Shrapit ek Prem Kahaani - 70 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 70

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 70

कुम्भन कहता है --

> ये मुझे ञात नही मित्र परतुं इस समय हित और अहित की चितां का नही है। जब रक्षा कवच टुटा तब मैने फिर से चुपचाप इस जंगल से बाहर आकर मणी की खोज करने लगा । ताकी किसी को भी ये आभास ना हो के रक्षा कवच टुट चुकी है और मैं जंगल से बाहर आ गया हूँ । परतुं मित्र मेरा ये प्रयत्न भी विफल रहा क्योकीं उस दिन मेला मे एक छोटे बालक ने मुझे देख लिया और मेरे आंखो को खेलने का वस्तु समझ कर मेरे आंख पर कुछ दे मारा तब मैं अपने आपको रौक नही पाया और गुस्से से सभी मानवो को मारने लगा । के तभी किसीने मुझे एक शक्ती से प्रहार किया और मैं फिर से इसि जंगल मे अचेत होकर गिर पड़ा। तब मेरी पत्नी ने तुम्हारे बारे मे मुझे स्मरण कराया और कहां के आप अपने मित्र मांतक और उनकी पत्नी त्रिजला से सहायता मांगिए क्योकीं उन्हें ये वर प्राप्त है के कोई भी बंधन उन्हे नही बांध सकती । 

कुंम्भन मांतक के पास जाकर कहता है--

> मित्र ! तुमने और त्रिजला ने कठोर तप करके देवताओ से वर प्राप्त किया है । तुम्हें और त्रिजला को देवताओ से ये वर प्राप्त है के कोई भी शक्ती तुम दोनो को बंधक नही बना सकती है। तब मैने तुम्हारा स्मरण किया मित्र ।

 मातंक कुंम्भन से कहता है--

> तुम निश्चंत रहो मित्र हम अपनी पूरी शक्ती लगा देगे पुत्री कुंम्भनी का मणी को ढुंढने के लिए ।

 मातंक गुस्से से कहता है --

> अभी तो हम अपने वचन और मर्यादा का पालन करते हूए उस मणी को ढुंढ रहे है। परतुं अगर ये मानव वो मणी देने से मना करता है तो फिर हम भूल जाएगे के हमने कोई वचन भी दिया था। परतुं मित्र एक बात और थी के तुंमने पुत्री कुंम्भनी को इस मृत्यु लोक पर क्यों भेजा ? 

कुंम्भन निराशा भरी आवाज मे कहता है---

> हठ मित्र । पुत्री के हठ ने मुझे विवश कर दिया और मैने अपनी पुत्री को मृत्यु लोक जाने की अनुमति दे डाली। एक संतान के प्रेम ने एक पिता को उसकी पुत्री की हठ को मानने के लिए विवश कर दिया ।

कुंम्भन अपने उस पल मे चला जाता है जहां पर कुंम्भनी उसके पास आती है और पृथ्वी पर घुमने जाने का जिद करती है। महल के अंदर कुंम्भन और उसकी पत्नी मृदुला बैठकर बाते कर रही थी के तभी वहां पर कुंम्भनी आ जाती है। और अपने माता और पिता कुंम्भन को प्रणाम करते हुए कहती है--

> प्रणाम माता , प्रणाम पिता श्री ।

 कुंम्भन और मृदुला कुंम्भनी को दैखकर मुस्कुराते हुए अपने पास आने का इशारा करता है। कुंम्भनी कुंम्भन के पास जाकर बैठ जाती है। कुंम्भनी कुछ दैर तक चुप चाप यूं ही बैठी रहती है और इधर उधर दैखने लगती है।

 कुम्भन समझ जाता है के कुंम्भनी के मन कुछ बात है जो वो कह नही पा रही है। इसिलिए कुंम्भन अपनी पुत्री कुंम्भनी से पूछता है --

> क्या बात पुत्री कुछ कहना है तो बोलो । 

कुंम्भनी सौच मे पड़ जाती है के अपने पिता कुंम्भन को पृथ्वी लोक जाने के बारे मे कैसे कहे। कुंम्भन दौबारा कुम्भनी से पूछता है--

> पुत्री क्या हुआ मौन क्यूं हो कुछ कार्य है तो बताओ। 

कुंम्भन की बात सुनकर कुंम्भनी हिचकिचाने लगती है। कुंम्भनी को हिचकिचाते दैखकर मृदुला कहती है--

> क्या पुत्री बोलो । अपने माता पिता से किस बात का संकोच । 

कुंम्भनी मृदुला से कहती है --

> मां आपको कैसे पता के मैं यहां आप दौनो से कुछ कहने आयी हूँ ! 

