Shrapit ek Prem Kahaani - 66 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 66

Featured Books
Categories
Share

श्रापित एक प्रेम कहानी - 66

चेतन कहता है।

> गुरुदेव जब मैं हॉस्पिटल से भागकर दक्षराज के घर 
गया था । तब वहां पर मुझे घर के उपर बैठे दो पक्षीयों पर नजर पड़ी जो मुझे कोई साधारण पक्षी नही लगी। तो मैने अपनी शक्ती से उसके बारे मे पता लगाने की कोशीश की तो मुझे पता चला के वो कोई साधारण पक्षी नही बल्की देत्य है। 


देत्य का नाम सुनकर अघोरी कुछ दैर चुप रहता है। और फिर कहता है । 

> देत्य ! ये दुसरा देत्य अब कहां से आ गया । कुंम्भन तो जंगल मे पड़ा है तो फिर ये दोनो पक्षी बने देत्य आखिर कौन हो सकते है। इसका मतलब कोई और देत्य भी है जो कुंम्भन के सहायता के लिए आया है़ , तभी ये सब घटना हो रही है।

 अघोरी चेतन से पूछता है। 

> चेतन कही उस देत्य का दक्षराज पर संदेह तो नही हो गया। 

अघोरी की बात पर चेतन कहता है। 

> नही गुरुदेव अगर ऐसा हुआ होता तो वो देत्य दक्षराज को कब का मार चुका होता परंतु उसने ऐसा नही किया इसका अर्थ ये होता है के वो दोनो उसी मणी की खोज मे लगा है जो मणी दक्षराज के पास ह़ै। और मैने इस बात की सुचना दक्षराज को एक कागज पर लिख कर दे दिया है के वो दोनो पक्षी नही बल्की दैत्य है। ताकी उन दोनो देत्य को हमारी बात का पता ना चलें । 

चेतन की बात पर अघोरी खुश होकर कहता है । 

> शाबास चेतन । तुमने बहुत बुद्धीमानी से काम किया । इसिलिए तुम मेरे सबसे प्रिय शिष्य हो और मैं तुम्हे ही केवल सभी कार्य सोंपता हूँ क्योकीं मुझे तुम्हारी बुध्दी पर पूर्ण विश्वास है। 

अघोरी चेतनो के कंधे पर हाथ रखते हुए कहता है। 

> परतुं एक चिंता और है ।

 चेतन कहता है । 

> कौन सी चिंता गुरुदेव ?

 अघोरी कहता है। 

> यही के अब देत्य भी मणी की खोज मे निकल पड़ा 
है और इस स्थिति मे दक्षराज की जान पर खतरा है। चेतन तुम सिघ्र जाओ और दक्षराज से कहना के मैने याद किया है। और एक बात है तुम सिघ्र अति सिघ्र उस वर्शाली और डॉक्टर पर नजर रखो और हमे इसकी सुचना दो । अब जाओ विलम्ब ना करो। 

चेतन अपना दोनो हाथ तौड़कर कहता है ।

> जो आज्ञा गुरुदेव । 

इतना बौलकर चेतन वहां से चला जाता है। चेतन के जाने के बाद अघोरी कुछ कदम चलकर कुछ सौचते हूए कहता है। 

> हम्म् ! तो इसका मतलब वो इस धरती पर आ चुकी है। क्योकीं कु़्ंम्भन को जैसे शक्ती शाली देत्य को मार गिराने वाला वो निलि रोशनी केवल शांतक मणी का ही हो सकता है। कही वर्शाली ही तो परी नही ? मुझे चेतन के आने तक का प्रतिक्षा करनी होगी। परतुं मुझे सिघ्र ही दक्षराज से मिलना होगी क्योकीं देत्य अब मणी को ढुडं रहा है और अगर उस देत्य को दक्षराज पर जरा सा भी संदेह हुआ तो दक्षराज के लिए अच्छा नही होगा। 

अघोरी कुछ सौचता हुअ कहता है। 

> परतुं परी ! परी उस मेला मे क्या कर रहा है। अगर वो निली रौशनी उस मेला मे कुम्भन को लगा था तो इसका मतलब ये हुआ के वो शांतक मणी का ही था और अगर वो रोशनी शांतक मणी की थी तो परी भी वही पर थी । परतुं एक बात समझ मे नही आती के परी वो भी मनुष्य के साथ मेला मे क्या कर रही थी। कही वर्शाली ही परी तो नही ? मुझे स्वयं जाकर 
खोज करनी होगी क्योकी इस समय परी का यहां होना इस बात का पता मुझे करना होगा । 

इतना बोलकर अघोरी अपनी त्रिशूल पकड़कर अपनी 
गुफा से बाहर चला जाता है। 

उधर हॉस्पिटल मे वृन्दां एकांश को ना देखकर गुणा से पूछती है। 

> गुणा तुमने एकांश को कही दैखा है क्या ?

