Arya in Hindi Motivational Stories by Radhika books and stories PDF | आर्या

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आर्या

बरसात की हल्की-हल्की बूंदें टीन की छत पर गिर रही थीं। जहां वह बैठकर वह बरसात के बूंदों को अपने पन्ने में इस तरह बयां कर रही थी मानों वो बारिश का पानी नहीं उसके आंसू हों। 
       उसका नाम आर्या था। सांवली सी, साधारण सी, भीड़ में खो जाने वाली लड़की। बस उसकी मुस्कान बड़ी प्यारी थी। गालों पर डिम्पल पड़ते थे उसके। वो उन लड़कियों में से थी जिन्हें कहानियों में “बेस्ट फ्रेंड” का रोल मिलता है… हीरोइन का नहीं। वो अक्सर अपने किस्मत को कोसती थी। वो जिस तरह कि जिंदगी जी रही थी, वो हर लड़की के बस का नही था। माना लड़कियां इमोशनली काफी स्ट्रॉन्ग होती हैं लेकिन सब अनलकी थोड़े ही होती हैं।

दोस्ती-यारी और प्यार मोहब्बत इन सब में तो मानों किस्मत हर बार उसके गाल पर थप्पड़ मार कर जाती थी। पर उसे पता था वो जिस कंडिशन में जी रहीं हैं, उसके मां बाप उससे भी ज्यादा परेशानियां झेल रहे हैं सिर्फ उसके खातिर, इसलिए हर बार एक प्यारी सी मुस्कान लिए वो हर परेशानी को झेलती जाती। शायद उस पत्थर कि तरह जो मंदिरों में नारियल फोड़ने के लिए होता है। 
     हर महीने की एक तारीख को घर का माहौल थोड़ा भारी हो जाता था। क्योंकि इस समय आर्या का रूम रेंट और महीने का ख़र्च के लिए पैसों की जरूरत होती है। 

पापा अपनी पुरानी डायरी निकालते, खर्चों का हिसाब लगाते। मम्मी रसोई में चुपचाप दाल में थोड़ा और पानी मिला देती… ताकि सबका पेट भर जाए।

आर्या को उनसे पैसे लेना अच्छा तो नहीं लगता लेकिन दिल पर पत्थर रख कर वह अपने पापा से पैसों कि बात कहती हैं — " पापा..... वो, मुझे इस बार मुझे थोड़े ज्यादा पैसों कि जरुरत पड़ेगी। दरअसल कॉलेज फीस भरना है और स्कॉलरशिप अभी तक आई नहीं है।" 

पापा मुस्कुराते हुए कहते—“अरे बस इतनी सी बात? हो जाएगा बेटा.... तुम फिक्र मत करो। पापा के होते हुए किस बात कि फ़िक्र?" 

"सच में! पापा के होते हुए किस बात की फ़िक्र?" मगर वो जानती थी… ये “हो जाएगा” के पीछे कितनी भागदौड़, कितनी उधारी और कितनी रातों की नींद छिपी होती है। उसे सबसे ज्यादा दर्द इसी बात का था वो ले तो रही है… पर दे कुछ नहीं पा रही थी ।
        हर बार जब भी उसे पैसों या किसी चीज़ कि जरुरत पड़ती वो परेशान सी खाली पर्स को देखती, अकेले में खुद को समझाती कि एक दिन वो अपने मेहनत से वो दिन जरूर लाएंगी जिस दिन मां पापा को वो एक बेहतर जिंदगी देगी और भाई को भी तो पढ़ाना है।

वो जिस घर में रहतीं थीं वो चार रूम का छोटा सा एक आम मिडिल क्लास घर…था,जहाँ सपने बड़े होते हैं, लेकिन जेबें छोटी। अपने सपनों को पूरा करने के लिए मां पापा से दूर वो दुसरे शहर में रहती थी। जहां दिन काटना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था।

