इंसानियत का इनाम
कमल चोपड़ा
एक गाँव के एक सेठ का किसी ने दरवाजा खटखटाया। रात का वक्त था। ‘इस वक्त कौन हो सकता है?’ यह सोचते हुए सेठ ने दरवाजा खोला। देखा सामने एक चालीस-बयालीस वर्ष का अनजान आदमी एक छोटी-सी गठरी लिए हुए खड़ा था। उसके कपड़े फटे हुए थे और हाथ-मुँह आदि कई जगहों से खून रिस रहा था।सेठ ने पूछा, ‘कौन हो तुम? क्या चाहते हो?’उस घायल आदमी ने कहा, ‘मुसीबत का मारा राहगीर हूँ। इस गाँव के पास से गुजर रहा था कि रास्ते में कुछ लुटेरों ने मुझे सेठ समझकर मुझ पर हमला कर दिया। मेरे पास कुछ ना पाकर मुझे घायल करके भाग गए। मैंने सोचा, पास ही के इस गाँव में रात बिता लूँ इसलिए रात भर के लिए आपके यहाँ शरण चाहता हूँ।’सेठ ने कुछ देर सोचा फिर बोले— ‘नहीं, नहीं भाई, पता नहीं तुम कौन हो, कौन नहीं? क्या पता इस वेश में तुम खुद ही हमारे यहाँ चोरी के इरादे से आए हो। जब हम लोग सो जाएँगे, तुम चोरी करके भाग जाओगे। जाओ भाई, जाओ कोई और घर देखो।’ उस राहगीर ने सेठ के आगे मदद के लिए हाथ-पाँव जोड़े पर सेठ को उस पर दया नहीं आई। सेठ ने दरवाजा बंद कर लिया।राहगीर ने आगे बढ़कर उसी गाँव के एक बड़े जमींदार का दरवाजा खटखटाया और उस जमींदार से भी रात के लिए शरण देने के लिए प्रार्थना की।जमींदार ने उसकी सारी बात सुनकर कहा— ‘भैया, हमें तो तू माफ ही कर। मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ? मैं तो खुद बाल-बच्चेदार आदमी हूँ। जिन चोर-लुटेरों से तुम बचकर भाग कर यहाँ आए हो, क्या पता वो अब भी तुम्हारा पीछा कर रहे हों। तुम्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वो हमारे घर तक आ पहुँचे तो तुम्हारे साथ हमारी भी आफत आ जाएगी। जाओ भाई, जाओ। कोई दूसरा घर देखो।’कोई चारा न देखकर उस राहगीर ने आगे जाकर गाँव के बहुत पुराने पंडित का दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खुला तो उस राहगीर ने सारी बात बताकर उससे भी शरण माँगी। पंडित जी ने पीछे हटते हुए कहा— ‘देखो भैया, तुम मेरी जाति के नहीं हो। मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ? जाओ भाई, कोई दूसरा घर देखो।’लाचार होकर वह आदमी आगे बढ़ गया। आगे जाकर उसने गाँव के एक बनिये का दरवाजा खटखटाया और उससे सहायता मांगी। बनिये ने भी साफ इनकार करते हुए कहा— ‘मैं तुम्हारी मदद क्यों करूँ? मुझे क्या फायदा? मेरा घर कोई सराय तो है नहीं कि किसी राहगीर को शरण देता फिरूँ। जाओ भाई, कोई दूसरा घर देखो।’राहगीर कुछ और घरों में भी गया पर उसे कहीं शरण नहीं मिली।जख्मी होने के कारण चलते-चलते उसकी हालत खराब हो गई थी। जख्मों से खून बह जाने से उसे चक्कर आने लगे थे। तभी वहां से गुजर रहे सत्तू नामक गाँववासी ने उसे आगे बढ़कर थामा और पूछा, ‘कौन हो भाई? कहाँ से आ रहे हो? कहाँ जाना है?, उस राहगीर ने सत्तू को सारी बात बताई तो सत्तू ने कहा- ‘आप मेरे घर चलो।’अपने घर जाकर सत्तू ने राहगीर से कहा- ‘आप यहाँ विश्राम कीजिए। जब तक आप कुछ स्वस्थ न हो जाएँ, तब तक आप यहाँ रह सकते हैं। मैं आपके खाने-पीने का प्रबन्ध करता हूँ।’राहगीर ने सत्तू से कहा- ‘क्या तुम्हें सेठ, जमींदार वगैरह की तरह मुझ अनजान आदमी से डर नहीं लग रहा? तुम भी कोई गरीब नहीं हो। तुम्हारे घर भी आराम की सभी चीजें हैं।’‘मैं तो इंसानियत के नाते आपकी मदद करना चाहता हूँ। यही मेरा फर्ज भी है। मेरा कुछ नुकसान भी हो जाए तो मुझे परवाह नहीं क्योंकि बाद में मेरी अंतरात्मा तो मुझे नहीं कोसेगी कि मैंने एक जरूरतमंद की सहायता नहीं की।’सत्तू ने गाँव के वैद्य को बुलवाकर राहगीर की मरहम-पट्टी करवाई। उसे कुछ खिलाया-पिलाया। उसकी सेवा में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन खून ज्यादा बह जाने से सुबह तक राहगीर की हालत बिगड़ती ही चली गई। सत्तू को परेशान होता देखकर राहगीर ने कहा— ‘भाई! तुम परेशान मत होओ। लगता है मेरा आखिरी वक्त आ गया है। मैं नहीं बच पाऊँगा। तुमने इंसानियत के नाते मेरी मदद की, उसके लिए मैं तुम्हारा आभारी हूँ। मेरे पास यह फटे-पुराने कपड़ों की गठरी है, इसमें दस लाख रुपयों के गहने हैं। अब यह तुम्हारी है। वैसे भी मेरा इस दुनिया में कोई नहीं। मैं तो राजनगर में रहता था। वहाँ से अपना सब कुछ बेचकर शहर जा रहा था ताकि जिन्दगी के बाकी दिन वहाँ गुजार सकूँ लेकिन रास्ते में लुटेरों ने मुझ पर हमला कर दिया। मेरे पास लोहे का ट्रंक भी था जिसमें सिर्फ कपड़े थे। लुटेरों ने समझा असली माल तो ट्रंक में होगा। वे उसे छीनकर भाग गए जबकि मैंने असली माल तो गठरी में बाँध रखा था। चोर-लुटेरे इसे छोड़ गए। अब यह माल तुम्हारा है। वैसे भी मेरा तो कोई वारिस नहीं था। तुम जैसा नेक इंसान ही इसका असली हकदार है।’‘लेकिन मैं...’ ‘लेकिन-वेकिन कुछ नहीं, जो दूसरों के काम आता है वही सच्चा इंसान होता है। इसे तुम इनाम समझकर रख लो। मुझे विश्वास है कि इस पैसे से भी तुम जरूरतमंद लोगों का भला ही करोगे।’ कहते-कहते राहगीर ने दम तोड़ दिया।बाद में गाँव के महाजन, जमींदार और पंडित को पता चला कि सत्तू जो कल तक, साधारण आदमी था, इंसानियत के रास्ते पर चलकर लखपति बन गया तो वे अपनी गलती पर छाती पीट कर रह गये।