Let's go somewhere far away...! - 11 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 11

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चलो दूर कहीं..! - 11

चलो दूर कहीं... 11

प्रतीक्षा ने 'अनाह' जोर से चिल्लाई और उठकर उस आकृति के पीछे दौड़ी तो रवि ने कहा,"संभलकर प्रतीक्षा अभी तुम्हारे पैर के घाव हरे है..!" 

लेकिन उसे इसकी सुध कहां थी, पलक झपकते ही वह झोपड़ी के बाहर थी और आंखें फाड़कर इधर उधर देख रही थी पर अनाह क्या उसकी परछाई भी नजर नहीं आ रही थी..! रवि भी उसके पीछे था, उसे हैरत से इधर उधर देखते देख उसने पूछा, "क्या हुआ किसे ढूंढ रही हो..? और ये अनाह कौन है..?" 

"दोस्त हैं मेरा.. मुझे लगा वह यहां से गुजरा है.. लेकिन ये मेरा भ्रम था..!" 

"एक तरफ कहती हो कि अतीत की कोई बात याद नहीं है फिर 'अनाह' कैसे याद रह गया..?" 

"लगता है अनाह से जलन हो रही है..? लेकिन जब एक बार उससे मिल लोगे न तो तुम भी उसके फैन बन जाओगे.. वो जादूगर का बाप है बाप..!" 

प्रतीक्षा उसके तारीफ के कसीदे पढ़ रही थी और रवि ने झुंझलाते हुए कहा, "अरे यार उसके कारनामे सुनकर क्या करुंगा.. जो पूछा है उसका उत्तर दो न कि तुम्हारे यादाश्त में अनाह कैसे याद है..?" 

"अरे आज उसी के कारण ही मैं तुम्हारे सामने खड़ी हूं... उसने ही मुझे बचाया और उस बंद गुफा से बाहर निकाल कर यहां तक पहुंचाया है.. जबतक मेरी सांसें चलेगी मैं उसे नहीं भूल सकती हूं..!" 

प्रतीक्षा एक ही सांस में बोल गईं और रवि बस उसका चेहरा देखता रहा.. उसे न जाने क्यों अनाह से जलन हो रही थी। अगर सचमुच में वह उसके सामने होता तो निश्चित रूप से दोनों के बीच मल्लयुद्ध हो गया होता..! थोड़ी देर के चुप्पी के बाद रवि ने कहा," जब उसे भूल नहीं सकती तो मेरे कलेजे पर मूंग दलने यहां क्यों आ गई..?" 

" 'कलेजे पर मूंग दलने'.. मतलब..?"

" मतलब तो तुम अच्छी तरह से समझ रही हो..जब तुम्हारे लिए अनाह इतना महत्वपूर्ण है तो उसे छोड़कर यहां नहीं आना चाहिए..?"

"मैं अनाह को क्यों छोड़ूंगी..अनाह मुझे छोड़कर न जाने कहां चला गया कुछ पता नहीं..मैं उसे इस जंगल में दर दर भटकते हुए पागलों के समान ढूंढ रही थी कि तुम्हारा शेरु मुझे यहां ले आया.. मुझे क्या पता था कि तुम यहां पड़े हो ? अगर पता होता तो आती ही नहीं..?" 

"तो अब पता चल गया न.. फिर यहां क्यों पड़ी हो जाओ न अपने अनाह के पास..?" 

"हां.. हां... चली जाऊंगी, तुम्हारे ये ताने सुनने के लिए नहीं रहुंगी..! इस झोपड़े में आसरा क्या दिया जैसे खरीद लिया है...हमेशा धौंस जमाता है। न जाने अपने आपको क्या समझता है...देख लेना एक दिन मेरा अनाह आएगा और मुझे ले जाएगा..! "

अभी वह बोल ही रही थी कि रवि ने तैश में आकर उसका बांह पकड़ते हुए कहा," देर किस बात की है.. जाओ अभी निकलो यहां से..!"  और जैसे ही धक्का देना चाहा उसे लगा जैसे कोई करंट उसके शरीर में प्रवेश कर गया हो और प्रतीक्षा का बांह उसके हाथ से चिपक गया हो.. वह उसे धकेलकर, झिंझोड़कर अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसका हाथ ऐसे चिपका था मानो किसी ने फेवीकोल से चिपका दिया हो..! वह पागलों जैसा झिंझोड़कर अपना हाथ छुड़ाने का प्रयास कर रहा था जिससे परेशान होकर प्रतीक्षा बोली," ये क्या कर रहे हो रवि.. ये पागलपन बंद करो मेरा सिर चक्कर दे रहा है..! "

" मैं क्या करूं.. मेरा हाथ तुम्हारे बांह से ऐसे चिपक गया है मानो फेविकोल का जोड़ हो जो छुटने का नाम ही नहीं ले रहा है..! "

