Bhangarh: 11:47 pm in Hindi Horror Stories by Jeetendra books and stories PDF | भानगढ़: रात 11:47

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भानगढ़: रात 11:47

मैं आज तक नहीं मानता था कि जगहें याद रखती हैं। पत्थर सिर्फ पत्थर होते हैं।

20 अक्टूबर 2019 की रात ने वो भरोसा तोड़ दिया। तब से मैं भानगढ़ का नाम सुनते ही कंधे झटक देता हूँ, जैसे कोई ठंडी हवा गर्दन के पीछे से निकल गई हो।

ये कहानी मैंने पुलिस को भी पूरी नहीं बताई थी। FIR में "भूत" लिखने से केस बंद हो जाता है। मैं विक्रम सिंह शेखावत हूँ, जयपुर से। 2016 से ट्रैवल डॉक्यूमेंट्री करता हूँ, चैनल का नाम "रास्ता"। 2019 में एक OTT प्लेटफॉर्म ने हमें एक सीरीज़ दी थी, "रात के बाद इंडिया"। शर्त थी कि शूट रात में होगा।

भानगढ़ के बारे में सबको पता है। अलवर जिले में, सरिस्का के किनारे, 1573 में आमेर के राजा भगवंत दास के भाई माधो सिंह ने बनवाया था। गेट पर आज भी ASI का पीला बोर्ड लगा है, "सूर्यास्त के पश्चात एवं सूर्योदय से पूर्व इस क्षेत्र में प्रवेश वर्जित है।" सरकारी वजह जंगली जानवर बताई जाती है। गाँव वाले वजह दूसरी बताते हैं। गोलाकाबास और अजबगढ़ में आज भी कोई पक्की छत नहीं डालता। कहते हैं, रात भर में गिर जाती है।

वहाँ दो कहानियाँ चलती हैं। एक साधु बालू नाथ की, जिन्होंने कहा था किले की छाया उन पर न पड़े। राजा ने महल ऊँचा कर दिया, छाया पड़ी, शहर उजड़ गया। दूसरी कहानी राजकुमारी रत्नावती की है। सत्रह साल की, रूप की चर्चा दिल्ली तक। तांत्रिक सिंघिया ने बाजार से उसके लिए इत्र में वशीकरण मिलाकर भेजा। रत्नावती ने पहचान लिया, शीशी पत्थर पर पटक दी। तेल बहकर उसी पत्थर पर गया जिस पर सिंघिया बैठा था, पत्थर लुढ़का और सिंघिया उसी के नीचे दब कर मरा। मरते-मरते वो चिल्लाया, "भानगढ़ उजड़ेगा, कोई दीया न जलेगा, कोई आत्मा मुक्त न होगी।" अगले साल लड़ाई हुई, फिर 1720 के अकाल में बस्ती पूरी खाली हो गई।

हमें ये सब पता था। हमें नहीं पता था कि श्राप सुनने और महसूस करने में फर्क होता है।

हम तीन लोग थे। मैं कैमरा संभालता हूँ। समीर कुरैशी साउंड पर था, उसके पास Zoom H6 और बाइनॉरल माइक था। तीसरा भैरों सिंह, अट्ठावन साल का, गोलाकाबास का गाइड। उसने पहले ही मना कर दिया था, "रात में नहीं रुकते साहब।" हमने उसे पंद्रह हजार दिए तो वो मान गया, बोला, "मैं बाहर बैठूँगा, अंदर नहीं।"

हम बीस अक्टूबर को दोपहर दो बजकर सैंतालीस मिनट पर पहुँचे। टिकट कटाया, एंट्री लिखाई। धूप तेज थी पर हवा में सरिस्का की नमी थी। हमने दिन में पूरा किला घूमा। जौहरी बाजार की टूटी दुकानें, सोमेश्वर महादेव का मंदिर, नाचने वाली हवेली, सात मंजिला महल का कंकाल। सब खाली था पर अजीब तरह से साफ, जैसे कोई रोज झाड़ू लगाता हो।

भैरों ने हमें महल के पीछे एक बावड़ी दिखाई, जिसे लोग तांत्रिक की बावड़ी कहते हैं। पानी काला और ठहरा हुआ था। उसने कहा, "यहाँ दीया मत जलाना।"

