वर्शाली हैरानी से कहती है --
> आपके घर ?
एकांश कहता है --
> हां मेरे घर ।
एकांश उत्साह से कहता है--
> हां वर्शाली ! तुम्हें दैख कर मा पापा भी बहोत खुश हो जाएगें। और मुझे भी तुम्हारे साथ रहने का कुछ पल और मिल जाएगा। इसी तरह तुम मुझे हर्शाली के बारे मे भी बता देना।
एकांश की बात पर वर्शाली अपनी हामी भरते हुए कहती है--
> ठीक है एकांश जी । जैसी आपकी ईच्छा।
वर्शाली के मुह से इतना सुनते ही एकांश खुशी से झुम उठता है। वर्शाली हर्शाली के पास जाती है और हर्शाली सके माथे पर प्यार से अपना हाथ फैरते है और फिर एक मंत्र बड़बड़ाती है--
"ॐ नीलांबरा दिव्यशक्ति, मम स्पर्शे प्रवाहित भव।
सर्व पीड़ा विनाशाय, जीवन ज्योति प्रकट भव॥"
और अपने हाथ को हर्शाली के सर से पांव तक फेरती है। जिससे वर्शाली सके हाथ से एक निलि रौशनी निकलती है। जिसे दैखकर ऐसा लग रही था के मानो वर्शाली ने हर्शाली को एक निलि रौशनी की चादर औड़ा दी हो। जिसे दैखकर एकांश हैरानी से वर्शाली की दैखता है और फिर पूछता है--
> ये क्या किया तुमने वर्शाली ?
एकांश की बात का वर्शाली जवाब देते हुए कहती है--
> सुरक्षा कवच एकांश जी।
एकांश हैरीनी से कहता है--
सुरक्षा कवच ..! पर इसकी क्या जरुरत है वर्शाली ये तो इस महल मे वेसे भी सुरक्षीत है ?
वर्शाली कहती है--
> वो तो है। परंतु इस कवच को कोई भेद नही सकता
। और इस कवच की हर्शाली के लिए आव्यशक है। क्योकी जिसके पास भी हर्शाली की मणी है वो ये कभी नही चाहेगा के वर्शाली कभी पुण: जिवित हो और अगर हर्शाली इस अवस्था मे उस राक्षस या मनुष्य के हाथ लग गयी तो अनर्थ हो जाएगा । अनर्थ ..!
> कैसा अनर्थ वर्शाली ?
एकांश चौंक कर कहता है ।
वर्शाली कहती है--
> अगर हर्शाली इस अवस्था मे उस दुष्ट के हाथ लग गई तो वो दुष्ट हर्शाली के शरीर को हानी पहूँचा सकता है जिससे हर्शाली को हम फिर कभी जिवित नही कर पाएगें । इसिलिए मैने ये सुरक्षा कवच हर्शाली को दिया है ताकी जबतक मैं यहां से दुर रहु तबतक हर्शाली को कोई हानी ना पहूँचा पाए। ये एक ऐसी शक्ती है जो कोई भी भेद नही सकता और हर्शाली सुरक्षित रहेगी ।
एकांश वर्शाली से पूछता है--
> वर्शाली ! क्या तुमने कभी हर्शाली की मणी को ढुढने की कोशीश नही की ?
वर्शाली निराशा भरी आवाज मे कहती है ---
> बहोत कोशीश की एकांश जी । परंतु वो कहां पर
है इसका खोज मैं नही कर पायी। और अब समय भी बहोत ही कम है । मैं क्या करूं कैसे उस मणी को ढुंढु कुछ ज्ञात नही हो पा रहा है।
इतना बोलकर वर्शाली भावुक हो जाती है। एकांश वर्शाली को दिलासा देते हुए कहता है---
> अब मैं तुम्हारे साथ हूँ ना । तो तुम चिंता मत करो अब मैं उस मणी को ढुंढ निकालुंगा । चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी क्यों ना करना पड़े।
एकांश की बात को सुनकर वर्शाली हल्की मुस्कान देती है और कहती है--
> हां वो तो मुझे ज्ञात है । अब सिघ्र चलिए आपके
घर भी तो जाना है।
> हां चलो ।
एकांश जवाब देता है।
और इतना बोलकर दोनो ही वहां से निकल जाता है। झरने के पास आकर वर्शाली अपने हाथ को हवा मे घुमाती है और मन ही मन कुछ मंत्र कहती है --
"ॐ मायाजाल संहर्त्री, नील छाया विस्तार।
एतत् स्थल विलुप्तं भव, केवल शून्य आधार॥"
वर्शाली के इतना करने वहां पर मौजुद झरना और महल गायब हो जाता है और चारों तरफ सिर्फ जंगल ही जंगल नजर आता है। ये सब दैख कर एकाश को अपने आंखो पर विश्वास नही हो रहा था। उसे ये सब एक जादु जैसा लग रहा था। वर्शाली एकांश से पूछती है--
> क्या हुआ एकांश जी आप अचानक से क्या सौचने लगे।
एकांश कहता है--
> कुछ नही वर्शाली । बस ...! ये सब दैखकर अपनी आंखो पर विश्वास नही कर पा रहा हूँ । आज के इस दौर मे इन सब चिजों पर कौन विश्वास करता है । के परी होती है , और परी जादु भी करती है। ये सब एक सपना सा लगता है। जो सिर्फ किताबों मे होती है। और ये सब मेरे आंखो के सामने हो रहा है तो मैं थोड़ा सा उलझन मे हूँ ।
वर्शाली हंस कर कहती है--
> ह ह ह ह । अच्छा ...! तो आपके किताबो मे हम परीयों के बारे मे क्या बताया गया है जरा मैं भी सुनु के आप मनुष्य हम परीयों के बारे मे कितना अधीक जानते हो।
एकांश हल्की मुस्कान के साथ कहता है--
> यही के परियां बहोत खुबसूरत होती है। उसके पिछे
पंख लगे होते है और वो सभी मन की ख्वाहिश पुरी करती है और हां परि के पास एक जादुई छड़ी भी होती है।
एकांश की बात पर वर्शाली खिलखिला कर हस उठती है और कहती है--
> हा हा हा हा । अच्छा ! तो आप सब ये जानते हो हम परियों के बारे मे । तो ..! आपको क्या लगता है एकांश जी परियां कैसी होती है ?