 गुणा ना मे अपना सर हिलाते हुए कहता है। 

> नही क्यों ! वो यहां हॉस्पिटल मे नही है क्या ? 

वृन्दां चिड़कर कहती है। 

> नही यार..! यही तो एकांश की प्रब्लाम है के वो बिना बताए कही भी चला जाता है। 

वृन्दां एकांश को फोन लगाती है पर एकांश का फोन नॉट रिचेबल आ रहा था । जिससे वृन्दां गुस्सा होकर कहती है ।

> अरे यार ..! ये फोन क्यों नही लग रही उसका। 

गुणा कहता है--

> तुम परेसान क्यों हो रही हो। यही कही होगा आ 
जाएगा । 

गुणा की बात पर वृन्दां चिड़कर कहती है--

> मैने तुमसे Suggestion मांगा क्या ? 

वृन्दां की गुस्सा को दैखकर गुणा समझ जाता है के इस वक्त वृन्दां से कुछ भी कहना सही नही है। इसिलिए गुणा अपना सर खुजाते हुए वहां से चला जाता है। वृन्दां कुछ सौचती है और फिर अपना फोन लेकर संपूर्णा का नंम्बर डॉयल करने लगता है। 

> हां संपूर्णा को फोन लगाती हूँ ।

 वृन्दां कहती है। 

उधर संपूर्णा का फोन रिंग होने लगता है। के संपूर्णा का फोन मिरा उठाती है और कहती है--

> हां वृन्दां बोलो बेटा । वो संपूर्णा नहाने के लिए बाथरूम गयी है कुछ काम था क्या ? 

वृन्दां कहती है --

> नही आंटी वो मैं बस ये जानने के लिए फोन किया था के एकांश वहां घर मे है क्या ? 

वृन्दां की बात पर मिरा कहती है--

> नही बेटा ! वो तो कल रात से वही हॉस्पिटल मे है। तुम वहां उसे देखो वो वही है। 

वृन्दां कहती है--

> नही आंटी मैं यही हॉस्पिटल मे ही हूँ । कल रात से हम सब यही पर है पर सुबह से एकांश का कुछ पता नही और उसका फोन भी बंद आ रहा है। तो मुझे लगा शायद वो घर होगा इसिलिए मैने संपूर्णा को यही बात जानने के लिए फोन किया। 

मिरा कहती है--

तु चितां मत कर बेटा होगा वो यही कही। गया होगा कही घुमने आ जाएगा वो ऐसा ही है बिना बताए कही भी चला जाता है , तुम टेंशन मत लो ठीक बेटा ।

वृन्दां मिरा से कहती है ---

ठिक है आंटी अब मैं फोन रखती हूँ वो आज सारे ˈपेशेन्ट को डिस्चार्ज भी करनी है। 

मिरा कहती है --

> ठिक है बेटा ! अपना ख्याल रखना। 

इतना बोलकर दोनो ही फोन को कट कर देती है। वृन्दां फोन को रख कर सौचती है--

> आखीर ये एकांश कहां चला गया। 

इधर जंगल मे एकांश और वर्शाली दौनो ही एक दुसरे के बाहों मे थे। कुछ दैर बाद दोनो अलग होते है और वर्शाली एकांश से कहती है--

> एकांश जी अब आपको जाना चाहिए क्योकी काफी समय हो गया है आपको यहां आते हुए और आप बिना बताए यहां पर आए हो तो अब आपको जाना चाहिए नही तो आपके दोस्त और आपके घर वाले चितां कर रहे होगें। 

वर्शाली की बात सुनकर एकांश कहता है--

पर वर्शाली तुमने कहा था के तुम तुम्हारी बहन हर्शाली के बारे बताओगी , के हर्शाली की ये हालत कैसे हूई । और तुम्हारी यहां आने का क्या कारण है ? मैं ये सब जानना चाहता हुँ। तभी तो मैं तुम्हारी मदद कर पाऊगां। 

वर्शाली एकांश के पास आकर कहती है --

> मैं सब आपको बताऊंगी एकांश जी। परतुं मैं ये नही 
चाहती के आप मेरे कारण अपने प्राण को संकट मे डालें । 

वर्शाली की बात का जवाब देते हुए एकांश कहता है । 
> संकट ..! ये तुम क्या कह रही हो वर्शाली ! मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ ।

 वर्शाली अपने लिए एकांश का समर्पण दैखकर एकांश की आंखो मे प्यार से दैखकर कहती है--

> परतुं क्यों एकांश जी ?

