Let's go somewhere far away...! - 3 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 3

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चलो दूर कहीं..! - 3

चलो दूर कहीं... 3

प्रतीक्षा को खाई में गिरे 36 घंटे से ज्यादा का वक्त बीत गया था और सभी उसके जिंदा होने पर संशय व्यक्त कर रहे थे लेकिन कमलनाथ ये मानने को तैयार ही नहीं थे । ये सच था कि उनपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था और इस दुख के घड़ी में उनपर क्या बीत रही होगी इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। 

तीसरे दिन भी एसडीआरएफ के द्वारा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया लेकिन नतीजा सिफर रहा...न प्रतीक्षा मिली और न ही उसकी लाश। थक-हारकर कर रेस्क्यू ऑपरेशन को बंद कर दिया गया। अपने करीबी दोस्त के खोने का ग़म दिल में लिए रोहन अपने दोस्तों और परिजनों के साथ दिल्ली लौट आया... और कमलनाथ को इस दुख की घड़ी में हर वक्त एक बेटा के तरह हर प्रकार से मदद करता रहा।

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                  अस्वीकरण 

इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएं काल्पनिक है..! इसका किसी भी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है! यदि कोई समानता पाई जाती है तो यह महज संयोग होगा! 

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घटना के पांचवें दिन बारिश थम चुकी थी, आसमान साफ था और घुप खिली हुई थी। उफनती नदी का जल स्तर नीचे आ गया था और दोनों तट पर जलप्रलय की विभिषिका साफ झलक रही थी.. तटों पर पानी के वेग के साथ बह कर आए कहीं लकड़ियों, जंगली झाड़ियों का अंबार लगा था तो कहीं बालू और कीचड़ का ढेर..! इन लकड़ियों के अंबार और बालू - कीचड़ के ढेर में न जाने कितने मरे हुए जंगली जानवरों के शव पड़े थे जिसे चील कौवे नोच रहे थे। इन शवों के सड़ांध से लोगों का वहां रहना दुभर था। 

वातावरण में शांति थी, पक्षियों के कलरव और सांय-सांय बहते हवा के शोर से एक मधुर संगीत सा उत्पन्न हो रहा था..इस शांत और सुंदर जगह को देखकर कोई ये अनुमान नहीं लगा सकता था कि महज पांच दिन पहले इस घाटी ने हंसती खिलखिलाती प्रतीक्षा को लील लिया था..? प्रतीक्षा जिंदा थी या मर गई ये किसी को पता नहीं था..लेकिन मन ही मन सभी ने मान लिया था कि प्रतीक्षा का जीवित मिलना नामुमकिन है..! 

हमें पता है हमारी पृथ्वी रहस्यों और चमत्कारों से भरी पड़ी है जिसके बारे में वैज्ञानिक भी सही सही पता नहीं लगा पाए हैं.. ऐसे ही रहस्यों और चमत्कारों को हम दैवीय या ईश्वरीय शक्ति मानते हैं। शायद हमारी प्रतीक्षा के साथ भी ऐसा ही चमत्कार हुआ था...जब छठे दिन उसकी आंख खुली तो वह एक अंधेरे गुफा में थी..! वहां घुप्प अंधेरा था और निशब्द सन्नाटा पसरा था ! उसका माथा भारी था ,बदन दर्द से टूट रहा था ! वह आंखें फैलाकर उस घुप्प अंधेरे में देखने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसे कुछ भी साफ साफ दिखाई नहीं दे रहा था। उस घुप्प अंधेरे में उसे दो जुगनू से चमकते प्रकाश दिखाई दे रहे थे... और उस जुगनू के जैव प्रकाश से गुफा में बेहद हल्की सी ठंडी रोशनी फैल रही थी। ये जीवदीप इस अनंत ब्रह्मांड में उस टिमटिमाते हुए तारे के समान था जो स्याह निशा में भी गोबर भृंग को गोबर का गोला बनाकर उस टिमटिमाते रोशनी के सीधी दिशा में लुढ़काने में मदद करता है।

