An incomplete mother - 5 in Hindi Drama by Anjali kumari Sharma books and stories PDF | एक अधूरी मां - 5

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एक अधूरी मां - 5

 राख से जन्मी ममता

अपने नन्हे कलेजे के टुकड़े को खोने के बाद राधा के लिए दिन और रात एक समान हो गए थे। वह कमरे के एक कोने में बैठी रहती, उसकी आँखों के आंसू अब सूख चुके थे और उनकी जगह एक पथरीली खामोशी ने ले ली थी। उसे न भूख लगती थी, न प्यास। उसे लगता था कि शायद उसकी ज़िंदगी का मकसद उसी छोटे से कफन के साथ दफन हो गया है।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
सूरज ने इस बार हार नहीं मानी। वह जो कभी बात-बात पर झुंझला जाता था, अब राधा की परछाईं बन गया था। वह काम से थककर आता, फिर भी बिना शिकायत किए रसोई में जाता, खिचड़ी बनाता और ज़बरदस्ती राधा को एक-एक निवाला खिलाता। वह कहता, "राधा, जो चला गया वो लौटकर नहीं आएगा, पर जो ज़िंदा हैं, उन्हें तुम्हारी ज़रूरत है। क्या तुम उन बच्चों को भी अनाथ कर दोगी जो तुम्हें अपनी माँ मान चुके हैं?"

सूरज की इन बातों का राधा पर कोई असर नहीं होता, जब तक कि एक दोपहर एक अनहोनी नहीं घटी।
राधा ज़मीन पर बेजान लेटी थी, तभी उसे रसोई से कुछ गिरने की आवाज़ आई। वह दौड़कर वहां पहुँची तो देखा कि सूरज की बड़ी बेटी 'मीरा', जो अब किशोरावस्था में थी, गर्म पतीले से जल गई थी। वह हाथ पकड़कर रो रही थी, पर उसने राधा को आवाज़ नहीं दी, क्योंकि वह जानती थी कि उसकी 'छोटी माँ' खुद बहुत बड़े दुख में है।
मीरा को दर्द में देखकर राधा के भीतर की माँ अचानक जाग उठी। सालों से जिस 'सौतेले' शब्द की दीवार ने उसे रोक रखा था, वह पल भर में ढह गई। राधा ने झपटकर मीरा का हाथ पकड़ा और उस पर ठंडा पानी डालने लगी। मीरा ने रोते हुए राधा के गले लगकर कहा, "माँ, आप बात क्यों नहीं करतीं? क्या आप हमें छोड़कर चली जाएँगी जैसे छोटा भाई चला गया?"


राधा का पत्थर सा दिल पिघल गया। उसने पहली बार अपने उन सौतेले बच्चों को सीने से लगाया और जी भरकर रोई। उसे अहसास हुआ कि उसका अपना सगा बेटा भले ही उसे छोड़कर चला गया, पर ये चार बच्चे, और उसका पहला बेटा आर्यन, उसे 'माँ' की नज़रों से देख रहे हैं।
धीरे-धीरे राधा ने खुद को समेटना शुरू किया। उसने अपनी इच्छा के विरुद्ध ही सही, पर उन बच्चों के लिए सुबह जल्दी उठना, उनके कपड़े सहेजना और उनके लिए खाना बनाना शुरू कर दिया। वह अब खुद को व्यस्त रखने लगी ताकि उसे उस सूने पालने की याद न आए।

सूरज यह सब देख रहा था। उसे अपनी पत्नी पर गर्व हो रहा था। अब घर में झगड़े नहीं, बल्कि एक-दूसरे का ख्याल रखने की होड़ लगी रहती थी। बच्चे अब बड़े हो रहे थे; बड़ा बेटा अब घर के कामों में सूरज का हाथ बँटाने लगा था, और बेटियाँ राधा के साथ रसोई में हाथ बँटातीं।
राधा ने समझ लिया था कि उसका नसीब भले ही उसे बार-बार चोट पहुँचाए, पर उसका परिवार ही उसकी असली ताकत है। उसने अपने मायके की बेरुखी और समाज के तानों को पीछे छोड़ दिया।


सब कुछ सामान्य हो रहा था, तभी एक दिन सूरज के दफ्तर से एक चिट्ठी आई। उसमें लिखा था कि सूरज का तबादला (transfer) वापस उसी पुराने गाँव के पास वाले कस्बे में हो गया है, जहाँ से वे भागकर आए थे!


राधा का शरीर यह सुनकर कांप गया। क्या वह उसी खौफनाक अतीत की गलियों में फिर से कदम रख पाएगी? क्या वह बुढ़िया की वह डरावनी चेतावनी सच में खत्म हो गई थी, या नियति ने राधा के लिए कोई और जाल बुना था?