उमा शादीशुदा थी ,उम्र यही कोई अड़तीस वर्ष । आजाद ख्यालों की महिला । पति कहीं बाहर काम करता था , महिने में कभी कभार आ जाता । देखा जाए तो वो अकेले ही अपना जीवन काट रही थी । रोज सुबह आठ बजे की लोकल से जाना और रात को भी आठ बजे की लोकल से आना । रास्ते में अपने जैसा ही जीवन जीने वाले अपडाउनर से मिलना और हंसना मुस्कुराना यही जीवन है । घर में तो कोई बात करने को है नहीं बस यहीं खूब गप्पें होती । काम तो काम ही था , जिंदगी तो बस लोकल में ही थी । यहां ये लोग सुख और दुख बांटते ; बस बातों बातों में । अकेली औरत कहीं भी अकेली नहीं होती और अगर यह मालूम हो जाए कि वह अपनी निजी जिंदगी में भी अकेली है तो अनेंक पुरूषों का पुरूषत्व जाग जाताहै । उसने भी महसूस किया कि एक बहुत ही खूबसूरत व्यक्ति कहीं उसके आस- पास ही बना रहना चाहता है । उसे उस पुरूष की आंखों में एक कशिश दिखाई दी । वो भी उसकी ओर अनायास ही खिंचें लगी । बातों - बातों में दोनों को लगने लगा कि वे एक-दूसरे की ओर आकर्षित होने लगे हैं । अब वे कभी काफी हाऊस में तो कभी पार्क में मिलनें लगे । तब उमा को मालूम हुआ कि वह याने उमेश शादी- शुदा तो है ही उसके दो बच्चें भी हैं । उमा और उमेश अब लगभग रोज ही मिलते । उमेश ने उमा को अपनें दोस्तों और रिश्तेदारों से भी मिलवाया ।एक दिन उमेश उसे अपने घर भी ले गया । यहां उसकी बहुत ही खूबसूरत पत्नी राधा से भी मिलवाया । राधा बहुत ही शांत भाव से मिली, दोनों को बैडरूम में छोड़ कर कुछ नाश्ते का प्रबंध करनें लगी । उमेश के बैडरूम बस वो दोनों ही थे । उमेश ने पहली बार धीरे से उमा की पीठ पर हाथ रख दिया और सहलाने लगा । उमा ने फुसफुसा कर कहा '' राधा है देख लेगी ।" उमेश ने भी धीरे से कहा " तो क्या हुआ ! " जैसे उसे राधा की कोई फिक्र ही न हो। उमा की सांसें तेज होने लगी लेकिन वो मौके की नज़ाकत के अनुरूप खुद को शांत रखने का प्रयास कर रही थी । उमेश अब पीठ से हाथ सामने ले आया और धीरे से उभारों को सहलाने लगा । कमरा शांत था उमा ने घबरा कर आंखें बंद कर ली । उमेश अपने हाथों को बेफिक्री से यहां वहां फिराता रहा । उमा को एक अजीब सी सिहरन का एहसास हो रहा था। उसका हाथ भी अनायास ही उमेश की जांघ पर फिसलने लगा और धीरे धीरे जांघ़ों के बीच जा पहुंचा । पैंट के ऊपर से ही उमा वहां पुरुष तुल्य कठोरता का आनंद लेना चाहती थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं । उसने आश्चर्य भरी निग़ाहों से उमेश की ओर देखा । उमेश ने केवल आंख दबा दी । ना जाने उमेश ने नज़रों से क्या कहा और उमा ने क्या समझा ।उसी समय राधा कमरे में नाश्ता लिए आ पहुंची । उमा ने हड़बडा कर अपना हाथ खींचा उमेश ने कोई जल्दी नहीं की परन्तु ठीक से बैठने का उपक्रम अवश्य ही किया। राधा ने भी केवल मुस्कुरा कर प्रतिक्रिया दी । इस मुलाकात में सब कुछ सामान्य था या ऐसा ही दिख रहा था । अचानक एक दिन उमा को किसी काम से नागपुर जाना था । शहर अनजान था, जाना जरूरी और पति का आ पाना संभव ही नहीं था । उसके लिए अब उमेश एक मात्र ऐसा दोस्त था जिसे वो अपनी अपनी समस्या बता सकती थी। उमेश ने कहा "यह कोई बड़ी समस्या नहीं है मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूं ।" उमा को संकोच था परंतु उमेश ने कहा कि इसमें संकोच करने की कोई जरूरत नहीं है हम साथ चलेंगे और काम पूरा करके ही वापस आएंगे। उमेश और उमा अब वैसे भी बहुत खुल चुके थे वे एक दूसरे से अपनी अंतरंग पलों की बातें भी करने लगे थे। उमेश तो हमेशा ही उमा को अन्य महिलाओं के साथ गुजारे अंतरंग पलों के किस्से बताया करता था । उमा और उमेश बातों ही बातों में हदें पार कर चुके थे जो वे शारीरिक स्तर पर नहीं कर पाए थे । उमा को लगा हो सकता है यह यात्रा शारीरिक स्तर पर भी संबंधों कुछ नये आयाम दे जाए । बस दोनों निकल गए एक साथ उस सफर पर । रात को उमेश जागता रहा और उमा उसके कंधे पर सर रख कर सोती रही । एक दो बार ही उमा को उमेश का हाथ कुछ अंतरंग अंगों के पास महसूस हुआ । उमा को मालूम था यह तो होना ही है । सुबह सबसे पहले उमा और उमेश एक होटल में कमरा लिया । उमा को लगा