Let's go somewhere far away...! - 8 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 8

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चलो दूर कहीं..! - 8

चलो दूर कहीं... 8

उस युवक ने प्रतीक्षा के पांव देखे खुबसूरत पांव लहुलुहान था.. कीचड़ से सने पांव के घाव से खून रिस रहा था। उसके पांव की स्थिति को देखकर वह उस दर्द का अनुभव कर रहा था जो इसने झेली थी.. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इतनी खूबसूरत लड़की यहां कैसे आई.. जरुर इसके साथ कुछ हुआ है जिसके कारण ये जान बचाकर यहां भाग आई है..! अगर घाव में ऐसे ही धुल मिट्टी पड़ा रहा तो संक्रमण फैल सकता है..? मुझे इसकी मदद करनी चाहिए..! सोच कर वह झोपड़ी के पीछे बने रसोई में गया और चूल्हे पर एल्यूमीनियम के तसले में पानी चढ़ा कर चूल्हा में पुआल झोंककर पानी गर्म किया और तसला लेकर प्रतीक्षा के पास आया और गमछा के एक कोने को पानी डुबोकर थोड़ा निचोड़ा और जैसे ही पांव के धुल मिट्टी को पोंछना शुरू किया तो पहले वह थोड़ा कुनमुनाई और फिर एकाएक उठ बैठी और अपना पैर पीछे खींचते हुए सामने बैठे बेहद आकर्षक युवक पर नजरें टिकाए बोली, "कौन हो तुम.. और मेरे साथ क्या कर रहे थे..?" 

"अरे वाह.. चोरी भी और सीनाज़ोरी भी.. तुम मेरे घर आकर मुझसे ही सवाल पूछ रही हो..?  पहले तुम बताओ कि तुम कौन हो और यहां क्या कर रही हो..?" 

उस युवक के सवाल से वह उसके सुंदर आंखों में झांकते हुए बोली, "मेरा नाम प्रतीक्षा है.. और मुझे कुछ याद नहीं..!" 

"ऐसा कैसे हो सकता है.. तुम झूठ बोल रही हो..?" 

"मेरा विश्वास करो.. सच में मुझे कुछ याद नहीं.. वैसे तुम्हारा नाम क्या है..?" 

"मुझे तो विश्वास नहीं हो रहा है.. चलो कोई बात नहीं है अगर तुम्हें अपना अतीत याद आ जाय तो बता देना..! वैसे मेरा नाम रवि है.. मैंने तुम्हारे पांव में ज़ख्म देखा है जिसपर धूल-मिट्टी लगा है... अगर घाव से धूल मिट्टी को साफ नहीं किया गया तो उसमें संक्रमण फैलने का खतरा है लाओ पहले अपना पैर आगे करो..! "

" नहीं लाओ कपड़ा मुझे दो मैं खुद से साफ कर लुंगी..! "

" अपना घाव खुद से साफ नहीं होता.. पैर आगे करो और आंखें बंद कर चुपचाप बैठी रहो..! "

रवि के इतना कहते ही वह तुनक कर उसके हाथ से गमछा झपटी और जैसे ही घाव को साफ करने के लिए रगड़ी वैसे ही दर्द से बिलबिलाते हुए उसके आंखों से आंसू निकल गए... रवि उसके चेहरे पर नजरें टिकाए था, आंखों से आंसू निकलते ही बोला," हो गई न हेकड़ी ढीली.. मैं बोल रहा हूं न कि ये तुम्हारे वश का नहीं है... लाओ गमछा और पैर आगे करो..! "

