Main Bhi Chetan in Hindi Love Stories by Prafulla Kumar Tripathi books and stories PDF | मैं भी चेतन

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मैं भी चेतन

                     बहुत मुश्किल में डाल दिया है तुमने |.. आज क्या मुझे अपनी चुप्पी तोडनी ही होगी ?.. नहीं, छोड़ो भी |एक मेरे बोलने या ना बोलने से तुम तथाकथित बुद्धिजीवियों, कलाकारों, नर्तकों,लेखकों और कवियों पर क्या कोई फ़र्क  पड़ेगा ?

                     लेकिन, कुछ तो पड़ेगा |सबसे ज्यादा फ़र्क  तो ऐसी मान्यता रखने वाले भौतिक शास्त्रियों को पड़ेगा जो मुझको   जड़ मानते हैं |उनका कहना है कि “मैं मात्र एक मेटेरियल हूँ और कुछ नहीं |” उनका कहना है कि” तुम देख नहीं सकते ,तुम सुन नहीं सकते , तुम बोल  भी नहीं सकते | तुममे कोई स्पंदन नहीं हो सकता है |”

                     इसलिए अब मुझे अपनी चुप्पी तोड़ देनी होगी | मैं तुम्हें सारी बातें बताना चाहूँगा क्योंकि मैंने सबसे निकट तुम्हें पाया है | हर जगह एक जैसा ही |शहर बदल गया हो ,इलाका बदल गया हो मेरे लिए तो तुम वैसे ही हो | लोगों की दृष्टि में भले ही निष्प्राण हूँ  लेकिन तुम्हारी  दृष्टि में मुझमें स्पंदन है | हाँ यह सच है | मैं जब भी निपट अकेले में रोया हूँ तो मैंने तुम्हारी अदृश्य आँखों में पानी का सैलाब पाया है |मैं जब -जब हंसा हूँ तो तुम्हारी खिलखिलाहट ने मेरा साथ दिया है |ध्वनि और दृश्य की इस मायावी दुनियाँ से तुम्हें मुझसे कोई पृथक नहीं कर सकता ,चाह कर भी नहीं कर सकता |

   “अच्छा ? तो शायद तुमने अपनी अतीन्द्रियों से उन दिनों की घटनाओं का अनुभव कर लिया होगा वरना रोज तो इन दीवारों के बीच में ऐसी घटनाएं हुआ करती  हैं |उन दिनों की  बातों को कुछ बता सकोगे क्या ?”

   “बताना क्या ? लोग मेरे करीब, बेहद करीब आकर हसते हैं, गाते हैं, प्यार करते हैं,चूमा चाटी करते हैं और  गुस्सा भी करते हैं |मानो वे किसी अलग दुनियाँ में आ गए हों |मैंने तो उनका असली मुखौटा देखा है |अब , अब तो मैं  थक सा गया हूँ इनकी रोज रोज केंचुले उतरती देख कर | ”

             “फिर बोलो ना ?कौन हैं ये लोग ? सृजन, रचना, कला, संगीत, नाटक में रचे - बसे इन चेहरों को बेनकाब होते देखा है तुमने |”

               इसके बाद चुप्पी का एक लंबा समुद्र मुझे पार करना पड़ा |लेकिन मेरी प्रतीक्षा, मेरा धैर्य व्यर्थ नहीं गया |जड़ (अचेतन) समझे  जाने वाला वह चेतन तत्व बोल ही पड़ा |

   “छोटी सी गुड़िया थी वह |क्या नाम था  उसका ? .. छोड़ो नाम में क्या रखा है |जब वह स्टूडियो में आती थी तो लगता था कि वसंत की थाप सुनाई दे रही है | उसमें यौवन की ताजगी थी और बहुत धीमे स्वर में वह बोला करती थी |जब वह पहली बार आई थी तो उसकी  आँखों में उत्सुकता का पानी टपक  रहा था | शायद वह कुछ ज्यादा ही रोमांचित थी |अपनी कला को नया आयाम देने के लिए उसने इस दुनियाँ में पहली बार कदम रखा था |उसकी आवाज हजार लोगों तक पहुंचेगी, यह सोच कर वह रोमांचित हो उठती थी | स्टूडियो के अंदर घुसते ही उसे लगता था कि वह सपनों की दुनिया में  आ गई है |सपना जो कभी भी कहीं भी और उम्र के किसी भी पड़ाव पर हम सब देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं | उस दिन उसने उस बड़े को यह सुनते ठीक ही महसूस किया था –“हाँ हुज़ूर,मैं सपने देखता हूँ ,ऐसे सपने जो कम से कम कुछ घंटों के लिए आपको अपनी निजी ज़िंदगी की उलझनों-परेशानियों से अलग -थलग तो रख सकते हैं !”

