अकथ in Hindi Drama by silent script books and stories PDF | अकथ

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अकथ

‎बस्ती की तंग गलियों में धूल उड़ रही थी। सूरज की तपिश कच्ची छतों को झुलसा रही थी, लेकिन सात के नील के पैरों में जैसे पहिए लगे थे।


‎"माँ! मैं खेलने जा रहा हूँ," उसने माथे का पसीना पोंछते हुए चिल्लाकर कहा।

‎उसकी माँ, जो फटे हुए कपड़ों के ढेर से कुछ काम का ढूँढ रही थी, रुकी और उसे गौर से देखा। उसकी आवाज़ में एक चेतावनी थी, जो हर गरीब माँ की सबसे बड़ी पूँजी होती है—स्वाभिमान।


‎"जा, पर देख... ज्यादा बदमाशी मत करना। बस अपने खेल पर ध्यान देना। और सुन!" माँ ने उसे पास बुलाकर उसके कंधे पकड़े, "खबरदार जो आज किसी से पैसे माँगे। भूल मत कि हम गरीब भले हैं, पर भिखारी नहीं। समझ गया?"


‎नील ने मासूमियत से मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। "हाँ माँ, समझ गया!"

‎वह झूठ बोलकर वहाँ से भागा। उसकी हँसी के पीछे एक ऐसी योजना थी जो उसकी माँ के स्वाभिमान से कहीं बड़ी थी। वह भागता हुआ बस्ती की सीमा लांघकर मुख्य सड़क के किनारे जा पहुँचा। यहाँ बड़ी गाड़ियाँ रुकती थीं और उनमें बैठे लोग अक्सर खिड़की से बाहर हाथ निकालकर कुछ गिरा देते थे।


‎सड़क किनारे खड़े होकर उसने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। माँ की बात उसके कानों में गूँज रही थी, पर उसकी नज़रों के सामने घर का वो खाली डिब्बा था जिसमें राशन खत्म हो चुका था।


‎'अगर आज किसी ने पाँच रुपये भी दे दिए, तो घर जाते समय माँ के लिए कुछ ले जाऊँगा,' उसने सोचा। जैसे ही एक बड़ी सफेद गाड़ी सिग्नल पर रुकी, नील अपनी मासूमियत का मुखौटा ओढ़कर उसकी खिड़की की तरफ बढ़ा। उसे पता था कि उसे क्या करना है।
‎ सड़क किनारे खड़ी वह लड़की, जिसकी उम्र करीब 25 साल रही होगी, अपने फोन पर किसी से उलझी हुई थी। उसके चेहरे के तनाव से साफ़ लग रहा था कि उसकी नौकरी या काम में कोई बड़ी मुसीबत आ गई है।


‎"सर, मैं कह रही हूँ न कि फाइल कल तक पहुँच जाएगी! प्लीज मुझे थोड़ा वक्त दीजिए..." वह लड़की गिड़गिड़ा रही थी।
‎तभी, नील उसके पास पहुँचा और उसका कुरता खींचते हुए बोला, "दीदी... ओ दीदी! थोड़े पैसे दे दो ना।"

‎लड़की ने उसे देखा, पर फोन पर मची किचकिच की वजह से उसने उसे अनसुना कर दिया। नील हार मानने वाला नहीं था। वह बार-बार उसके हाथ के पास जाकर चहकने लगा,"दीदी, दे दो ना... बस थोड़े से पैसे दे दो।"

‎लड़की—जिसका नाम अवनि था—झुंझला गई। उसने फोन कान से हटाकर हाथ से इशारा किया, "हाँ-हाँ, देती हूँ! पहले ये कॉल खत्म होने दे। जा, वो सामने जो बेंच दिख रही है न? वहाँ जाकर बैठ, मैं पाँच मिनट में आती हूँ।"


नील के चेहरे पर जीत की मुस्कान खिल गई। "पक्का दोगी ना?"


अवनि ने सिर हिलाया और फिर से फोन पर बात करने लगी। नील खुशी-खुशी उस बेंच की तरफ दौड़ा। वह अपनी धुन में था, सड़क की गाड़ियों से बेखबर। उसे बस वो 'कुछ रुपये' दिख रहे थे जो अवनि उसे देने वाली थी।



तभी... एक भयानक आवाज़ गूँजी। टायर के सड़कों पर रगड़ने की 'चींऽऽऽ' और उसके तुरंत बाद एक ज़ोरदार 'धप'!,


अवनि के हाथ से फोन छूटकर नीचे गिरा उसका पूरा शरीर काँप उठा।