शाम साढ़े पाँच बजे गार्ड ने सीटी बजाई। हम बाहर निकले, पर गाड़ी पार्किंग में नहीं लगाई। पीछे आम के बाग में खड़ी कर दी। प्लान था कि छह पंद्रह पर गेट बंद होने के बाद हम दीवार के टूटे हिस्से से अंदर घुस जाएंगे, रात दो बजे तक शूट करेंगे और सुबह निकल जाएंगे। भैरों ने आखिरी बार कहा, "अगर कुछ सुनो तो पीछे मत देखना, और किसी का नाम मत लेना।"

छह बजकर सत्रह मिनट पर सूरज डूबा। हम अंदर थे। मेरे पास Sony A7S3 था, लो लाइट के लिए। समीर ने हेडफोन पहन रखे थे। पहला घंटा कुछ नहीं हुआ। सिर्फ झींगुर और चमगादड़। तापमान सत्ताईस से चौबीस पर आ गया, जो सामान्य था।

सात बजकर चालीस पर जौहरी बाजार में हम बैठे थे। समीर ने अचानक हेडफोन उतारे, "किसी ने विक्रम बोला?" मैंने नहीं बोला था। भैरों का चेहरा सफेद पड़ गया। बाद में रिकॉर्डिंग में सुना तो बाएँ चैनल में बहुत धीमी औरत की आवाज़ थी, "विक्की, इधर आ।" मुझे विक्की सिर्फ मेरी नानी कहती थी, जिनकी मौत 2008 में हो गई थी। मैंने हँस कर टाल दिया।

आठ बजकर पचपन पर मैंने ड्रोन उड़ाया। महल के ऊपर से थर्मल ले रहे थे। स्क्रीन पर तीसरी मंजिल पर, जो आधी टूटी है, एक ठंडा पैच दिखा, चौदह डिग्री, जबकि आसपास तेईस था। ड्रोन अचानक हिलने लगा, जैसे किसी ने धक्का दिया हो। बैटरी सड़सठ प्रतिशत से सीधे बारह पर आ गई। वो नीचे आंगन में गिरा। जब उठाने गए तो वो गर्म नहीं था, बर्फ जैसा ठंडा था।

ग्यारह बजकर सैंतालीस पर हम महल में चले गए। भैरों ने मना किया था पर हम गए। सीढ़ियाँ टूटी थीं, टॉर्च की रोशनी में धूल उड़ रही थी। दूसरी मंजिल पर रत्नावती का शयनकक्ष बताया जाता है। दरवाजा नहीं था, सिर्फ चौखट।

वहाँ हवा एकदम बंद हो गई। सरिस्का में रात को हमेशा हवा चलती है, पर उस कमरे में जैसे किसी ने कांच रख दिया हो। समीर के मीटर पर माइनस बयालीस db का लगातार hum आने लगा, उन्नीस हर्ट्ज के आसपास। इंसान इसे सुन नहीं सकता, पर पेट में घबराहट होती है।

तभी भैरों फुसफुसाया, "दीया।"

कोने में, जहाँ कुछ भी नहीं था, एक छोटा सा तेल का दीया जल रहा था। लौ बिलकुल स्थिर थी, पीली। न धुआँ था, न बाती की आवाज़। पत्थर पर तेल का कोई निशान नहीं था।

मैंने कैमरा उठाया। फोकस नहीं हुआ। मैनुअल पर भी इमेज धुंधली रही, जैसे लेंस पर भाप जम गई हो। समीर ने रिकॉर्डिंग चालू रखी।

और फिर वो आई। दरवाजे से नहीं, दीवार के अंदर से, जैसे धुंध से बनी हो। सत्रह अठारह साल की लड़की, गहरा लाल ओढ़ना, माथे पर बोर, हाथ में छोटी इत्र की शीशी। चेहरा साफ नहीं था, पर आँखें दिखीं। बहुत थकी हुई, गुस्से में नहीं।

उसने कुछ नहीं कहा। उसने शीशी जमीन पर पटक दी। आवाज़ नहीं हुई पर दीया एकदम तेज हो गया।

भैरों चिल्लाया, "नाम मत लो।" पर समीर डर में बोल पड़ा, "रत्नावती।"

उसी सेकंड हमारी दोनों टॉर्च, कैमरा, H6, सब बंद हो गए। सिर्फ वो दीया जल रहा था। और पूरे महल में एक साथ सैकड़ों पायल की आवाज़ आई, जैसे ऊपर से नीचे तक कोई दौड़ रहा हो। ठंडी हवा का झोंका आया, साथ में सड़ा हुआ इत्र और जले हुए तेल की गंध।

