Sip ka Moti - 5 in Hindi Love Stories by manasvi Manu books and stories PDF | सीप का मोती - 5

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सीप का मोती - 5

भाग ५ 

"सुनेत्रा" 

ट्युशन से आते समय पीछे से एक लडके का आवाज आया। सुनीऔर मै पलटे मुझे विश्वास ही नही हो रहा था। वह लडका सचिन था।

" हां...??" सुनी का इतना ही उत्तर निकला

"थोड़ा काम था।" वह बोला।  मुझे पूरी तरह से इग्नोर करते हुए पूरी तरह उसकी तरफ ध्यान देते हुए बोला ।

"मुझसे...?? क्या...।"  सुनी ने शांत स्वर में पूछा

"तुम संस्कृत की ट्यूशन जाती हो ना...?? मुझे नहीं जाते आएगा। काम ही इतने होते हैं घर में...तो मुझे संडे को पढ़ने के लिए तुम्हारी क्लास की कॉपी दोगी क्या..?? बाकी  किसी की भी ले सकता था, पर तुम क्लास में फर्स्ट आती हो, इसलिए तुमसे पूछा। दोगी क्या..??" वह एक बार में ही बोल गया।

" दे तो सकती हूं... पर मुझे सोमवार को सुबह क्लास में वापस चाहिए होगी।"  वह बोली। उसने पहली बार में ही हां कर दी। वैसे भी पढ़ाई से संबंधित बातों के लिए वह मना कर दे यह संभव ही नहीं था। मदद करना उसका स्वभाव था।

" हां बिल्कुल दूंगा... रविवार का दिन बहुत है मेरे लिए। और हां... एक बात और.. अगर कुछ समझ नहीं आया तो तुमसे पूछूंगा... चलेगा ना...??" उसने फिर से पूछा

"ठीक है !! पूछ सकते हो।" उसने कॉपी आगे बढ़ते हुए कहा।

उसने कॉपी ली और उसकी साइकिल पर टंगे थैली में डाल दी। 

" और हां.. और.. वो.. तुम पर भी कीचड़ उड़ा ना उस दिन उस बात के लिए.. sorry।" वह बोली

"अच्छा वो.. अरे कोई बात नहीं.. उसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी। समर ने वह हरकत नहीं करनी चाहिए थी। बेवजह तुम्हें गुस्सा दिला दिया उसने।" वह बोला। उसने जानबूझकर मेरा जिक्र टाल दिया, यह मैं समझ गया, जैसे उसके हिसाब से मैं वहां था ही नहीं।

" हम्म" वह बोली।

" ठीक है... सोमवार को सुबह क्लास में देता हूं कॉपी। Thank you." वह बोला और उसकी तरफ हंसते हुए देखते हुए निकल गया।

कुछ सेकंड उसने वह जिस दिशा मे गया वहां देखा और फिर मुझे "चल" बोली।

"यह उस समर जैसा नहीं है... जरा ठीक-ठाक है व्यवहार में।" वह बोली 

"क्या यार सुनी!!  तू रविवार को पढ़ाई नहीं करेगी क्या..??"  मैंने पूछा 

" अरे.. तेरी कॉपी है ना... उससे पढ़ेंगे।उसे जरूर है ऐसा मुझे लगा... मेहनत करने वालों की मदद करनी चाहिए मोटू... और इसमें हमारा क्या नुकसान है...??" वह बोली

"लेकिन इस तरह पहली मुलाकात में ही कॉपी मांग लेना, जरा अजीब नहीं लगता क्या...??" मैं बोला

" नहीं यार!! अपनी क्लास का ही तो लड़का है ना... भाग  जाएगा क्या कॉपी लेकर कहीं। उस पर भरोसा किया है... देखें क्या होता है।" सुनी बोली 

मेरी कॉपी का सपोर्ट सुनी को मिलना , यह बात ठीक थी। पर उस सचिन को सुनी की कॉपी हम दोनों के लिए मेरी कॉपी के सपोर्ट के कारण मिली थी। सुनी अपनी इंसानियत के सिद्धांत पर चल रही थी, या सचिन ने उसके मन में एक छोटी सी जगह बना ली थी, इसलिए उसने अपनी कॉपी इतनी आसानी से दे दी, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा था। बाकी लड़कों का मुझ पर कीचड़ उछलने के बाद सचिन का मुझे देखकर हल्केसे हंसते हुए निकल जाना, मुझे आज भी परेशान कर देता है। क्या वह मुझ तक कुछ पहुंचाना चाहता था, और शायद उसने कुछ ना बोलते हुए भी मुझ तक वह पहुंचा दिया था।
🍁🍁🍁🍁

सोमवार को सचिन ने उसे कॉपी वापस की,और ऐसा करते हुए "तुम्हारी हैंडराइटिंग बहुत अच्छी है" यह बोलना वह नहीं भूला सुनी ने उस तारीफ का हंसकर स्वागत किया।

बाद में यह सिलसिला शुरू हो गया। हर शनिवार को ट्यूशन के रास्ते पर सचिन को सुनी की संस्कृत की कॉपी मिल जाती ,और सोमवार को वह उसे वापस करता था।