मृदुला मुस्कुराते हुए कहती है-- 

अरे पुत्री ! हम तुम्हारे माता पिता है। और सभी माता पिता अपने संतान के मन की बात को जानता है। 

मृदुला की बात का कुम्भनी जवाब दैकर कहती है--

> अच्छा ! ऐसी बात है तो बताईए के मेरे मन मे अभी क्या चल रही है और मैं क्या बात करने के लिए यहां पर आयी हूँ ।

 कुम्भनी की बात पर कुम्भन हंसते हूए कहता है--

> हां हां ! बताओ मृदुला मेरी पुत्री की बात का उत्तर दो।

 तभी कुम्भनी कुंम्भन से कहती है --

> ये प्रश्न मैने आपसे भी पुछा है पिताश्री । 

कुंम्भनी के इतना कहने पर मृदुला हसने लगती है--

 कुंभ्मन कुछ दैर तक चुप रहता है। फिर तीनो एक 
साथ हंसने लगता है। कुंम्भनी अपनी पुत्री कुंम्भनी से कहती है। अच्छा बताओ पुत्री किस कार्य से तुम यहां पर आयी हो। कुंम्भनी फिर हिचकिचाते हुए कहती है--

> पिताश्री वो मैं पृथ्वी लोक के बारे मे ...!

 इतना बोलकर कुंम्भनी चुप हो जाती है। 

> पृथ्वी लोक के बारे मे क्या जानना है पुत्री ! वहां पर अब तो केवल मानव रहते है। 

कुम्भन कुंम्भनी से कहता है। 

कुंम्भनी अपने पिता से उत्साह से पूछती है--

> ये मानव कैसे दिखते है पिताश्री ? आप तो पहले पृथ्वी लोक पर रहते थे ना ? 

कुंम्भनी की बात का कुंम्भन जवाब दैकर कहता है--
 नही पुत्री ! मैं पृथ्वी लोक मे नही रहा मेरे पूर्वज वहां पर राज करते थे। 

> अगर हम पृथ्वी लोक पर राज करते थे तो फिर हम वहां से देत्य लोक क्यों आ गए पिताश्री ! मैने सुना के पृथ्वी बहोत सुंदर और मोहक लोक है। 

कुंम्भनी अपने पिता से पुछती है। तब मृदुला कहती है --

> क्योकी पुत्री पृथ्वी को इश्वर ने केवल मानवो के लिए 
बनायी है। हम देत्य तो अपने बल से तिनो लोको को जीत रखा था । श्वर्ग से लेकर पाताल तक सिर्फ हमारा ही आधिपत्य था। परतुं पुत्री यह ठीक नही था । किसी पर बल पूर्वक राज करना उचित नही था। हमारे पूर्वजों के पास अशीम शक्तीयां थी वो शक्ती उन्होने अपने तप के कारण प्राप्त किये थे। और उसी शक्ती का दुरउपयोग करके उन्होने पृथ्वी पर मानवो पर बहोत अत्याचार किये । उनका पूजा बंद करवा दिया और अपने आपको ईश्वर घोषित करते पूजा करने पर विवश कर दिया।

 कुंम्भनी अपनी माँ से पूछती है--

> परतुं माँ किसी वस्तु को अपने बल से जितना तो 
शोर्य की बात है ना माँ । तो फिर इसमे बुराई क्या है। 

मृदुला कहती है--

> हां बेटा बल से जीता वस्तु सदेव जितने वाले का 
होता है परतुं पृथ्वी को ईश्वर ने मानवो के लिए बनाया है और उन पर अत्याचार कहां का न्याय है। ये तो उचित नही है ना पुत्री। 

कुम्भनी कहती है --

> माँ ! मानव कैसे होते है क्या करते है और उनका स्वभाव कैसा होता है ? पिताश्री क्या आपने कभी मानव को दैखा है ?