रवि ने ये बातें इतने अधिकार से कहा जैसे उसे वह लंबे समय से जानता हो... प्रतीक्षा ने कातर नेत्रों से उसे घूरते हुए गमछा उसे पकड़ाई और धीरे से अपने दोनों पैर आगे कर दी .. रवि ने गमछे को गर्म पानी में भिगोकर निचोड़ते हुए उसके नाजुक पैरों को देखा, तलवे लहुलुहान थे, खुबसूरत अंगुलियां सूजी हुई थी.. उसने आहिस्ते से उसके एक पैर के टखने को अपने बाएं हाथ से पकड़ा और दाहिने हाथ से गमछे को गर्म पानी में डुबोकर कीचड़ को साफ करना शुरू किया तो वह दर्द से तड़प उठी.. वह जोर से चीखते हुए अपना पैर छुड़ाने का भरसक प्रयास की लेकिन रवि पर कोई फर्क नहीं पड़ा वह एक हाथ से टखने को मजबूती से पकड़े किसी निर्दयी की भांति घाव से कीचड़ को साफ करता रहा.. जब घाव साफ हुआ तो पैर में अनेकों कंकड़ पत्थर धंसे थे जिसे निकालना जरूरी था.. और रवि के पास कोई औजार था नहीं इसलिए उसने पैर में धंसे पत्थर को अपने अंगुलियों से पकड़ कर निकालना शुरू किया तो वह दर्द से तड़प उठी.. आंखों से अनवरत आंसू बह रहे थे और वह चीख चिल्ला रही थी। रवि ने जब दोनों पैरों को साफ कर सारे कंकड़ पत्थर निकाल कर उसके टखना को छोड़कर उसे देखा तो उसका चेहरा लाल और दर्द से कुम्हलाया हुआ था, आंखों से बहते आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। 

उसे सांत्वना देते हुए रवि ने कहा, "ये दर्द जो तुमने सहा वह भविष्य में सुकून पहुंचाएगा..!" 

"तुम बड़े निर्दयी हो..?" वह सिसकते हुए बोली तो रवि ने कहा, "बिना निर्दयी बने ये घाव ठीक कैसे होंगे.. अगर घाव को अपने हाल में छोड़ दिया जाय तो उसे नासुर बनते देर कहां लगती है..?" 

प्रतीक्षा को समझ नहीं आ रहा था कि इतना खुबसूरत और होशियार लड़का इस जंगल में क्या कर रहा है..ये अकेले हैं या कोई और भी हैं इसके साथ..? इसने कितनी सफ़ाई से बिना किसी घृणा के घाव को साफ सुथरा कर दिया जैसे कोई डॉक्टर या कम्पाउन्डर हो..आखिर इसे ये सब कैसे पता..? वह उससे कुछ पूछती उससे पहले ही वह बाहर निकल गया तो उसने अपने पैरों के जख्मी तलवों पर नजर डाली और स्थिति देख खड़े होने का विचार त्याग कर रवि का इंतजार करने लगी.. !

करीब आधे घंटे बाद वह हाथ में कुछ लता पता लिए आया और बोला, " यहां तो अंग्रेजी दवा मिलेगा नहीं इसलिए जड़ी बूटी से ही काम चलाना पड़ेगा..! मैं अभी इसे पीस कर लेता हूं..!"

" रवि लाओ दो मुझे मैं पीस कर ला देती हूं..!" प्रतीक्षा ने उठने का प्रयास करते हुए कहा तो वह बोला," चुपचाप बैठी रहो कितना मुश्किल से घाव को साफ किया हूं..उठेगी तो फिर से घाव में धूल मिट्टी लग जाएंगे..!"

" ऐसे मैं कब तक बैठी रहूंगी..?"

" जबतक घाव ठीक नहीं हो जाते तब तक..!"

" लगता है तुम मुझे अपाहिज बना कर छोड़ोगे.. तुम्हारे शक्ल को देखकर लगता नहीं कि तुम्हें जड़ी बूटी के बारे में कुछ मालूम भी है.. कहीं तुम मुझे उल्लू तो नहीं बना रहे..?" 

"वैसे भी उल्लू बनने के सिवा तुम्हारे पास कोई चारा नहीं है.. इसलिए चुपचाप बैठी रहो और मैं जो कर रहा हूं उसमें टांग न अड़ाओ..!" 