             बहुत घबड़ाई हुई थी वह जब उसने पहली बार स्टूडियो के लाइव माइक्रोफोन का सामना किया |उसकी घबडाहट साफ साफ उसके चेहरे से और उसके बोले जा रहे शब्दों से व्यक्त हो रही थी |एक बार तो उसे लगा कि यह सब उसके वश  की बात नहीं एक साथ तीन तीन मशीनों को चलाना ,माइक्रोफोन संभालना और घड़ी की एक एक टिक टिक पर नजर रखना .. .. |उसके मुंह से निकला “उफ़!मैं कहाँ आ फंसी |”

   लेकिन पहली ड्यूटी के बाद जब वह अपनी सहेलियों से मिली और उनकी ईर्ष्या मिश्रित प्रतिक्रियाएं सुनने को मिलीं तो वह आवाज की दुनियाँ की अंदरूनी घबड़ाहटों को भूल बैठी |उसे ऐसा लगा कि सब कुछ सामान्य होकर भी उसमें अब कुछ असामान्य सा ऐसा गुण आ गया है जिससे वह आम में खास हो गई है |

  ‘लड़की , प्यारी लड़की ! मैंने तुम्हारे एक- एक पल का पूरा हिसाब अपने पास रख छोड़ा है |तुम्हारे साथ वह एक नौजवान जब पहली बार मुझे दिखा था न जाने क्यों वह मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा था |किन्तु तुम खुश थी ,तुम्हें वह कुछ अपना सा लगता जा रहा था तो मैं भी चुप था  |वैसे मैंने उस नौजवान की  आँखों में तुम्हारे प्रति प्यार नहीं वासना देख ली थी परंतु .. .. |”

  समय पंख लगा कर उड  रहा था और शायद तुम दोनों भी  | तुम धीरे धीरे स्टूडियो की इन गलियों में उस नौजवान के साथ मिल कर सपने देखने लगी थी |मैंने तुम्हें खिलखिलाते हुए देखा है , औरों की नजरें बचा कर तुम दोनों को प्यार करते हुए भी देखा है | हाँ - हाँ तुम या तुम जैसे तमाम नौजवान यह भूल जाते हैं कि मैं जड़ नहीं चेतन हूँ |मैं देखता, सुनता, महसूस करता, सब हूँ बस बोल नहीं पाता हूँ !                                      

               तुम दोनों के प्यार दुलार देख कर मैं भी रोमांचित हो उठता था |ऊपर वाले से कहता कि बस अब बहुत हो चुकी तुम्हारी  दी हुई सजा |अब मुझे मनुष्य का रूप दे दो प्रभु जिससे मैं भी खिलखिला कर हंस सकूँ, रो सकूँ और वह सब कर सकूँ जो मैं नहीं कर पा रहा हूँ, सिर्फ़ देख सुन और महसूस कर पा रहा हूँ  |यह मैं ही तो हूँ जो शापग्रस्त होकर तुम लोगों के हर उचित अनुचित व्यवहार को देखता सुनता रहता हूँ |उस रात .. छि .. मुझे शर्म आती है यह कहते हुए कि जब बिजली गुल हो गई थी और जेनरेटर चलाने में कुछ देर हुई थी तो कैसे वह लफंगा हिंसक जानवर बनकर तुम्हें खा  जाने को आतुर हो उठा था !एक नर को एकाएक पिशाच बनते देखा था .. और तुम कितनी निरीह हो गई थी |वह अपने नाखून भरे पंजों से तुम्हें अपने बाहुपाश में जकड़ने वाला ही था कि बिजली आ गई और सब कुछ सामान्य हो उठा |

  कच्ची उम्र की भावुक ,प्यारी और नादान लड़की |आज तुम ना जाने कहाँ किस रुप में होगी |यह भी हो सकता है कि तुम्हारी अतृप्त इच्छाओं के चलते  तुम्हें अभी मुक्ति ही ना मिली हो .. तुम्हारी आत्मा अभी भी भटक रही हो यहीं ,स्टूडियो के उन्हीं कक्षों में जहां तुम अपने प्रेमी के साथ सनहले सपने देखा करती थी |

  मैंने पूछा फिर उसके बाद ?

  वह बोल उठा -प्रतिदिन की  तरह उस दिन भी सुबह का सूरज निकला था |रात की कालिमा सूरज के प्रकाश से छँट रही थी | सुबह की शिफ्ट आ चुकी  थी और वह उसमें सम्मिलित थी |कुछ बुझी - बुझी सी |

क्या हो गया था तुम्हें कल रात ?और आज वह लफंगा भी नहीं दिखाई दे रहा है ?

