Shrapit ek Prem Kahaani in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 81

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 81

निलु के मन मे कुम्भन का डर सता रहा था । इसिलिए वो अपना हाथ के रस्सी को जल्दी जल्दी खोल लोता हो और जैसे ही अपमे पैर की रस्सी को खोलने जाता है के तभी वहां पर कुंम्भन आ जाता है। कुंम्भन को दैख कर निलु की जान हलक मे आ जाती है। 

 निलु झट से रस्सी को जैसे तैसे लपेटकर वहा पर लेट जाता है और बेहोश होने का ढोंग करता है। तभी वहां पर कुम्भन आ जाता है और निलु को बेहोश दैखकर कहता है। 

" लगता है ये अभी तक मूर्छित है। जब तक ये मूर्छित है मैं जाकर मांतक और त्रिजला को बुलाने का प्रयास 
करता हूँ । "

कुंम्भन निलु की और दैखकर कहता है। 

" क्योकी यही वो मानव है जो मुझे उस दुष्ट तक पहूँचा सकता है । इसका बली देकर मैं नारंग को बुलाऊगां और इसकी आत्मा को नारंग अपने वस मे करके उस मानव का पता पूछूगां जिसके पास पुत्री कुंम्भनी की मणी है। "

 इतनी बोलकर कुंम्भन जोर जोर से हसने लगता है। कुंम्भन की हंसी सुनकर निलु एक दम से सहम जाता है। 

मिलन मन ही मन कहता है :

" ये मेरा बली देना चाहता है और मेरी आत्मा को निकाल कर ....." 

इतना बोलकर वो चुप हो जाता है और कुंम्भन के यहां से जाने का प्रतिक्षा करता है । कुंम्भन यज्ञ मंडप पर बैठ जाता है। जहा पर कुंम्भन के सामने मानल कंकाल , मानव खोपड़ी , एक पात्र मे रक्त और एक हिरण का कटा सर था। 

निलु ये सब अपने आंखो हल्के से खुला रखकर दैख रहा था। कुछ दैर तक यज्ञ करने के बाद निलु दैखता है के कुंम्भन पात्र मे रखे रक्त को उस यज्ञ कुण्ड मे डालने लगता है। 

जैसे हा कुंम्भन ने सारा रक्त उस कुंण्ड मे डाल देता है के तभी एक बहोत तेज आंधी आती है। और वहां पर मौजुद मानव कंकाल और खोपड़ी वहा मे लहराते हूए हवा मे घुमने लगता है। 


कुछ दैर तक ऐसे ही चलता है फिर अचानक से वहा का बहाव कम हो जाता है। और वो मानव कंकाल और खोपड़ी अपने जगह पर आ जाता है। के तभी हिरण का कटा सर उस यज्ञ कुंण्ड के उपर आ जाता है। और जोर जोर से हंसने लगता है और कुंम्भन से कहता है।

" हा...हा हा हा ! महाराज की जय हो कहिए 
 महाराज .... अपने इस दास को क्यों याद किया ? "

कटे सर के इतना कहने पर कुंम्भन उठकर खड़ा हो जाता है। और उस कटे हुए सर से पूछता है।

" हे नारंग बताओ मुझे के मेरी पुत्री की मणी को पाने का क्या मार्ग है। मेरे पास समय बहोत कम है । 
इसिलिए मुझे बताओ के मैं उस मणी तक कैसे पहूँचु ?"

