अपने जैसी परछाइयों को सामने देखकर…दोनों के पैरों तले ज़मीन खिसक गई…वो दोनों परछाइयां…धीरे-धीरे हंसना बंद कर चुकी थीं…अब वो सिर्फ…उन्हें घूर रही थीं…बिल्कुल वैसी ही आंखों से… जैसी उनकी खुद की थीं…
रिद्धि की आवाज़ कांप गई और बोली—
अ… अपर्णा… ये… ये क्या है…?
लेकिन जवाब देने से पहले ही उन परछाइयों ने एक साथ सिर टेढ़ा किया…जैसे…किसी चीज़ को समझने की कोशिश कर रही हों…
रिद्धि का डर अब चीख में बदल गया और बोली—
अपर्णा भाग! ये छलावा है!
अपर्णा ने बिना एक सेकंड गवाए उसका हाथ कसकर पकड़ लिया और बोली—
भागो!!
दोनों पूरी ताकत से भागने लगीं…पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं थी…बस दौड़… और दौड़…पेड़, सड़क, अंधेरा… सब धुंधला पड़ने लगा…लेकिन…जितना वो भागतीं…उन्हें लगता…वो वहीं हैं…
अपर्णा हांफते हुए बोली —
रिद्धि… ये… ये रास्ता…हम… भटक गए हैं…।
रिद्धि ने चारों तरफ देखा हर दिशा एक जैसी…हर मोड़… पहले जैसा…जैसे ये सड़क…उन्हें कहीं जाने ही नहीं दे रही…तभी…
ट्रिन… ट्रिन…रिद्धि का फोन बजा… उसने कांपते हाथों से फोन निकाला , स्क्रीन पर लिखा था — Battery Low – 2%
वो घबराकर बोली -
नहीं… अभी नहीं…
अपर्णा ने जल्दी से कहा —
जल्दी किसी को call करो!
रिद्धि ने नंबर डायल किया…लेकिन…No Network
वो बोली -
सिग्नल भी नहीं आ रहा…।
उसकी आंखों में आंसू आ गए।तभी…फोन की स्क्रीन अपने आप flicker करने लगी…और अचानक…स्क्रीन पर camera ON हो गया…दोनों ने डरते हुए फोन की स्क्रीन की तरफ देखा…और उनका खून जम गया…क्योंकि…स्क्रीन में…उनके पीछे…वो दोनों परछाइयां खड़ी थीं…बहुत पास…इतनी पास…कि जैसे अभी…
उनके कंधे पर हाथ रख देंगी…अपर्णा धीरे-धीरे मुड़ी…लेकिन…
पीछे…कोई नहीं था…।
रिद्धि कांपती आवाज़ में बोली —
वो… सिर्फ फोन में दिख रही हैं…
तभी…
फोन से एक धीमी आवाज़ आई —
क्योंकि… हम वहीं रहते हैं…
और उसी पल…फोन पूरी तरह बंद हो गया....,अंधेरा…सन्नाटा…
और फिर…पीछे से…दो हाथों ने…उनके कंधों को छू लिया…
दोनों के कंधों पर अचानक पड़े हाथ…उनकी रूह तक हिला गए…
लेकिन जब उन्होंने पलटकर देखा…वहां कोई नहीं था…अब डर अपने चरम पर था…दोनों बिना कुछ बोले…बस आगे बढ़ती जा रही थीं…कदम लड़खड़ा रहे थे…सांसें बिखरी हुई थीं…।
तभी…पीछे से एक आवाज़ आई —
रिद्धि…
रिद्धि जैसे जम सी गई…ये आवाज़…वो पहचानती थी…धीरे-धीरे उसने पीछे मुड़कर देखा…
वो बोली -
वि… विशाल…?
सामने उसका मंगेतर विशाल खड़ा था…बिल्कुल सही सलामत…
जैसे कुछ हुआ ही ना हो…
रिद्धि की आंखों में राहत के आंसू आ गए और बोली—
विशाल!
वो दौड़कर उसके पास गई…अपर्णा भी उसके साथ ही थी…
विशाल ने गुस्से और चिंता के बीच कहा —
रिद्धि! पागल हो क्या? इस जगह अकेले क्या कर रही हो?
रिद्धि हांफते हुए बोली —
अकेले नहीं… अपर्णा भी तो है… यही मिली थी मुझे…
विशाल का चेहरा अचानक बदल गया और बोला—
कौन अपर्णा? यहां कोई नहीं है…
रिद्धि चौंक गई और बोली—
क्या मतलब? ये रही तो…
उसने अपने पीछे इशारा किया…क्योंकि…उसे तो अपर्णा साफ़ दिख रही थी…वहीं खड़ी…उसी सफेद कपड़ों में…लेकिन…विशाल की नजरों में वहां कुछ भी नहीं था…।
विशाल ने धीरे लेकिन सख्त आवाज़ में कहा -
रिद्धि… वहां कोई नहीं है…
रिद्धि का दिल बैठ गया…
वो बोली -
नहीं! तुम झूठ बोल रहे हो… अपर्णा, तुम बोलो ना…
उसने पीछे मुड़कर अपर्णा की तरफ देखा…अपर्णा चुप खड़ी थी…लेकिन…उसकी आंखें अब पहले जैसी नहीं थीं…वो धीरे-धीरे मुस्कुराई…एक अजीब… ठंडी मुस्कान…
और फिर…धीरे से बोली —
देखा… मैंने कहा था ना…यहां… हर किसी को… सब कुछ नहीं दिखता…।
रिद्धि पीछे हट गई…
रिद्धि बोली -
न… नहीं… तुम… तुम क्या हो…?
विशाल ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला—
रिद्धि! वहां कोई नहीं है! तुम किससे बात कर रही हो?
अब रिद्धि के सामने…दो अलग-अलग सच खड़े थे…
एक — विशाल, जो कह रहा था कि वहां कोई नहीं है
दूसरी — अपर्णा, जो वहीं खड़ी थी… मुस्कुरा रही थी…तभी…अपर्णा धीरे-धीरे आगे बढ़ी…लेकिन…उसके कदमों की कोई आवाज़ नहीं आई…वो सीधे विशाल के पास आकर रुकी…
और रिद्धि से बोली —
अगर ये सच में तुम्हारा विशाल है…
तो इसे… मेरा नाम लेने को कहो…
रिद्धि कांपते हुए विशाल की तरफ मुड़ी —
विशाल… बोलो… इसका नाम क्या है…?
विशाल ने बिना एक सेकंड रुके कहा —
यहां कोई नहीं है, रिद्धि!
अपर्णा की मुस्कान और गहरी हो गई…
उसने फुसफुसाया -
समझ गई…?
रिद्धि की सांसें रुकने लगीं…क्योंकि अब…उसे खुद समझ नहीं आ रहा था झूठ कौन बोल रहा है…?
विशाल… या अपर्णा…?
और तभी…विशाल ने उसका हाथ और कसकर पकड़ लिया…
और धीमे से बोला —
रिद्धि… भागो यहां से…
ये… तुम्हें दिखाई क्यों दे रही है…?
अब सवाल ये था -
क्या विशाल झूठ बोल रहा था या अपर्णा?
To be continued… 😶🌫️
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