Ajnabi - 4 in Hindi Horror Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | अजनबी - 4

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अजनबी - 4

रिद्धि की धड़कनें अभी संभली भी नहीं थीं कि…अचानक विशाल ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा…

विशाल बोला - 
हाहाहा… रिद्धि! तुम्हारा चेहरा देखना चाहिए तुम्हारा!

रिद्धि सन्न रह गई…और तभी…अपर्णा भी हंस पड़ी…

अपर्णा बोली - 
विशाल! तुम इससे शादी करने वाले थे? ये तो डर के मारे पीली पड़ गई!

रिद्धि की आंखें गुस्से और हैरानी से फैल गईं और बोली—
तुम दोनों… ये क्या मजाक है?!

विशाल हंसते हुए उसके पास आया और बोला—
अरे पागल! ये अपर्णा है… मेरी चचेरी बहन…

रिद्धि एक पल के लिए चुप रह गई…

रिद्धि बोली - 
क… क्या?

अपर्णा ने मुस्कुराकर हाथ हिलाया और बोली—
Hi… officially अब मिल लिए 😅

रिद्धि को जैसे गुस्सा आ गया और बोली—
तुम लोग मेरा मजाक बना रहे हो! मैं यहां जान निकल रही थी… और तुम दोनों—

फिर उसकी आवाज़ धीमी हो गई…

वो बोली - 
और जो… अभी जंगल में हुआ…

दोनों की हंसी एकदम रुक गई…माहौल अचानक भारी हो गया…

विशाल का चेहरा गंभीर हो गया और बोला—
क्या हुआ था?

रिद्धि कुछ बोल पाती उससे पहले…अपर्णा की आंखों में डर लौट आया…उसने धीमे-धीमे सब बताना शुरू किया  scooty का अपने आप चलना…फोन में परछाइयां दिखना…दोनों जैसी आकृतियां…और वो अजीब आवाज़…। हर शब्द के साथ…
विशाल का चेहरा सख्त होता गया…जब अपर्णा ने बात खत्म की…
तीनों कुछ सेकंड तक चुप रहे…सिर्फ हवा की आवाज़…।

फिर विशाल धीरे से बोला —
ये… मजाक नहीं है…।

रिद्धि घबराकर बोली —
मतलब?

विशाल ने आसपास देखा…जैसे वो भी अब कुछ महसूस कर रहा हो…

वो बोला -
इस सड़क के बारे में… मैंने सुना है…

अपर्णा ने तुरंत पूछा —
क्या?

विशाल ने धीमी आवाज़ में कहा —
यहां… जो भी होता है…वो दो लोगों के बीच नहीं होता…।

रिद्धि बोली - 
तो?

रिद्धि की सांस अटक गई।

विशाल ने उनकी आंखों में देखते हुए कहा —
हमेशा… तीन होते हैं…

तीनों के चेहरे से खून उड़ गया…क्योंकि…वो तो तीन ही थे…लेकिन…तभी…पीछे से…फिर वही हंसी गूंजी…लेकिन…इस बार…
तीनों में से कोई भी नहीं हंस रहा था…तीनों धीरे-धीरे पीछे मुड़े…
और इस बार…सड़क के किनारे…एक चौथी परछाई खड़ी थी…
जो बिल्कुल…तीनों का मिला-जुला चेहरा लिए… मुस्कुरा रही थी…।

तीनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ा…और बिना पीछे देखे… भागने लगे…सड़क पर उनके कदमों की आवाज़ गूंज रही थी…
सांसें टूट रही थीं… दिल जैसे सीने से बाहर निकलने को था…
रिद्धि बार-बार पीछे देखने की कोशिश करती… 

लेकिन विशाल ने उसका हाथ और कस लिया और बोला—
पीछे मत देखना!

अपर्णा लगभग रोते हुए बोली —
वो… वो हमारे पीछे है… मुझे महसूस हो रहा है…

लेकिन कोई रुका नहीं…बस भागते रहे…भागते रहे…और अचानक तीनों एक साथ रुक गए…सामने जो था…उसे देखकर उनकी रूह कांप गई…वही टूटा हुआ पेड़…वही बिजली का खंभा…वही मोड़…वो फिर…उसी जगह पर थे…

रिद्धि की आंखों से आंसू निकल पड़े वो बोली - 
नहीं… ये नहीं हो सकता… हम तो भागे थे…

अपर्णा घबराकर इधर-उधर देखने लगी और बोली—
ये जगह हमें जाने ही नहीं दे रही…

विशाल ने गहरी सांस ली…उसका चेहरा अब डर से ज्यादा समझ से भरा था…

वो धीरे से बोला —
हम… फंस चुके हैं…

दोनों ने उसकी तरफ देखा और कहा—
क्या मतलब?

