खोया हुआ विश्वास
कमल चोपड़ा
बंटी को खाली हाथ घर लौटा देखकर माँ ने हैरानी से पूछा— "नमक की थैली कहाँ है? मैंने तुझे दस रुपए देकर नमक की थैली लेने भेजा था ना?"जवाब में बंटी ने सुबकते हुए कहा- 'किराने वाले की दुकान पर पहुँचकर मैंने जेब में हाथ डाला तो दस रुपये का सिक्का..... लगता है रास्ते में कहीं गिर गया है... मेरी जेब भी फटी हुई है।'माँ ने सुनते ही अपने आटे वाले हाथों से अपना ही माथा पकड़ लिया। बंटी की मासूमियत पर वह विश्वास करने को तैयार नहीं थी। वह उसे झिंझोड़ती हुई उसकी तलाशी लेने लगी और गुस्से में कहा— "मैं सब जानती हूँ, तू उन दस रुपयों की चीज खा आया है... पता है मैं और तेरे बापू पैसे-पैसे के लिए कैसे मेहनत करते हैं और तू...?"किसी मुजरिम की तरह सिर झुकाए सुन्न पत्थर हुआ खड़ा था बंटी। माँ को एकाएक याद आया, दो दिन से बंटी लट्टू और उसकी रस्सी लेने के लिए दस रुपए की जिद कर रहा था। हो न हो जरूर ही ये झूठ बोल रहा है कि दस रुपये का सिक्का कहीं गिरा बैठा है।माँ ने उसकी तलाशी ली पर सिक्का नहीं मिला। पर माँ को उस पर शक तो हो ही गया था। वह उस पर पिल पड़ी— "मैं कहती हूँ सीधी तरह तू सच सच बता दे वो सिक्का तू कहाँ छुपा आया है... बोल... नहीं तो तुझे आज मैं मार दूँगी......."पिटता, रोता और बिलबिलाता हुआ वह बार-बार यही दोहरा रहा था— माँ, मैं सच कह रहा हूँ।उसे पीटते-पिटते माँ खुद भी रोने लगी थी, उसकी साँस फूल गई थी। पिटाई का कोई असर न देखकर माँ ने बंटी से बड़े प्यार से पूछा लेकिन बंटी अपनी बात पर अड़ा रहा, मैं सच कह रहा हूँ, माँ आपको कैसे विश्वास दिलाऊं?हार-थककर माँ ने सोचा, हो सकता है बंटी सच ही कह रहा हो। उसकी जेब भी तो फटी हुई है। बच्चा ही तो है, कहीं गिरा बैठा होगा। नमक की थैली के लिए माँ ने बंटी को फिर दस रुपए दिए तो बड़े अनमने मन से वह फिर से चल पड़ा।रास्ते में वह सोचने लगा- "खामखाह पिटाई हो गई मेरी। मैंने तो हेराफेरी की भी नहीं और..... इससे अच्छा तो मैं वो दस रुपये मार ही लेता...... पर वो गए कहाँ? गिरे तो गिरे कहाँ?"रास्ते पर चलते हुए उसकी नज़रें खोए हुए उसी सिक्के को तलाश रही थीं और संयोगवश रास्ते में एक जगह उसे दस रुपए का वो सिक्का मिल ही गया। खुशी से उछल पड़ा वह- पिट तो चुका ही हूँ मैं....अब क्यों न मैं ये दस रुपये का सिक्का रख ही लूँ तो क्या पता चलेगा.....अब और तो पीटने से रही माँ। पर इन पैसों का क्या लूँ? टाफियाँ ले लेता हूँ। नहीं लट्टू ले लेता हूँ। बड़ा मजा आएगा लट्टू खेलने में। पर एकाध दिन में वह टूट जाएगा या गुम जाएगा। फिर क्या लूँ? आइसक्रीम.... हाँ आइसक्रीम, बड़ा मजा आएगा आइसक्रीम खाने में।वह आइसक्रीम वाली रेहड़ी तक पहुँचा और ज्यों ही आइसक्रीम खरीदने के लिए उसने हाथ आगे बढ़ाया, माँ का रोता-सुबकता हुआ चेहरा उसकी आँखों के सामने आ गया- "माँ मुझे चोर समझती है। माँ ने मुझे बिना कसूर के ही पीट दिया पर माँ को क्या पता मैं सच बोल रहा हूँ या झूठ? माँ पीटती है तो कितना प्यार भी तो करती है। माँ को मुझ पर शक न हो इसके लिए पहले मुझे माँ का विश्वास जीतना होगा। अगर मैं ये सिक्का माँ को वापिस कर दूँ तो माँ को विश्वास हो जाएगा कि मैं झूठ नहीं बोल रहा था और कितनी खुश हो जाएगी माँ।"नमक की थैली लेकर वह घर पहुँचा तो माँ का रुआँसा चेहरा देखकर उसे माँ पर बहुत दया आने लगी- "कितना तो खटती है माँ मेरे लिए और मैं?" उसने माँ को सारी बात सच-सच बता दी और वो दस रुपए का सिक्का जो उसे रास्ते में पड़ा मिला था, उसने माँ को दे दिया—मां उसे गले लगाकर प्यार करने लगी। थोड़ी देर बाद माँ ने खुद ही वो सिक्का फिर बंटी को दे दिया और बोली— "ले बेटा, तू ही रख ले इस सिक्के को....।"बंटी की खुशी का ठिकाना नहीं था, सच बोलकर मैंने पैसे भी पा लिए और माँ का खोया हुआ विश्वास भी पा लिया। अगर मैं आइसक्रीम खा लेता तो क्या होता। दो मिनट का जीभ का स्वाद, बस। जितनी खुशी अब मिल रही है उतनी मिलती?माँ की आँखों में प्यार और विश्वास के आँसू देखकर उसकी आँखों में भी आँसू आ गए।