसे अपनी आज़ादी प्यारी थी…
और कान्हा… उसके लिए बस एक बोझ…”
उसकी आवाज़ टूटने लगी—
“जब उसे पता चला… तो उसने… उल्टी-सीधी गोलियाँ खा लीं…
बस… वही एक गलती… जिसकी सज़ा आज तक मेरा बेटा भुगत रहा है…”
आँसू अब रुक नहीं रहे थे।
“कान्हा पैदा तो हुआ… मगर कभी सामान्य नहीं हो पाया…
डॉक्टर ने कहा… जो नुकसान होना था… गर्भ में ही हो चुका था…”
कुछ पल रुककर उसने खुद को संभालने की कोशिश की—
“हमारे रिश्ते में पहले ही दरार थी…
और अब… वो दरार खाई बन गई…”
वो कड़वा मुस्कुराया—
“भगवान करे… ऐसी माँ किसी को न मिले…
सोनिया… माँ कहलाने के लायक ही नहीं है…”
फिर उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई—
“अब मेरी ज़िंदगी… मेरी साँसें… सब कुछ सिर्फ कान्हा है…
वो ही मेरी वजह है जीने की…”
उसने रुककर कहा—
“और आज… पहली बार… तुम्हारी वजह से…
मैंने उसके चेहरे पर सुकून देखा है…”
अब वह रो पड़ा—बिना किसी रोक के…
जैसे बरसों का दर्द बह जाना चाहता हो।
महक दूसरी तरफ चुपचाप सुन रही थी…
उसकी आँखों से भी आँसू बह निकले।
वो बस इतना कह पाई—
“रो लीजिए देव… जी भर के रो लीजिए…
आज खुद को ये हक़ दीजिए…”
फोन की दोनों तरफ—
दो अनजान लोग…
एक जैसा दर्द…
और एक रिश्ता… जो शायद नाम से परे था।
क्या ये सिर्फ हमदर्दी थी…?
या किसी नए रिश्ते की शुरुआत…?
महक—एक शादीशुदा औरत…
क्या ये भावनाएँ उसके जीवन को उलझा देंगी?
और… देव आखिर है कौन?
To be continued…