कहकर रवि रसोई में गया और कुछ देर सील पाट की घर्.. घर् ..की आवाज गूंजती रही और जब वह कमरे में आया तो उसके हाथ में एक कटोरा लेप था। आते ही उसने कहा," पैर आगे करो..!" और प्रतीक्षा ने किसी यंत्र की भांति अपने पैर फैला दिए..वह बैठा और इत्मीनान से बहुत ही हल्के हाथों से घाव पर लेप को लगाने लगा.. और प्रतीक्षा आंखें बंद किए दांत भींचे उस दर्द के एहसास को बर्दाश्त करने के लिए अपने आपको सशक्त कर रही थी कि उसे उस भयंकर दर्द और जलन के स्थान पर शीतलता के साथ दर्द कम होता हुआ महसूस हुआ तो वह वह डरते डरते अपनी आंखें खोली और रवि को देखी तो प्रतीत हुआ जैसे ये कोई देवता हैं..वह पुरे मनोयोग से घाव पर लेप लगाकर तलवे के नीचे एक चौड़े पत्ते को रखकर पेड़ के छाल के रस्सी से बांधते हुए कहा," इस पत्ते को बांध देने से तुम चल फिर सकती हो..कल इस पत्ते को बदल दूंगा..!" 

प्रतीक्षा ने उसे कातर नेत्रों से निहारते हुए बोली,"ये जड़ी-बूटियां तो जादू जैसा काम करती है ..लगाते ही ऐसा लग रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है..! बताओ न रवि तुम कौन हो.. और इस जंगल में क्या कर रहे हो..? तुम्हें इन जड़ी-बूटियों के बारे में इतना कुछ कैसे मालूम है..?" 

"जैसे तुम अपना अतीत भूल चुकी हो वैसे ही मैं भी भूल चुका हूं कि मैं कौन हूं...शायद ईश्वर ने हमें इसलिए मिलवाया है कि हम एक-दूसरे का सुख दुख बांट सकें..! कहते कहते रवि ने जैसे उसके पुरे बदन का स्कैन कर लिया हो..! उसने उसके बदन के घाव को देखकर कहा," अरे तुम्हारे बदन में तो ढेर सारे घाव है..लो अपने से घाव में लेप लगा लो .. आराम मिलेगा..!"

कहकर रवि ने लेप का कटोरा आगे बढ़ाया तो वह सामने के सभी घावों में अपने अंगुलियों से लेप उठाकर लगा ली लेकिन पीठ के घाव में लेप लगाना उसके वश में न था..! उसके चेहरे पर परेशानी के भाव को देखकर रवि ने पूछा,"क्या हुआ..?" 

"वो सामने के घाव में तो लेप लगा ली लेकिन पीठ के घाव पर नहीं लगा पा रही हूं... अगर तुम..!" 

अभी प्रतीक्षा की बात पुरी भी नहीं हुई थी कि उसने तपाक से कहा,"इसमें कौन सी बड़ी बात है... पीछे घुमो ..!" 

प्रतीक्षा घुमकर उसके सामने अपनी पीठ तो कर दी लेकिन उस गोरे खुबसूरत पीठ का दीदार होते ही इसके पसीने छूट रहे थे..उसकी बोलती बंद थी,उस गोरे पीठ पर तीन-चार खरोंच के निशान थे जो चंन्द्रमा पर धब्बे के समान प्रतीत हो रहा था। उसका हिम्मत नहीं हो रहा था कि उस चांद को छूए..जब कुछ देर तक रवि चुपचाप बैठा रहा तो प्रतीक्षा बोली," क्या हुआ रवि लेप लगाओ न..?"

प्रतीक्षा के आवाज से उसकी तंद्रा टुटी और उसने जैसे ही अपने थरथराते हाथ के अंगुलियों से लेप को घाव पर लगाया.. प्रतीक्षा की सिसकारी निकल गई,वह जैसे जैसे घाव पर लेप लगाता जाता उसकी धड़कनें बढ़ती जाती.. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह अपना सुध-बुध खोती जा रही है.. और उस स्पर्श के जादू के वशीभूत वह पलटी और उससे लिपट गई...

                                               क्रमशः....