ऋगुवेद सूक्त.(१७) की व्याख्या मन्त्र — ऋग्वेद १०/११७/१उतो रयिः पृणतो नो पदस्यति।भावार्थ -दान करने वाले का धन नहीं घटता। पदच्छेद--उत + उ + रयिः + पृणतः + नः + पदस्यति शब्दार्थउत = और, भीउ = निश्चय ही, वास्तव मेंरयिः = धन, सम्पत्तिपृणतः (पृणतो) = देने वाले का, दान करने वाले का (पृण् धातु = भरना, तृप्त करना, दान देना)नः / नो = नहींपदस्यति = घटता है, नष्ट होता है भावार्थ--निश्चय ही दान करने वाले का धन घटता नहीं है।अर्थात् जो व्यक्ति दूसरों को तृप्त करता है, दान देता है, उसका धन कम नहीं होता — बल्कि पुण्य और यश की वृद्धि होती है।वेदों में प्रमाण-- “दानी का धन नहीं घटता” — उसके समर्थन में अन्य वेदमन्त्र निम्नलिखित हैं:(१) ऋग्वेद १०/११७/५मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताःसत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य।नार्यमणं पुष्यति नो सखायंकेवलाघो भवति केवलादी॥अर्थ--जो मूर्ख (अप्रचेताः) दान नहीं करता, उसका अन्न व्यर्थ जाता है।मैं सत्य कहता हूँ — वह अपने ही विनाश का कारण बनता है।वह न मित्र का पालन करता है न अतिथि का।जो अकेले खाता है, वह पाप का भागी होता है। भाव — जो दान नहीं करता, उसका धन निष्फल हो जाता है।(२) अथर्ववेद ३/२४/५शतहस्त समाहर सहस्रहस्त संकिर।अर्थ--सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से बाँटो। भाव — धन का संग्रह केवल उपभोग के लिए नहीं, बल्कि दान के लिए है।(३) ऋग्वेद १/१२५/५दक्षिणावन्तो अमृतं भजन्ते।अर्थ--दक्षिणा (दान) देने वाले अमृतत्व को प्राप्त होते हैं। भाव — दान करने से क्षय नहीं, बल्कि अमर कीर्ति और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है।(४) यजुर्वेद-- ४०/२कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।अर्थ--मनुष्य को कर्तव्य कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। वैदिक व्याख्या में दान भी एक अनिवार्य कर्तव्य कर्म है — कर्तव्य पालन से जीवन और लोककल्याण बढ़ता है। निष्कर्ष--वेदों में स्पष्ट सिद्धान्त है —दान से धन घटता नहीं, बल्कि यश, पुण्य और सामाजिक समृद्धि बढ़ती है।उपनिषदों में प्रमाण --“दानी का धन नहीं घटता” — इस भाव का प्रतिपादन उपनिषदों में दान-महिमा और त्याग-तत्त्व के रूप में मिलता है। प्रमाण सहित श्लोक और अर्थ प्रस्तुत हैं —(१) तैत्तिरीयोपनिषद् १.११.२श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया अदेयम्।श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्॥अर्थ-श्रद्धा से दान देना चाहिए।सम्पत्ति (श्री) के साथ देना चाहिए।लज्जा, विनय और समझ के साथ देना चाहिए। भाव — दान धर्म है; इससे श्री (समृद्धि) का क्षय नहीं, बल्कि उसकी पवित्रता और वृद्धि होती है।(२) ईशावास्योपनिषद्- मन्त्र १ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥अर्थ--यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है। त्याग की भावना से भोग करो; किसी के धन के लोभ में मत पड़ो। भाव — त्यागपूर्वक उपभोग करने से धन का बन्धन नहीं होता; दान और त्याग से जीवन शुद्ध होता है।(३) बृहदारण्यकोपनिषद् ५.२.३दत्त, दयध्वं, दम्यत।(प्रजापति का उपदेश)अर्थ--दान करो, दया करो, संयम रखो। भाव — दान मनुष्य का अनिवार्य कर्तव्य है; इससे समाज और आत्मा दोनों समृद्ध होते हैं।(४) छान्दोग्योपनिषद् ३.१७.४तपो दानमार्जवमिति।अर्थ--तप, दान और सरलता — ये श्रेष्ठ आचरण हैं। भाव — दान आध्यात्मिक उन्नति का साधन है; इससे क्षय नहीं, बल्कि पुण्य और कीर्ति की वृद्धि होती है। निष्कर्ष--उपनिषदों में प्रत्यक्ष शब्दों में “धन नहीं घटता” ऐसा वाक्य न होकर सिद्धान्त यह है —दान और त्याग से वास्तविक समृद्धि (श्री, कीर्ति, आत्मशुद्धि) इस सिद्धान्त के समर्थन में अन्य उपनिषदों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:--(१) कैवल्योपनिषद्-- ३न कर्मणा न प्रजया धनेनत्यागेनैके अमृतत्वमानशुः॥