Ghost hunters - 9 in Hindi Horror Stories by Rishav raj books and stories PDF | Ghost hunters - 9

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Ghost hunters - 9

                                भाग - 9 


पंद्रह दिन बीत चुके थे पिछला केस खत्म हो चुका था लेकिन उसका असर अभी भी टीम के चेहरों पर था

लेकिन ये कहानी वहाँ से नहीं शुरू होती।


ये शुरू होती है एक छोटे से गाँव से


सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था हल्की-हल्की धुंध खेतों पर तैर रही थी और उसी गाँव के बीच एक पक्का घर

बाकी कच्चे घरों के बीच थोड़ा अलग 

घर के अंदर रोहित अपने कमरे में खड़ा था रेलवे की यूनिफॉर्म पहनते हुए करीब 42 साल का disciplined कम बोलने वाला आदमी

उसकी घड़ी हमेशा सही समय पर चलती थी और उसका दिन भी

रोहित - रितिका, चाय हो गई?

रसोई से आवाज आई

रितिका - बस अभी लाई

रितिका लगभग 38 साल शांत लेकिन मजबूत , घर की हर चीज़ उसके control में थी खाना बच्चों की पढ़ाई घर का खर्च सब कुछ perfectly balance

वो चाय लेकर आई—

रितिका - आज फिर late मत होना

रोहित - कोशिश करूँगा

तभी अंदर से एक आवाज आई

आर्यन - मम्मी! मेरा bag कहाँ है?

15 साल का थोड़ा लापरवाह लेकिन दिल का अच्छा

हर चीज़ last moment पर करता था


रितिका (थोड़ा गुस्से में) - जहाँ कल फेंका था वहीं होगा!

आर्यन - मम्मी! मैंने फेंका नहीं था बस रखा था

दूसरे कमरे से एक calm आवाज

निशा - bag सोफे के नीचे है।

सबकी नजर उस पर गई

18 साल समझदार, घर में अगर कोई चीज़ silently notice करता था तो वो थी निशा 

आर्यन - तुझे कैसे पता?

निशा (हल्की मुस्कान के साथ) - क्योंकि तुम हर बार वहीं रखते हो

चारों लोग एक साथ बैठे नाश्ता करते हुए Simple बातें कर रहे थे छोटी-छोटी नोक-झोंक लेकिन एक चीज़ साफ थी ये एक खुशहाल परिवार था।


निशा खिड़की की तरफ देख रही थी कुछ सेकंड के लिए उसकी नजर अटक गई जैसे उसने कुछ देखा हो


रितिका - क्या हुआ?

निशा - कुछ नहीं मुझे लगा वहां कोई है 

आर्यन - लगता है कल रात कोई हॉरर मुवी देखी होगी , अभी तक असर है ध्यान से कहीं भुत पकड़ के न ले जाए 🤣🤣


रोहित ने घड़ी देखी

रोहित - मैं निकलता हूँ

उसने बैग उठाया और बाहर चला गया।

गाँव से स्टेशन तक जाने के लिए एक कच्चा रास्ता था और उस रास्ते के बीच एक पुराना पेड़ बहुत पुराना झुका हुआ सूखा, लेकिन अब भी खड़ा


रोहित हर दिन वहाँ से गुजरता था आज भी गुजरा लेकिन

जैसे ही वो उसके पास से निकला एक सेकंड के लिए

हवा ठंडी हो गई रोहित रुका चारों तरफ देखा कुछ नहीं


रोहित (धीरे से) - बेवजह सोच रहा हूँ।

और वो आगे बढ़ गया

घर में निशा फिर से खिड़की से बाहर देख रही थी इस बार

उसे साफ दिखा दूर वही पेड़ और उसके पास कोई खड़ा था लेकिन जब उसने ध्यान से देख वहाँ कुछ नहीं था


निशा (धीरे से) - ये क्या था? लगता है मुझे भी चस्मा लगवाना पड़ेगा 

गाँव में ज़िंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी ना कोई डर ना कोई अजीब घटना ,बस वही रोज़ का routine


लेकिन कभी-कभी सब कुछ normal होना भी abnormal होता है😈


सुबह 9:30 बजे रोहित रेलवे स्टेशन पर था वो स्टेशन मास्टर नहीं था लेकिन उससे कम भी नहीं उसकी पोस्ट respectable थी जिम्मेदारी वाली


