ऑफिस का कमरा — रात का समय।
श्राव्या अपनी डेस्क पर बैठी है, कंप्यूटर स्क्रीन की हल्की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही है। सारी लाइट्स बुझी हैं। बाहर बारिश की हल्की आवाज़ और बिजली की चमक माहौल को डरावना बना रही हैं। श्राव्या कंप्यूटर पर कुछ काम करने की कोशिश कर रही है, पर बार-बार उसका ध्यान 9th फ्लोर की यादों की ओर जाता है।
श्राव्या (धीरे से, खुद से) बोली -
मैं कैसे वहाँ गई थी...? वो हरी परछाई... मुझे क्यों बुला रही थी?
वो अपने हाथों से बालों को सहलाती है, पर एक ठंडी हवा उसके कंधे को छूती है। वो डर के मारे कंप्यूटर से पीछे झुक जाती है।श्राव्या कंप्यूटर से उठकर खिड़की की ओर जाती है। बाहर की बारिश और बिजली के बीच, 9th फ्लोर की खिड़की से हल्की रोशनी झलक रही है। वो कंपकंपाती है, पर देखना चाहती है।
श्राव्या (धीरे से) बोली -
नहीं... मुझे वहाँ जाना है, पर डर लग रहा है...
कम्प्यूटर स्क्रीन अपने आप झिलमिलाती है। कागज़ और फाइलें हल्की आवाज़ के साथ गिरती हैं। श्राव्या चौंककर पीछे हटती है।श्राव्या अपने दोस्त की याद करती है, जो डर के मारे नहीं आया था। वो अपने डेस्क के पास बैठती है, पर उसका दिमाग लगातार 8th और 9th फ्लोर पर घूम रहा है। उसकी आंखों में डर, बेचैनी और हल्की जिज्ञासा झलकती है।
श्राव्या (धीरे से फुसफुसाते हुए) बोली -
क्यों लगता है कि वो मुझे अभी भी देख रही है...?
क्यों मैं चैन से बैठ नहीं पा रही?
वो कंप्यूटर बंद करती है, पर पीछे से हल्की हवा चलती है।
सभी फाइलें कंप्यूटर के पास अचानक गिरती हैं। श्राव्या डर के मारे पीछे हटती है और दीवार से लग जाती है।
ऑफिस में अंधेरा। CCTV कैमरे फूटेज दिखाते हैं श्राव्या अपने डेस्क पर बैठी है, पर उसके पीछे एक हल्की हरी परछाई झलकती है। परछाई धीरे-धीरे हंसती है और गायब हो जाती है।
श्राव्या (हड़बड़ाकर) बोली -
नहीं... ये फिर वही हरी परछाई थी... वो मुझे देख रही थी...
वो कंप्यूटर और फ़ाइलों के पास झुकती है, खुद को सम्भालती है।
सारा ऑफिस अब उसके लिए डरावना महल बन चुका है।
वो धीरे-धीरे अपने डेस्क पर बैठकर काँपती है।
कभी-कभी डर के साये में जीना भी एक सजा बन जाता है...
ऑफिस का कमरा — रात।
श्राव्या डेस्क पर बैठी है, हाथ कंप्यूटर की कीबोर्ड पर टिके हुए हैं।
उसकी सांस तेज़ है। वो अचानक डर के मारे काँपने लगती है। उसकी आंखें बंद हो जाती हैं।
श्राव्या (घबराते हुए, खुद से) बोली -
नहीं... मुझे अब और सहना नहीं होगा...
हवा चलती है, फाइलें हल्की आवाज़ के साथ गिरती हैं। श्राव्या डर के मारे पीछे झुकती है। श्राव्या अचानक महसूस करती है कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा है।
वो डर के मारे जोर से चीखती है —
आह!
हाथ कृषांत का है। श्राव्या पल भर के लिए सिहर जाती है। कृषांत अचानक डर जाता है, उसका चेहरा गंभीर और बेचैन है।
कृषांत (धीरे से, चिंतित आवाज़ में) बोला -
श्राव्या... तुम ठीक हो? तुम्हें शायद... आराम की ज़रूरत है।
श्राव्या धीरे-धीरे आंखें खोलती है। कृषांत उसके पास खड़ा है, हाथ हल्का सा उसके कंधे पर रखा हुआ। श्राव्या अब डर और राहत के मिश्रित भाव में है। कृषांत धीरे-धीरे उसे कुर्सी पर बैठने का इशारा करता है। श्राव्या कांपती हुई कुर्सी पर बैठ जाती है। कृषांत उसके सामने खड़ा है, गंभीर नज़रें, पर अब थोड़ी नरमी भी है।
श्राव्या (धीरे से, हकबकाते हुए) बोली -
मैं... मैं डर गई थी... मुझे लगा... वो फिर वही हरी परछाई है...