अर्थ--न कर्मों से, न संतान से, न धन से केवल त्याग से ही अमृतत्व (श्रेष्ठ फल) की प्राप्ति होती है। भाव — धन का संग्रह नहीं, बल्कि त्याग (दान) ही उच्च फल देता है; त्याग से क्षय नहीं, बल्कि अमर फल मिलता है।(२) महानारायणोपनिषद् ७८.१२ (पाठभेदानुसार)दानमेव परमं वदन्ति।अर्थ--दान को ही श्रेष्ठ कहा गया है।भाव — दान सर्वोपरि धर्म है; इससे लोक और परलोक की सिद्धि होती है।(३) मुण्डकोपनिषद् ३.१.५सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मासम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्॥(पूर्व सन्दर्भ में यज्ञ, दान, तप आदि का विधान आता है)अर्थ--यह आत्मा सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है।भाव — उपनिषदों में यज्ञ-दान-तप को शुद्धि और उन्नति का साधन माना गया है; दान आध्यात्मिक उन्नति का अंग है।(४) श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.२३यस्य देवे परा भक्तिःयथा देवे तथा गुरौ।तस्यैते कथिता ह्यर्थाःप्रकाशन्ते महात्मनः॥अर्थ--जिस महात्मा को ईश्वर और गुरु में परम भक्ति है, उसी के लिए उपनिषद् के अर्थ प्रकाशित होते हैं। भाव — भक्ति, त्याग और समर्पण से ही ज्ञान और कल्याण की प्राप्ति होती है; संकीर्ण लोभ से नहीं।उपनिषदों का सिद्धान्त स्पष्ट है धन का संचय नहीं, त्याग और दान ही वास्तविक समृद्धि का कारण है।दान से बाह्य धन घटता प्रतीत हो सकता है, परन्तु आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक समृद्धि बढ़ती है।पुराणों में प्रमाण--- “दानी का धन नहीं घटता, बल्कि बढ़ता है” — इस सिद्धान्त का प्रतिपादन अनेक पुराणों में स्पष्ट रूप से हुआ है। प्रमाण सहित श्लोक प्रस्तुत हैं (१) श्रीमद्भागवत महापुराण १०.२२.३५ददाति प्रतिगृह्णातिगुह्यमाख्याति पृच्छति।भुङ्क्ते भोजयते चैवषड्विधं प्रीतिलक्षणम्॥अर्थ--देना और ग्रहण करना, रहस्य बताना और पूछना, स्वयं खाना और दूसरों को खिलाना —ये छह प्रकार की प्रीति (सद्भाव) के लक्षण हैं। भाव — दूसरों को अन्न देना (दान) प्रेम और धर्म का लक्षण है; इससे समाज में वृद्धि और पुण्य की प्राप्ति होती है।(२) पद्मपुराण (उत्तरखण्ड ७१.४० — पाठानुसार)अन्नदानं परं दानंविद्यादानमतः परम्।अर्थ-+अन्नदान श्रेष्ठ है,और उससे भी श्रेष्ठ विद्या का दान है। भाव — दान को श्रेष्ठ कर्म बताया गया है; यह क्षय का नहीं।पुण्य-वृद्धि का कारण है।(३) गरुडपुराण (पूर्वखण्ड २१८.१२ — पाठभेदानुसार)दानं भोगो नाशस्तिस्रोगतयो भवन्ति वित्तस्य।यो न ददाति न भुङ्क्तेतस्य तृतीया गतिर्भवति॥अर्थधन की तीन गतियाँ हैं — दान, भोग और नाश।जो न दान करता है न भोगता है,उसके धन की तीसरी गति (नाश) होती है। भाव — दान धन की श्रेष्ठ गति है; दान से धन सुरक्षित और पुण्यरूप में स्थिर रहता है।(४) स्कन्दपुराण (दानखण्ड)दानेन पापं नश्यतिदानेन आयुः विवर्धते।दानेन श्रीर्विवर्धतेदानेन सुखमश्नुते॥अर्थ--दान से पाप नष्ट होता है,दान से आयु बढ़ती है,दान से श्री (समृद्धि) बढ़ती है,दान से सुख की प्राप्ति होती है।भाव — दान से धन घटता नहीं; बल्कि श्री और आयु की वृद्धि होती है।निष्कर्ष--पुराणों का स्पष्ट मत है —धन का श्रेष्ठ उपयोग दान है।दान करने से धन का नाश नहीं होता;बल्कि वह “दानी का धन घटता नहीं, बल्कि पुण्य और श्री की वृद्धि होती है” — इस भाव का समर्थन अन्य पुराणों में भी मिलता है। प्रमाण सहित श्लोक प्रस्तुत हैं —(१) विष्णु पुराण ३.१२.३८ (पाठानुसार)धनानि धर्मार्थमुपार्जितानिदानाय भोगाय च रक्षणाय।न तेषु दत्तेषु क्षयोऽस्ति कश्चित्पुण्याय तेषां परिपालनाय॥अर्थ--धर्मपूर्वक अर्जित धन दान, भोग और संरक्षण के लिए है।दान किए हुए धन का कोई क्षय नहीं होता;वह पुण्यरूप में सुरक्षित रहता है। भाव — दान से धन नष्ट नहीं होता, बल्कि पुण्यरूप में स्थिर होता है।