रोहित प्लेटफॉर्म पर खड़ा था ट्रेन धीरे-धीरे अंदर आ रही थी सीटी आवाज लोग भागते हुए सब कुछ controlled chaos, एक कर्मचारी उसके पास आया


कर्मचारी - सर, signal line में थोड़ी दिक्कत थी, अभी ठीक कर दिया है।

रोहित - double check कर लो एक गलती और accident हो सकता है


उसकी आवाज में कोई गुस्सा नहीं था लेकिन seriousness थी

रोहित की आदत थी हर चीज़ को खुद verify करना

कागज़… टाइमिंग… सिस्टम… वो shortcut में विश्वास नहीं करता था



लंच टाइम पर बाकी लोग हँसते-बोलते बैठे थे लेकिन रोहित एक कोने में बैठकर quietly खाना खा रहा था एक colleague ने मजाक किया


कर्मचारी - सर, कभी हँस भी लिया कर डर लगता है आपसे


रोहित (हल्की मुस्कान) - काम सही चले तब डरने की क्या जरूरत 



घर में रितिका का दिन भी उतना ही structured था सुबह बच्चों को तैयार करना घर साफ करना खाना बनाना और बीच-बीच में

थोड़ा खुद के लिए समय




वो आंगन में बैठी थी सब्ज़ी काटते हुए पास की एक पड़ोसन आई


पड़ोसन - दीदी, आपका तो सब सेट है पति अच्छी नौकरी में, बच्चे पढ़ने वाले

रितिका (हल्की मुस्कान) - सब ऊपर वाले की कृपा है

लेकिन उसके चेहरे पर एक चीज़ साफ थी जिम्मेदारी वो हर चीज़ संभालती थी बिना complain किए


दोपहर के समय निशा अपने कमरे में थी किताबें खुली हुई notes लिख रही थी वो पढ़ाई में serious थी लेकिन सिर्फ किताबों तक limited नहीं 

उसकी एक दोस्त का call आया

दोस्त - कॉलेज के बाद क्या प्लान है?

निशा - अभी कुछ fix नहीं लेकिन गाँव से बाहर जाना है

दोस्त - बड़े शहर

निशा - हाँ शायद

उसकी आँखों में एक goal था

दूसरी तरफ आर्यन पूरी तरह अलग था वो दोस्तों के साथ बाहर खेल रहा था क्रिकेट… शोर… हँसी… ये सब उसे पसंद था 

आर्यन - अरे सही से डाल यार!

दोस्त - तू ही डाल ले फिर!

वो carefree था पढ़ाई से भागता था लेकिन family से जुड़ा हुआ था और कोई ग़लत आदत भी नहीं थी शाम को वो मोबाइल पर game खेल रहा था


रितिका - पढ़ाई कर ली?

आर्यन - हाँ (झूठ बोलते हुए)

निशा (पास से) - झूठ मत बोल एक chapter भी नहीं खोला।

आर्यन - तू CBI है क्या? और मैंरे पिछे हमेशा क्यूं परी रहती है 

निशा - अब चल शांति से पढ़ाई कर ले , मेरी दोस्त की बहन भी तेरे ही क्लास में है और जब जब तुम मुर्गा बनता है या जब भी सर तुझे पिछवाड़े में मारते हैं न तो वो मुझे बताती है 

रात को चारों लोग एक साथ बैठे थे खाना खाते हुए छोटी-छोटी बातें

दिन कैसा गया, स्कूल में क्या हुआ

आर्यन - पापा आपसे एक बात करनी है 

रोहित - हँ बोलो 

आर्यन - वो मेरी बेट टुट गई थी 

रोहित - ठीक है 

रितिका - कोई जरूरत नहीं है बेट की पढ़ाई करता नहीं है, आपने ही सर पर चढ़ा कर रखा है सबको बिगाड़ दिजिए 

रोहित - सुन लिया न डांट खिला दी मुझे , पढ़ाई पर ध्यान दो ये समय वापस नहीं आएगा

आर्यन - जी😔(लेकिन उसका ध्यान खाने पर ज्यादा था 😅)


निशा शांति से सब सुन रही थी रात गहरी हो गई सब अपने-अपने कमरे में सो गए घर शांत था बिल्कुल सामान्यबाहर हवा चल रही थी पेड़ हिल रहे थे दूर वही पुराना पेड़.....