अब… । वे कमरे में थे । उमेश शांत भाव से पलंग पर लेटा था । उमा ने कमरे में ही उमेश के सामने कपड़े उतार दिये और बाथरूम चली गई । लौट कर आई तो उमेश वैसे ही बैठा था । उमा उसके साथ ही पलंग पर आ कर लेट गई । उमेश की कोई प्रतिक्रिया नहीं थी । उमा ने ही पहल करने का फैसला किया । उसने धीरे से उमेश के शरीर पर हाथ फेरना प्रारंभ किया । उमेश शांत था । उमा का हाथ कपड़ों के ऊपर से उमेश के उस अंग को टटोल रहा था जो पुरूषोचित कठोरता का प्रतीक होता है । उमा को वह कठोरता नहीं महसूस हुई । उमेश ने कपड़े हटा दिये । उमा के सामने शिशूसुलभ कोमलता लिए अंग था । उमेश उमा का हाथ पकड़ कर उसे पर पर रख कर बोला " कुछ करो तो कठोर हो जाएगा ।" उमा ने कुछ देर प्रयास किया कुछ नहीं हुआ । उमेश कपड़े पहनते हुए बोला " ये घर में तो चैन भी नहीं लेने देता लेकिन बाहर हमेशा ऐसा ही करता है । " उमा जो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर चुकी थी बोली " कोई बात नहीं दोस्त हम इसलिए थोड़े ही मिले थे ; ये तो बस एक स्त्री और पुरूष के बीच हो सकने वाला एक कारक मात्र है और जरूरी भी नहीं कि इसके होने से ही हमारे संबंध हो , हम दोस्त थे और दोस्त रहेंगे । " उमेश किसी और ही धुन में था बोला " नहीं उमा हम ये भी जरूर करेंगे किसी दिन बिल्कुल एकांत में जैसा मैं रोज घर में करता हुं। तुम्हें बताऊं मै एक भी दिन बिना इसके रह नहीं सकता।" उमा अपने इतने अच्छे दोस्त को खोना नहीं चाहती थी बोली " ठीक है यहां से जाने के बाद मेरे घर में आराम से रात भर रहना मुझे मालूम है सब ठीक ही होगा ।" इसके बाद उमेश उमा को कई और स्त्रियों के साथ कैसे ये सब किया इसके किस्से सुनाता रहा । उमा उसकी बातों को सच और झूठ के बीच कहीं रखती चली गई । वैसे भी उमा के लिए यह एक पल था जो निकल चुका था । वो इस पल को ना ही आमंत्रित करना चाहती थी और ना ही खोना । उनको लौटे लगभग एक सप्ताह हो चुका है । उमा लोकल में उमेश को खोजती है । उमा ने फोन भी किए जवाब भी नहीं मिला । आखिर उमा उमेश के घर ही चली गई । दरवाजा खुला तो राधा खड़ी थी बहुत ही अस्त-व्यस्त सी अवस्था में । उसके पीछे एक पुरूष खड़ा था ;अर्ध-नग्न अवस्था में । उमा ने राधा से उमेश के विषय में पूछा । राधा बोली " वो तो काम पर गए हैं । आप आईए बैठिए ।" उमा बैठक में बैठ गई पुरूष अंदर कमरे में चला गया । राधा पानी लेकर आई और वहीं बैठ गई । राधा धीरे से बोली "क्या हुआ उमा ? " उमा को पूछना कुछ और था पूछ कुछ और ही बैठी " ये कौन है ? " शयन कक्ष की ओर इशारा करते हुए बोली । राधा बिना किसी लाग-लपेट के बोली " ये सुरेश है उमेश के भाई । वैसे तो आपको पूछना नहीं चाहिए लेकिन मुझे लगा था आप उमेश की असलियत समझ गई होगी । " उमा जैसे चौंक ही पड़ी "…असलियत … कैसी असलियत …? " राधा बोली " तुमने जब पहले दिन हाथ लगाया था तब भी समझ जाना था ।" उमा बोली " क्या ……क्या समझ जाना था ? " राधा ऊंची आवाज में बोली " क्या तुमने उसका पुरूष अंग नहीं देखा ।" उमा के दिमाग में वह बालसुलभ अंग उभर आया लेकिन क्या बोलती निगाह जमीन में धंसी जा रहीं थीं । राधा बोली " तुमने देखा है; उमेश ने मुझे बताया था , नागपुर में। उसे लगा तुम उसकी सच्चाई जान गई हो; वो तुम्हारे से बहुत शर्मिंदा है इसलिए वो तुमसे नहीं मिलना चाहता ।" राधा बोले जा रही थी " उमेश के विषय में घर में सब लोग जानते हैं ,मैं उमेश की केवल नाम की पत्नी हुं वास्तव में तो सुरेश ही मेरा पति है । ये बच्चे भी उसी के है लेकिन उमेश उनका पिता कहलाता है । अब बात रही तुम्हारी ......... ;तुम और बहुत सी स्त्रियां उसके लिए बाहर मर्दानगी का प्रदर्शन करने का साधन मात्र हो । मुझे क्या आपत्ति हो सकती है ,उसके ऐसा करने से लेकिन उमेश ने बताया था कि तुम और वो उस सीमा तक चले गए जहां से तुम्हें उसकी सच्चाई मालूम हो गई होगी । बस आप से निवेदन है कि यह बात किसी और को न बताना ।"
उमा बिना कुछ कहे ही उठ कर बाहर आ गई । उसे उमेश की सच्चाई से कोई फर्क नहीं पड़ता ; उसे फर्क पड़ता है तो बस इस बात से उसने एक अच्छा दोस्त को शायद खो दिया ।
आलोक मिश्रा " मनमौजी "