चलो दूर कहीं... 15
सारा और प्रतीक्षा कैंटीन में बैठी रोहन का इंतजार कर रही थी कि अविनाश के साथ शिखा और शिवा वहां पहुंचे और अविनाश ने प्रतीक्षा से कहा, " किस खुशी में पार्टी दे रही हो प्रतीक्षा.. कहीं रोहन से ब्रेकअप तो नहीं हो गया..?"
ये सुनते ही प्रतीक्षा की सुरत देखने लायक था, उसे महसूस हुआ जैसे अविनाश ने उसके गरीबी का मज़ाक उड़ाया हो.. वह बोली तो कुछ नहीं लेकिन सारा को समझते देर न लगी, उसने अविनाश के पीठ पर एक चपत लगाते हुए बोली, "प्रतीक्षा क्यों पार्टी देगी.. पार्टी तुम दे रहे हो..!"
"किस खुशी में...?" अविनाश ने पूछा और सारा जबाब देती उससे पहले शिखा बोली, " तुमने वादा किया था कि सिक्स्थ सेमेस्टर में प्रतीक्षा को पछाड़ दोगे लेकिन तुम अपना वादा पुरा नहीं कर पाए .. प्रतीक्षा तो इस बार भी क्लास में अव्वल आई है.. अब बताओ फाइन कौन देगा..?"
"हां.. फाइन तो अविनाश को देना पड़ेगा और सिर्फ कॉफी से काम नहीं चलेगा... उसके साथ और कुछ होता तो मजा आ जाता..! " शिखा के बात को काटते हुए शिवा ने कहा तो अविनाश थोड़ा नाराज़ स्वर में बोला," अच्छा जबरजस्ती है.. तुम सब तो उल्टा गंगा बहाने के फ़िराक़ में हो..? अरे भाई जो टॉप करता है वो पार्टी देता है कि फेल करने वाला..?"
इतना सुनते ही प्रतीक्षा की आंखें भर आई और वह चुपचाप वहां से उठी और बाहर निकलने लगी तो सारा ने कहा, " क्या हुआ प्रतीक्षा कहां चली..?"
प्रतीक्षा ने अपने जज़्बातों को काबू करते हुए होंठों पर मुस्कान लाकर कहा, " बस अभी आई ..! "
कहकर वह वहां से चली गई, उसके जाने के बाद रोहन वहां पहुंचा और प्रतीक्षा को वहां नहीं देखकर पूछा," प्रतीक्षा कहां गई..? चलो अच्छा हुआ तुम सब यहां आ गए... प्रतीक्षा भी हमारे साथ भीमबैठका जा रही है..!"
"आज सुबह मैं उसके घर गई थी तो उसने अपने पिता से भीमबैठका जाने के बारे में पूछा तो वे इतने जोर से उस पर भड़के की पूछो मत.. मुझे नहीं लगता की उसके पापा उसे जाने की इजाजत देंगे..! " शिखा बताई तो सारा बोली," कभी कभी हमें जो दिखाई देता है वैसा होता नहीं है... उसके पापा उस पर जान छिड़कते हैं लेकिन क्या करें परिस्थिति के आगे विवश हैं..! किसान आदमी और ऊपर से इतना फिजूल खर्च कैसे वहन करेंगे इसलिए सीधे सीधे मना कर दिए..!"
ये सुनते ही अविनाश को प्रतीक्षा की डबडबाई आंखें याद आई..! अब उसे अपने कहे पर गिल्टी फील हो रहा था," मुझे क्या पता था कि वह इतने गरीब घर से है..? किसी गरीब के गरीबी का मज़ाक उड़ाना.. उस अमीरी पर तोहमत है जिसके गर्भ में गरीबी पलता है..! मैंने उसके दिल को ठेस पहुंचाया है.. मुझे उससे माफी मांगना होगा..! " सोचते हुए वह उठ कर बाहर जाना चाहा तो सारा उसके हाथ को पकड़ कर बोली," तुम्हें क्या हुआ.. तुम कहां चले..? "
" बस एक मिनट में आ रहा हूं.. जो खाना है सबके लिए मेरे तरफ से ऑर्डर कर दो न प्लीज़..! मैं अभी आया..! " कहकर वह तेज कदमों से बाहर निकला और इधर उधर नजरें दौड़ाकर प्रतीक्षा को ढूंढने का प्रयास कर रहा था..! उसे थोड़ी दूर पर एक पेड़ के नीचे प्रतीक्षा बैठी दिखाई दी तो वह उसके पास पहुंचा और बिना किसी लाग लपेट के कहा," सॉरी प्रतीक्षा..! "
अविनाश के आवाज से चौंक कर उसे देखते हुए बोली," सॉरी किसलिए..? "
" वो मुझे पता नहीं था कि तुम इतने गरीब घर की हो और तुम हमारे पार्टी का खर्च एफोर्ड नहीं कर सकती... मैं समझ सकता हूं कि मेरे बातों से तुम्हारे दिल को कितना ठेस पहुंचा होगा.. दिल से सॉरी.. प्लीज़ माफ़ कर दो..! " अविनाश ने कहा तो वह उसके चेहरे को ध्यान से देखते हुए बोली," इसमें सॉरी कहने की कोई बात नहीं है अविनाश... तुम्हें पता है ग़रीबी अपने साथ अदम्य सहनशक्ति लाती है... ग़रीब सबकुछ सहन कर सकता है.. सिर्फ पैसे के गुमान को छोड़कर..! "
वह कुछ देर तक प्रतीक्षा के सपाट चेहरे को देखता रहा फिर धीरे से कहा," चलो.. कैंटीन चलो सभी तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं..! "
" तुम जाओ.. मैं थोड़ी देर में आती हूं..! "
अविनाश तो वहां से चला गया था लेकिन प्रतीक्षा के कहे शब्द उसके दिलो-दिमाग में गूंज रहा था.. !
