Let's go somewhere far away...! - 9 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 9

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चलो दूर कहीं..! - 9

चलो दूर कहीं... 9

रवि इस हसीना को देखकर पहले ही अपना होशोहवास खो बैठा था, अबतक इतनी खूबसूरत लड़की से उसे पाला न पड़ा था, उसके छुवन से उठती उसकी सिसकारी जैसे आग में घी डालने का काम कर रही थी..वह अपने भावनाओं को किसी तरह काबू किए था और उसकी हरकत से वह सकते में था, उसने सोचा न था कि वो अचानक इस तरह उससे लिपट जाएगी... हालांकि यह मिलन उसके लिए बहुत सुखद अनुभव था, उसके दिल में गुदगुदी हो रही थी,दिल की धड़कनें बढ़ गई थी..! जैसे जैसे उसके गर्म सांसों का एहसास बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे उसकी मदहोशी बढ़ती जा रही थी। उसी मदहोशी में जैसे ही उसने उसे अपने आगोश में समेटना चाहा ..लगा जैसे 440 भोल्ट का झटका लगा हो वह छिटक कर उससे दूर जा गिरा...! उसके दूर छिटकते ही वह मदहोश स्वर में बोली,"क्या हुआ रवि ऐसे दुर क्यों छिटक गए...?" 

"अरे यार मैंने तो सुना था कि लड़कियां झटका देती है.. और आज महसूस भी कर लिया..!" 

रवि के मुंह से ये सुनते ही प्रतीक्षा को लगा कि ये वाक्य उसने उसके तारीफ में कहा है जिससे उसके गालों पर हया की लाली उतर आई, नजरें झुक गई,मन में लड्डू फूट रहे थे ! उसने घीमे से थरथराते स्वर में कहा,"तुम भी कोई कम नहीं हो..आग हो आग ..भला तुम्हारे संपर्क में आकर मोम पिघलने से अपने आपको रोक सकता है क्या..? ये नामुमकिन है रवि..!" 

रवि ने उसके बातों को सुनकर मुस्कुराते हुए कहा,"लगता है तुम मेरी बातों को समझ नहीं पाई.. मैं वो बिजली वाले झटके की बात कर रहा हूं..!" 

"पागल हो क्या..भला मेरे शरीर से बिजली का झटका कैसे लगेगा.. तुम्हें कोई गलतफहमी हुई होगी..?" 

"जब मैंने उस झटके को महसूस किया है तो गलतफहमी कैसे हो सकती है..?"  कहते हुए उसे एहसास हुआ कि इस बात को खींचने से कोई फायदा नहीं है, इसलिए उसने बात बदलने के इरादे से कहा," चलो छोड़ो इन बातों को बताओ क्या खाओगी..दाल चावल या खिचड़ी..?" 

"तुम बताओ तुम्हें क्या पसंद है.. मैं वही बना देती हूं..!" 

"अरे वाह तुम्हें खाना बनाने आता है..तब तो मेरी सारी परेशानी दूर हो गई...! ये खाना बनाना सबसे झंझट का काम है लेकिन क्या करें पापी पेट का सवाल है..पेट भरने के लिए मेहनत तो करना पड़ेगा वरना भुखे पेट सोना पड़ेगा..!" 

" अच्छा तो तुम मुझे अपना नौकरानी समझ रहे हो क्या..?"

" अरे.. नौकरानी नहीं.. रानी समझता हूं..!" 

उसने तपाक से कहा तो वह उसके कान को पकड़ कर अमेठते हुए बोली,"अच्छा बच्चू जब काम करवाना हो तो रानी और टाइम में झटके वाली..!" 

"अरे मेरा कान छोड़ो दर्द हो रहा है..!" कहते हुए उसने उसके हाथ को झटका देकर कान छुड़ाना चाहा तो उसके कर्णपल्लव(Earlobe ) में नाखून से ख़रोंच लग गया और जिससे उसे थोड़ी सी जलन महसूस हुई और उसने अपने अंगुलियों से स्पर्श किया तो उसके अंगुलियों में हल्का सा खून का धब्बा दिखाई दिया, खून देखते ही उसने कहा," सही में तुम जंगली बिल्ली हो.. देखो नोच ली..!"

