Do Patiyo ki Ladli Patni in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | दो पतियों की लाडली पत्नी - 45

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दो पतियों की लाडली पत्नी - 45

दोनों भाइयों के बीच झगड़ा हो चुका था। ऐसा झगड़ा
जिसमें शब्द नहीं, अहंकार जीत गया था। नियम के अनुसार अब श्रेया को करण के साथ रहना था। पर यह वही करण नहीं था जो कभी बिना कहे उसके दर्द को समझ जाता था।

रात थी। कमरा शांत था, पर हवा भारी। श्रेया बिस्तर के एक कोने में चुपचाप बैठी थी। आँखें नीचे, कंधे सिमटे हुए। करण कमरे में टहल रहा था।

करण (कठोर स्वर में) बोला - 
अब तुम मेरे साथ हो, तो ऐसे डर-डर कर क्यों बैठी हो?

श्रेया चौंक गई।

श्रेया (धीरे से) बोली - 
मैं डर नहीं रही…बस…थोड़ी असहज हूँ।

करण रुक गया।

करण (तेज़ आवाज़ में) बोला - 
असहज?
मैं तुम्हारा हूँ, और तुम मेरी हो।
इसमें असहज क्या?

श्रेया का दिल बैठ गया।

श्रेया बोली - 
करण जी…प्यार में ‘हक़’ होता है, पर ज़बरदस्ती नहीं।

करण की आँखों में कुछ टूटने लगा।

करण बोला - 
ज़बरदस्ती?
तो कबीर के साथ तुम्हें सब ठीक लगता था?

यह वाक्य श्रेया के सीने में चाकू की तरह लगा।

श्रेया (काँपते स्वर में) बोली - 
ये तुलना मत करो।
मैं किसी की चीज़ नहीं हूँ जिसे तराज़ू में तौला जाए।

करण ने उसके क़रीब आकर कहा—
मैंने तुम्हें संभाला है, तुम्हें बचाया है, तो मेरा हक़ बनता है।

श्रेया पीछे हट गई।

श्रेया बोली - 
हक़! तभी तक हक़ होता है जब सामने वाला खुश हो।

उसकी आँखों में डर साफ़ दिख रहा था। करण ने यह देखा…पर समझ नहीं पाया। या शायद समझना नहीं चाहता था।

करण (थकी, टूटी आवाज़ में) बोला - 
मैं तुम्हें खोने से डरता हूँ, श्रेया।
इसलिए कभी-कभी हद पार कर जाता हूँ।

श्रेया की आँखों से आँसू बहने लगे।

श्रेया बोली - 
डर के नाम पर किसी को क़ैद मत करो, करण।
मैं तुम्हारे पास हूँ, पर ऐसे नहीं।

कमरे में सन्नाटा छा गया। करण खड़ा रहा। उसके हाथ काँप रहे थे। श्रेया बिस्तर के किनारे सिमटकर लेट गई।
उसने करवट बदली, मानो अपने ही कमरे में पराई हो गई हो। करण ने पीछे से कुछ कहना चाहा…पर शब्द गले में अटक गए। वह समझ रहा था वह अधिकार जता रहा है, प्यार नहीं। और यही बात
सबसे ज़्यादा डराने वाली थी।

दूसरे कमरे में कबीर करवटें बदल रहा था। उसे कुछ सुनाई नहीं दिया, पर उसका दिल बेचैन था। जैसे कहीं
श्रेया फिर से टूट रही हो। और इस बार उसे समेटने वाला कोई नहीं था।

रातें गुजर रही थीं। नियम के अनुसार श्रेया करण के साथ थी। करण अब भी उसके क़रीब आता था। कभी चुपचाप उसके पास बैठ जाता, कभी उसके सिर पर
हाथ फेर देता। उस लम्हे श्रेया को थोड़ा सुकून मिलता था। पर… वह सुकून पूरा नहीं होता था।

कमरे में हल्की रोशनी थी। खिड़की के बाहर हवा सरसराती थी। श्रेया बिस्तर पर बैठी थी, घुटनों को सीने से लगाए। करण आकर उसके पास बैठ गया।

करण (नरम आवाज़ में) बोला - 
अब ठीक लग रहा है?

श्रेया ने धीरे से सिर हिलाया।

श्रेया बोली - 
हाँ…थोड़ा।

करण ने उसे अपनी तरफ खींचा। श्रेया ने विरोध नहीं किया। उसका सिर करण के कंधे पर टिक गया।
दिल की धड़कनें थोड़ी धीमी पड़ीं। पर उसकी आँखें
अब भी अधूरी थीं।

करण (धीरे से) बोला - 
मैं यहीं हूँ। तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं।

श्रेया ने हल्की सी मुस्कान दी।

श्रेया (मन ही मन) बोली - 
डर नहीं है…बस खालीपन है।

उसे याद आया वह एहसास जब करण और कबीर दोनों साथ होते थे। जब एक तरफ से मजबूत बाहें होती थीं, और दूसरी तरफ मासूम-सी जिद। वह सुकून जो तीन दिलों के एक साथ धड़कने से मिलता था। श्रेया ने
आँखें बंद कर लीं।

श्रेया (बहुत धीमे स्वर में) बोली - 
करण जी…

करण बोला - 
हूँ?