दोनों के बीच बातचीत होने की वजह से सचिन कैसे अपने मामा को कार्पेंटी के काम में और रंगाई के काम में मदद करता है, मामी के 17 - 18 टिफिन कैसे घर-घर पहुंचाता है, और अब जल्द ही उसका खुद का पेपर बांटने का विचार है अगले साल... ऐसी छोटी-छोटी जानकारी मुझे सुनी से बेवजह मिलती थी , तो कभी मैं उसके साथ होते हुए सचिन भी साथ होता था। तो यही जानकारी डायरेक्ट सचिन से मिल जाती थी। अभी भी उसने मुझसे एक शब्द भी बात नहीं की थी, जैसे मैं उसके लिए एक गोलाकार शून्य था। लेकिन वह जब साथ होता तब सुनी ज्यादातर उससे ही बात करती थी। यह फर्क मुझे महसूस होने लगा।

सुनी के मन में उसने एक repo बना लिया है, यह मुझे समझ आने लगा। कभी-कभी तो रिसेस में वह सुनी को रोक कर पढ़ाई से संबंधित और इधर-उधर की बातें करता। वैसे मुझे समर की तरफ से सीधे किसी भी तरह की तकलीफ वगैरा नहीं थी, पर उनका मेरी तरफ देखकर अजीब तरह से हंसना, मुझे परेशान करता था। वह भी तब जब सुनी और सचिन बातें कर रहे होते थे। तब जैसे उस हंसी के द्वारा समर यह कहने की कोशिश कर रहा हो, कि "बेटा तुझसे तेरा कुछ छीन लिया जा रहा है ,तू बैठ इसी तरह हाथ मलते।"  लेकिन सुनी मुझसे उसी तरह व्यवहार रखनी थी। उतनी ही सहज थी। उसने अभी तक तो उसके लिए मुझे साइड नहीं किया था।

एक रविवार शाम को मैं सुनी के घर गया "बैडमिंटन खेलें  क्या" यह पूछने । घर पहुंचा ही था कि मेरे कानों पर जो सुनाई दिया...

"खो-खो और कबड्डी में मैंने गेम देखा है इसका ।पहले यह कॅप्टन था दोनों गेम्स में। अपनी टीम का best player है सचिन।" सुनी सचिन की तारीफ करती हुई बोल रही थी

सचिन... वहां उसके घर पर था। कॉपी के बहाने से उसने यहां प्रवेश हासिल कर लिया था । सुनी के मम्मी पापा वैसे बहुत खुले मिज़ाज के थे। मुझे तो हमेशा घर के सदस्य की तरह समझते थे। सुनी को उन्होंने दोस्तों की वजह से बिना मतलब के बंधन में नहीं रखा था । उसकी बातों से मुझे इतना तो समझ में आ गया था कि सुनी को सचिन पहले से पता था ,बस दोनों की पहचान नहीं थी।

"हमारी क्लास को, दोनों में हराया था इसने । अब हमारी क्लास इसकी पुरानी क्लास को हराएगी।" सुनी उसकी बढाई मम्मी पापा को बता रही थी।

मैं चुपचाप वापस मुड़ने लगा तभी उसके पापा ने मुझे देखा..." अरे...आओ, आओ।" 

" सुनी बैडमिंटन खेलने आएगी क्या...?? बस यही पूछना आया था।" मैं बोला 

"हां खेलेंगे ना !! आज तो सचिन भी खेलेगा, कॉपी देने आया था। अपन तीनों खेलेंगे।" वह बोली 

"ठीक है ।"  मैं इतना ही बोला। यह हमारा... हम दोनों का टाइम था एक साथ रहने का। उसने उसमें उसे शामिल किया, यह किसी भी तरह मुझे पसंद नहीं आया लेकिन यह जताना मुझे गलत साबित कर देता।

"मुझे आता नहीं है खेलते, बैडमिंटन... मुझे सिखाना हां।" घर से निकलते निकलते सचिन ने बड़ी शालीनता से कहा।

"अच्छा आंटी अंकल ...चलता हूं!! " सचिन उनसे विदा लेते हुए बोला। खुद के ऊंचे मैनर्स दिखाने थे उसे शायद 

मुझे उस पर बहुत गुस्सा आया था। यह यहां क्यों आया होगा...??  यह सवाल बार-बार मुझे परेशान कर रहा था। 

अगले एक डेढ़ घंटे में मैं दर्शक था। तनु के घर के सामने के आंगन में दोनों का गेम देख रहा था । उनकी नजरों में मैं वहां होते हुए भी, वहां नहीं था । सच पूछो तो मेरी टाइमिंग गलत हो गई और सचिन को सुनी के साथ समय बिताने का अवसर मिल गया। सचिन इस बार...बस एक बार ही ...उसने अच्छाई की पहचान दिखाते हुए बोला..."अरे... तुम भी खेलो ना.. लो..।" उसने रैकेट आगे की। 

"नहीं तुम खेलो हम क्या... हम तो खेलते ही रहते हैं, बीच-बीच में।"  मैंने कहा और फिर दर्शक बन गया ।उसका सुनी से खेल सीखने का अभिनय करना मेरी समझ में आ गया था। फालतू जोक्स करके वह सुनी को हंसाने की कोशिश करता हुआ बड़ा मूर्ख लग रहा था। आज की शाम जल्द से जल्द खत्म होकर अंधेरा हो जाना चाहिए ऐसा मुझे लगने लगा, क्योंकि वह उसे जिता रहा था और मैं...मैं खुद को हरा रहा था।
🍁🍁🍁🍁

ये दुनिया किसी एक की नहीं...जानता हूं 
अभी मेरा तुझ पर हक़ नहीं... मानता हूं 
पर मेरा जो तुझमें है, वो बस मेरा हो
तुझसे यही...बस यही चाहता हूं।

क्रमशः 
मूल लेखक:- शब्द भ्रमर 
अनुवाद कर्ता :- शब्द सरिता