और ये तो इंसान थी उस जीवदीप ने उसके निश्तेज शरीर में एक जान फूंक दिया था, वो उस रोशनी के पास जल्द से जल्द पहुंचना चाहती थी..बैचैनी और घुटन के कारण वह उठकर बैठने की कोशिश की मगर बैठ न सकी उसे लगा जैसे उसके हाथ पैर काम नहीं कर रहे हैं.. अभी वह सोच ही रही थी कि उसे लगा कोई उसके पीठ से सहारा देकर उठा रहा है..! वह देखने की कोशिश की पर उसे कुछ समझ नहीं आया, जब वो बैठी और अपने बदन पर नजर डाली तो उसकी चीख निकल गई.. उसके बदन में कोई वस्त्र न था।बदन में जगह जगह खरोंच लगा हुआ था और ज़ख्म काफी गहरे मालूम पड़ रहे थे। 

वह अपने घुटनों को मोड़कर अपने छाती से सटाए बैठी अपने स्मृति पटल पर जोर डाल रही थी और याद करने की कोशिश कर रही थी कि," मैं कौन हूं.. और यहां कैसे आई..?"

जब लाख कोशिश के बाद भी उसे याद नहीं आया कि," मैं कौन हूं..?" तो वह खड़े होने की कोशिश की पर नाकामयाब रही..उसे लग रहा था जैसे उसके पैरों को लकवा मार गया है.. ! अगले ही पल उसे एहसास हुआ जैसे कोई कीड़ा उसके पैरों में रेंग रहा है...वह उस कीड़ा को झाड़ने के लिए अपने पैरों को इधर उधर फेंकती रही और पैर इधर उधर फेंकते फेंकते वह खड़ी हो गई..! 

खड़े होते ही वह पागलों की भांति चारों ओर घुमकर यहां से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रही थी..पर ये क्या ये जगह तो चारों तरफ से बंद था, बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं था.. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें यहां से बाहर कैसे निकले.. मैं कौन हूं?आखिर मैं यहां आई कैसे..? मुझे यहां कौन ले आया..? जो मुझे यहां ले आया वह सामने क्यों नहीं आ रहा..? कहीं उसने मेरे साथ कुछ किया तो नहीं...? उसके मन में अनगिनत सवाल उमड़ घुमड़ रहे थे लेकिन किसी का जबाब उसके पास न था..!वह उस जुगनू से चमकते प्रकाश को बैचैन नजरों से खोज रही थी,इस विचित्र गुफा में डुबते को तिनके का एकमात्र सहारा ये जुगनू ही था जो न जाने किधर गायब हो गया था।

जब उसे कोई रास्ता न सुझा तो वह उदास होकर एक कोने में बैठ गई..और उसके आंखों से आंसू बह निकले... उसका चेहरा आंसूओं से सराबोर था..कि उसे एहसास हुआ जैसे कोई उसका आंसू पोंछ रहा है... ये एहसास होते ही उसके बदन में एक सिहरन सी उठी और वह पीछे खीसकते हुए चीखी,"कौन है यहां..? सामने क्यों नहीं आते...? देखो तुम जो कोई भी हो मैं तुमसे हाथ जोड़कर विनती करती हूं प्लीज मुझे यहां से बाहर निकाल दो..?" 

वह रोते बिलखते उससे गुहार लगाती रही लेकिन उसने न कुछ कहा और न ही कोई संकेत दिया... बस वो टिमटिमाते से जुगनू जैसे उसे घूर रहा था.. लेकिन प्रतीक्षा ने अंधेरे में तीर चलाना जारी रखा..और लगातार उससे बोलती रही,"तुम कुछ बोलते क्यों नहीं..? कौन हो तुम और मुझे इस अंधेरे गुफा में क्यों ले आए हो..?" 

उसके लगातार रोते हुए बोलते रहने से उस ठंडी हरी रोशनी में परिवर्तन हुआ और वह नारंगी हो गया.. ये नारंगी रोशनी इतनी तीव्र थी कि उस गुफा का घुप्प अंधेरा दूर हो गया था और गुफा की हरेक चीज प्रतीक्षा को साफ साफ दिखाई दे रही थी.. गुफा चारों ओर से पत्थर के चट्टानों से घिरा था, फर्श पथरीले और उबड़-खाबड़ थे,छत भी पत्थर के ही थे और उसकी ऊंचाई प्रतीक्षा के ऊंचाई के बराबर थी। उस तीव्र रोशनी में एक पल में गुफा पर नजर फेरने के बाद उसकी नजर उस रोशनी पर टिक गई.. और जैसे ही उसके उस विभत्स रूप को देखी तो उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम थी..उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसके सामने कोई दैत्य खड़ा हो...!

                                               क्रमशः...