Guru's city and plane hijacking in Hindi Short Stories by Devendra Kumar books and stories PDF | गुरु की नगरी और विमान अपहरण

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गुरु की नगरी और विमान अपहरण

गुरु की नगरी, अमृतसर  ने जितने अच्छे बुरे अनुभव उतराव चढाव देखे है,  विश्व के बिरले ही नगरों  ने देखे होंगें. ज्यादा पुराना नहीं है यह नगर  केवल साढ़े चार वर्ष पुराना ही तो है, जब इसे चौथे सिक्ख  गुरु राम दास जी ने इसे पवित्र अमृत  सरोवर के इर्दगिर्द बसाया था. उन्होंने ही पहले अमृत सरोवर को  खुदवाया था और वहीँ पवित्र हरमंदिर साहेब का निर्माण कराया था, जिसकी नींव एक मुस्लिम संत हज़रत मियाँ मीर से रखवाई थी. बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने सोने की परत चढवा कर इसे स्वर्ण मंदिर अर्थात  गोल्डन टेम्पल के नाम से प्रसिद्धि दिलवाई थी. यह अब संसार में सिक्खों  की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र व तीर्थ स्थल है.

इस शहर ने अनेक त्रासदियाँ और दर्दनाक घटनाएं बहादुरी से झेली है, चाहे भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा जलियांवाला नरसंहार हो, चाहे  बंटवारे के समय हुये हत्या कांड और विस्थापन या  बर्बादी. बाद में जून 1984 में ‘ब्लू स्टार’आर्मी ऑपरेशन की सैनिक कार्रवाही, जिसमें पवित्र तीर्थ स्थल से अलगाववादी  जरनैल सिंह  भिंडरांवाले के उग्रवादियों  के कब्ज़े से छुड्वाया गया था. आर्मी इसे फौजी सफलता मान सकती है परन्तु इसके दूरगामी भयंकार दुष्परिणामों के मद्देनज़र देश में यह एक बहुत बड़ी भूल हो गयी थी, जिसका बड़ा खामियाजा हमारे देश को भुगतना पड़ा.

इस आर्मी ऑपरेशन में सैकड़ों लोग मारे गए थे तथा स्वर्ण मंदिर के कुछ हिस्सों विशेष रूप से अकालतख़्त में बहुत नुकसान हुआ था. असल में आर्मी से बर्खास्त मेजर जनरल शाबेग सिंह ने स्वर्ण मंदिर में काफी ज़बरदस्त किलेबंदी की हुई थी, बहुत अधिक हथियार इकट्ठे किये हुए थे. इस ऑपरेशन से तथा इसके लिए आदेश देने वाली प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी से सिख समुदाय बेहद नाराज़ हुआ था. उसके बदला लेने के लिए ही 31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधान मन्त्री श्रीमति इंदिरा गांधी की उसी के सिख अंगरक्षको बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने उनकी  निर्मम  हत्या की थी. हालाकि इस ऑपरेशन में वहीँ अन्दर मौजूद दमदमी टकसाल के मुखिया भिंडरावाले, आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के अमरीक सिंह तथा मेजर जनरल शाबेग सिंह मारे गए थे तथा 10 दिन लम्बे चले इस फौजी  ऑपरेशन में आर्मी ने टैंक तक इस्तेमाल किये थे . आर्मी से वहां गंभीर टैक्टिकल गलती भी  हुई थी. उन्हें अंदाज़ा ही नहीं था कि वहां कितने हथियार हैं, कितनी तैयारी है ? मंदिर  परिसर में अलगाववादी कितने तैयारी से हैं? अर्थात खुफिया जानकारी का नितांत अभाव था. इसीलिए  वहां दस जैसा अधिक  दिन लगे. इतनी  जान माल की बड़ी हानि के अलावा इस ‘ब्लू स्टार ऑपरेशन’ के लम्बे समय तक दुष्परिणाम देश को तथा विशेष रूप से पंजाब को भुगतने पड़े थे. देश में बहुत से स्थानों पर भयंकर खून खराबा हुआ था. एक तरफ सिख भावनाएं भड़की फिर श्रीमति इंदिरा गाँधी की सिख अंगरक्षकों के द्वारा हत्या के बाद  बड़े स्तर पर जो सिक्खों का नर संहार हुआ, लूट पाट हुई तथा कार्रवाही की  गयी, तथा फिर दशकों तक सामान्य स्थिति बहाल नहीं हो सकी थी.  इसके कारण किस तरह हिन्दू व सिक्खों फ़ालतू का  मन भेद हुआ, सैकड़ों गुरूद्वारे ज़ला दिए गए, दुनिया भर में बदनामी हुई, वह बहुत दुखद वह शोचनीय है.

 पाकिस्तान न इस बात का भरपूर लाभ उठाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, अलगाववादी आतंकियों को खूब उकसाया, आश्रय दिया, ट्रेनिंग दी, हथियार दिए, धन दिया, और उनसे अपराध  कराये, अपराध करने के बाद वापिस अपने यहाँ छुपाया, पाक की दुर्दांत आईएसआई  सिक्ख  अलगाववादियों और आतंकवादियों  की बड़ी हिमायती और मददगार बन गयी थी, उन्होंने ही कश्मीर के आतंकवादी संगठनों और सिक्ख अलगाववादियों को आपस में मिला कर पंजाब और कश्मीर दोनों में अशांति का माहौल पैदा कर दिया था. अपराधियों को पाक के रास्ते से कनाडा, यूएसए, यूंके तथा अन्य स्थानों पर जाने में मदद की. अपराधी इन देशों में गुरूद्वारे में शरण लेते तथा सिख कौम और अलग खालिस्तान की मांग के समर्थन में धन  इकट्ठा करते. इस तरह एक लोकल समस्या अब अंतर्राष्ट्रीय आन्दोलन बनती चली गयी और पाकिस्तान इन सिरफिरे भारतीयों की मदद से हमारे देश को जख्म देता रहा प्रॉक्सी वॉर लड़ता रहा.