कुंम्भन के इतना कहने पर वो कटा सर कुंम्भन के कान के पास आ जाता है। और धिरे से कुछ कहता है। 

जिसे निलु सुन नही पाता है। निलु को ये सब एक TV सिरियल जैसा लग रहा था। जो जादु की तरह था जिसे दैखकर निलु को अपने आंखो पर भरोसा नही हो रहा था। उस हिरण के कटे सर के कुछ कहने के बाद कुंम्भन जोर से हंसने लगता है और साथ मे वो सर भी हंस रहा था। एक हिरण के कटा हुआ मुह से इंसानी हंसी और बोलने से निलु हैरान था । 

हिरण का कटा सर बापस से यज्ञ कुंण्ड के उपर आता है और एक जोर की हंसी देकर वही पर उस सर के टुकड़े टुकड़े हो जाता है। कुंम्भन उठकर देवी मां के पास जाता है और देवी मां की मूर्ती को प्रणाम करते हूए कहता है।

" हे मां मेरी पुत्री की रक्षा करना । मैं कुछ क्षण मे लौट कर आऊँगा और उस मानव की बली चड़ाउँगा ।"

इतना बोलकर कुंम्भन वहां से गायब हो जाता है। कुंम्भन के गायब होने के बाद निलु अपनी आंखे खोलता है और जल्दी से उस गुफा के कमरे से बाहर आ जाता है । निलु डर से इधऱ उधऱ दैखने लगता है के कही फिरसे कुंम्भन वापस ना आ जाए । 

इतना सौचते हूए निलु कुछ कदम आगे बड़ाया ही था के निलु का नजर एक सुंदर सजावट वाली बाक्स पर पड़ती है जो दैखने मे बहोत ही सुंदर था । निलु बाक्स की सुंदरता को दैखकर उसे दैखता ही रह गया। निलु के कदम अपने आप उस बाक्स की और बड़ा चला जा रहा था। 

उस बाक्स के करीब जाकर निलु रुक जाता है। तो निलु दैखता है के उस बाक्स के अंदर एक बहोत ही खुबसुरत लड़की सोयी हूई थी। जो दैखने मे अप्सरा जैसी थी । उसके पूरे शरीर मे बहु मुल्य रत्न और आभुषणों से सजा था। 

निलु उस लड़की की खुबसुरती को दैखता ही रह गया था वह इस वक्त ये भूल गया था के वह कहां पर हैं। निलु मन ही मन कहता है:

" इतनी सुंदर लड़की कौन है ये। मैने आज तक ऐसी लड़की नही दैखी । "

निलु कुंम्भनी की खुबसुरती को दैखकर कामुक हो जाता है। निलु कुंभ्मनी के पुरे शऱीर को काम नजरो से घुरने लगता है। कुंम्भनी के उभरे वक्ष और गौरे सुंदर नाभी को दैखकर वह बहक जाता है। जैसे ही निलु कुंम्भनी के करीब जाने की कोशीश करता है। निलु को एक अदृश्य शक्ती से जोरदार धक्का लगता है और कुछ दुर जाकर गिरता है। 

निलु अब काम वासना से बाहर आ चुका था । निलु को अब कुंभ्मन का डर सताने लगा था वह दर्द से कराहते हूए उठता है और कहता है :

" ये मुझे क्या हो गया था । अगर मैं कुछ यहां पर कुछ दैर और ठहरा तो कुंम्भन मुझे दैख लेगा और मेरा बली आज ही चड़ा देगा । "

निलु लड़खड़ाते हुए उठता है लंगड़ाते लंगड़ाते भागने लगता है। उसके शरीर मे काफी ज्यादा चौंटे थी जिस वजह से वह ठीक से चल नही पा रहा था ।

निलु अब अपने उस पल से इस पल मे चला आता है जहां पर निलु दक्षराज और दयाल को अपने साथ हूई धटना को बोलकर सुना रहा था । निलु की बात को सुनकर दक्षराज और दयाल दौनो के मानो पैरो तलो से जमीन खिसक गई हो। 

क्योकी कुंभ्मन अब निलु की मालिक यानी दक्षराज को ढुंड रहा था। निलु दक्षराज से कहता है। 

" मालिक वो देत्य सच मे बहोत भयानक है मालिक । मुझे कही छुपा लिजिए मालिक वरना वो ...वो मुझे फिर से ढुंड लेगा और ले जाकर मेरा बली चड़ा देगा। और फिर वो आपको भी तो ढुंड रहा है। "