वह मौन थी | स्टूडियो के अंदर वायुशीत तापित वातावरण के बावजूद उसका शरीर मानो तप रहा था |शायद बुखार ग्रस्त थी वह |

लेकिन हुआ क्या ? कल से आज में तुम क्या से क्या बन गई हो ! हो ना हो जरूर उस लफंगे ने तुम्हें सताया है |

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इधर उसका स्टूडियो आना जाना कुछ काम हो चला था |पता चला है कि उसने बस्ती में कोई नौकरी पा ली है |वह इस शहर से उस शहर के लिए रोज अप डाउन करती  है |कोई बता रहा था कि वह लफंगा अब तुम्हारा बॉडीगाड बनकर साथ आता जाता है |तुम दोनों की निकटता अब चर्चा का विषय बन चुकी  है |क्या तुम दोनों ने शादी कर ली है ?

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एक अच्छी कलाकार बनने का सपना लेकर तुम स्टूडियो मे आई थी और मंजिल पाने के पहले ही तुमने अपने सपनों का रूख मोड दिया और अब तुम अपने सपनों के  राजकुमार को वरीयता देना शुरू कर दिया है |सपना.. राजकुमार ..  और वह लफंगा !नहीं लड़की तुम बहक रही हो |वह तुम्हें बर्बाद करके छोड़ेगा |जिस पवित्रता से तुम उसकी ओर खींचि  जा रही हो वह उसके लायक नहीं |वह तो एक आवारा बादल  है |कभी यहाँ तो कभी वहाँ बरसता रहता  है |

  मेरा क्या ? मैं विवश होकर तुम्हारा खिलना मुरझाना और शायद असमय टूट कर बिखर जाना देख रहा हूँ |उस दिन जब तुम स्टूडियो में फूट फूट कर रो रही थी तभी मैं समझ गया था कि तुम टूट चुकी हो |तुमने प्यार की कोमल भावनाओं में आकर उस छलिया के लिए अपना सर्वस्व नौछावर कर दिया है |अब तुम्हारे सामने दो ही विकल्प हैं या तो बिन ब्याहे माँ बनना या आत्महत्या करना |

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  उस दिन अखबार की  ढेर सारी खबरों के बीच एक खबर पढ़ कर सभी चौक गए थे –“एक नवयुवती द्वारा आत्महत्या |”इस खबर ने मुझे चौंका दिया | हो न हो वह नवयुवती तुम ही हो |क्या तुमने , प्यारी लड़की, आत्महत्या कर ली ?क्यों ? आखिर क्यों तुमने ऐसा किया ?तुमने उस छलिया को क्यों नहीं मार डाला जिसने तुम्हारी अस्मत लूटी है ?क्यों उसे यूं ही छोड़ डाला कला और संस्कृति के इस मंदिर मे आने वाली नई कलियों को सपने दिखने  और फिर उन सपनों को मसलने और फिर निचोड़ कर मार डालने के लिए!                                     तुम तो जानते ही हो कि किसी सुसभ्य समाज के संवेदनहीन , अमानवीय तथा बर्बर होने और होते चले जाने ,उसमें मानवीयता ,नैतिकता आदि की अनुपस्थिति पर आज के युग में चिंताऐं प्रकट करने का रिवाज खत्म हो रहा है |यह विकसित हो रही दुनियाँ का एक शोक समाचार है जिसके मार्क प्रभाव मे आकर तमाम मानवीय सरोकार बीते युग के मुहावरों में तब्दील होते जा रहे हैं | दुनियाँ की इस संवेदनहीनता  से मैं आहत हूँ किन्तु सिवाय अपनी छटपटाहट व्यक्त करने के मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है |

तुम्हारी आत्महत्या ने तुम्हारी कायरता प्रदर्शित की है |तुम्हें तो सच के साथ जीते हुए अन्याय के विरुद्ध लड़ना चाहिए था |लड़की, बेचारी लड़की यह तुमने क्या किया ?

“मैं भी चेतन “ का उदघोष करने वाला अब मौन हो गया  था और अभी तक उसकी बातें सुनने वाला वाणी सम्पन्न प्राणी मैं अपने आपको गूंगा पाने लगा |ऐसा लगा कि मुझे उसका मौन फिर - फिर तोड़ना होगा क्योंकि जब वह बोलेगा तभी तो कई दाबी पड़ी कहानियों को स्वर मिल सकेगा !ध्वनि और शब्द माध्यम के लाखों लाख लिखे - अन  लिखे अध्यायों को प्रकाश में लाया जा सकेगा |

लेकिन यह “मैं भी चेतन “ का उदघोष करने वाला है कौन ?

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