अस्सी का दशक पंजाब में सबसे बड़ी समस्या का रहा, दिन में पुलिस राज, रात में अलगाववादी खाड़कू राज, डर कर हिदुओं ने अपनी ज़मीन जायदाद औने पौने में बेच कर सुरक्षित स्थानों में जाना ठीक समझा. लम्बे समय तक राष्ट्रपति शासन रहे, अर्ध सैनिक बलों की संख्या विशेष रूप से सीआरपीएफ की संख्या वहां बढ़ती ही चली गई, अमृतसर में सीआरपीएफ के नए आईजी आये  थे, सुपरकॉप केपीएस गिल जो असम कैडर से थे, उस समय पंजाब के डीजीपी नियुक्त किये गए थे दूसरे मशहूर सुपरकॉप जे एफ रिबेरो, जो मुम्बई के पुलिस कमिश्नर रह चुके थे तथा लम्बे समय तक सीआरपीएफ में भी रह चुके थे. दोनों ने मिल कर हर जिले में एस.पी. (ऑप्स) की नई पोस्ट बनाई और छांट कर  सीआरपीएफ व कुछ अन्य फ़ोर्स को एस.पी (ऑपरेशन)के पद पर  नियुक्त किया. अब खाडकू मुकाबले से बचने लगे थे. पुलिस के टूटे मनोबल  को दुबारा स्थापित करने पर जोर दिया. धीरे धीरे पुलिस का मनोबल बढ़ता रहा उन्होंने अलगाववादियों  की हिंसा को बेदर्दी से कुचलना शुरू किया, अब उनको अपने ऊपर वाले अफसरों पर भरोसा था कि वे उनके साथ हैं, जिन अधिकारियों ने आगे बढ़ कर रिजल्ट दिए उन्हें समय से पहले प्रमोशन दिया जाता, पुलिस प्रशासन  अच्छा रिजल्ट मिलने पर तुरंत पुरस्कृत करता, कई अच्छे इंस्पेक्टर रातों रात डी.एस.पी यहाँ तक एस.पी  तक बना दिए गए  थे. अच्छे रिजल्ट के लिए कुछ ज्यादती भी  हो जाती तो उस के लिए माफ़ी गलती थी. पहले पुलिस का मनोबल इसलिए भी गिरा हुआ था क्योंकि अगर  खूंखार अपराधी या उग्रवादी को खतरा उठा कर पकड़ कर लाते थे तो उनके विरुद्ध कोई गवाही के लिए राज़ी नहीं होता, मजिस्ट्रेट व जज उन्हें  जमानत देने में एक मिनट भी नहीं लगाते थे, उन्हें अपनी व अपने परिवार की सेफ्टी सिक्यूरिटी का डर सताता रहता था. एक जिला जज ने तो साफ़ कह दिया था कि ‘नार्मल लॉ नार्मल समय के लिए है और ये नार्मल समय नहीं है.’

 उन्ही दिनों अक्तूबर 1986 में  हथियार बंद आतंकियों ने पुलिस ड्रेस में आकर, जालंधर केंट में पंजाब आर्म्ड  पुलिस हेड क्वार्टर में ही  घुस कर वहां ठहरे तत्कालीन पुलिस महानिदेशक जूलियो रिबेरो और उनकी पत्नी पर जानलेवा हमला किया, जिसमें वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे और दो सिपाही मारे गए थे. कई अन्य पुलिस अधिकारी भी जख्मी हुए थे. घटना का अंजाम देकर हमलावर वहां से निकलने में भी कामयाब भी हो गए थे. जब यह हुआ केपीएस गिल सीआरपीएफ के महानिदेशक बन कर चले गए थे, उन्हें फिर पंजाब का डीजी बना कर दोबारा बुलाया गया .

गिल साहेब ज़बरदस्त फील्ड अफसर थे ही उन्होंने ‘बुलेट फॉर बुलेट’ नीति अपनाई और दुर्दांत आतंकवादियों को कोर्ट कचहरी में नहीं, बल्कि  एनकाउंटर में ढेर करने की बोल्ड पालिसी अपनाई. सुना जाता है कि उन्होंने पद ग्रहण से पहले सरकार को स्पष्ट कर दिया था कि अगर पंजाब को बचाना है तो उन्हें उनके तरीके से काम करने दिया जाये. कोई दखलंदाजी ना की जाए. पोस्टिंग. प्रमोशन आदि  भी वो अपनी मर्ज़ी से करेंगें क्योंकि वहां सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलने वाला.’