"मैं सब समझ रही हूं ये तुम्हारा नया पैंतरा है.. ताकि मेरे शरीर से खेल सको..!" कहते हुए वह उसके हाथ को पकड़ कर हटाई तो उसका दोनों हाथ आसानी से हट गया..! आसानी से हाथ हटते ही प्रतीक्षा ने तंज कसते हुए कहा," हाथ तो आसानी से हट गया..हूं..जितना शरीफ़ बनने की कोशिश करते हो उतना हो नहीं.. तुम्हारे मन में बैठा चोर अपने हरकत से उजागर कर ही दिया कि तुम चाहते क्या हो..? लेकिन याद रखना मैं तुम्हारे मंसुबे कभी पुरे नहीं होने दूंगी..!"

रवि को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है, ये कैसे मुमकिन है कि मुझसे वहीं हाथ छुड़ाए छुट नहीं रहा था और प्रतीक्षा ने कैसे आसानी से छुड़ा दिया.. ? जरुर ये कोई जादूगरनी है या ये कोई चुड़ैल तो नहीं..? पहले करंट का झटका और फिर ये हाथ का चिपकना .. उसके शक को और मजबूत कर रहा था..! 'जरुर ये मुझे अपने मोहपाश में जकड़ने के फ़िराक़ में है, लेकिन मैं इसके झांसे में पड़ने वाला नहीं हूं !' उसे चुप देख वह पूछी,"सांप क्यों  सुंघ गया..बताओ ..बताओ तुम्हारे मन में क्या चल रहा है..?" 

"अरे यार मेरा विश्वास करो.. जैसा तुम सोच रही हो वैसा कुछ नहीं है..!"

" चलो मैं मान लेती हूं.. तुम महर्षि विश्वामित्र के चेले हो और तुम्हारी तपस्या को कोई रंभा भंग नहीं कर सकती..! लेकिन तुम्हें अनाह से जलन क्यों है..?" 

रवि के पास उसके इस प्रश्न का उत्तर नहीं था,वह चुपचाप उसे निहारता रहा..उसे प्रतीत हो रहा था जैसे उस अनुपम सौंदर्य के मल्लिका के सौंदर्य का जादू उसके मन मस्तिष्क पर किसी मदिरा के सुरुर की भांति चढ़ रहा है.. उसके मृगनयनी आंखों में उसे अपना अक्स दिखाई दे रहा था...जैसे उसपर मदहोशी छाती जा रही थी... और उसे प्रतीत हो रहा था कि उसने उसके मन मस्तिष्क को अपने कब्जे में कर लिया हो.. ! वह मुस्कुराती तो वो मुस्कुराता,वह जैसा आवाज निकालती वो उसका नकल करता.. एकाएक वह खिलखिला कर हंसी तो उसकी वो खिलखिलाहटें प्रतिध्वनित होकर ऐसे गूंज रही थी मानो दर्जनों प्रतीक्षा एक साथ खिलखिला रही हो..! हंसते हंसते वह एकाएक रुकी और बेहद गंभीर स्वर में बोली," रवि..आओ मेरे पास आओ...डरो नहीं मैं न कोई जादुगरनी हूं और न ही कोई चुड़ैल... मैं तुम्हारे तरह इंसान हूं...आओ मेरे करीब आओ..!" 

उसके बातों को सुनकर रवि की हालत पस्त थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि जो बातें उसने अपने मन में सोचा था वो बातें इसे कैसे मालूम हुआ...? मैंने जादूगरनी और चुड़ैल के बारे में इसे बताया ही नहीं फिर ये कैसे जान गई कि मैं क्या सोच रहा हूं... जरुर ये चुड़ैल ही है, मुझे इससे छुटकारा पाना ही होगा लेकिन कैसे..?"

अभी वह सोच ही रहा था कि वह बोली," ये क्या अनाप-शनाप सोच रहे हो रवि.. मैं कोई चुड़ैल नहीं हूं और मुझसे छुटकारा पाने की जरूरत नहीं है तुम्हें..! तुम्हें क्या लगता है कि इतनी आसानी से छुटकारा पा लोगे तुम मुझसे... जबतक मैं न चाहूं तबतक तुम मुझसे छुटकारा नहीं पा सकते...!"

प्रतीक्षा की बातें सुन रवि की सिट्टी-पिट्टी गुम थी, उसे समझ आ रहा था कि प्रतीक्षा से छुटकारा पाना इतना आसान नहीं है... उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी.. माथे पर पसीने की बूंदे उभर आए थे.. और उसके हालत को देखकर वह मंद मंद मुस्कुरा रही थी...


                                               क्रमशः...