 निलु रोते हूए कहता है:

" कुछ किजिए मालिक । वरना हम सब मारे जाऐगें। "


दक्षराज निलु के सर पर हाथ रखकर कहता है:

" तु बिल्कुल भी चिंता मत कर निलु । तुम अब यही 
इसी हवेली के अंदर रहोगे और जबतक मैं ना कहूँ हवेली से बाहर आने की गलती नही करना क्योकी कुंम्भन ने तुम्हें पहचान लिया है। और अगर वो दोबारा से तुम तक पहूँचे तो फिर हम सब मारे जाऐगें। "


निलु दक्षराज से कहता है:

" मालिक ! आपसे एक बात पूछु ? "

निलु के ऐसा कहने से दक्षराज कहता है:

" हां बोलो क्या बात है। "

निलु डर से कहता है :

" मालिक ! क्या उस देत्य कुम्भन की बेटी का मणी आपके पास है ? "

निलु के इतना पूछने पर पहले तो दक्षराज कुछ दैर तक चुप रहता है। फिर निलु से कहता है:

"तुझे क्या लगता है निलु ?"

 निलु कहता है:

: वो सब तो मैं नही जानता मालिक पर मैं इतना जरुर 
जान गया हूँ के कुंम्भन बुरा नही है। वह यहां पर मजबूरी मे आया वह अपनी बेटी को बचाने के लिए आया है। उसने तो यहां तक कहा के अगर मणी उसे मिल जाऐ तो वह अपनी बेटी को जिवित करके यहां से चला जाएगा और मणी देने वाले को जिवन दान देगा । "

".हमने उस बेचारे कुंम्भन पर बहोत ही ज्यादा अन्याय 
किया है । मालिक अगर आपको पता है के वो मणी कहां है तो कृप्या आप उसे कुंभ्मन के पास लौटा दिजिए । यही हमारे गांव और सभी के लिए अच्छा होगा। "

निलु की बात को सुनकर दक्षराज कहता है:

" ये तु क्या बकवास किये जा रहा है तबसे मणी को लोटा दो । मणी को लौटा दो । अरे कौन सा मणी 
किसकी मणी ! अगर दोबारा से यही बकवास किया ना तो कुंम्भन क्या मैं ही तेरी जान ले दुगां। ".

अब मैं जो कहूँ उसे ध्यान से सुन इस कमरे से बाहर नही निकलना । जब तक मैं ना कहूँ तुम यही पर रहोगे। क्योकी कुंभ्मन ने दौ और देत्य को भी बुला लिया है। 

" जो पक्षी बनकर हमारे घर के उपर तो गांव के किसी और घर के उपर मे भी बैठ कर वो सब पर नजर रख 
रहा है। ऐसा लग रहा है के ये कली युग देत्य युग आ गया है। इतने सारे देत्य वो भी एक मणी के लिए। "

दयाल दक्षराज से कहता है:

" मालिक ये सब सिर्फ मणी के लिए नही आए है। ये सब उस को ढुंडकर कुंम्भनी को फिर से जिवन देने के 
लिए के आए है। और अगर ये मणी को सही वक्त रहते नही ढुंड पाते या हम सब इन्हें यहां से भगा नही देते तो ये देत्य हमारे इस पूरे गांव या फिर सभी पृथ्वी वासियो तो जान से जान से मार देगा। "

" और पृथ्वी एक बार फिर देत्यो के राज्य मे आ जाएगा। "

दयाल की बात सुनकर दक्षराज एक गहरी चिंता मे पड़ जाता है। दयाल फिर अपनी बात को जारी रखते हूए कहता है:

" मालिक ! ये वक्त सौच मे का नही है । हमे जल्दी से अघोरी बाबा के पास जाना चाहिए । और उनसे इन देत्यो से हमेशा की छुटकारा पाने का कोई उपाय पूछनी चाहिए । "

To be continue.....1565