 देखा जाए उन दिनों वे पंजाब के बेताज प्रशासक बन गए थे. बहुत कम बोलते थे पर उनके दिमाग में बेहतरीन स्पष्टता थी. छांट कर उन्होंने एसएसपी बनाये, छांट कर एसपी ऑपरेशन, यहाँ तक एसएचओ लेवल तक वे सीधे ध्यान करते थे, बहादुर रिजल्ट दिखाने पर तुरंत प्रमोशन या रिवॉर्ड तथा कोताही करने पर तुरंत एक्शन लेते थे . अगर किसी से गुड फैथ में कुछ गलती हो जाए उस को वे बचाते थे. पहले पुलिस का कोई स्पष्ट माई बाप नहीं था अब निर्विवाद उनके कंधे पर गिल साहेब का हाथ था. यही  उनकी लीडरशिप का स्टाइल था. उन  दिनों में पंजाब में दो आतंकी संगठन खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स ( के.सी.एफ) और बब्बर खालसा इंटरनेशनल(बी.के.आई.)  बहुत ज्यादा  सक्रिय थे, दोनों को ही पाकिस्तान और उनकी आईएसआई  से पूर्ण समर्थन, हथियार पैसा, बॉर्डर की आवाजाई सब में खुलकर सहायता मिल रही थी. उस समय लगता था कि पंजाब में अब कभी शांति नहीं आएगी और एक डर सब को सताने लगा था कि ये सिरफिरे खालिस्तान के समर्थक खून खराबे कर कहीं भारत से अलग खालिस्तान ही न बनवा कर छोड़ें? उन दिनों हिंसा, लूटपाट, अपहरण का बाज़ार गरम था, कोई दिन ऐसा नहीं होता था के डेढ़ सौ दो सौ  लोगों की हत्या न हो रही हो.

1986 आते आते अलगाववादी समर्थक लोगों ने दोबारा से स्वर्ण मंदिर में  फिर से कब्ज़ा सा कर लिया था पर भारत सरकार ने इस बार 30 मई की रात में एनएसजी के कमांडो को चुपचाप बुला कर ऑपरेशन आरम्भ किया और एक मई की सुबह को 122 संदिग्ध लोगों ने आत्मसमर्पण भी करा  दिया था. इस ऑपरेशन  ‘ब्लैक थंडर 1 में न किसी की मौत हुई न ही परिसर की किसी सम्पति का  नुकसान हुआ था, बहुत साफ़ सुथरे ढंग, तेजी से किया गया था कि संदिग्ध सिरफिरे लोगों के पास आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई उपाय ही नहीं था. इसमें पंजाब पुलिस के डी.जी. गिल महोदय ने भी बड़ी भूमिका निभायी थी. दोबारा ऑपरेशन के कारण  उस समय के चीफ मिनिस्टर सुरजीत सिंह बरनाला की बड़े सिख लीडरों द्वारा खूब भर्त्सना की गयी थी.

 खैर, आतंकी कहाँ आसानी से मानने वाले थे, हिंसक घटनाएँ रूक नहीं रही थी, सिख आतंकवादी संगठन खालिस्तान कमांडो फ़ोर्स के आतंकियों ने सेवा निवृत आर्मी जनरल ऐ एस वैद्य की पूणे में  जाकर हत्या की जिसे ब्लू-स्टार ऑपरेशन का बदला बताया गया था .

रहती, सो मई 1988 में एक बड़ा ऑपरेशन केंद्रीय सरकार के तहत प्लान  किया गया,  स्वर्ण मंदिर का एक सैंड मॉडल एनएसजी के मानेसर के कैंप में रिहर्सल के लिए तैयार किया गया. वहां अच्छी तरह से रिहर्सल की गयी. इस बार मुख्य मुद्दा था  कि ब्लू स्टार की तरह स्वर्ण मंदिर कोई खून खराबा बिलकुल नहीं होने देना था.

सो केपीएस गिल ने, इस ऑपरेशन जिसे ब्लैक थंडर 2 का नाम  दिया गया था, को बहुत सावधानी  से लागू किया था, मंदिर की घेरा बंदी सीआरपीएफ और पंजाब  पुलिस द्वारा कर दी गयी थी. स्वर्ण मंदिर की सब सप्लाई, बिजली, पानी, खाना सब्जी आदि काट दिए गए थे, एनएसजी के आने पर ऊँचे स्थानों पर उनके स्नाइपर  तैनात कर  दिए गए थे, मीडिया को कवर करने की पूरी छूट दी गयी थी ताकि पूरी पारदर्शिता रहे. अन्दर क्या हो रहा उसकी इंटेलिजेंस द्वारा पूरी जानकारी मिल रही थी. चार पांच दिन में ही बिना राशन पानी बिजली आतंकियों और उनके समर्थकों का धैर्य टूटने लगा था. ज़रा सा भी बाहर दिखने पर स्नाइपर का फायर उन पर आता था.

  पंजाब पुलिस के डीआईजी एस एस विर्क जब आतंकियों को पुलिस सहयोग करने के लिए बातचीत कर रहे थे आतंकियों के साथ फ़ायर एक्सचेंज में उनके ज़बाड़े में गोली लगी और वे बुरी तरह ज़ख्मीं हो गए थे.फिर एक सीज फ़ायर एलान से आतंकियों को सरेंडर के लिए खाली हाथ ऊपर उठा कर आने का सुझाव दिया गया था, अंततः भूखे प्यासे लगभग 200 आतंकियों ने सरेंडर कर दिया और   ब्लैक थंडर ऑपरेशन बेहद सफल रहा. इसकी सफलता ने आतंकवादियों की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी थी, उनका मनोबल टूट गया था तथा पुलिस को बहुत समय बाद आम पब्लिक का सहयोग मिलने लगा था.