विशाल ने जमीन की तरफ इशारा किया… रिद्धि और अपर्णा ने नीचे देखा…मिट्टी पर…तीनों के पैरों के निशान थे…लेकिन…
उनके साथ-साथ…एक चौथे पैरों के निशान भी थे…जो हर जगह…
उनके साथ चल रहे थे…

अपर्णा की आवाज़ कांप गई वो बोली—
ये… हमारे साथ ही था…

तभी…हवा एकदम से रुक गई…सन्नाटा…और फिर…

एक आवाज़…तीनों के कानों में एक साथ गूंजी —
अब समझे…?

तीनों ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा…इस बार…वो चौथी आकृति बिल्कुल साफ थी…ना पूरी इंसान…ना पूरी परछाई…उसका चेहरा…हर सेकंड बदल रहा था…कभी रिद्धि…कभी अपर्णा…कभी विशाल…और फिर…तीनों एक साथ…वो मुस्कुराई…

वो बोली - 
तुम लोग भाग नहीं सकते…

रिद्धि कांपते हुए बोली —
तुम… क्या चाहती हो?

वो आकृति धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ने लगी…

वो आकृति बोली - 
मैं… तुममें से एक बनना चाहती हूं…

विशाल ने दोनों को पीछे किया और बोला—
कोई पीछे नहीं हटेगा… साथ रहेंगे!

आकृति हंसी…और बोली - 
साथ…?

उसकी आवाज़ गूंज उठी और बोली—
देखते हैं… कब तक…

अचानक…तीनों के हाथ…अपने आप छूट गए…और…तीनों अलग-अलग दिशाओं में खड़े हो गए…जैसे…कोई अदृश्य ताकत उन्हें अलग कर रही हो…अब…तीनों अकेले थे…और वो आकृति…
धीरे-धीरे…तीनों में से किसी एक की तरफ बढ़ रही थी…

अचानक अलग होने के बाद…तीनों के दिल जैसे थम गए थे…
लेकिन अगले ही पल —

विशाल चिल्लाया —
भागो!!!

जैसे किसी ने उन्हें फिर से होश में ला दिया हो…रिद्धि… अपर्णा… और विशाल…तीनों अलग-अलग दिशाओं से दौड़ते हुए फिर एक जगह मिले…और बिना पीछे देखे…सीधे भागते चले गए…इस बार…ना कोई परछाई दिखी…ना कोई आवाज़ आई…। बस… अंधेरा…और उनकी भागती सांसें…काफी देर भागने के बाद…
तीनों रुक गए…सामने…एक नई सड़क थी…सीधी… खुली…
और… सामान्य…

रिद्धि ने हांफते हुए चारों तरफ देखा और बोली—
ये… ये वही जगह नहीं है…

अपर्णा ने भी राहत की सांस ली और बोली—
हाँ… अब वो पेड़… वो खंभा… कुछ भी नहीं है…

विशाल ने धीरे से कहा —
शायद… हम निकल आए…

तीनों कुछ पल तक चुप रहे…फिर एक साथ हंस पड़े…डर के बाद की वो हंसी…थोड़ी राहत भरी थी…।

रिद्धि ने थकी हुई मुस्कान के साथ कहा -
यार… आज की रात तो जिंदगी भर याद रहेगी…

अपर्णा बोली —
सच में… मैं तो समझी थी आज गई…

विशाल ने मजाक में कहा —
और तुम दोनों ने तो मुझे भी डरा दिया था…

अब माहौल हल्का हो चुका था…तीनों धीरे-धीरे सड़क पर चलने लगे…बातें करते हुए…

अपर्णा बोली - 
वैसे रिद्धि… तुमने जो phone वाला बताया… वो सबसे creepy था…।

रिद्धि ने सिर हिलाया और बोली—
और वो परछाइयां…मैं तो सच में समझ गई थी कि हम—

वो अचानक चुप हो गई…

विशाल ने पूछा —
क्या हुआ?

रिद्धि ने धीरे से कहा —
हम… तीन ही हैं ना?

दोनों ने उसकी तरफ देखा —
हाँ… क्यों?

रिद्धि ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा…फिर सामने…फिर नीचे…
उसकी सांसें रुकने लगीं…

वो बोली - 
तो फिर…

उसकी आवाज़ कांप गई और बोली—
ये… चौथा साया किसका है…?

विशाल और अपर्णा ने भी नीचे देखा…सड़क पर…स्ट्रीट लाइट की रोशनी में…तीनों की परछाइयों के साथ…एक चौथी परछाई भी चल रही थी…जो…किसी से जुड़ी नहीं थी…लेकिन…उनके साथ-साथ…चल रही थी…और धीरे-धीरे…वो परछाई…लंबी होती जा रही थी…जैसे…अब…वो किसी एक के साथ जुड़ने वाली हो…

To be continued… 👁️‍🗨️

Aapko kya lagta Hai 
Teeno mese kon tha chhalava?