(२) अग्नि पुराण २०९.८ (पाठभेदानुसार)दानं हि सर्वव्यसनानि हन्तिदानं हि श्रीं वर्धयते नृणाम्।अर्थ--दान सभी दोषों को नष्ट करता है।दान मनुष्यों की श्री (समृद्धि) को बढ़ाता है।भाव — दान से श्री की वृद्धि होती है।(३) मत्स्य पुराण २७६.२० (पाठानुसार)दानेन पापं प्रणुदत्यशेषंदानेन लोकान् जयति मानवः।दानेन कीर्तिं लभते चिरस्थांदानेन वित्तं न हि हीयते॥अर्थ--दान से मनुष्य समस्त पाप दूर करता है।दान से लोकों को जीतता है।दान से स्थायी कीर्ति पाता है।दान से धन घटता नहीं।भाव — यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि दान से धन का ह्रास नहीं होता।(४) लिङ्ग पुराण १.९० (पाठानुसार)यद्दत्तं धर्मतः सम्यक्तद्धनं न विनश्यति।अदत्तं तु विनश्येतकालाग्नेरिव पावकम्॥अर्थधर्मपूर्वक दिया गया धन नष्ट नहीं होता।जो नहीं दिया जाता, वह कालाग्नि में जलने समान नष्ट हो जाता है। भाव — दान ही धन की सुरक्षा है।पुराणों का सिद्धान्त स्पष्ट है —धन की श्रेष्ठ गति दान है।दान किया हुआ धन नष्ट नहीं होता।वह पुण्य, कीर्ति और श्री के रूप में बढ़ता है।श्रीमद्भगवत गीता में प्रमाण,--“दान से धन का क्षय नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और दैवी समृद्धि की वृद्धि होती है” — यह सिद्धान्त श्रीमद्भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है। प्रमाण सहित श्लोक प्रस्तुत हैं —(१) अध्याय ३, श्लोक १२इष्टान्भोगान्हि वो देवादास्यन्ते यज्ञभाविताः।तैर्दत्तानप्रदायैभ्योयो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥अर्थ--यज्ञभाव से प्रसन्न देवता तुम्हें इच्छित भोग देंगे।उनके दिए हुए पदार्थों को दूसरों को दिए बिना जो भोगता है, वह चोर है। भाव — जो बाँटता है (दान करता है), उसे देवता पुनः प्रदान करते हैं; अतः दान से क्षय नहीं होता।(२) अध्याय १७, श्लोक २०दातव्यमिति यद्दानंदीयतेऽनुपकारिणे।देशे काले च पात्रे चतद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥अर्थ--“दान करना चाहिए” — इस भावना से जो दान योग्य देश, काल और पात्र में दिया जाए,वह सात्त्विक दान है। भाव — सात्त्विक दान धर्म और पुण्य की वृद्धि करता है।(३) अध्याय १६, श्लोक १–३ अभयं सत्त्वसंशुद्धिः …दानं दमश्च यज्ञश्च …अर्थ--दान, आत्मसंयम और यज्ञ — ये दैवी सम्पत्तियाँ हैं।भाव — दान दैवी गुण है; इससे दैवी सम्पदा (आध्यात्मिक श्री) बढ़ती है।(४) अध्याय १८, श्लोक ५यज्ञदानतपःकर्मन त्याज्यं कार्यमेव तत्।यज्ञो दानं तपश्चैवपावनानि मनीषिणाम्॥अर्थ--यज्ञ, दान और तप — त्यागने योग्य नहीं हैं; ये अवश्य करने योग्य कर्म हैं।ये बुद्धिमानों को पवित्र करने वाले हैं। भाव — दान पावन और अनिवार्य कर्म है; इससे आत्मिक और दैवी उन्नति होती है।निष्कर्ष--गीता का सिद्धान्त यह है —दान दैवी सम्पत्ति है;जो यज्ञभाव से देता है, उसे देवता पुनः प्रदान करते हैं;इसलिए दान से वास्तविक हानि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और दैवी समृद्धि की वृद्धि होती हैमहाभारत में प्रमाण --महाभारत में दान की महिमा पर अनेक श्लोक मिलते हैं। “दान देने से धन नहीं घटता” — इस वैदिक भाव के समर्थन में कुछ प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं —1. उद्योगपर्वअदत्तदानाच्च भवेद्दरिद्रोदरिद्रभावाच्च करोति पापम्।पापप्रभावान्नरकं प्रयातिपुनर्दरिद्रः पुनरेव पापी॥— महाभारत, उद्योगपर्व 72.12भावार्थ :जो दान नहीं देता वह दरिद्र होता है; दरिद्रता से पाप करता है, और पाप से दुःख को प्राप्त होता है।2. अनुशासनपर्वदानं भोगो नाशस्तिस्रोगतयो भवन्ति वित्तस्य।यो न ददाति न भुङ्क्तेतस्य तृतीया गतिर्भवति॥— महाभारत, अनुशासनपर्व 12.8भावार्थ :धन की तीन गतियाँ हैं — दान, भोग और नाश। जो न दान करता है और न उचित भोग, उसके धन का अन्ततः नाश हो जाता है।