 अगले कुछ वर्षों में स्थिति में काफी सुधार दिखने लगा था. इसका बहुत श्रेय गिल साहेब को था, उन्ही की देखरेख में  मुश्किल हालात के होते हुए भी 1992 में इलेक्शन हुआ, जो अपने में एक बहुत बड़ा और जोखिम भरा था, यह सामान्य स्थिति के लिए अगली बहुत बड़ी उपलब्धि मानी गयी थी.  खाड़कूओं  के भय के कारण वोटिंग प्रतिशत कम रहा था, केवल तेईस प्रतिशत फिर भी एक चुनी हुई सरकार सरदार बेअंत सिंह के नेतृत्व में बनना प्रजातंत्र शासन के लिए बहुत बड़ा कदम था. यह एक बहुत बडी चुनौती थी क्योंकि अलगाववादी खाड़कू यह बिलकुल नहीं चाहते थे, उन्होंने इसे बायकाट करने का एलान भी किया था लोगों को खूब डराया धमकाया भी था. वे  इसे हिंसा तथा तोड़ फोड़ कर किसी भी कीमत पर इसे  विफल करने के लिए कटिबद्ध थे, यह उनकी पुलिस से भी जोर आजमाईश भी थी,जिसमें खाड़कू हारे उनका मनोबल अब तेज़ी से टूटने लगा था. शांतिप्रिय जनता की विजय हुई थी. देखा जाय कितनी भी बुरी परिस्थिति थी या ब्लू स्टार की नाराज़गी थी, पंजाब के ज्यादातर सिक्ख कभी भी भारत से टूट कर अलग नहीं होना चाहते थे, भले ही और स्वायत्तता ज़रूर चाहते रहे हो सकते थे.

 धीरे धीरे पंजाब में  शांति आती जा रही थी, इस से पाकिस्तान की आईएसआई के पेट में दर्द हो रहा था, खालिस्तान समर्थक संगठन अभी भी हार नहीं मानने को तैयार नहीं थे, पुलिस उन्हें ढूंढ ढूंढ कर खत्म  कर रही थी जिसके लिए  पुलिस ने एक नायब ‘केट ऑपरेशन’ द्वारा  खूंखार से खूंखार आतंकियों को गिरफ्त में किया. केट में व आतंकी होते थे जो पकडे जाने पर बचने के लिए पुलिस से सहयोग करने के लिए तैयार हो जाते थे, फेस ढाप कर आतंकी को दिखा कर उनकी पहचान करने उनके ठिकाने ले जाकर उनको पकडवाने, उनकी प्लान आदि के बारे में पता देते थे. पुलिस इनका खुल कर इस्तेमाल करती. इनको एवेज में  सिक्यूरिटी  व अच्छा पैसा इस काम के लिए दिया जाता था, बड़े आतंकियों को पकडवाने के लिए अच्छा खासा  पैसा पुलिस  से उनको मिल जाता  था. इनकी मदद से  बहुत उग्रवादियों को पकड़ा या एलिमिनेट किया जा रहा था.

कहना नहीं होगा ऑपरेशन ब्लैक थंडर व विधान सभा चुनाव  के बाद तो अलगाववादियों और उनके आन्दोलन में तेज़ी से कमी आने लगी थी. डी जी  गिल साहेब ही पंजाब के सबसे शक्ति शाली व्यक्ति  हो चुके थे. पुलिस और खालिस्तानी आतंकियों की खूनी लुका-छिपी, पकडम  पकड़ा, जोर आज़माईश का खेल निरंतर चलता जा रहा था. अभी तक  बहुत से आतंकी सक्रिय थे, आईएसआई के भरोसे आन्दोलन चल रहा था वरना अब तक कमर टूट जाती.  पंजाब के राज्यपाल सुरेन्द्रनाथ भी  स्वयं पुलिस अधिकारी रह चुके थे.पंजाब में यह एक बहुत अच्छा  टर्निंग पॉइंट सिद्ध हुआ था. आईएसआई में निराशा आई थी अब वे पंजाब और कश्मीर में कुछ बड़ा करने की फ़िराक में थे जिससे आन्दोलन में दोबारा जान डाली जाए.

इस पृष्ठ भूमि में देखने से बात समझ में आती है कि पंजाब में असली परिवर्तन तब  शुरू हुआ था, उधर  घाटी में वहां के आतंकी ग्रुप पाकिस्तान और वहां की बदनाम आईएसआई  को यह पच नहीं रहा था, पंजाब में  भारी संख्या में उनके खाड़कू  पुलिस एनकाउंटर में मारे जा रहे थे. पकडे जाने पर  अनेक खाड़कूओं  ने सायनाईड खा कर पुलिस कस्टडी में आत्म हत्या की, पुलिस को  के पी एस का वरदहस्त प्राप्त था. बब्बर खालसा के दो  खतरनाक  खाड़कू सुखदेव सिंह बब्बर तथा तलविंदर सिंह सिंह परमार को पुलिस ने मार गिराया था.