रवि के इतना कहते ही वह उसके कर्णपल्लव को देखी जिससे हल्का खून रिस रहा था। वह तुरंत गमछे से खून को पोंछकर उसके घाव में लगाए लेप को बाटी से उठाकर लगाने की कोशिश की तो रवि ने उसे रोकते हुए कहा,"रुको ..हर घाव के लिए एक दवा थोड़े होता है.. ये प्राकृतिक रूप से किसी वस्तु से चोट लगने पर होने वाले घाव के लिए है,किसी जानवर के काटने या नोचने पर नहीं..!" 

"मैं कोई जानवर थोड़े हूं..?" 

"तुम जानवर नहीं..जंगली बिल्ली हो.. बिल्ली..! रहने दो इस लेप को मैं दुसरा औषधि ले आता हूं तुम तबतक चूल्हा जलाकर पानी गर्म करो..!" कहकर रवि बाहर निकल गया और शेरु किसी पहरेदार की भांति दरवाजे पर पसरा हुआ था। वह उठी और लंगड़ाते हुए धीरे-धीरे रसोई की ओर बढ़ रही थी कि शेरु उठा और उसके आगे पीछे घुम घुम कर कूं..कूं.. करता हुआ रोकने की कोशिश करने लगा जैसे वह उसके दर्द को महसूस कर रहा हो.. प्रतीक्षा ने उसके माथे पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा,"मैं ठीक हूं शेरु..आओ मेरे साथ आओ..!" 

उसका इतना कहते ही वह उसके आगे आगे ऐसे भागने लगा मानो सच में वह उसकी बातों को समझता हो.. प्रतीक्षा बरामदे में पहुंची तो बरामदे के एक कोने में चूल्हा बना था और वहीं कुछ लकड़ियां पड़ी थी पर मुसीबत ये थी कि वो इन लकड़ियों को जलाए तो जलाए कैसे..? न उसे घासलेट मिल रहा था और न ही दियासलाई..! शेरु कुछ देर प्रतीक्षा को घूरता रहा.. फिर अचानक से अपने आगे के दोनों पैरों से वहां पड़े पुआल को इकट्ठा किया और एक छोटे से प्लास्टिक के डब्बे को लुढ़काकर प्रतीक्षा के सामने कर दिया.. प्रतीक्षा ने उस डब्बे को खोला तो उसमें माचिस की डिब्बी थी..! उसे समझते देर न लगी कि पुआल सुलगाकर लकड़ी को जलाना है..!शेरु के बुद्धिमत्ता के वह कायल थी, प्यार से उसे सहलाकर वह अपने काम में जुट गई..!

उसने चूल्हा जलाकर हांडी में पानी चढ़ाई फिर पुरे घर में झाड़ू लगा कर सारे बिखरे पड़े कपड़े और सामान को सहेजकर अपने जगह पर रखी तो वही घर जो अव्यवस्थित और गंदा था चकाचक नजर आ रहा था...! अभी वह चूल्हे के पास आकर बैठी ही थी कि रवि आया और एक थैला उसके सामने रखते हुए कहा,"तुमने तो इस झोपड़े को घर बना दिया.. इसलिए कहा जाता है बिना औरत के मकान घर नहीं बनता..!" 

"ऐसा मैंने क्या कर दिया कि तुम ये दार्शनिक वाला डायलॉग मार रहे हो..?" 

"इस विरान घर को आबाद कर दी..इस झोपड़े को स्वर्ग जैसा सुंदर बना दिया.. ऐसा लगता है हर ओर खुशियां ही खुशियां बिखेर रही है…हर वस्तु प्रिय लग रहे हैं.. ये पेड़ पौधे, पक्षी, नदी, पहाड़ सब के सब हंसते खिलखिलाते से प्रतीत हो रहे हैं..! कौन हो तुम जो मेरे नीरस जीवन में ये बहारें खिलाने आई हो.. नहीं.. नहीं... मुझे महसूस हो रहा है जैसे तुम कोई कल्पना हो.. कोई स्वप्न हो... नहीं.. मुझे इतनी खुशी नहीं चाहिए.. मैं जैसा था वैसा ही ठीक था.. तुम चली जाओ मेरे जीवन से... तुम चली जाओ..!

वह जोर जोर से पागलों की भांति चीख रहा था.. जिसकी प्रतिध्वनि शांत वातावरण में गूंज रही थी... प्रतीक्षा को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक इसे क्या हुआ..?वह उसे कातर नेत्रों से घूरे जा रही थी और चूल्हे पर चढ़े हांडी का पानी खदक रहा था...

                                                    क्रमशः...