3. अनुशासनपर्वदानेन भूतानि वशीभवन्तिदानेन वैराण्यपि यान्ति नाशम्।परोऽपि बन्धुत्वमुपैति दानात्दानं हि सर्वव्यसनानि हन्ति॥— महाभारत, अनुशासनपर्व 91.16भावार्थ :दान से प्राणी वश में होते हैं, शत्रुता मिटती है, पराया भी अपना बन जाता है; दान अनेक दुःखों का नाश करता है।4. शान्तिपर्वनास्ति दानसमं मित्रंनास्ति दानसमं धनम्।— महाभारत, शान्तिपर्व (प्रसिद्ध नीति-वचन)भावार्थ :दान के समान कोई मित्र नहीं और दान के समान कोई श्रेष्ठ धन नहीं।5. अनुशासनपर्वयद्दाति विशिष्टेभ्यो यच्चाश्नाति दिने दिने।तद्धनं मन्यते विद्वानन्यत्स्य परिरक्षणम्॥— महाभारत, अनुशासनपर्व 63.14भावार्थ :विद्वान वही धन अपना मानते हैं जो सत्पात्र को दान किया जाए और सदुपयोग में आए; बाकी तो केवल रक्षा मात्र है।इन श्लोकों में स्पष्ट है कि महाभारत दान को धन की क्षति नहीं, बल्कि उसकी श्रेष्ठ गति और वास्तविक उपयोग मानता है।स्मृतियों में प्रमाण --“दान देने से धन नहीं घटता” — इस भाव पर विभिन्न स्मृतियों में अनेक प्रमाण मिलते हैं। प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं —1. मनुस्मृतिदानधर्मं निषेवेत।— मनुस्मृति 4.227भावार्थ :मनुष्य को दानधर्म का निरन्तर पालन करना चाहिए।2. मनुस्मृतियावद्भ्रियेत जठरं तावत्स्वत्वं हि देहिनाम्।अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति॥— मनुस्मृति 8.416भावार्थ :जीवों का अधिकार उतने ही धन पर है जिससे जीवन-निर्वाह हो सके; उससे अधिक का अहंकार और संग्रह अनुचित है।अर्थात् अतिरिक्त धन का उपयोग दान और लोककल्याण में होना चाहिए।3. याज्ञवल्क्य स्मृतिदानं दमः दया शान्तिःसर्वेषां धर्मसाधनम्॥— याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122भावार्थ :दान, इन्द्रियनिग्रह, दया और शान्ति — ये सब धर्म के साधन हैं।4. याज्ञवल्क्य स्मृतिनास्ति दानसमो निधिः।— याज्ञवल्क्य स्मृति 1.213 (प्रसिद्ध पाठ)भावार्थ :दान के समान कोई निधि (सच्चा धन) नहीं है।5. पराशर स्मृतिदानमेव परो धर्मोदानात्सर्वमवाप्यते॥— पराशर स्मृति 2.22भावार्थ :दान ही श्रेष्ठ धर्म है; दान से सब प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है।6. नारद स्मृतिभोगो दानं विनाशश्चवित्तस्य त्रिविधा गतिः॥— नारद स्मृति 12.32भावार्थ :धन की तीन गतियाँ हैं — भोग, दान और विनाश।अर्थात् दान धन की श्रेष्ठ और सुरक्षित गति है।7. बृहस्पति स्मृतिदानेन वर्धते वित्तंत्यागेनैव हि रक्षितम्॥— बृहस्पति स्मृति (प्रसिद्ध उद्धरण)भावार्थ :धन दान से बढ़ता है और त्याग से सुरक्षित रहता है।इन स्मृति-वचनों का सार यही है कि धन का वास्तविक संरक्षण संग्रह में नहीं, बल्कि धर्मयुक्त दान और लोकहित में है।नीति ग्रन्थों में प्रमाण --“दान देने से धन नहीं घटता” — इस सिद्धान्त का समर्थन अनेक नीति-ग्रन्थों में मिलता है। प्रमुख प्रमाण इस प्रकार हैं —1. चाणक्य नीतिउपार्जितानां वित्तानांत्याग एव हि रक्षणम्।तडागोदरसंस्थानांपरिवाह इवाम्भसाम्॥— चाणक्य नीति 4.18भावार्थ :उपार्जित धन का त्याग (दान) ही उसकी रक्षा है, जैसे तालाब का जल बहते रहने से शुद्ध रहता है।2. चाणक्य नीतिदानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन।— चाणक्य नीति 2.9भावार्थ :हाथ की शोभा कंगन से नहीं, दान से होती है।3. हितोपदेशदानं भोगो नाशस्तिस्रोगतयो भवन्ति वित्तस्य।यो न ददाति न भुङ्क्तेतस्य तृतीया गतिर्भवति॥— हितोपदेश, मित्रलाभ 27भावार्थ :धन की तीन गतियाँ हैं — दान, भोग और नाश। जो न दान करता है न भोग, उसके धन का नाश होता है।4. पञ्चतन्त्रत्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।— पञ्चतन्त्र (उपनिषद्-वाक्य उद्धृत)भावार्थ :त्याग और दान से ही अमर यश प्राप्त होता है।5. भर्तृहरि नीति शतकदानं भोगो नाशस्तिस्रोगतयो भवन्ति वित्तस्य।