उन दिनों मैं भी पंजाब में भारत की एक शीर्ष बाह्य ख़ुफ़िया एजेंसी के ब्यूरो का इन्चार्ज़  था. हम भी बहुत महत्वपूर्ण सूचनाएं पुलिस व प्रशासन को दे रहे थे जिनसे बहुत से छोटे बड़े ऑपेरशन किये जा रहे थे, आईएसआई यह सब पचा नहीं पा रही थी, उनके किये कराये पर पानी फिर रहा था. पंजाब से पहले मैं यही काम कश्मीर में भी  कर  श्रीनगर के बाद अमृतसर में तैनात किया गया था तो मुझे दोनों जगह के दहशतगर्दों की अच्छी जानकारी थी तथा हम आईएसआई  के संचार तन्त्र को भी मोनिटर कर ते आ रहे थे, जिससे बॉर्डर क्रॉस करने वाले बहुत ज्यादा खाड़कू और पाकिस्तानी  सोर्स आदि पकडे जा रहे थे. ऐसा नहीं था कि वो हमारे बारे में भी काफी ख़ुफ़िया जानकारी जान जाते थे यहाँ तक की मेरी गाडी किस बॉर्डर पोस्ट पर जा रही है तथा अन्य बहुत कुछ, हमारे यूनिट भी चुपचाप उनका दूरसंचार मोनिटर  कर पा रहें थे. उनको शुरू में काफी दिन  यह पता नहीं चलने दिया गया  था.

 यहाँ एक मनोरंजक बात अब 36 वर्ष बता सकता हूँ कि उन्होंने मेरा ‘कोड नेम’ मामा रखा हुआ था और वे अपने आदमियों को हिदायत देते सुने जाते थे कि ‘आज  मामा फलां जगह  है, शायद उनके सोर्स  हमारी गाड़ी  के मूवमेंट पर कैसे नज़र रख पा रहे थे, उसके लिए  हमने भी ब्लफ करने के जिस जगह जानो हों वहां  से दूसरी दिशा में अपनी गाडी किसी स्टाफ के साथ भेजत दिया करता  और जहाँ जाना हो वहां कोई अन्य गाड़ी में चले जाते थे. बचपन के चोर सिपाही वाला खेल अब बड़े होने पर आईएसआई  के साथ खेला जा रहा था. अपने लिए ‘मामा’ जान कर बड़ा मज़ा आता था, पता नहीं पाकिस्तान में किसने यह कोड नेम मेरे लिए छांटा होगा.   

इन हालातों में 24 अप्रैल 1993 की शाम को कभी भी भुला नहीं सकता, वह एक नार्मल शाम थी दिन में रूटीन काम किया था, स्टाफ अपने अपने घर निकलगए थे, मेरी बड़ी बेटी का सोलहवां जन्मदिन था जिसको मनाने के लिए उसने कई दिन से तैयारी की हुई थी, गुब्बारे आदि लटका कर कुछ दिवाली की लाइट की लड़ियाँ लगा कर ड्राइंग रूम सजाया हुआ था, उसके मित्र अन्य कुछ मित्रों के  परिवार भी बुलाये हुए थे, सात साड़े सात तक लोगबाग इकट्ठे हो गए थे, सनेक्स सॉफ्ट ड्रिंक आदि सर्व किये जा रहे थे बच्चे बच्चों में मग्न थे, बड़े बड़ों में. बातचीत के  शौक़ीन डिस्ट्रिक्ट जज अमर दत्त जी अपने किस्से सुना रहे थे, उनके कोर्ट में एक पंजाबी अमृतसरी सिख महोदय का उस दिन का एक  मुकदमा था जिसने एक अंग्रेज टूरिस्ट महिला के साथ उस अपराधी ने ज़बरन बलात्कार का प्रयास व  दुर्व्यवहार किया था, जब उससे जज साहेब ने ऐसा करने का कारण पूछा, तो अभियुक्त ने हडबडा कर उन्हें उत्तर  दिया था,“जनाब, ज़लियाँ वाले बाग  का बदला ले रहा था.” और भी कई मजेदार किस्से लोग सुना रहे थे, ठहाके लगा रहे थे महिलाए अपनी बच्चे अपनी तरह से लगे थे कि एक क्रैश सिग्नल मुझे  मिला कि इंडियन एयर लाइन का एक एरोप्लेन दिल्ली से श्रीनगर  जाते हाईजैक हो गया है जो अमृतसर के राजासांसी एअरपोर्ट पर पहुंचा हुआ है, साथ साथ  तभी टेलीफोन की घंटी भी बजी और मुझे एअरपोर्ट पहुँच कर हेड क्वार्टर से संपर्क रख कर  पूर्ण सूचित रखने के लिए आदेश दिया गया था.

 मेरे ऑफिस कम रेजिडेंस (ओ सी आर) में कुछ कर्मचारी अभी मौजूद थे, कुछ जा चुके थे, उनमें से कुछ मुख्य सहयोगियों को ऑफिस में मौजूद रहने के लिए बताया तथा साथ  में दो  सहयोगियों को तुरंत ऑफिस मैं बुला लिया था. पत्नी को यह बता कर कि बहुत अर्जेंट ड्यूटी पर जाना है, मेरा इंतज़ार न कर बर्थडे मना लें. बेटी मेरे जाने से दुखी दिख रही थी.

