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*Title: "सिंघानिया मेंशन का राज"*
*Total: 500 शब्द*
प्रज्ञा रोज सुबह 5 बजे उठकर नाश्ता बनाती, फिर गरम-गरम अदरक वाली चाय लेकर अपने शौहर अभि को उठाती।
अभि चाय का घूंट भरते ही शरारत से मुस्कुराया, "कल रात तो तुम झांसी की रानी बनी हुई थीं। चैलेंज पे चैलेंज... मेरी तो हालत खराब कर दी।"
प्रज्ञा ने तकिया मारा, "हां तो? तुम्हें भी तो पता चले कि तुम्हारी बीवी मामूली नहीं है।" दोनों की हंसी से कमरा गूंज उठा।
पर हंसते-हंसते प्रज्ञा का दिल बैठ गया। शादी की पहली रात से ही अभि ने एक बात साफ कह दी थी - _"सिंघानिया मेंशन के आसपास भी मत जाना"_
क्यों? प्रज्ञा डॉक्टर थी। शादी से पहले वो अक्सर बुजुर्गों का चेकअप करने उस मेंशन जाया करती थी। पर अब? अभि का चेहरा गुस्से से लाल हो जाता था उस नाम से।
अभि ऑफिस निकला। प्रज्ञा हॉस्पिटल। अभि के घर में। अभि प्रज्ञा और उसकी मां ही थे।
दोपहर होते-होते ER में कोहराम मच गया। एक लड़का - सिर फटा हुआ, खून से लथपथ, सांसें उखड़ रही थीं। भयानक एक्सीडेंट हुआ था।
_12 घंटे।_ प्रज्ञा और उसकी टीम मौत से जंग लड़ती रही। आखिरकार ऑपरेशन सक्सेसफुल हुआ। लड़के की जान बच गई।
पर ICU से बाहर आते ही प्रज्ञा को झटका लगा। इतने बड़े घर का लड़का... और अभी तक कोई भी मिलने नहीं आया। कुछ देर सिर्फ उसकी माँ आई? और वो भी 5 मिनट में चली गई? बाकी परिवार कहाँ है?
जवाब जल्द मिल गया। जैसे ही लड़के को होश आया, उसने प्रज्ञा को देखते ही बेड से उठकर चीखना शुरू कर दिया।
_"You bloody woman! तुम्हारी औकात कैसे हुई मुझे छूने की? हाथ काट दूंगा तेरा!"_
प्रज्ञा के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिसकी जान बचाई, वो गालियां दे रहा था? पागल है क्या? शायद सिर की चोट से दिमाग हिल गया हो... प्रज्ञा ने खुद को समझाया।
तभी वार्ड बॉय हांफता हुआ आया, "मैडम! पेशेंट के पापा आए हैं। बहुत बड़े आदमी हैं।"
दरवाजा खुला। सामने जो शख्स खड़ा था उसे देखकर प्रज्ञा का खून जम गया। _विराट सिंघानिया।_ सिंघानिया मेंशन का मालिक। करोड़ों की हवेली का वारिस।
और बेड पर लेटा, गालियां देता वो बदतमीज लड़का? _शौर्य सिंघानिया।_ विराट का इकलौता बेटा।
वही सिंघानिया परिवार, जिससे अभि ने उसे दूर रहने को कहा था।
प्रज्ञा ने गहरी सांस ली। प्रोफेशनल स्माइल चेहरे पर लाकर बोली, "ये आपका बेटा है Mr. सिंघानिया? माफ करना, पर ये तो आप पर गया ही नहीं। बिल्कुल अलग है आपसे तो।"
विराट सिंघानिया ठहाका लगाकर हंसा, "मेरा ही खून है डॉक्टर साहिबा। बस इसकी माँ ने सिर चढ़ा रखा है। बिगड़ गया है थोड़ा। अब ये ठीक है ना? मैं इसे घर ले जा सकता हूँ?"
"जी, ले जाइए," प्रज्ञा बोली। उसने शौर्य की बदतमीजी का जिक्र तक नहीं किया।
पर शौर्य की आंखें... वो अभी भी प्रज्ञा को चीर देने वाले अंदाज में घूर रही थीं। नफरत। सिर्फ नफरत।
रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे प्रज्ञा का दिमाग फटा जा रहा था। अभि का सिंघानिया मेंशन से क्या रिश्ता? वो सिंघानिया मेंशन से इतना चिढ़ता क्यों है? और शौर्य... शौर्य उसे देखकर ऐसे क्यों भड़का जैसे जन्मों की दुश्मनी हो?
प्रज्ञा पूरी रात सो नहीं पाई। अभि का गुस्सा, शौर्य की नफरत और विराट सिंघानिया की हंसी - सब उसके कानों में गूंज रहा था। सिंघानिया मेंशन में ऐसा क्या राज दफन है जिसकी वजह से अभि उस नाम से भी नफरत करता है? क्या अभि का पास्ट उस हवेली की दीवारों से जुड़ा है? और शौर्य उसे देखकर इतना क्यों भड़का? कहीं ये जन्मों की दुश्मनी तो नहीं?
_[To be continued..]