Honey Doll - Ranjan Kumar Desai (89) in Hindi Love Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (89)

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (89)

               

                 यादों की सहेलगाह - प्रकरण 89


          " मैं एक लेखक था, यह जानकर उस ने मेरा सन्मान किया था."

           " मैं उस वक़्त वेश्या के बारे में सर्वे कर रहा था.  यह जानकर वह प्रभावित हुई थी. उस ने मुझे न्योता दिया था."

           " भैया! आप को हमारे बारे में क़ोई भी जानकारी चाहिये तो इस बहन के पास आना. मैं आप की मदद करूंगी. "

            "जाते जाते उस ने अपनी कहानी बयान की थी:'

            " वह राजस्थान की रहने वाली थी.. वह चार बहने थी. वह सब से बड़ी थी. मा अक्सर बीमार रहती थी, कुछ काम नहीं कर सकती थी. उस के पिताजी फौज में थे. जो भारत पाकिस्तान की लड़ाई में शहिद हो गये थे. उस वक़्त उस के चाचा  काम दिलाने के बहाने उसे मुंबई ले आये थे और बड़ी रकम ऐंठकर उसे वेश्या दलालो के हाथ बेच दिया था. "

            " उस ने धंधा क़र के अपने परिवार का गुजारा किया था. वह अपने आप में एक मिशाल थी."

             " गंदगी में रहते हुए भी वह नेक दिल थी, साफ थी.  उस की मा के उपचार के लिये उस ने मेरे पैसे पर हाथ आजमाया था, इस बात का भी स्वीकार किया था. "

            " यह जानकर मैंने उस की मदद की थी. उस पर आरती ने क़ोई एतराज दर्शाया नहीं था. "

           " वैसे तो आरती किसी को पैसे देने के पक्ष में नहीं थी.. उस की अपनी क़ोई हैसियत भी नहीं थी. फिर भी उस ने इस नेक काम में मुझे सहयोग दिया था. "

            "मेरी इस कहानी को लोगो ने बहुत सराहा था.. उस के लिये मुझे साहित्य संघ के जरिये के द्वारा पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था."

            " यह मेरे लिये सुनहरा मौका था, जिसे मैं कभी नहीं भूल पाया था. "

            " उस वक़्त पहली बार आरती ने मेरे लिखने की आदत की खरे दिल से सराहना की थी. लेकिन सब दिन एक जैसे नहीं होते. मुझे इस बात का बहुत जल्द एहसास हो गया था. "

           " हमारे यहाँ सब लोग कहानिया पढ़ते है, अख़बार या सामायिक उन की डिमांड भी करते है, लेकिन पैसे के नाम से मानो उन्हें साप सूंघ जाता है."

            "सामायिक हो या अख़बार, दोनों ज्यादा जाहिरात के बलबूते चलते है. हमारे यहाँ सामायिक, अख़बार को लोग खरीदते नहीं, बल्कि अड़ोस पड़ोस से मांगकर पढ़ते हैं.."

           " मैंने एक स्पर्धा में भाग लिया था. मुझे पहला इनाम मिला था. यह मेरे लिये खुशी की बात थी. सहज मुझे बडे पुरस्कार की अपेक्षा थी. लेकिन मुझे केवल 21 रूपये ही दिये गये थे. जिस ने मेरी आगे लिखने की इच्छा पर पानी फेर दिया था."

           " एक पल मुझे लिखना बंद करना चाहिये ऐसा ख्याल भी आया था. लेकिन अन्य लेखकों की सलाह मानकर लिखना बंद नहीं किया था."

            "घर में किसी को मेरा लिखना पसंद नहीं था!!"

             "और लिखना मेरी जनून बन गया था."

              " उस के बारे में मैं खुद अपने आप से लडता रहता था. "

               " लिखने को तो लोग बहुत कुछ लिख जाते थे, लेकिन लिखाई और हकीकत के बीच क़ोई मेल नहीं होता था. "

              " अंदर क्या? बाहर क्या?? "

               "चोरी ना करने की सलाह देने वाले खुद चोरी करते थे."

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              " मेरी तबियत काफ़ी ख़राब हो गई थी. मेरा अंत समजो आ गया था. उस समय मैंने स्नेहा को अपील की थी."

              " मेरी बेटी बिभूति को वीडियो कोल करो. "

               " उस ने तुरंत वीडियो कोल किया था."

               "  बिभूति तुरंत लाईन पर दिखाई दी थी."

              "   मैं उस वक़्त बिस्तर में सोया था. इतवार का दिन था. मुझे देखकर उसे कुछ संदेह हुआ था. "

              " उस ने चिंतित होकर सवाल किया था. "

              " बडे पापा! क्या बात हैं? आज फिर इतनी देर तक बिस्तर में  सोये हुए हो. "

               "  यह सिनारियो मेरी जिंदगी में दोबारा हुआ था."

                " मैं तो उस को कुछ कह  नहीं पाया था. उस पर स्नेहा ने जवाब दिया था :"

                " बिभूति दीदी! आप के बडे बापा बहुत बीमार हैं. उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ेगा. "

               " यह सुनकर उस के होंश उड़ गये थे."

               " तुम अपने पापा का ख्याल करो. हम लोग तुरंत मुंबई आते हैं."

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           " और पांच घंटे के भीतर बिभूति अपने पति और छोटू को लेकर मुंबई आ गई थी."

            " मैंने कभी दोबारा उसे मिलने की उम्मीद नहीं की थी. लेकिन भगवान ने हम दोनों को फिर से मिलाया था. मेरे नसीब में ईश्वर ने मुझे इस तरह मिलने का लिखा था."

              "अब मुझे क़ोई चीज की चाहत नहीं बची थी."

           .  " मैंने उसे स्नेहा के बारे में सब कुछ बताया था. उस ने तुरंत उस को अपनी बहन के रूप में स्वीकार लिया था. मेरे लिये यह बात एक लॉटरी जीत ने से भी बढ़कर थी. "

               " उस के साथ छोटू भी आया था. उस ने मुझे ' नानू ' कहकर बुलाया था. यह भी मेरे लिये एक बड़ी उपलब्धि थी."

                " डॉक्टर ने ओपरेशन का सुझाव दिया था."

                " बिभूति खर्च करने को भी तैयार हो गई थी. लेकिन मेरे बचने की क़ोई उम्मीद नहीं थी."

                " मैंने मना क़र दिया था."

                " बिभूति ने भी सच्चाई का स्वीकार किया था."

               " उस ने मेरी बाजू में बैठकर मेरा सिर सहलाया था. मेरी उपन्यास को ' प्रति लिपि ' कहानी स्पर्धा में इनाम  मिला था. उसी समय मेरे मोबाईल में मेसेज आया था. "

              " बिभूति ने तहेदिल से मुझे अभिनन्दन दिया  था."

               " मेरी ख़ुशी दुगुनी नहीं बल्कि चौगुनी हो गई थी. अतिशय ख़ुशी में मुझे अटैक आया था."

             "  यह देखकर बिभूति की आँखों में आंसू का महासागर उभर आया था. सैलाब बहने लगा था."

              " उस वक़्त मुझे याद आया था."

                "मैंने स्नेहा की गोद में सिर रखकर अंतिम सांस लेने का सपना देखा था."

              " मैंने बिभूति उस के बारे में आगाह किया था."

              "  मेरा अंत होने वाला था. बिभूति समझ गईं थी. "

               " उस ने स्नेहा को मेरे पास बिठा दिया था. और मेरा सिर उस की गोद में रख दिया था."

                     000000000000    ( क्रमशः)