 एक ऑफिसर को अपने साथ ले  मैं  एअरपोर्ट  पहुँचा, वहां एसएसपी  अमृतसर पहले से  मौजूद थे और  डीजी केपीएस गिलमहोदय से फ़ोन पर बातचीत कर रहे थे, मैंने सुना गिल साहेब उन्हें हिदायत दे रहे थे-“किसी भी हालात में अपहृत जहाज को ईंधन न दिया जाये, किसी हालात में जाने ना दिया जाये, कोई भी ट्रक आदि रनवे पर रास्ता रोकने के लिए खड़ा करवा दें. या कोई और अड़चन तुरंत लगवा दें. अपहरणकर्ता से एअरपोर्ट टावर पर ऐटीसी द्वारा जहाज के पायलट की मदद द्वारा संवाद स्थापित कर मेरे आने तक उलझा कर रक्खो ज़रा भी कोताही नहीं होनी चाहिये.”           

   एस एस पी ढिल्लों  ये सब तुरत फुरत करने के लिए जीप से जल्दी से बताई हुई कार्रवाही कर ने के लिए निकल् पड़े थे, एअरपोर्ट पर अधिकारियों  के आने का ताँता बंधता जा रहा था, रेंज डीआईजी , आईजी(बॉर्डर ) अन्य आर्गेनाईजेशनों के हेड भी आते जा रहे थे, पंजाब पुलिस की एक बस और सीआरपीएफ की दो बसें भर कर आई जिन्हें बताई  हुई जगहों पर लगा दिया गया था. एअरपोर्ट की एंट्री बंद कर दी गयी थी, जो लोग कहीं जाने के लिए आये थे, उन्हें भी वापिस किया जा रहा था, कुछ पत्रकार भी दौड़ दौड़ कर आना चाहते थे उन्हें भी  कोई 100 मीटर पहले रोक दिया गया था , वे बार बार अपना कार्ड दिखा कर अन्दर आना चाहते थे. तभी लगभग 15 मिनट के बाद हेलीकाप्टर द्वारा केपीएस गिल पहुँच गए , एस एस पी उन्हें सीधे उनके लिए निश्चित बड़े रूम में ले आये, वे फ़ोन पर किसी से बातचीत करते कह रहे थे,“ सर, मैं राजा सांसी पहुँच गया हूँ अब बाकी मैं संभाल  लूँगा.”

आते ही उन्होंने एयरक्राफ्ट को  थोडा  दूर से  देखा, वहां बाहर सीआरपीएफ  की टुकडियां  मुस्तैदी से तैनात थी, एक खाली फ्यूल ट्रक  को  एयरक्राफ्ट  से थोडा  आगे रनवे पर खड़ा करने के लिए आदेश दिया. एसएसपी ने तो रनवे पर ट्रैफिक पुलिस की रुकावट वाली ट्राली को  पहले ही खड़ा  किया हुआ था, उन्हें शायद वह रूकावट कम लगी होगी. बिना समय खोये  गिल साहेब  स्थापित कंट्रोल  रूम में आ गये थे  वहां अफसरों की काफी भीड़ देख केवल अपने लिए उपयोगी चुन कर बाकी को बराबर के कमरे में बैठने का आदेश दिया, केन्द्रीय खुफिया एजेंसी के हम दो को  भी अपने नज़दीक रखा हुआ था. मैं अमृतसर से पहले श्रीनगर में भी इसी ख़ुफ़िया एजेंसी में ही तैनात था और वहां की मिलिटेंट गतिविधियों, मिलिटेंट ग्रुप्स तथा उनके मुख्य आतंकवादियों की व्यक्तिगत जानकारी भी मुझे  ठीक ठाक मालूम थी,अपने आवास से  आते समय वह फाइल  साथ ही लेता आया  था.

 राजा सांसी एअरपोर्ट पर एटीसी का इंचार्ज अभी तक बहुत समझदारी से जहाज के क्रू मेम्बेर्स तथा अपहरण कर्ता से बड़े शांत और ठंडे तरीके से संपर्क साधे हुए था, अपहरण कर्ता के डांटने आदि पर भी बिना उत्तेजित हुए  सहज ढंग से संपर्क साधे रहा और अपहरण कर्ता को आश्वासन देता रहा कि ज़ल्दी ही उसकी फ्यूल भरने की डिमांड पूरी हो जायेगी.

 धीरे धीरे अपहरण कर्त्ता उत्तेजित और उतावला होता जा रहा था और उसने एक फायर कर जहाज की अन्दर की सतह को डैमेज भी कर दिया था, पायलट और एटीसी ने उसे समझाया की ऐसा करने से जब फ्लाइट में ऊपर जाने से एक्सीडेंट हो सकता है. उसे देर के कारण झुंझलाहट हो रही थी ,वह पायलट को भी डांट चुका था पर  पायलट स्थिति की नाजुकता समझ कर शांत रहा.

एटीसी इंचार्ज तथा पायलट ने अपहरणकर्त्ता  को यह भी बताया कि पाकिस्तान से बात चीत चल रही है कि इस प्लेन को अपनी हवाई सीमा में से गुजरने दे ताकि कि वे अफगानिस्तान जा सके.

इधर गिल साहेब दिल्ली  स्थित क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप (सी एम जी) के हेड से भी  बात कर रहे थे, जो कैबिनेट सेक्रेटरी  स्वयं थे, भारत के शीर्ष अधिकारी, उनसे गिल साहेब ने कहा, “ सर, अब सिचुएशन को मुझ पर छोड़ दीजिये,  अच्छा रहेगा न मुझ से कोई पूछे न कुछ बताये, मैं आपको और सिर्फ आप को   स्थिति से निबटने के बाद स्वयं  पूरा  रिपोर्ट करूंगा .”

