Shrapit ek Prem Kahaani - 71 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 71

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 71

संजीवनी मंत्र का नाम सुनते ही कुंम्भनी कहती है--

> संजीवनी मंत्र ये वही मंत्र है ना पिताश्री जो हमारे गुरू शुक्राचार्य के पास है । तो क्या गुरू देव को ये मंत्र भगवान शंकर ने दिया था ? 

कुंभ्मन कहता है--

> हां पुत्री ! जब ये बात देवताओ को पता चली के दैत्य गुरु शुक्राचार्य भगवान शंकर के पास संजीवनी मंत्र को प्राप्त करने के किए गया है तो उनको ये बात सताने लगी के अगर दैत्य गुरु शुक्राचार्य को भगवान शंकर ने संजीवनी मंत्र दे दिया तो अनर्थ हो जाएगा । क्योकी संजीवनी मंत्र मिलने के बाद दैत्य देवताओ पर आक्रमण कर देगें और देवता और दैत्य के बिच युध्द मे देत्यो के जितने भी सैनिक मारे जाएगें । दैत्य गुरु शुक्राचार्य उन सभी को संजीवनी मंत्र से पुण: जिवित कर देगें। 

और फिर इस तरह से दैत्यों का एक भी सैनिक नही मरेगा और इस तरह से देवताओ के सैनीक कम होती जाएगी और वे युध्द मे पराजीत हो जाएगें तो उन्हें स्वर्ग जैसे सुंदर जगह को छौड़कर जाना पड़ेगा। इसी भय के कारण के महादेव गुरु शुक्राचार्य को संजीवनी मंत्र ना प्रदान कर दे भगवान इंद्र भी महादेव के पास संजीवनी मंत्र को प्राप्त करने के लिए कैलाश पँहुच गए। 

दोनो ही भगवान शंकर के पास जाते है । जहां पर भगवान शंकर ने कहां के दौनो मे से उसी को संजीवनी प्रदान करेगें जो सबसे कठोर तप करेगा । मैं उसे ही संजीवनी मंत्र दुगां । इस तरह से गुरु शुक्राचार्य ने कठोर तप करके भगवान महादेव को प्रशन्न करके उनसे संजीवनी मंत्र प्राप्त कर लेता है। और फिर देत्य स्वर्ग मे आक्रमण करके स्वर्ग को जीत लेता है।

 और देवता को स्वर्ग छौड़कर जाना पड़ता है।

कुंम्भनी पूछती है--

> स्वर्ग लोक को हारने के बाद देवता सब कहां गए पिताश्री ? 

कुम्भन कहता है--

> वे सभी भगवान विष्णु के पास गए और अपनी पराजय की कहानी कह सुनाई। देवताओ की बात सुनकर भगवान विष्णु इंद्रदव से कहते है।

" आप लोग चिंता ना करे । एक उपाय है जिससे आप सब उन देत्य को परास्त करके पुण: स्वर्ग लोक को पा सकते है। "

इंद्रदेव हाथ जौड़कर कहता है --

> मगर कैसे प्रभु ?

इंद्रदेव के प्रश्न का भगवान विष्णु उत्तर देेते हुए कहता है--

> समुद्र मंथन । 

समुद्र मंथन के बारे मे सुनकर सभी देवता हैरानी से एक दुसरे को दैखते रहते है। और भगवान विष्णु से पुछते हैं --

> समुद्र मंथन परतुं प्रभु ये कैसे संभव है ! इतना विशाल संमुद्र को हम मथेगें कैसे ? 

तब भगवान श्री हरी ने देवताओ को संमुद्र को मथने का उपाय बताया। ‌‌‌कुम्भन की बात सुनकर कुंम्भनी बड़े उत्साह के साथ पूछती है--

> पिताश्री ! भगवान विष्णु ने उन देवताओ को क्या उपाय बताया ? 

कुंम्भनी की बात पर कुंम्भन हंसते हुए कहता है---

> अच्छा ..! ठिक है मैं तुम्हें ये भी बताता हूँ । देवताओ के विनती पर श्री हरी ने कहा के मंद्राचल पर्वत को मंथनी और नाग राज बाशुकी को उसकी डोरी बना देने से समुद्र को मथा जा सकता है। भगवान श्री हरी की बात पर सभी ने यही उपाय ठीक समझा परतुं अब भी एक दुविधा थी देवताओ के पास अब उतनी बल और सैनीक नही थे के वो अकेले ही समुद्र को मथा सके। इसके लिए वे हम देत्यों के पास आकर हमसे सहायता मांगी के जो भी वस्तु उस मंथन से निकलेगा उसे दौनो पक्षो मे समान समान बांट दिया जायेगा। और फिर अमृत निकलेगा जिसे पीने के बाद सभी अमर हो जाऐगें । 