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प्रतीक्षा कॉलेज से घर पहुंची तो उसकी मां खटिया पर चादर ताने सोई हुई थी, उसे शक हुआ कि कहीं मां की तबियत तो खराब नहीं है, फिर भी उसके पास न जाकर दूर से बोली," क्या हुआ मां.. इतनी गर्मी में चादर ताने क्यों सोई हो ..? "
वह अपना बैग खूंटे पर टांगकर टंगनी में पड़े घर में पहनने के कपड़े को लेकर पलटी ही थी कि मां के कुछ न कहने से उसे थोड़ा आश्चर्य हुआ और वह उसके पास जाकर चेहरा से चादर हटाई तो चेहरा पीला पड़ा हुआ था, होंठ सूखे हुए थे.. उसने हाथ छुआ तो उसका बदन तवे सा तप रहा था, उसने हड़बड़ाते हुए कहा, " मां.. तुम्हें तो तेज बुखार है.. कोई दवा ली है या नहीं..?"
प्रतीक्षा की बातें सुन उसने क्षीण स्वर में बोली, "तू आ गई प्रतीक्षा.. जा हाथ मुंह धोकर खा ले बेटा मैंने तेरा खाना ढक कर रख दिया है..!"
"मां तुझे इतनी तेज बुखार है और तू मेरे खाने की चिंता कर रही है... पहले मैं तेरे लिए दवा लेकर आती हूं..!" कहकर वह मुड़ी ही थी उसने हाथ को पकड़ कर कहा,"तू नाहक परेशान हो रही है मुझे कुछ नहीं हुआ हल्का सा बुखार चढ़ा है…थोड़ी देर में उतर जाएगा..! तू अभी थका मांदा कॉलेज से आई है, जाओ खा पीकर आराम करो..मेरी चिंता मत करो तेरे बापू दवा लेने गए हैं..!"
लेकिन प्रतीक्षा मानने वाली कहां थी,वह एक कटोरे में पानी ली और कपड़ा भिगोकर मां के माथे पर पट्टी करने लगी... करीब आधे घंटे बाद कमलनाथ आए उनके चेहरे पर मायूसी छाई हुई थी, उनपर नजर पड़ते ही प्रतीक्षा पूछी,"मां का दवा लाए बापू..?"
उसने दवा का एक छोटा सा थैला उसको थमाते हुए कहा," ये लो.. और इसमें से पहले बुखार का दवा दे दो..!"
अपने बापू के बुझे चेहरे को देखकर प्रतीक्षा को कुछ समझ नहीं आया तो वह पूछी,"क्या हुआ बापू इतने उदास क्यों लग रहे हो..?"
कमलनाथ ने जबरजस्ती मुस्कुराते हुए कहा,"मैं उदास हूं.. अरे नहीं.. नहीं..ऐसी कोई बात नहीं है..! बाजार से भागे भागे आ रहा हूं न इसलिए तुम्हें ऐसा लग रहा होगा..!"
लेकिन कमलनाथ के बातों से ऐसा नहीं लग रहा था कि वे सच बोल रहे हैं... इसलिए प्रतीक्षा ने मां को बुखार की दवा खिलाई और अपने बापू का हाथ पकड़कर खींचते हुए अंदर के कमरे में ले जाकर बोली,"क्या परेशानी है बापू.. मुझे साफ साफ बताओ..!
क्रमशः...