कृषांत (सख्ती और चिंता के मिश्रित स्वर में) बोला -
अब डरना बंद करो। तुम सुरक्षित हो।
जो भी हुआ, अब मैं तुम्हारे साथ हूँ।
श्राव्या धीरे-धीरे अपनी सांस पर काबू पाती है। डर अब कुछ कम हुआ है, पर बेचैनी अभी भी दिख रही है।
डर के बीच भी कभी-कभी एक हाथ आपको बचा सकता है...
कृषांत और श्राव्या ऑफिस के केबिन में खड़े हैं। बाहर हल्की रोशनी है, अंदर सन्नाटा। श्राव्या कांपते हुए धीरे-धीरे कृषांत की तरफ देखती है।
श्राव्या (हकबकाते हुए, डर के लहज़े में) बोली -
S… Sir, मुझे… मुझे बहुत डर लग रहा है।
कृषांत उसकी तरफ ध्यान से देखता है। उसकी आंखों में गहरी चिंता और गंभीरता है। वो धीरे-धीरे उसके पास आता है।
कृषांत (धीरे, मगर सख्त आवाज़ में) बोला -
श्राव्या… डरना स्वाभाविक है।
लेकिन अब तुम अकेली नहीं हो। मैं यहाँ हूँ।
श्राव्या अपनी साँसों को काबू में लाने की कोशिश करती है।
कृषांत उसका हाथ हल्का सा पकड़ता है और कुर्सी पर बैठने का इशारा करता है। श्राव्या धीरे-धीरे बैठती है।
श्राव्या (धीरे से, अभी भी डर में) बोली -
Sir… मैं… मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं 8th और 9th फ्लोर के डर से कैसे निपटूँ…।
कृषांत (गंभीर स्वर में, पर नरमी के साथ) बोला -
श्राव्या… डर का सामना करना आसान नहीं होता।
पर तुमको अब पता है कि सच क्या है, और मैं तुम्हारे साथ हूँ।
तुम सुरक्षित हो, और अब हम इसे मिलकर समझेंगे।
डर अभी भी है, पर अब थोड़ी राहत और भरोसा भी दिखता है।
बैकग्राउंड में हल्की हवा की सरसराहट।
डर कबूल करने से ही पहला कदम शुरू होता है...
केबिन में शाम का समय। श्राव्या कुर्सी पर बैठी है, हाथों में फाइलें हैं, लेकिन वो काँप रही है। उसके चेहरे पर डर और थकान साफ़ झलक रही है।
श्राव्या (धीरे, हकबकाते हुए) बोली -
Sir… मुझे… मुझे बहुत डर लग रहा है…
और शायद… मुझे थोड़े दिन की leave चाहिए…
शायद मुझे rest की जरूरत है।
कृषांत उसकी आँखों में डर और बेचैनी देखकर थोड़ी नरमी से देखता है। वो फाइलों को एक तरफ रख देता है।
कृषांत (धीरे, गंभीर लेकिन समझदार लहज़े में) बोला -
ठीक है, श्राव्या…तुम कुछ दिन आराम करो।
तुम्हें अब डर और तनाव से दूर रहना चाहिए।
श्राव्या की आँखों में राहत झलकती है। वो धीरे-धीरे सिर हिलाती है और मुस्कुराती है।
श्राव्या (धीरे से, सांस छोड़ते हुए) बोली -
Thank you, Sir… मैं… मैं फिर से संभलकर लौटूँगी।
कृषांत (सख्ती और चिंता के मिश्रित स्वर में) बोला -
हां, पर ध्यान रखना…जब वापस आओगी, तब पूरी तरह तैयार रहना। ये जगह… बस दिखने से डरावनी नहीं है। असल में इसमें बहुत रहस्य हैं।
श्राव्या धीरे-धीरे उठती है और धीरे-धीरे कमरे से बाहर जाती है।
कृषांत उसकी पीठ देखता है, चेहरे पर हल्की चिंता और थोड़ी राहत दोनों झलकती हैं।
कभी-कभी डर से सामना करने से पहले थोड़ा आराम भी ज़रूरी होता है…।