एकांश अपना सर को खुजाते हुए कहता है---
> वो । वो । वर्शाली तुमसे मिलने से पहले तो यही सब जानता था जो किताबों मे लिखा था। पर अब मैं ये जान गया हूँ के परि कैसी होती है। किताबों मे जो लिखा है के परि खुबसूरत होती है वो गलत है।
एकांश के इतना कहने पर वर्शाली एकांश की और हैरानी से दैखती है । वर्शाली कुछ कहती इससे पहले एकांश अपनी बात को जारी रखते हुए कहता है--
> परि बहुत खुबसूरत होती है हद से ज्यादा खुबसूरत
होती है ।
एकांश वर्शाली के करीब जाकर कहता है--
> क्योकीं ऐसी एक खुबसूरत परि मेरे सामने है जिससे मैं किताबों मे नही पड़ा अपनी इन आंखो से दैख रहा हूँ।
एकांश की बात पर वर्शाली सरमा के लाल हो जाती है।
एकांश फिर कहता है--
> पर पता नही कब तक मैं तुम्हें अपने पास दैख पाऊगां क्योकी एक दिन तो तुम यहां से चली जाओगी है ना वर्शाली ? और मैं ये सब कुछ भुल जाऊगां जैसे तुमने आलोक को भुला दिया है।
एकांश का मन भारी हो जाती है ये दैखकर वर्शाली भी भावुक हो जाती है ।
एकांश की बात का वर्शाली कोई जवाब नही देती है। एकांश फिर वर्शाली से कहता है--
> अगर कभी ऐसा हुआ तो वर्शाली तुम मुझे सच मे सब भुला देना क्योकी जब तुम यहां से चली जाओगी तो तुम मुझे बहोत याद आओगी। और फिर मैं रह नही पाऊंगा।
एकांश की बातों को सुनकर वर्शाली भी उदास हो जाती है। फिर वर्शाली बात तो संभालते हुए कहती है।
> आप ऐसा क्यों सौचते हो एकांश जी । अगर मुझे
भुलाना होता तो मैं आपको कबका सारी बात भुला दिया होता। यू अपने बारे मे आपको सारी बात नही बताती। और मैने कभी भी आपको अपने बारे मे असत्य नही कहीं और वैसे भी आप उदास क्यों हो रहे हो अगर मैं चली भी गई तो मैं आपसे मिलने आया करुगीं ।
एकांश वर्शाली के आंखो मे दैखकर कहता है--
> और अगर तुम अपने लौक मे जाकर मुझे भूल गयी तो ?