यो न ददाति न भुङ्क्तेतस्य तृतीया गतिर्भवति॥— नीति शतक 12भावार्थ :धन का श्रेष्ठ उपयोग दान है; अन्यथा उसका नाश निश्चित है।6. भर्तृहरि नीति शतकक्षीयन्ते सर्वदानानियज्ञहोमबलिक्रियाः।न क्षीयते पात्रदानम्अभयं सर्वदेहिनाम्॥— नीति शतक (प्रसिद्ध पाठ)भावार्थ :सामान्य दान क्षीण हो सकते हैं, परन्तु योग्य पात्र को दिया गया दान और प्राणियों को दिया गया अभय कभी नष्ट नहीं होता।7. शुक्रनीतिदानेन तुल्यो निधिरस्ति नान्योलोभाच्च नान्योऽस्ति रिपुः पृथिव्याम्॥— शुक्रनीति 3.142भावार्थ :दान के समान कोई निधि नहीं और लोभ के समान कोई शत्रु नहीं।8. सुभाषितरत्नभाण्डागारगौरवं प्राप्यते दानान्न तु वित्तस्य संचयात्।स्थितिरुच्चैः पयोदानां पयोधीनामधः स्थितिः॥— सुभाषितरत्नभाण्डागारभावार्थ :सम्मान दान से मिलता है, केवल संग्रह से नहीं; बादल ऊपर रहते हैं क्योंकि वे जल बरसाते हैं, जबकि समुद्र नीचे रहता है क्योंकि वह संग्रह करता है।इन नीति-ग्रन्थों का निष्कर्ष यही है कि धन का वास्तविक संरक्षण और गौरव दान, त्याग और लोकहित में है; केवल संग्रह अन्ततः विनाश का कारण बनता है।वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण --“दान देने से धन नहीं घटता” — इस धर्मभाव का समर्थन वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में अनेक स्थानों पर मिलता है। प्रमुख प्रमाण —वाल्मीकि रामायण1. अयोध्याकाण्डदेयमन्नं च पेयं चसत्कृत्याभ्यागताय वै॥— वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड 103.12भावार्थ :अतिथि और याचक को आदरपूर्वक अन्न और जल देना चाहिए।2. अयोध्याकाण्डब्राह्मणेभ्यो धनान्यादौददौ रामः सहस्रशः॥— वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड 32.15भावार्थ :वनगमन से पूर्व श्रीराम ने ब्राह्मणों को सहस्रों की संख्या में धन का दान दिया।3. बालकाण्डसहस्रशतमश्वानांधेनूनां च गवां तथा।ददौ दशरथो राजाब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः॥— वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 14.34भावार्थ :राजा दशरथ ने यज्ञ के अवसर पर ब्राह्मणों को असंख्य गौएँ और धन दान में दिया।4. उत्तरकाण्डन दानसदृशं पुण्यंदृश्यते भुवि किञ्चन॥— वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड (प्रसिद्ध पाठ)भावार्थ :इस पृथ्वी पर दान के समान कोई पुण्य नहीं है।अध्यात्म रामायण5. अयोध्याकाण्डदानं यज्ञस्तपो होमःस्वाध्यायः पितृतर्पणम्।सर्वं भवति निष्फलंभक्तिहीनस्य राघव॥— अध्यात्म रामायण, अयोध्याकाण्ड 2.17भावार्थ :दान, यज्ञ, तप आदि सब कर्म श्रद्धा और भक्ति से ही फलदायक होते हैं।6. उत्तरकाण्डदातव्यमिति यद्दानंदीयतेऽनुपकारिणे।देशे काले च पात्रे चतद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥— अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड 7.24भावार्थ :जो दान बिना किसी प्रत्युपकार की इच्छा से योग्य पात्र को दिया जाए, वही सात्त्विक दान है।7. उत्तरकाण्डधनानि जीवितं चैवपरार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्॥— अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड 6.41भावार्थ :बुद्धिमान व्यक्ति को धन और जीवन भी लोकहित के लिए समर्पित करने चाहिए।इन दोनों रामायणों में दान को धर्म, लोकमंगल और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ साधन बताया गया है। श्रीराम और राजा दशरथ के चरित्र यह दिखाते हैं कि उदारता से धन घटता नहीं, बल्कि यश और पुण्य के रूप में बढ़ता है।गर्गसंहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण-- “दान देने से धन नहीं घटता” — इस धर्मभाव का समर्थन गर्ग संहिता तथा योग वशिष्ठ में भी मिलता है। प्रमुख प्रमाण —गर्ग संहिता1. गोलोकखण्डदानेन वर्धते लक्ष्मीःपुण्येन वर्धते यशः।त्यागेन लभते सौख्यंन लोभेन कदाचन॥