उसके पास दोस्त तो बहुत थें मगर उसका कोई खास दोस्त नहीं था। उसके दोस्तों को वो हर बार डिसपॉइंट कर देती थी। कोई ट्रिप का प्लान हो या कैफ़े में पार्टी, इन सब चीजों पर उसे पैसे खर्च करना पसंद नहीं था इसलिए सब उससे दुर रहना ही पसंद करते थे। क्योंकि वे सोचते थे कि इसके साथ चाय पीने भी जाएंगे तो उसके पैसे भी उन्हें ही देना पड़ेगा। इसलिए वो भी धीरे-धीरे दूर हो गए। ग्रुप फोटो में उसे टैग करना भूल जाते। वैसे बहुत कम ही फोटो थे उनके साथ क्योंकि हर बार तो आर्या न चाहते हुए भी उनकी कैमरामैन बन जातीं थीं। काफी प्लान में उसका नाम आखिरी में आता… या आता ही नहीं। पार्टी हों या फिर ट्रिप सबसे लास्ट में उसे ही पूछा जाता था और हर बार वो मना कर देती क्योंकि उनके बीच हर बार वो अकेली पड़ जाती थी। 
    आर्या को लगता था — "शायद सच में वो किसी को पसंद नहीं।" आईने के सामने खड़ी होकर वो अक्सर खुद को देखती। सांवली त्वचा, साधारण चेहरे के नक्श…।
समाज ने जैसे पहले ही तय कर लिया था, हीरोइन गोरी होगी, मुस्कुराती होगी, सबकी पसंद होगी।
और वो....? वो तो बस साइड कैरेक्टर थी, जो हिरोइन के साथ रहकर बस किसी सीन को पूरा करती थी।

पर इस बात से वह हमेशा खुश होती कि कोई था जो उसे पसंद करता था। हर बार उदास होने पर उसके लिए चुपके से किताब के अंदर कोई नोट छोड़ कर चियर करता था तो कभी उसे हंसाने के लिए तरह तरह कि हरकतें करता था। इस बात पर वो बहुत खुश थी। उसने सोच लिया था शादी करेंगी तो सिर्फ राहुल से।

एक दिन अचानक सोशल मीडिया पर उसकी शादी की तस्वीरें आईं...। जहां हैसटैग में लिखा था— "मेरी पसंदीदा औरत" 🎀 उसके दिल के अंदर तो जैसे कोई सीन स्लो मोशन में टूट गया। मेहंदी से सजी हुई किसी और की हथेलियां.... उसके अरमानों को इस तरह तहस नहस कर रही थी मानों कोई गुलाब की पंखुड़ियों को तोड़ तोड़ कर जमीन पर फेंक रहें हों और उन पंखुड़ियों को पैरों तले रौंदने के लिए लोगों कि भीड़ सी लग गई हों। आर्या उस दिन बहुत रोई…पर कमरे का दरवाज़ा बंद करके।
क्योंकि मिडिल क्लास घरों में बेटियों के आँसू भी लिमिट में होने चाहिए वरना मम्मी-पापा परेशान हो जाते हैं। इस समय वो घर पर थी और उसे इस तरह देखकर सब परेशान हो जाते इसलिए दुसरे दिन सवेरे सवेरे किसी प्रॉजेक्ट का बहाना कर वो अपने अपार्टमेंट में आई मगर वहां उसकी सहेली का बॉयफ्रेंड आया हुआ था इसलिए वो चुपचाप अपना सामान रखकर एकांत ढूंढने लगी जहां कोई उसे परेशान न कर सके।
     वो चलते चलते काफी दूर आ गई थी। वहां एक छोटा सा पार्क था लेकिन ठीक पीछे एक तालाब था जहां बतखें तैर रही थी, और हवा के कारण पानी लहर बना रहीं थीं। यहां उसे एक सुकून सा मिल रहा था इसलिए एक पत्थर पर बैठकर वह चुपचाप अपने मन में चल रहे उथल-पुथल को शांत करने की कोशिश कर रही थी और जब उसकी बैचेनी बढ़ने लगी उसने पेपर उठाया और अपने मन में चल रहे उलझन को शब्दों में बयां करने लगी।
 उसकी आंखें से बार बार आंसू गिरते और पन्ने को भिगो देती। तभी किसी ने उसकी फोटो ली और बड़े प्यार से देखने लगा। ये आदित्य था जो आर्या के ही कॉलेज का लड़का था। वो आर्या को अच्छी तरह जानता था। आदित्य को उसकी सादगी हमेशा अट्रेक्ट करती थी। वो उसकी मुस्कान में खो सा जाता था।
आज वह उसके पास आकर बैठ गया। आर्या थोड़ी सी अनकम्फर्टेबल हो गई और उठ कर जाने लगी तो आदित्य ने उसका हाथ थाम लिया।
     "आर्या सुनो! थोड़ी देर यहीं रुक जाओ ना, अच्छा लग रहा है।" मगर आर्या तो मानो पत्थर की मूरत हो गई थी। बस खड़ी हुई ठंडी आंखों से उसकी तरफ देखती रही जब तक कि आदित्य ने उसका हाथ छोड़ नहीं दिया। वो जाने लगी मगर आदित्य ने इस बार उसे एक एनवलप दिया जिस पर उसकी खूबसूरत सी तस्वीर थी और साथ में एक नोट — "मुस्कराया करों, क्योंकि मुस्कुराते हुए तुम बहुत अच्छी लगती हो।" इस बार तो आर्या का दिल तड़प उठा। इस तरह का नोट उसे राहुल कि याद दिला देती थी। वो चुपचाप वहां से चली गई।