वर्शाली एकांश की बात का जवाब देते हुए कहती है--
> आप ऐसा क्यु सौच रहे हो । और आपके बात से बता चलता है के आाप मुझसे प्रेम तो नही कर बैठे एकांश जी ? जो आप बता नही रहे हो।।
वर्शाली की बात का एकांश बिना कोई जवाब दिये ही वहां से आगे बड़ने लगताा है। तो वर्शाली मन ही मन कहती है--
> मैं जानती हूँ एकांश जी के आप मुझसे बहोत प्रेम करते हो पर आप बता नही रहे हो। क्योकी आपको लगता है के मैं एक परी हूँ और आप के बताने से कही मैं आपसे नाराज ना हो जाऊं । परंतु एकांश जी सत्य तो यह है के मैं भी आपसे बहोत प्रेम करती हूँ । परतुं मैं ये बात आपके मुख से सुनना चाहती हूँ । मैं तो उसी रात को आपकी हो गई थी जिस रात को आपने उस दुष्टो से मेरी लाज बचायी थी । बस मै उस समय का इंतजार कर रही हूँ जब आप मुझे स्वयं ये बात कहोगे ।
इतना बोलकर वर्शाली झट से आगे जाकर एकांश का हाथ पकड़ती है और कुछ मन ही मन मंत्र बड़बड़ाती है--
"ॐ माया आवरणे, दृश्यं अदृश्यं भव।
क्षणेन लीयताम् सर्वं, शून्ये समाहितम्॥"
जिससे दौनो ही वहां से गायब हो जाता है। उधर मांतक और त्रिजला फिर से उस मणी की खोज मे पूरे गांव घर घर जाकर ढुंढने लगता है पर अभी तक उन दौनो को मणी ते बारें मे कुछ भी पता नही कर पाई। तो मांतक और त्रिजला फिर दक्षराज के घर के उपर बैठ जाता है और वहां बैठ कर इधर उधर दैखने लगता है। तभी वहां पर अघोरी बाबा धोती कुर्ता पहन कर एक गाँव वाले के वैश मे आ जाते है ताकी कोई उन्हे पहचान मी पाए। और अघोरी बाबा दक्षराज के महल के अंदर चला जाता है।
हवेली के अंदर जाते ही अघोरी को देत्य शक्ती का आभास होता है। अघोरी वही रुक कर इधर उधर दैखने लग जाता है। और मन ही मन कहता है --
> ये चेतन ने जो कहा था वो बात मुझे सच लग रही
है। यहां पर जरूर कोई देत्य है मुझे उसके यहां होने का आभास हो रहा है । पर वो कहां पर है ।
इतना बोलकर अघोरी इधर - उधर दैखने लग जाता है पर अघोरी को कोई दिखाई नही देता है।
तभी वहां पर दक्षराज आ जाता है। दक्षराज दैखता है के एक साधारण सा दिखने वाला कोई दुसरी तरफ मुह करके खड़ा है और हवेली को तांक झांक कर रहा है । पहले तो दक्षराज अघोरी बाबा को पहचान नही पाता है और यूं बिना बताए हवेली मे घुस जाने से गुस्सा होकर कहता है--
> अरे कैन है ये पागल जो बिना बताए हवेली के अंदर चला आया । दयाल ..! कहां हो तुम दैखे कौन है ये निकालो इसे बाहर।
दक्षराज के इतना कहने पर अघोरी बाबा गांव वाले का वेस लेकर दक्षराज की और मुड़ता है। दक्षराज अघोरी बाबा को दैखकर पहचान लेता है। तभी वहां पर दयाल आ जाता है और अघोरी का हाथ पकड़ कर उसकी और दैखकर कहता है--
> अरे ! कौन हो भाया और यूं यहां पर अंदर कैसे चले आए। चलो निकलो बाहर।
दक्षराज कुछ कह पाता इससे पहले ही दयाल अघोरी का हाथ पकड़ कर खिचने लगता है के अचानक अघोरी का शरिर तपने लगता है। अघोरी का शरिर तप कर इतना गर्म हो जाता है के मानो दयाल ने अघोरी का हाथ नही बल्की कोई आग मे तपे लोहे को पकड़ लिया हो।
दयाल अपने हाथ मे तेज जलन महसुस करते हुए झट से अघोरी का हाथ छौड़ देता है। और दयाल सौच मे पड़ जाता है के ये उसके साथ क्या हो रहा है। किसी का शरिर इतना कैसे तप सकता है। तभी दक्षराज अपना हाथ जौड़कर आगे बड़ने लगता है के तभी अघोरी बाबा दक्षराज को ना मे इशारा करता है।
दक्षराज वही रुक जाता है। मांतक और त्रिजला ये सब कुछ एक पैड़ के डाली पर बैठकर दैख रहा था। अघोरी दक्षराज के पास जाकर हाथजोड़ कर कहता है--
> मालीक ..! मालीक हम का बचाइलो मालीक । हम बहोत बड़ी मुस्कील मे है मालीक । औ केवल आप ही मुझे इस मुसीबत से बचा सकती हो।
दयाल को ये सब कुछ बिलकुल भी समझ मे नही आ रहा था के ये सब हो क्या रहा है और ये आदमी कौन है । पहले तो दधराज को भी आश्चर्य होता है के अघोरी बाबा ऐसे क्यु बरताव कर रहे हैं पर दक्षराज भी काफी चालाक है । वो अघोरी बाबा की इशारा को समझ लेता है के शायद कुछ बात जरुर है जिस कारण अघोरी बाबा को इस तरह से आना पड़ा ।
दक्षराज अघोरी बाबा से कहता है--
> ठिक है ठिक है आप पहले सांत हो जाईए और आप अंदर आईए हम आराम से बात करते है। आप भी काफी थके हुए से लग रहे हैं । आइए अंदर आइए।
To be continue....1081