 हम सब को उनके साहस और आत्मविश्वास पर  आश्चर्य हो रहा था. उसके बाद  अगले वाक्य में कहा, “प्लीज सभी शीर्ष विभागों को भी यह भी बता दें वे यहाँ अभी न कोई फ़ोन करें ना कुछ पूछे ताकि मैं हाला पर पूरी तरह से ध्यान दे सकूं.”  मेरा अनुमान था कि कैबिनेट सेक्रेटरी को यह बिलकुल अच्छा नहीं लगा होगा, पर गिल साहेब को किसी की परवाह कब थी?

इसके बाद वहां आये हुए एटीसी के अधिकारी से कहा,“ चलो मेरी पायलट से बात कराओ,”  पायलट से सीधा कहा कि बन्दे को बताओ “मैं केपीएस गिल उस से सीधे बात करूंगा.”

 पायलट ने बताया कि गिल साहेब नाम सुन कर टारगेट बात करने से बिल्कुल मना कर रहा है, पर यहीं मौजूद है .

सुनकर गिल थोडा मुस्काये और कहा कि  वॉल्यूम बढ़ा दो  या स्पीकर कर दो ताकि वो सुन सके और बोले, “मेरे कश्मीरी भाई तुम्हारी फ्यूल भरवाने में कुछ टेक्निकल दिक्कत आ रही हैं, मैं बहुत ज़ल्दी इस को पूरा करा दूंगा, पर मेरी एक छोटी बात तुम भी मान लो कि प्लेन से औरतों और बच्चों को छोड़ दो बाकि लोगों और प्लेन को हम  ज़ल्दी ही जाने देंगे. सोच लो. कुछ और डिमांड हो वह भी बता दो.” पायलट ने बताया कि वह कुछ नहीं मान रहा है, और कॉकपिट से बाहर चला गया है. पायलट ने बताया कि वह नाम सुन कर  एक क्षण थोडा घबराया था पर दोनों हाथों में पिस्तोल लिए अन्दर  यात्रियों की तरफ चला गया है. बस अपनी डिमांड को जल्दी पूरा करने की रट  है.

 जब वह दोबारा कॉकपिट में आएगा बात कराने की चेष्टा करूंगा.

एटीसी इंचार्ज ने बताया की ‘टारगेट’ ने  पहले अपने आप को ‘जनरल हसन’ बताया था, और यह भी  कह कर सबको डराया था कि उसके पास ग्रेनेड  भी है,अगर किसी ने कुछ हरकत की या डिमांड  नहीं मानी  तो वह प्लेन कौ  ग्रेनेड से उड़ा  देगा.  बाद में अपने को जनरल हसन से हट कर सैय्यद  सलाहुद्दीन  हिजबुल मुजाहिदीन  का सुप्रीम कमांडर बता रहा है .

 मुझे  हिज़मुल मुजाहिदीन के सुप्रीम कमांडर के बारे में  कश्मीर की ड्यूटी के समय से पूरा पता ही था मैंने अपने लाये हुए रिकॉर्ड को गिल साहेब को दिखाते चुपचाप बताया कि यह बंदा सलाहुद्दीन तो नहीं हो सकता क्योंकि सलाहुद्दीन तो पाकिस्तान में है, वहीँ से ऑपरेट करता है, परन्तु काफी संभव है कि यह  हिजबुल मुजाहिदीन ही का कश्मीर घाटी स्थित युसूफ शाह या एक दूसरा नाम भी बताया था ( अब वह याद नहीं है) वे चुप रहे तथा उन्होंने मेरे से  पेपर ले कर थोडा पढा फिर मुझ से  पूछा “तुम्हारी गट फीलिंग क्या है? यह कौन है, मैंने थोडा  झिझकते कहा कि  बडगाँव  का रहने वाला  हिजबुल मुजाहिद्दीन का युसूफ शाह हो सकता है, जो  घाटी में काफी एक्टिव है, पर निश्चित रूप से नहीं कह सकता. गिल साहेब ने उसके सोर्स पर्टिकुलर सरसरी तौर से देखे.

थोड़ी देर बाद फिर से प्लेन से उनकी  बात हुई तो उन्होंने टारगेट को अपनी बात दोहराई, “बच्चों और महिलाओं को छोड़ दो  हम तुम्हें ज़ल्दी से ज़ल्दी इंतजाम कर प्लेन का तेल दिलवाने जा रहे हैं.” मना करने पर गिल साहेब ने अचानक एक नया प्रस्ताव अपहरणकर्ता के  सामने रक्खा, “देखो भई, मेरा कहना है मैं प्लेन पर पहुँच रहा हूँ, मुझे होस्टेज रख लो, पर लेडीज और बच्चों को छोड़ना पड़ेगा.”

सुन कर  अपहरणकर्त्ता हडबडा गया  तथा कहा “बिलकुल भी प्लेन के नजदीक भी मत आना. मुझे यह मंज़ूर नहीं  है.”

गिल साहेब को  तभी सूचना मिली कि एनएसजी पहुँच चुकी  है तथा उन्होंने चुपचाप प्लेन के पास तैनाती कर चुके हैं. अचानक गिल साहेब ने अपहरणकर्त्ता को कहा , “ ज़नाब. मुझे पूरा पता चल चुका है  तुम बडगांव के युसूफ शाह हो, और हमने तुम्हारे घरवालों को बडगांव पुलिस स्टेशन मैं बिलकुल सेफ ढंग से अपने कब्ज़े में ले लिया है, अब तुम पैसेंजेर को छोड़ दो हम तुम्हारे कुनबे को. मैं प्लेन पर पहुँच रहा हूँ, बाकी बात  वहीँ बात करूंगा.”  वह मना करता रहा बिलकुल इधर मत आना, पर गिल उठे मुझे और अपने पी.एस.ओ सुरेश, जो सीआरपीएफ से ही था जो  कभी मेरा अकादमी में ट्रेनी भी रह चुका था, को अपने साथ ले एक गाडी में बैठ प्लेन की तरफ रवाना हो गए .