उसके बाद तो आदित्य हर बार उसे अपने प्यार का इजहार करता।
“तुम्हें पता है? तुम्हारी आँखों में बहुत गहराई है… लोग समझ नहीं पाते।”
 कॉलेज कैम्पस हो या कैंटीन वह हर जगह उसके पीछे रहता लेकिन आर्या............? वो तो अपनी ही उलझनों में इतनी फंसी हुई थी कि उसे देखने की फुरसत नहीं 
उसे लगता था कि वो किसी की जिंदगी की खुशी बनने लायक नहीं। वो तो बस बोझ है… अपने घर पर भी, अपने रिश्तों पर भी।
••••••
कॉलेज पूरा हुआ डिग्री मिल गई, सब ग्रेजुएट होकर अपने अपने सपनों को पाने में व्यस्त हो गए। और इसी धीरे धीरे समय बीतता गया। अब वो एक वकील बन चुकी थी। अच्छी कमाई करने लगी थी लेकिन अब भी वो बस खोई खोई सी रहती थी।

एक दिन जब वो घर पर थी तब रात को उसने पापा मम्मी की बात सुनी। 
दोनों उसके बारे में ही बात कर रहे थे। उसका यूं गुमसुम सा रहना उन्हें कांटों की तरह चुभ रहा था लेकिन वो उससे कुछ पूछ नहीं पा रहे थे।
उसने अपने पापा कि बात सुनी “बस हमारी बेटी खुश रहे… फिर सब ठीक है।”
और यह शब्द आर्या के दिल कि गहराई में उतर गया।आर्या ने पहली बार महसूस किया वो बोझ नहीं है वो उनकी उम्मीद है।

उसने सोचा शायद कहानी में हीरोइन बनना जरूरी नहीं, जरूरी है अपने किरदार को ईमानदारी से निभाना। उसने तय किया कि वो पढ़ेगी, मेहनत करेगी,एक दिन पापा की डायरी से उधार के पन्ने फाड़ देगी। मम्मी की पुरानी साड़ी की जगह नई साड़ी लाएगी।
     और शायद…
आदित्य की आँखों में खुद को देखने की हिम्मत भी जुटा लेगी क्योंकि हर सांवली लड़की साइड कैरेक्टर नहीं होती।कुछ लड़कियां कहानी की शुरुआत में चुप रहती है, लेकिन अंत में वही पूरी कहानी बदल देती हैं।
और आर्या?
वो अब भी वही है मिडिल क्लास घर की बेटी…
पर अब उसे पता है, वो किसी की मजबूरी नहीं वो अपने परिवार की सबसे खूबसूरत उम्मीद है।