अमृत का नाम सुनकर देत्य भी मंथन के लिए राजी हो गए। क्योकी संजीवनी मंत्र केवल उसे ही जिवित कर सकता था जिसकी मृत्यु युध्द मे हुआ हो अन्यथा संजीवनी मंत्र का उपयोग नही किया जा सकता था। ये सौच कर देत्य भी राजी हो गए और फिर दौनो ही पक्ष समुद्र मे पहूँच जाता है। और जब समुद्र को मंथने की बारी आयी तो मंद्राचल पर्वत संमुद्र् की गहराई के कारण डुब जा रहा था । तब भगवान श्री हरी ने स्वंय कछुए का रुप लिया और मंद्रचल पर्वत को अपनी पिठपर रख लिया और फिर दौनो ही समुद्र तो मथमा सुरु कर दिया। 

कुंम्भनी फिर बिच मे टोक कर कहती है---

> अच्छा वाह ! तो फिर क्या पिताश्री उसके बाद अमृत प्राप्त हो गई दोनो को ? 

कुम्भनी की बात को सुनकर कुंम्भन कहता है---

> नही पुत्री इतनी सरलता से अमृत कहा प्राप्त होनी थी । वो तो सबसे अंत मे निकला । 

अर्थात पिताश्री अमृत से पहले भी कोई वस्तु निकला था क्या ? 

कुंम्भनी अपने पिता से पुछती है।

 कुंम्भन कहता है --

> हां पुत्री ! समुद्र मंथन मे कुल 14 वस्तुए निकली थी । सबसे पहले महा भयंकर कालकोट विष प्रकट हुआ । जिसके प्रभाव से सारे शृष्टी मे हाहाकार मच कर गया । सभी देवता और देत्य वहां से भाग निकले ।

 फिर क्या हुआ पिताश्री ? 

कुंम्भनी जिज्ञासा भरी आवाज मे पूछती है ।

कुंम्भन अपनी बात को आगे जारी रखते हूए कहता है--


> फिर इस महासंकट से हम सब का उध्दार करने के लिए स्वम महादेव आये और उन्होने कालकोट विष को पिकर उसे अपने कंठ मे रख लिया और पूरी सृष्टि को इस महा भंयकर प्रलयकारी कालकोट विष से रक्षा की। अपने कंठ मे कालकोट विष को रखने के कारण उनका नाम नीलकंठ पड़ा । 

कुंम्भनी झट से कहती है--

> ओ ..! तो इसिलिए उनका नाम नीलकंठ पड़ा । अच्छा फिर क्या हुआ पिताश्री ! क्या कालकोट को महादेव द्वारा पी लेने के बाद फिरसे समुद्र को मथने के लिए देव और देत्य दोबारा से वहां पर गए ?

 कुंम्भन कहता है--

> हां पुत्री ! महादेव के कालकोट विष को पी लेने के बाद सृष्टी मे आयी संकट टल गयी और फिर दोवारा से समुद्र का मंथन सुरु हुआ। समुद्र को मंथने के बाद उसमे से कामधेनु नाम का एक गाय उत्पन्न हुआ जो स्वेत वर्ण का था । जिसे देवताओ ने ऋृषियों को दे दिया। उसके बाद मंथने से एक घोड़ा उत्पन्न हुआ जिसका नाम उच्चेयशर्वा घोड़ा था जो हम देत्यों को मिला ।

 कुंम्भनी खुश होकर कहती है--

> हां मैं जानती हूँ ये वही घोड़ा है ना जो हम देत्यों के पास है। 

> हां पुत्री ये वही है। 

कुंम्भन जवाब देता है। 

> फिर आगे और क्या निकला पिताश्री ? 

कुंम्भनी जिज्ञासा से पूछती है।

 कुंभ्मन कहता है---

> फिर 4 दाँत वाला ऐरावत हाथी निकला जिसे देवता ले गए जो इंद्र देव का वाहन है। फिर माता लक्ष्मी प्रकट हूई जिनका रूप दैखकर देव और देत्य आपस मे भीड़ गए । तब माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपना वर माना और भगवान विष्णु उन्हें अपने साथ लेकर गए । उसके बाद अप्सराएँ प्रकट हूई फिर चंद्रमा उसके बाद वारुणी देवी मदीरा के साथ प्रकट हूई जिन्हें देत्य ने अपने पास रखा। 

उसके बाद शंख फिर पारिजात वृक्ष प्रकट हुई जिसे छुने से सरीर की सारी थकान दुर हो जाती। फिर कोस्तुव मणी इस मणी का प्रकाश इतना था के ये तिनो लोकों को प्रकाशीत कर रहा था। फिर प्रकट हुआ कल्प वृक्ष जिससे जे कुछ भी मांगो ये मांगने वाले की हर ईच्छा को पूरी करता है। 