जाते जाते एस.एस.पी. को  निर्देश दिया “कोई भी मेरे पीछे नहीं आएगा. दूसरे जब तक मैं  न कहूं   कोई भी  हो  किसी भी मीडिया का व्यक्ती या अन्य पदाधिकारी या अन्य अधिकारी या दर्शक एअरपोर्ट के अन्दर[DK1]  से टारमेक की तरफ न घुसने दिया जाए. क्रॉस फ़ायर में मर सकता है.”  

 इस सब में रात का एक बज चुका था, मैं सकते में था रोमांच हो रहा था कि पता नहीं अब  आगे क्या होने वाला है? गिल साहेब और सुरेश दोनों ने बुलेट प्रूफ जैकेट पहनी हुई थी पर मैं लेकर नहीं आया था, न मुझे कल्पना थी कि मुझे इसकी आवश्यकता पड़ेगी.

 दूर अकेला विमान खड़ा हुआ था, गिल साहेब आदेश दे रहे थे  कि टारगेट को केबिन की खिड़की के पास् बुला लो, पर टारगेट उनको  पास आने के लिए रोक रहा था. शायद यह गिल साहेब  की साईकोलोजिकल जीत भी थी, मुझे बाहर से दिखाई दिया कि अँधेरे की आड़ ले लेकर  एनएसजी के ब्लैक कैट कमांडो भी प्लेन के स्टोर्मिंग के लिए मुस्तैद खड़े हैं.

 गिल साहेब ने बिलकुल पास पहुँच कर कहा कि पायलट अपनी केबिन के पास वाला गेट खोल दे वे ऊपर आयेंगे,  ऊपर सामने दोनों हाथों में पिस्तौल ताने टारगेट उन्हें ज्यादा करीब आने से रोक रहा था, बिना खौफ खाए गिल कह रहे थे, “शाह, मेरी बात मान लो इसी में तुम्हारी व तुम्हारी फेमिली की भलाई है कि  तुम सरेंडर कर दो वरना बहुत जाने जा सकती हैं , अपनी बीवी और बच्चों की भी सोचो, अपनी पिस्तौल नीचे करो और नीचे उतर जाओ, अपने आप को सरेंडर कर दो, तुम्हारे खरोंच भी नहीं लगेगी वरना मैं ऊपर आता हूँ.”

कुछ मिनट कुछ सोच अपनी पिस्तौल नीचे  एयर क्राफ्ट में रख छोड़. हाथ ऊपर उठा कर वह नीचे उतर रहा था, नीचे उतरते ही  गिल साहेब के मुंह से निकला, “पकड़ो साले को वहां  सिक्यूरिटी में खड़ा एक सिपाही जैसे ही  टारगेट की तरफ बढ़ा टारगेट अँधेरे की तरफ तेज़ी से भागा, गिल साहेब जोर से बोले मारो “ मारो साले को बच के न भागने पाए पाए. एनएसजी वालों ने कोई एक्शन नहीं लिया. उनके एस.एस.ओ. ने गोलियां चला कर उसे ढेर कर दिया, ठीक उसी समय एनएसजी ने धमाके के साथ स्टोर्मिंग किया जिससे प्लेन के दरवाजे लगाये गए एक्स्प्लोसिव से अलग हो गए थे, वे अन्दर घुस गए थे. सब कुछ  बहुत तेज़ी से घटित हुआ, जिसकी कल्पना न थी.  

गिल साहेब ने गहरी सांस ली मुंह से निकला, “ अब अमृतसर से कोई हाईजैकिंग नहीं होगी”  और जेब से निकाल कर पानी से एक गोली ले, पता नहीं  ब्लड प्रेशर की थी या उस प्रेशर की थी जिसको अन्दर झेल रहे थे, उन्होंने मोबाइल निकाला और कैबिनेट सेक्रेटरी को सिर्फ इतना कहा, सर ऑपरेशन  सक्सेस फुल” और पहने काट दिया. रात का डेढ़ बज़ गया था, मैंने अपनी गाडी मंगाई, मीडिया की, तथा अन्य लोगों की  भीड़ लपकी हुई टारमेक  पर पड़े अपहरणकर्ता के तरफ दौड़ी आ रही थी, विमान से लोग उतर उतर कर आ रहे थे, मेला सा लग रहा था, थक कर चूर दो बजे घर पहुंचा, ड्राइंग रूम में पार्टी का सामान, बच्चों के गिफ्ट कुछ खुले कुछ अधखुले पड़े थे , बच्चे  कभी के सो चुके थे, बीवी  मेरी चिंता  में जाग रही थी,  मुझे देख कर उसने राहत से लम्बी सांस ली.

यह थी 1993 की इंडियन एयर लाइन्स की फ्लाइट नंबर 427 के हाईजैकिंग की  गुरु की नगरी अमृतसर में आँखों देखी घटना, जितनी इतने  दिनों बाद याद कर बता पाया.