श्रेया कुछ पल चुप रही।

श्रेया बोली - 
सुकून…आ रहा है…पर पूरा नहीं।

करण ने उसकी बात सुनी। समझ भी गया। उसका सीना भारी हो गया।

करण (टूटी आवाज़ में) बोला - 
क्योंकि कबीर नहीं है न?

श्रेया ने कोई जवाब नहीं दिया। बस उसकी आँखों से
आँसू बह निकले। करण ने उसे और कसकर पकड़ लिया। जैसे उस खालीपन को अपने सीने से भर देना चाहता हो। पर कुछ खालीपन सिर्फ़ कसने से नहीं भरते।

दूसरे कमरे में कबीर करवट बदल रहा था। उसे नींद नहीं आ रही थी। उसका दिल बेचैन था।

कबीर (खुद से) बोला - 
आज भी उसे सुकून नहीं मिला होगा…।

इधर श्रेया करण के पास थी, पर मन कहीं और अटका था। और करण उसके पास होकर भी खुद को अकेला महसूस कर रहा था। क्योंकि अब वह समझ रहा था—
श्रेया को उसकी ज़रूरत है, पर सिर्फ उसकी नहीं।
तीनों की कहानी फिर उसी मोड़ पर आ खड़ी हुई थी
जहाँ प्यार अधूरा नहीं, अकेला हो गया था।

रात फिर उतर आई थी। कमरे में हल्की पीली रोशनी जल रही थी। खिड़की से आती हवा परदे को धीरे-धीरे हिला रही थी। श्रेया बिस्तर पर बैठी थी। आँखों में नींद थी, पर दिल में बेचैनी। करण कमरे में टहल रहा था।
उसके कंधे झुके हुए थे, जैसे अंदर कोई भारी बोझ हो।
करण सच में श्रेया से प्यार करता था। बेइंतहा। पर उस प्यार के नीचे एक ऐसा दर्द छुपा था जिसे वह किसी को दिखाना नहीं चाहता था। वह दर्द कभी कबीर की याद बनकर चुभता, तो कभी अपने ही गुस्से का डर बनकर।

करण पीछे से चुपचाप उसके पास आया। उसने धीरे से
श्रेया को थाम लिया। श्रेया चौंकी नहीं। उसे अब आदत थी। करण ने उसकी गर्दन के पास अपने होंठ टिकाए।
कोई जल्दबाज़ी नहीं। कोई ज़िद नहीं। बस एक थका हुआ प्यार।

करण (धीमी आवाज़ में) बोला - 
थक गई हो?

श्रेया ने हल्का-सा सिर हिलाया।

श्रेया बोली - 
हाँ…दिल से।

करण ने उसे बिस्तर पर सुला दिया। उसका सिर अपने सीने से लगा लिया। हाथ उसकी पीठ पर रख दिया।
जैसे कोई टूटे बच्चे को सुला रहा हो। कुछ देर तक कमरे में सिर्फ़ साँसों की आवाज़ थी। श्रेया की साँस
तेज़ थी। करण की भारी।

श्रेया (धीरे से) बोली - 
करण जी…

करण बोला - 
हूँ।

श्रेया ने आँखें बंद किए-किए कहा—
आप पास होते हो…पर मन फिर भी डरा रहता है।

करण का दिल जोर से धड़का। उसने अपनी पकड़ थोड़ी और कस ली।

करण (टूटी आवाज़ में) बोला - 
मैं तुम्हें डराना नहीं चाहता था…कभी भी नहीं।

श्रेया ने उसके सीने पर हथेली रख दी।

श्रेया बोली - 
मुझे पता है। आप बुरे नहीं हो। बस…आप भी बहुत टूटे हो।

यह सुनकर करण की आँखें भर आईं। उसने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया ताकि आँसू न दिखें।

करण (खुद से) बोला - 
अगर मैं मजबूत होता तो इसे ऐसा महसूस नहीं होता…

श्रेया उसकी धड़कनें सुन रही थी। वे तेज़ थीं। बेचैन।
वह जानती थी करण उसे प्यार करता है, पर उस प्यार में शांति नहीं बची थी। कुछ देर बाद श्रेया की आँखें
बंद हो गईं। वह सो गई। पर करण नहीं सो पाया। वह उसे सीने से लगाए लेटे-लेटे छत घूरता रहा। उसके अंदर हजार सवाल थे।

वो सोच रहा था —
 क्या सिर्फ मेरा प्यार काफी है?
क्या मैं उसे वही सुकून दे पा रहा हूँ…जो वह ढूंढ रही है?

उसने श्रेया के बालों को हल्के से सहलाया।

करण (फुसफुसाकर) बोला - 
मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ…पर शायद प्यार के साथ तीसरा साया भी जरूरी था।”

कमरे में शांति थी। पर उस शांति के नीचे तीन टूटे दिलों की धड़कनें अब भी बेचैन थीं। श्रेया सो रही थी, करण जाग रहा था, और कहीं दूर कबीर का दिल फिर उसी बेचैनी से कराह रहा था।