और आर्युवेद के प्रबंथक धनवंतरी अमृत के साथ प्रकट हुआ । अमृत को दैखते ही सभी देवता और देत्य उसे पाने के लिए धनवंतरी का पिछा करने लग गए। 

इतना सुनने के बाद कुंम्भनी कहती है---

> परतुं पिताश्री वे सब आपस मे लड़ाई क्यों करने लगे जबकी दौनो पक्षो मे तो यह संधी हूई थी के अमृत को दौनो पक्षो मे समान बांटा जाएगा। 

कुम्भन कहता है --

> हां पुत्री ! संधी तो यही हुई थी परतुं जैसे ही धनवंतरी अमृत लेकर प्रकट हुआ स्वरभानु ने जाकर धनवंतरी से अमृत छल करके उससे छीन लिया और उसके बाद असुर अमृत को अपने साथ अपने लोक लेकर चले आए। तब भगवान विष्णु मोहिनी का रुप धारण करके देत्यो के पास गए । 

देत्य मोहिनी का रुप दैखकर उसपर पुर्ण रुप से मुग्ध हो गए थे। मोहीनी का मन मोहक रुप दैखकर सारे दैत्य मोहिनी पर ऐसे मुग्ध हो गए के देत्य मोहिनी के कहने पर देवताओ को भी वहां पर आमंत्रीत करके देत्य लोक पर बुलाकर ले आता है। मोहिनी अपनी रुप के जाल मे देत्य को फसाकर सारा अमृत देवताओ को पिला देता है। और देत्य को सिर्फ मदिरा ।

 अमृत को पीने ते बाद देवता अब अमर हो चुके थे। और अमर होने के वजह से देवता फिर से स्वर्ग को देत्यों जीत लेता है। फिर ऐसे ही कई युध्द देत्य और देवताओ के बिच हुआ । फिर एक समय महान विष्णु के भक्त प्रहलाद के पोत्र और विरोचन के पुत्र बली राजा बने विरोचन को देवराज इंद्र छल से उनका वध कर देते है और देत्य गुरु शुक्राचार्य विरोचन को कही पुण:: जिवित ना कर दे इस भय से देवराज इंद्र विरोचन के शव को वही पर भस्मं कर देते हैं। इसि क्रोध मे आकर राजा बली ने धौर तपस्या किया और फिर वरदान प्राप्त करके तिनो लोको पर अपना विजय ध्वज लहराया । 

कुंम्भनी पूछती है--

> पिताश्री मुझे ये तो ज्ञात है राजा बली एक महान 
दानविर राजा और एक पुण्य आत्मा है। परतुं जब उन्होनें तिनो लोको को जीत लिया था तो फिर उन्होने सब छौड़कर देत्य लोक क्यो चले आए। क्या वे भी कभी मानवो पर अत्याचार या दुर्व्यवहार करते थे ? 

कुंम्भन कहता है---

> नही पुत्री ! वे ऐसा नही थे । वे तो एक महान दानी थे जो भी उनके पास अपनी इच्छा लेकर गए उन सभी का इच्छा वे अवश्य पूर्ण करते थे। राजा बली ने देवताओ से स्वर्ग को जीत कर देवराज इंद्र को बेघर कर दिया । देव राज इंद्र इधर उधर भटकने लगे और राजा बली उन्हें हर जगह ढुंढने लगे थे । 

कुंम्भनी फिर ये एक प्रश्न कुंभ्मन से पुछ लेती है--

> पिताश्री तो इस बार भगवान विष्णु ने देवताओ के सहायता के नही आए ? 

कुंम्भन कहता है---

> नही पुत्री वे इस बार नही आए । क्योकी जिस प्रकार देवताओ ने विरोचन को छल से मारा था उससे वो देवताओ से बहुत ही क्रोधीत थे। इसिलिए वे इस समय देवताओ की सहायता नही की । परतुं बाद मे देवताओ के बहुत प्रयत्न के बाद भगवान विष्णु वामन का अवतार लिया और भिक्षुक बनकर वे राजा बली के पास गये और उनसे भिक्षा मांगने लगे। उस समय राजा बली अश्वमेघ यज्ञ कर रहे थे । जब राजा बली ने वामन देव से भिक्षा मांगने को कहा तो उन्होनें राजा बली से भिक्षा मे तीन पैर ज़मीन मांग लिया। वामन देव के मात्र तीन पैर जमीन मांगने से राजा बली हैरान थे क्योकी वामन देवता के पैर बिल्कुल छौटे छोटे थे। जिसे दैखकर राजा बली हैरान होकर कहने लगे। 

" हे वामन देवता आपके अपने लिए मात्र तीन पैर जमीन मांगना जिसे सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य लगा क्योकी आपके इतने छोटे छोटे पैर से तीन पैर जमीन लेकर क्या किजीएगा अगर आपको मांगना ही है तो सोना , चाॅदी , किमती रत्न वस्त्र ये सब मांगिए। "

To be continue...1138