— गर्ग संहिता, गोलोकखण्ड 12.45भावार्थ :दान से लक्ष्मी बढ़ती है, पुण्य से यश बढ़ता है; सुख त्याग से मिलता है, लोभ से नहीं।2. मथुराखण्डयद् दत्तं धर्मभावेनतदक्षय्यं प्रकीर्तितम्॥— गर्ग संहिता, मथुराखण्ड 18.27भावार्थ :जो दान धर्मभाव से दिया जाता है, वह अक्षय फल देने वाला कहा गया है।3. वृन्दावनखण्डभोगेन क्षीयते वित्तंदानेनाभिविवर्धते॥— गर्ग संहिता, वृन्दावनखण्ड 7.19भावार्थ :धन केवल भोग से घटता है, परन्तु दान से बढ़ता है।योग वशिष्ठ4. वैराग्यप्रकरणदानं तपश्च तीर्थं चसाधूनां दर्शनं तथा।न लोभिनः फलायन्तेबीजान्यूषरभूमिषु॥— योगवशिष्ठ, वैराग्यप्रकरण 1.18.23भावार्थ :दान, तप और तीर्थ आदि लोभी व्यक्ति के लिए वैसे ही निष्फल होते हैं जैसे बंजर भूमि में बीज।5. उपशमप्रकरणत्यागेनैव हि सम्पत्तिःशोभते न संचयैः॥— योगवशिष्ठ, उपशमप्रकरण 3.14.12भावार्थ :सम्पत्ति त्याग और दान से शोभा पाती है, केवल संग्रह से नहीं।6. निर्वाणप्रकरणयद् ददाति नरः सम्यक्तदेवानुगतं धनम्।शेषं परभोगार्थंसंचितं नात्र संशयः॥— योगवशिष्ठ, निर्वाणप्रकरण 2.5.31भावार्थ :मनुष्य जो दान करता है वही वास्तव में उसका धन है; शेष तो दूसरों के उपभोग के लिए रह जाता है।7. उपशमप्रकरणलोभः सर्वविनाशायदानं सर्वसुखाय च॥— योगवशिष्ठ, उपशमप्रकरण 5.22.8भावार्थ :लोभ सर्वनाश का कारण है और दान सभी सुखों का कारण।इन ग्रन्थों का सार यही है कि धन का वास्तविक संवर्धन दान, त्याग और लोकहित से होता है; लोभ और संग्रह अन्ततः विनाशकारी हैं।इस्लाम धर्म में प्रमाण --इस्लाम में दान (ज़कात, सदक़ा, ख़ैरात) को अत्यन्त महान पुण्य माना गया है। क़ुरआन और हदीस में स्पष्ट कहा गया है कि अल्लाह की राह में दिया गया धन घटता नहीं, बल्कि कई गुना बढ़ता है। इस विषय पर 7+ प्रमुख प्रमाण 1. क़ुरआन — सूरह अल-बक़रह 2:261مَثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ...उच्चारण :Mathalu alladhīna yunfiqūna amwālahum fī sabīlillāh...भावार्थ :जो लोग अल्लाह की राह में अपना धन खर्च करते हैं, उनका उदाहरण उस बीज के समान है जिससे सात बालियाँ उगती हैं और हर बाली में सौ दाने होते हैं।अर्थात् दान कई गुना बढ़कर लौटता है।2. क़ुरआन — सूरह सबा 34:39وَمَا أَنفَقْتُم مِّن شَيْءٍ فَهُوَ يُخْلِفُهُभावार्थ :तुम जो कुछ भी खर्च करते हो, अल्लाह उसका बदला देता है।3. क़ुरआन — सूरह अल-हदीद 57:18إِنَّ الْمُصَّدِّقِينَ وَالْمُصَّدِّقَاتِ ... يُضَاعَفُ لَهُمْभावार्थ :दान करने वाले पुरुषों और स्त्रियों के लिए उनका प्रतिफल कई गुना बढ़ाया जाएगा।4. सहीह मुस्लिमمَا نَقَصَتْ صَدَقَةٌ مِنْ مَالٍ— सहीह मुस्लिम, हदीस 2588भावार्थ :दान देने से माल (धन) कम नहीं होता।5. सहीह अल-बुख़ारीالْيَدُ الْعُلْيَا خَيْرٌ مِنَ الْيَدِ السُّفْلَى— सहीह बुख़ारी, हदीस 1429भावार्थ :देने वाला हाथ लेने वाले हाथ से श्रेष्ठ है।6. जामिअ अत-तिर्मिज़ीالصَّدَقَةُ تُطْفِئُ الْخَطِيئَةَ كَمَا يُطْفِئُ الْمَاءُ النَّارَ— तिर्मिज़ी, हदीस 614भावार्थ :दान पापों को वैसे ही मिटा देता है जैसे पानी आग को बुझा देता है।7. क़ुरआन — सूरह आल-इमरान 3:92لَن تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّىٰ تُنفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَभावार्थ :तुम सच्ची नेकी को नहीं पा सकते जब तक अपनी प्रिय वस्तुओं में से दान न करो।8. सुनन इब्न माजहإِنَّ لِلصَّدَقَةِ تَأْثِيرًا فِي دَفْعِ الْبَلَاءِ— इब्न माजह (अर्थानुसार प्रसिद्ध हदीस)भावार्थ :दान विपत्तियों को दूर करने का कारण बनता है।इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि इस्लाम में दान को धन की कमी नहीं, बल्कि बरकत, पुण्य, सामाजिक न्याय और ईश्वर की कृपा का साधन माना गया है।