मुझे याद है मैंने पीछे देखा। नहीं देखना चाहिए था।

सीढ़ियों पर, नीचे आंगन तक, लोग खड़े थे। धुंधले, फटे कपड़ों में, सैनिक, औरतें, बच्चे। उनके चेहरे नहीं थे, सिर्फ गड्ढे। वो हमारी तरफ नहीं देख रहे थे, वो महल की तरफ देख रहे थे, जैसे कुछ बार बार हो रहा हो।

भैरों ने मेरा हाथ खींचा, "भाग।"

हम गिरते पड़ते उतरे। पीछे से वही आवाज़ आई, इस बार बिलकुल कान के पास, "विक्की, रोको उसे।" नानी की आवाज़।

हम जौहरी बाजार तक आए तो समीर गिर गया। उसका बाइनॉरल माइक अभी भी पावर बैंक से चल रहा था। उसने कहा, "कोई मेरे कंधे पर हाथ रख रहा है।" मैंने देखा, कुछ नहीं था, पर उसकी जैकेट पर पाँच उंगलियों के गीले निशान थे, इत्र जैसे।

हम बाहर निकलने का रास्ता भूल गए। कंपास घूम रहा था। भैरों बोला था बावड़ी के पास मत जाना, हम वहीं पहुँच गए।

पानी अब काला नहीं था। उसमें नीचे से हल्की रोशनी आ रही थी। और उसमें चेहरे थे। दर्जनों। ऊपर देख रहे थे। एक ने हाथ बढ़ाया। समीर ने डर के मारे रिकॉर्डर पानी में गिरा दिया।

तभी पीछे से टॉर्च आई। ASI का नाइट पेट्रोल, दो होमगार्ड। उन्होंने हमें पकड़ा, गालियाँ दीं, बाहर खींचा। हमें लगा बच गए।

बाहर आकर देखा तो समय चार बजकर बारह मिनट था। हमारे फोन में एक बजकर तैंतीस ही बजा था। तीन घंटे गायब थे।

होमगार्ड ने सुबह थाने में रिपोर्ट लिखी, घुसपैठ की। कैमरा जब्त नहीं किया पर मेमोरी कार्ड फॉर्मेट करवा दिया। ड्रोन टूटा हुआ मिला। समीर का H6 पानी में जाने से खराब हो गया पर SD कार्ड बच गया।

जयपुर लौट कर हमने फुटेज देखी। महल वाले कमरे की फाइल में ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट तीन सेकंड से लेकर बीस सेकंड तक सत्रह सेकंड का ब्लैक है। ऑडियो में सिर्फ वो hum है, उन्नीस हर्ट्ज, और उसके नीचे दबी हुई सैकड़ों फुसफुसाहटें। एक साफ सुनाई देती है, "फिर आ गया।"

समीर ने तीन महीने बाद साउंड का काम छोड़ दिया। वो कहता है अब भी कभी कभी दाहिने कान में पायल सुनाई देती है। भैरों सिंह की 2021 में हार्ट अटैक से मौत हुई। उनके बेटे ने बताया, आखिरी हफ्तों में वो रात को उठ कर कहते थे, "दीया बुझा दो, वो फिर शीशी तोड़ेगी।"

मैं दोबारा कभी नहीं गया। OTT सीरीज़ हमने ड्रॉप कर दी।

लोग पूछते हैं क्या सच में भूत थे। मैं नहीं जानता। मैं इतना जानता हूँ, भानगढ़ में कोई एक आत्मा नहीं भटकती। पूरा शहर वहीं फंसा है, उसी आखिरी लड़ाई की रात में। तांत्रिक का श्राप था कि कोई मुक्त न होगा। रत्नावती ने शीशी तोड़ी पर श्राप नहीं टूटा। वो हर बार वही करती है। हर कोई जो रात में रुकता है, वो दर्शक बन जाता है।

ASI का बोर्ड सही है। वो जंगली जानवरों से नहीं बचाता। वो हमें इस बात से बचाता है कि हम उस रात का हिस्सा न बनें।

अगर आप कभी जाएँ, दिन में जाइए। महल की दूसरी मंजिल पर मत रुकिए। और अगर कोई आपको बचपन के नाम से बुलाए, पीछे मत देखिएगा।

मैंने वो सत्रह सेकंड की ऑडियो फाइल आज तक डिलीट नहीं की। पिछले हफ्ते समीर का फोन आया था, तीन साल बाद। उसने कहा उस फाइल में फिर से वही hum बजने लगा है। और इस बार उसमें नानी की आवाज़ नहीं, मेरी है। मैं सुनने की हिम्मत नहीं करता।