 कुम्भन बात का जवाब दैकर कहता है़--

> हां पुत्री दैखा है। मानव वहोत धार्मिक और सिधे होते है। परतुं कुछ मानव इतने स्वाथी प्रपंची होते है के जो सिधे होते है उनपर अपनी बल का प्रयोग करता है। और बेचारे मानव जो सिधे होते है उनके प्रपंच को समझ नही पाता ।

> पिताश्री जब पृथ्वी इतनी सुंदर है और पृथ्वी लोक पर हमारा अधिपत्य था तो फिर हम यहां कैसे आए और फिर कभी वापस क्यो नही गए । 

कुंम्भनी अपने पिता से पूछती है। 

कुंम्भन जवाब देता है--

> पुत्री ईश्वर ने श्रृष्टी की रचना की और सबके लिए 
अलग अलग लोक का निर्माण किया । जैसे स्वर्ग लोक देवताओ के लिए , मृत्यु लोक मानवो के लिए और देत्य लोक हम देत्यो के लिए इसके अलावा और भी लोक है जो सभी प्रजाती के लिए रचा गया है। जैसे नाग लोक नागों के लिए । 

कुम्भन की बात पर कुंम्भनी फिर पूछती है--

> पिताश्री ! ये स्वर्ग लोक कैसा है। और मृत्यु लोक कैैसी है ? 

कुम्भन कहता है--

> पुत्री स्वर्ग लोक अती सुंदर है इतना के कोई कल्पना भी नही कर सकता । वहा पर सारे सुख सुविधा और धन एश्वर्य से परिपूर्ण है । पुत्री स्वर्ग सबकी कल्पना से परे है। और मृ्त्यु लोक प्राकृतिक सौंदर्य का भंण्डार है। जहा कोई एक बार जाए तो वापस आने का मन नही करता । वहा पर जो सांती है वो किसी लोक मे नही है । बस इन दोनो मे एक असमानता है के मृ्त्यु लोक मे सभी मानव को एक निश्चित समय आने पर मर कर इस लोक को छौड़कर जाना पड़ता है। परतुं स्वर्ग लोक मे सभी अमर है । वहां पर ना कोई रौग है और ना ही किसी प्रकार की कोई असुविधा । 

कुंम्भन की बात को सुनकर कुंम्भनी उत्साह भरी आवाज मे पूछती है--

> मृत्यु लोक मे सबको एक समय आने पर मर कर 
जाना पड़ता है वही हमारे यहा भी है परतुं देवता कैसे अमर हो गए ?

> अमृत पी कर पुत्री ! 

कुंम्भन कहता है---

अमृत का नाम सुनकर कुम्भनी हैरानी से पूछती है--

> अमृत ..! ये अमृत क्या वस्तु है पिताश्री ? अगर देवता अमृत पाकर अमर हो गए तो फिर वो अमृत देत्य और मानवो को क्यो नही मिला ? 

कुम्भनी की बात सुनकर कुंम्भन हल्की मुस्कान के साथ कहता है--

> ये बहुत पुरानी और लम्बी कथा है पुत्री ! किसी और समय मैं तुम्हें देवता और दैत्यों की कथा कह कर सुनाउगां ।

पर कहा मानने वाली थी कुंम्भनी अपनी हठ पर रही और कथा को अभी सुनाने की जिद करने लगी---

> तो बताईए ना पिताश्री मुझे अभी जानना है के ये अमृत क्या वस्तु है। ये कहां से आई और इस अमृत को कौन लाया ?

पुत्री के हठ के आगे कुंम्भन की एक ना चली और कुंम्भन देवता और देत्यों की कथा कुंम्भनी को बताना सुरू करता है। कुंम्भन कहता है---

> पुत्री एक समय की बात है जब अपनी श्रैठता को 
शिध्द करने के देवताओं और दैत्यों के बिच मतभैद चल रहा था के दौनो मे श्रैष्ठ कौन है। देत्य कठोर तप करते ईश्वर को प्रशन्न करके उनसे वर प्राप्त करता था और बहोत शक्तीशाली बन जाते थे। अपनी शक्ती और श्रैष्ठता को शिध्द करने के लिए देवता और देत्यों मे कई बार भंयकर युध्द हूए। जिसमे कभी देवता विजयी हुए तो कभी दैत्य । परतुं विजयी कोई भी रहा हो युध्द मे क्षती दौनो पक्षो को होती थी।

 युध्द मे दौनो पक्षो के हजारों सैनिक मारे जाते थे । जिसमे बहोतो ने अपने पिता , पति और पुत्र को युध्द मे खो दिये। जिसे दैखकर हमारे देत्य गुरु शुक्राचार्य भगवान शंकर के पास गए ताकी उन्हे संजीवनी मंत्र मिल सके। 

संजीवनी मंत्र का नाम सुनते ही कुंम्भनी कहती है--

> संजीवनी मंत्र ये वही मंत्र है ना पिताश्री जो हमारे गुरू शुक्राचार्य के पास है । तो क्या गुरू देव को ये मंत्र भगवान शंकर ने दिया था ?