क्योकीं मैं तुमसे ....!

इतना बोलकर एकांश चुप हो जाता है। वर्शाली एकांश से पूछती है--

> आप मुझसे क्या एकांश जी। कहीए ना रुक क्यों गए । 

एकांश सौच मे पड़ जाता है के ये मैं क्या कहने जा रहा था । अगर आज मेरे मुह से ये निकल जाता के मैं वर्शाली से प्यार करता हूँ तो शायद आज के बाद वर्शाली मुझसे कभी नही मिलती। क्योंकि वो एक परी है और मैं एक साधारण सा इंसान , नही - नही मुझे वर्शाली से उसके लिए अपना प्यार छुपाकर रखना होगा ।

 एकांश को देखकर वर्शाली कहती है-- 

> क्या हुआ एकांश जी आप क्या सौचने लगे। आप कुछ कह रहे थे । 

एकांश वर्शाली के सवाल से हड़बड़ा जाता है। और घबरा कर कहता है --

> वो वो .. वर्शाली मैं ये कह रहा था के तुम मेरी बहोत अच्छी दोस्त हो ना । इसिलिए मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ।

 इतना बोलकर एकांश वर्शाली से अपनी नजरे चुराने लगता है। वर्शाली एकांश के करीब जाकर कहती है--

> सिर्फ दौस्त एकांश जी ! 

वर्शाली के इतनी करीब आने से एकांश अपनी नजरे चुराने लगता है। एकांश की सांसे तेज हो जाती है और उसकी दिल की धड़कन बड़ जाती है। जो जौर जौर धड़क रहा था जिसे वर्शाली साफ साफ सुन पा रही थी। 

एकांश के कुछ ना कहने से वर्शाली अपनी बात को घुमाते हुए कहती है। 

> अरे एकांश जी आप तो लड़की जैसा घबराने लगे । 
आप ही ने तो कहां था के एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नही हो सकते । बस इसिलिए मैने आपसे पूछ लिया। 

एकांश वर्शाली का हाथ अपने हाथ मे थामकर वर्शाली के आंखो मे दैखकर कहता है--

> वो सब तो मुझे नही पता है वर्शाली पर मैं इतना जरुर जानता हूँ के जब मैने सपने मे दैखा के तुम कोई मुसीबत हो तो मैं बहुत डर गया था। तब मुझे किसी बात का ख्याल नही था । ख्याल था तो सिर्फ तुम्हारा । 

एकांश वर्शाली के और करीब जाकर कहता है--

> मैं तुम्हें परेसान नही दैख सकता वर्शाली । तुम्हारी 
खुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ । 

एकांश से इतना सुमकर वर्शाली के मुख पर एक चमक आ जाती है। वर्शाली मन ही मन एकांश खुश हो रही थी और प्यार से एकांश के आंखो मे दैखने लगती है। एकांश वर्शाली से कहता है--

> वर्शाली मुझे तुम्हारे साथ समय बिताना बहुत अच्छा 
लगता है। जब मैं तुम्हारे साथ होता हूँ । तब ऐसा लगती है के दुनिया की सारी खुशी मेरे पास है। और जब दुर जाता हूँ । तब ऐसा लगता है जैसे मुझसे कोई मेरी सांसे छिन कर ले जा रहा है। 

एकांश से इस तरह की बात सुनकर वर्शाली का मन कर रहा था के वो एकांश को अपने सिने से लगा ले और उसके माथे को चुमकर उससे ये कह दूँ के ---

> एकांश जी मैं भी आपसे बहोत प्रेम करती हूँ। मैं भी 
अब आपसे दुर नही नही रह सकती । 

पर वर्शाली चाह कर भी अपने म़न की बात एकांश से नही कर पा रही थी। तब एकांश कुछ सौचता है और वर्शाली से कहता है--

> वर्शाली.! क्यो ना तुम भी मेरे साथ मेरे चलो। 

वर्शाली हैरानी से कहती है --

> आपके घर ?

To be continue.....1064