Resolution signal in Hindi Moral Stories by HARISH books and stories PDF | संकल्प संकेत

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संकल्प संकेत


विद्यालय से घर पहुँचते ही माँ ने घबराहट में बताया कि हमारी गाय ‘दारा’ घर नहीं लौटी है और उसका बछड़ा भूख से बिलख रहा है। मैंने अपने साथी राजेंद्र यादव के साथ उसे खोजने का निश्चय किया। हम गाँव के समीप से होते हुए खेतों की ओर निकल पड़े। मेरे बड़े पिताजी के पुत्र, सत्या भी हमारे साथ हो लिए।
सूरज ढलने को था, पर दारा का पता नहीं चला। खोजते-खोजते हम गाँव से दूर ‘खार’ ( सुदूर इलाके) की ओर बढ़ गए। अंधेरा गहराने लगा था, तभी नहर की मेढ़ से उतरते समय मेरा संतुलन बिगड़ा और मैं नीचे गिर गया। मेरे पैर में गंभीर मोच आ गई। उस स्थिति में गाय को खोजना असंभव था। भारी मन और पैर के असहनीय दर्द के साथ हमें वापस लौटना पड़ा। रात भर मेरी आँखों में नींद नहीं थी, एक तरफ पैर की पीड़ा थी और दूसरी तरफ सुरभि के बछड़े की करुण पुकार जो मेरे कानों में गूँज रही थी।
अगले दिन विद्यालय जाना नहीं था, क्योंकि कोरोना काल के चलते केवल बुलाए जाने पर ही जाना होता था। शाम होते ही मैं दर्द के बावजूद फिर से सुरभि की तलाश में निकला, लेकिन वह कहीं नहीं मिली। रात 8 बजे जब हम घर लौटे, तो मेरा पैर पूरी तरह सूज चुका था और चलने में असमर्थ था। डॉक्टर को दिखाया, एक्स-रे हुआ और पता चला कि मुझे एक महीने का पूर्ण विश्राम करना होगा। नौकरी पर जाना भी संभव नहीं था।
इसी दौरान सोशल मीडिया से ज्ञात हुआ कि राम मंदिर निर्माण हेतु समर्पण निधि का महायज्ञ आरंभ हुआ है। मैं सदैव सामाजिक कार्यों में अग्रणी रहा हूँ, परंतु मेरा घायल पैर मेरी बाधा बन गया था। डॉक्टर ने शल्यक्रिया (सर्जरी) की सलाह दी थी, जिससे मैं भयभीत था। तभी हेमंत साहू का फोन आया कि वे इस पुनीत कार्य में मेरा सहयोग चाहते हैं। मैंने अपनी असमर्थता जता दी, पर मन ही मन प्रार्थना की—“हे प्रभु राम, यदि इस कष्ट से मुक्ति मिले, तो मैं इस यज्ञ में अपना सर्वस्व अर्पित कर दूँ।“
पता नहीं कहाँ से एक अद्भुत आंतरिक ऊर्जा का संचार हुआ! मैं दर्द को भुलाकर बैठक में पहुँचा। वहाँ मैंने ‘प्रभात फेरी’ के माध्यम से निधि संग्रहण का प्रस्ताव रखा, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। अब समस्या मेरी नहीं, मेरे स्वास्थ्य की थी। गाँव के पंच बड़कू मंडल मुझे मेरे मित्र की दादी के पास ले गए। कहा जाता है कि उन दादी के पास असाध्य मोच को ठीक करने का दिव्य हुनर था। राम नाम की महिमा और दादी के उपचार ने चमत्कार कर दिखाया।
 यह प्रभु राम की ही असीम अनुकंपा थी। इसके बाद हमने 16 गाँवों को जोड़कर एक मंडल बनाया और निधि संग्रहण में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। आज मेरा हृदय श्रद्धा से भरा है और मन में केवल यही पंक्तियाँ गूँजती हैं:
”राम नाम आधार जिसे, वो जल में राह बनाते हैं।
जिस पर कृपा राम करें, वो पापी भी तर जाते हैं।“
दादी ने न केवल मुझे, बल्कि अनगिनत लोगों को अपनी औषधियों से नवजीवन दिया है।