छत पर गोलियों की आवाज़ लगातार गूंज रही थी।
“मारो साले को!!”
राजू भाई के आदमी चारों तरफ फैल चुके थे।
लेकिन अर्नब…
घबराया नहीं।
उसकी आँखें बिल्कुल शांत थीं।
जैसे ये सब पहले से उसके दिमाग में चल रहा हो।
धाँय!!
एक और गोली चली।
भागता हुआ आदमी छाती पकड़कर नीचे गिर गया।
खून छत पर फैलने लगा।
“पीछे से घेरो इसे!”
एक गुंडा चिल्लाया।
अर्नब तेजी से पलटा…
पास पड़ी लोहे की कुर्सी उठाकर पूरी ताकत से उसकी तरफ फेंकी।
कुर्सी सीधे उसके चेहरे पर लगी।
आदमी रेलिंग से टकराकर नीचे जा गिरा।
बाकी लोग एक पल को रुक गए।
डर।
पहली बार उनके चेहरों पर डर दिख रहा था।
क्योंकि सामने कोई लड़का नहीं था…
कोई और चीज़ थी।
अर्नब धीरे-धीरे राजू भाई की लाश के पास गया।
नीचे बैठा।
उसकी सोने की मोटी चेन उतारी…
और अपनी जेब में रख ली।
फिर राजू भाई की खुली आँखों में देखते हुए बोला—
“शिवपुर में डर खत्म नहीं होता…
बस चेहरा बदलता है।”
तभी पीछे से गोली चली।
अर्नब झुका।
गोली दीवार में लगी।
वह बिजली की तेजी से आगे बढ़ा और उस आदमी का हाथ पकड़कर मोड़ दिया।
चक्!
हड्डी टूटने की आवाज़ आई।
आदमी चीखा—
“आआआह्ह्ह!”
अर्नब ने उसी के हाथ की पिस्टल उसके मुँह में डाल दी।
धाँय!!
खून दीवार पर फैल गया।
छत पर खामोशी छा गई।
बाकी आदमी पीछे हट गए।
अर्नब ने उनकी तरफ देखा।
“जिसे मरना नहीं…
वो रास्ते से हट जाए।”
कोई आगे नहीं बढ़ा।
क्योंकि सब समझ चुके थे—
राजू भाई मर चुका था।
और शिवपुर में नया जानवर उतर चुका था।
नीचे सड़क पर लोग गोलियों की आवाज़ सुनकर इकट्ठा होने लगे थे।
तभी बिल्डिंग के पीछे एक काली बाइक आकर रुकी।
अर्नब पीछे की सीढ़ियों से नीचे उतरा।
उसके कपड़ों पर खून लगा था।
लेकिन चेहरे पर वही शांति।
बाइक पर बैठा आदमी बोला—
“बहुत जल्दी कर दी तूने।”
अर्नब पीछे बैठ गया।
“डर गया क्या?”
बाइक तेज़ी से अंधेरी सड़क पर निकल गई।
कुछ देर खामोशी रही।
फिर बाइक वाला बोला—
“अब पूरा शिवपुर तेरे पीछे आएगा।”
अर्नब हल्का सा मुस्कुराया।
“मैं भी तो उसी के पीछे आया हूँ।”
उसी रात।
शिवपुर पुलिस मुख्यालय।
कमरे में तनाव भरी खामोशी थी।
टेबल पर राजू भाई की खून से सनी फोटो रखी थी।
कमिश्नर गुस्से में चिल्लाया—
“दिनदहाड़े शहर का सबसे बड़ा आदमी मार दिया गया…
और किसी को कुछ पता नहीं?!”
कोई जवाब नहीं देता।
तभी कमरे के कोने में बैठा एक आदमी फोटो को ध्यान से देख रहा था।
काले कपड़े।
तेज आँखें।
चेहरे पर हल्की दाढ़ी।
एसीपी कबीर राठौड़।
शिवपुर पुलिस का सबसे खतरनाक officer।
बाकी पुलिस वाले जहाँ कानून से काम करते थे…
वहाँ कबीर नतीजों से काम करता था।
उसने धीरे से फोटो उठाई।
राजू भाई का गला एक ही वार में कटा था।
कबीर हल्का सा मुस्कुराया।
“जिसने भी किया है…”
उसने सिगरेट जलाई।
“…वो पहली बार खून नहीं कर रहा।”
कमिश्नर उसकी तरफ मुड़ा।
“मिल जाएगा?”
कबीर ने धुआँ छोड़ा।
“अगर वो छिपना चाहता…
तो इतने लोगों को जिंदा नहीं छोड़ता।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कबीर की नजर फोटो पर थी।
“उसने जानबूझकर खबर फैलाई है।”
“क्यों?”
कबीर की आँखें ठंडी हो गईं।
“क्योंकि वो चाहता है…
शिवपुर उसका नाम सीखे।”
उसी समय।
शहर के दूसरे कोने में।
एक पुराने गोदाम के अंदर।
करीब बीस लोग खामोश खड़े थे।
बीच में कुर्सी पर बैठा था—
सुल्तान मिर्ज़ा।
सफेद कुर्ता।
सफेद दाढ़ी।
धीमी आवाज़।
लेकिन पूरे शिवपुर में उससे ज्यादा खतरनाक आदमी कोई नहीं था।
एक आदमी बोला—
“राजू खत्म हो गया।”
सुल्तान ने आँखें बंद रखीं।
“किसने किया?”
“नाम नहीं पता।”
“चेहरा?”
“नया लड़का है।”
कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर सुल्तान ने धीरे से आँखें खोलीं।
“नया लड़का…”
उसने हल्की मुस्कान दी।
“…या नई मुसीबत?”
तभी पीछे खड़ा आदमी डरते हुए बोला—
“भाई… लोग कह रहे हैं उसने अकेले सात आदमी मार दिए।”
सुल्तान ने चाय का कप उठाया।
“शिवपुर में दो तरह के लोग जल्दी मरते हैं।”
“एक… जो बहुत डरते हैं।”
उसने कप नीचे रखा।
“दूसरे… जो बिल्कुल नहीं डरते।”
गोदाम में सन्नाटा फैल गया।
और उसी सन्नाटे के बीच…
पहली बार एक नया नाम धीरे-धीरे पूरे शिवपुर में फैलने लगा।
अर्नब।