चलो दूर कहीं.. 18
गहराते रात के साथ उस बीहड़ जंगल की भयावहता भी गहराती जा रही थी और प्रतीक्षा को इसकी कुछ सुध न थी । उसके मन मस्तिष्क में उसके अपनों का चित्र तैर रहा था और उनसे मिलने के लिए वो व्याकुल थी । उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करें कैसे अनाह के चंगुल से मुक्त हो? कैसे इस बीहड़ जंगल से बाहर निकले ? उसे तो ये भी पता न था कि वो कहां है..?
वह रवि के झोंपड़े के सामने विचारों में डुबी गुमसुम बैठी थी। ठंडी हवा के झोंके से उसका बदन थरथरा रहा था लेकिन उसका दिमाग इतना उलझा हुआ था कि उस ठंड का उसके बदन पर कोई असर नहीं हो रहा था। वह इस भूल भुलैया से वह थक चूकी थी और इससे बाहर निकलना चाहती थी..उसे पता था अनाह के चंगुल से मुक्त होना इतना आसान नहीं है। मेरे कारण बेचारा रवि भी बलि का बकरा बन रहा है..? शायद रवि मेरा कुछ मदद कर सकता है? लेकिन उसे तो गांव वाले पकड़ कर न जाने कहां ले गए..और न जाने उसके साथ क्या सलूक किए होंगे..?हे ईश्वर उसकी रक्षा करना..!
रवि का याद आते ही उसकी आंखें भर आई.. और हृदय में एक हुक सी उठी.. उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे अभी दौड़ पड़े रवि से मिलने लेकिन वह लाचार थी अब उसके अंदर इतनी भी शक्ति न बची थी कि झोंपड़े के अंदर चली जाय !
नीले स्वच्छ आसमान में चांद खिला था और उसके शीतल प्रकाश से पुरा जंगल दुधिया रोशनी से नहाया हुआ था। मौन खड़े ऊंचे ऊंचे पेड़ों के फड़फड़ाते पत्तों की सरसराहट निस्तब्ध सन्नाटे में किसी पिशाच के फुंफकार की भांति प्रतीत हो रहा था। प्रतीक्षा अपने आप में खोई हुई थी कि जमीन पर पड़े सुखे पत्तों में चरमराहट के आवाज से उसकी तंद्रा टुटी और वह देखी तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई.. शेरु मुंह में कंबल का एक शिरा दबाए उसकी ओर चला आ रहा था। यह दृश्य उसके लिए अकल्पनीय था.. शेरु जैसे बेजुबान के संवेदनशीलता का ऐसा कोई उदाहरण उसके सामने न था। शेरु जब उसके नजदीक आया तो वह भावविभोर उससे लिपटकर उसके नथुने को चूम ली.. और कंबल अपने बदन में डाल ली..!
शेरु कूं ..कूं .. करते हुए उससे अलग हुआ और कंबल का एक सिरा मुंह में दबाकर खींचने लगा..! उसे उठने की एक जरा इच्छा न थी और शेरु था कि मानने का नाम नहीं ले रहा था वह लगातार कंबल को पुरी ताकत से खींचें जा रहा था.. जिससे उसे चिढ़ हो रहा था, उसने गुस्सा से बिलबिलाते हुए बोली," जब कंबल खींचना ही था तो देने की क्या जरूरत थी..लो ले जाओ अपना कंबल..!" और कंबल को अपने बदन से निकाल कर छोड़ दी..जैसे प्रतीक्षा ने कंबल छोड़ी वैसे ही शेरु ने तीन चार गुलाटी मार कर कंबल को अपने बदन में लपेट लिया.. ये इतना तेजी से हुआ कि प्रतीक्षा को कुछ समझ नहीं आया लेकिन शेरु की दशा देख उसके होंठों पर मुस्कान तैर गई..!
उधर शेरु कंबल से बाहर निकलने के लिए जितना छटपटा रहा था उतना ही उलझता जा रहा था। शेरु के छटपटाहट और चिल्लाने से उसका दिल पसीजा वह अनमने मन से उठी और धीरे धीरे घुमा घुमाकर कंबल से शेरु को मुक्त कराते हुए बोल रही थी,", तुम तो बहुत समझदार हो शेरु ... रवि को वे लोग मार डालेंगे शेरु ..! मेरे कारण रवि को न जाने क्या क्या जुल्म सहना पड़ रहा है... एक बार उससे मिला दो शेरु मैं उससे माफी मांगकर उसके जीवन से हमेशा हमेशा के लिए दूर चली जाऊंगी..!"
मुक्त होते ही शेरु उसका धोती पकड़ा और खींचने लगा तब उसे समझ आया कि शेरु उसे कहीं ले जाना चाहता है..वह कंबल उठाकर अपने बदन में डाली और शेरु के पीछे पीछे चल पड़ी..! शेरु जंगल के उबड़-खाबड़ पथरीले रास्ते पर आगे आगे चला जा रहा था और उसके पीछे-पीछे प्रतीक्षा सम्मोहित सा दौड़ी चली जा रही थी.. न उसके मन में कोई प्रश्न था और न ही कोई दुविधा..!
करीब एक घंटे बाद शेरु एक कच्चे फूस के घर के सामने रुका और कूं..कूं... करने लगा तो प्रतीक्षा को समझते देर न लगी कि शेरु इस घर के बारे में कुछ बताना चाहता है..! वह बिना कुछ कहे चुपचाप उस घर के दरवाजे पर पहुंची तो दरवाजा टाट का था.. अंदर की टोह ली तो वहां सन्नाटा पसरा था..! उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस विरान घर में शेरु उसे क्यों ले आया..? मुझे नहीं लगता कि इस घर में कोई है..? सोचते सोचते उसने दरवाजे से टाट को हल्का सा धक्का दिया तो वह खुल गया..! टाट खुलते ही वो दबे पांव अंदर गई.. अंदर घुप्प अंधेरा था, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था फिर भी टोह लेकर वह जैसे आगे बढ़ी उसका पैर किसी के पैर से टकराया और उस निशब्द सन्नाटे में थरथराती आवाज गूंजी,"कौन है यहां..?"
उस आवाज से प्रतीक्षा काफी घबरा गई थी, उसने कांपते स्वर में पूछा,"तुम कौन हो और इस विरान घर में क्या कर रही हो..?"
"मैं वो अभागी हूं जिसके सौभाग्य को एक चुड़ैल ने लील लिया.. मेरे आंखों के सामने मेरे देवता को मेरे घर वालों ने पीट पीट कर मार डाला और मैं कुछ न कर सकी..! "
कहकर वो फूट फूटकर रोने लगी तो प्रतीक्षा उसके समीप बैठी और ढ़ाढस बंधाते हुए बोली,"शांत हो जाओ बहन.. भाग्य में बदा होता है वह होकर रहता है.. वैसे तुम्हारे देवता का नाम क्या है?"
"रवि..!"
"क्या..? रवि मर गया.. कहां है वो..?" घबराए स्वर में प्रतीक्षा ने कहा तो वह फूंफकारते हुए बोली," तो तुम यहां तक पहुंच गई.. उसे मारने के बाद भी तेरे कलेजे को ठंडक नहीं पहुंची है..अब क्या लेने आई हो यहां..?"
" देखो समझने की कोशिश करो .. मैं मानती हूं कि मेरे कारण ही रवि की यह स्थिति हुई है.. लेकिन ये सब क्या धरा अनाह का है... समझने की कोशिश करो मैं भी तुम्हारी तरह रवि को प्यार करती हूं भला मैं उसका बुरा कैसे कर सकती हूं..बस एक बार मिला दो रवि से..बस एक बार मिला दो सुमी...!" कहते कहते प्रतीक्षा फफक पड़ी।
सुमी चुप थी और रात के निशब्द सन्नाटे में प्रतीक्षा की सिसकियां गूंज रही थी...
क्रमशः...