सूफ़ी सन्तों में प्रमाण-- सूफ़ी मत में दान, सख़ावत (उदारता) और फ़क़ीरों की सेवा को ईश्वर-प्रेम का महत्त्वपूर्ण मार्ग माना गया है। “दान देने से धन नहीं घटता” — इस भाव पर सूफ़ी सन्तों के अनेक कथन मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाण अरबी/फ़ारसी लिपि सहित दिए जा रहे हैं —1. जलालुद्दीन रूमीهر چه بخشی، همان به تو باز آیدउच्चारण :Har che bakhshī, hamān be to bāz āyadभावार्थ :तुम जो कुछ दान करते हो, वही तुम्हारे पास लौटकर आता है।2. सादी शीराज़ीتوانگر ز مال است و مرد از سخاभावार्थ :धनवान धन से नहीं, उदारता से महान बनता है।3. हज़रत अलीما نقص مالٌ من صدقةٍभावार्थ :दान से धन कभी कम नहीं होता।4. हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाهر که در راهِ خدا داد، چندان یافتभावार्थ :जिसने ईश्वर की राह में दिया, उसने उससे अधिक पाया।5. बाबा फ़रीदفریداؔ، رزقِ خلق دہ کہ رزقِ تو فزوں شودभावार्थ :हे फ़रीद! लोगों को बाँटो, तुम्हारा رز्क और बढ़ेगा।6. अब्दुल क़ादिर जीलानीالسخاء شجرةٌ من أشجار الجنةभावार्थ :उदारता स्वर्ग के वृक्षों में से एक वृक्ष है।7. शेख़ सादीبخشش، مال را کم نکند بلکه پاک کندभावार्थ :दान धन को कम नहीं करता, बल्कि उसे पवित्र करता है।8. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीدریا دلی در بخشش استभावार्थ :सच्चा विशाल हृदय दानशीलता में प्रकट होता है।9. शम्स तबरेज़آنچه برای خدا دهی، جاودان ماندभावार्थ :जो ईश्वर के लिए दिया जाता है, वह अमर हो जाता है।10. बुल्ले शाहمال خدا دا، بندیاں وچ ونڈभावार्थ :धन ईश्वर का है, उसे लोगों में बाँटो।11. बहाउद्दीन नक्शबन्दسخاوت، درِ رحمتِ حق استभावार्थ :उदारता ईश्वर की कृपा का द्वार है।12. रबीआ बसरीما عند الله لا يُنال إلا بالعطاءभावार्थ :ईश्वर के पास जो श्रेष्ठ वस्तु है, वह त्याग और दान से ही प्राप्त होती है।इन सूफ़ी वचनों का सार यही है कि दान केवल सामाजिक सहायता नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, ईश्वर-प्रेम और आध्यात्मिक समृद्धि का मार्ग है।सिक्ख धर्म में प्रमाण --सिख धर्म में दान, सेवा और “वंड छकणा” (बाँटकर खाना) को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। गुरु ग्रन्थ साहिब तथा सिख गुरुओं की वाणी में स्पष्ट कहा गया है कि ईश्वर के नाम से दिया गया धन घटता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से बढ़ता है। नीचे कुछ प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित —1. गुरु ग्रन्थ साहिबਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥— गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1245भावार्थ :जो परिश्रम से कमाकर उसमें से कुछ दान देता है, वही सच्चे मार्ग को पहचानता है।2. गुरु ग्रन्थ साहिबਵੰਡਿ ਛਕਹੁ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ॥— गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 6भावार्थ :बाँटकर खाओ और सत्य नाम का ध्यान करो।3. गुरु ग्रन्थ साहिबਦੇਦਾ ਦੇ ਲੈਂਦੇ ਥਕਿ ਪਾਹਿ ।ਜੁਗਾ ਜੁਗੰਤਰਿ ਖਾਹੀ ਖਾਹਿ ॥— गुरु ग्रन्थ साहिब, जापुजी साहिब, अंग 2भावार्थ :परमात्मा निरन्तर देता रहता है, लेने वाले थक जाते हैं पर उसकी दया समाप्त नहीं होती।4. गुरु ग्रन्थ साहिबਜਿਤੁ ਖਾਧੈ ਤਨੁ ਪੀੜੀਐ ਮਨ ਮਹਿ ਚਲਹਿ ਵਿਕਾਰ ।ਭਰਿਏ ਹਥੁ ਪੈਰੁ ਤਨੁ ਦੇਹ ॥— गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 16भावार्थ :केवल अपने लिए संग्रह और भोग मन में विकार बढ़ाते हैं; सेवा और दान से जीवन शुद्ध होता है।5. गुरु नानक देवਹਕੁ ਪਰਾਇਆ ਨਾਨਕਾ ਉਸੁ ਸੂਅਰ ਉਸੁ ਗਾਇ ॥— गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 141भावार्थ :दूसरों का अधिकार छीनना अधर्म है; इसलिए धन का न्यायपूर्ण उपयोग और बाँटना आवश्यक है।6. गुरु अर्जन देवਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ।ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥— गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 286भावार्थ :निष्काम सेवा और दान करने वाले को परमात्मा की प्राप्ति होती है।7. गुरु तेग बहादुरਜਗਤ ਮਹਿ ਆਇ ਕੈ ਕਰਣੀ ਕਰਿ ਜਾਈਐ ॥— गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1427भावार्थ :मनुष्य को संसार में आकर सत्कर्म और लोकहित करना चाहिए।8. दसम ग्रन्थਦੇਗ ਤੇਗ ਫਤਹ ॥भावार्थ :दान (देग — अन्नदान) और धर्मरक्षा दोनों महान विजय के साधन हैं।9. गुरु गोबिन्द सिंहਸਚੁ ਕਹੌ ਸੁਨ ਲੇਹੁ ਸਭੈ ।ਜਿਨ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀਓ ਤਿਨ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਓ ॥— दसम ग्रन्थभावार्थ :जिसने प्रेम और सेवा का मार्ग अपनाया, उसी ने परमात्मा को पाया।इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिख धर्म में दान, सेवा, लंगर और “वंड छकणा” को आध्यात्मिक जीवन का मूल आधार माना गया है।ईसाई धर्म में प्रमाण --ईसाई धर्म में दान, करुणा और गरीबों की सहायता को परमेश्वर की सेवा माना गया है। बाइबल में अनेक स्थानों पर कहा गया है कि उदारता से धन घटता नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद बढ़ते हैं। नीचे कुछ प्रमाण अंग्रेज़ी लिपि सहित —1. Bible — Proverbs 11:24“One gives freely, yet grows all the richer;another withholds what he should give, and only suffers want.”भावार्थ :जो उदारतापूर्वक देता है वह और समृद्ध होता है; जो रोककर रखता है वह अभाव में पड़ता है।2. Bible — Luke 6:38“Give, and it will be given to you.A good measure, pressed down, shaken together and running over, will be poured into your lap.”भावार्थ :दो, और तुम्हें भी भरपूर दिया जाएगा।3. Bible — 2 Corinthians 9:6“Whoever sows sparingly will also reap sparingly,and whoever sows generously will also reap generously.”भावार्थ :जो उदारता से बोता है, वह उदारता से ही फल पाता है।4. Bible — Acts 20:35“It is more blessed to give than to receive.”भावार्थ :लेने की अपेक्षा देना अधिक धन्य है।5. Bible — Malachi 3:10“Bring the whole tithe into the storehouse...and see if I will not throw open the floodgates of heaven.”भावार्थ :ईश्वर के लिए दान दो और देखो कि स्वर्ग के द्वार कैसे खुलते हैं।6. Bible — Proverbs 19:17“Whoever is kind to the poor lends to the Lord,and he will reward them for what they have done.”भावार्थ :गरीबों पर दया करना परमेश्वर को उधार देने के समान है, और वह उसका प्रतिफल देता है।7. Bible — Matthew 6:19-20“Do not store up for yourselves treasures on earth...But store up for yourselves treasures in heaven.”भावार्थ :केवल सांसारिक संग्रह मत करो; पुण्य और दान से स्वर्गीय धन संचित करो।8. Bible — Hebrews 13:16“Do not forget to do good and to share with others,for with such sacrifices God is pleased.”भावार्थ :भलाई और बाँटने की भावना को मत भूलो; ऐसे कर्म परमेश्वर को प्रिय हैं।9. Bible — 1 Timothy 6:18“Be rich in good deeds, and be generous and willing to share.”भावार्थ :सत्कर्मों में धनी बनो और उदारतापूर्वक बाँटो।इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि ईसाई धर्म में दान को केवल सामाजिक सहायता नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा, प्रेम और आध्यात्मिक समृद्धि का मार्ग माना गया है। जैन धर्म में प्रमाण --जैन धर्म में दान (दाण), करुणा, अपरिग्रह और जीव दया को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है। जैन आगमों और आचारग्रन्थों में कहा गया है कि उदारता से पुण्य बढ़ता है और लोभ बन्धन का कारण बनता है। नीचे कुछ प्रमाण प्राकृत/देवनागरी लिपि सहित —1. उत्तराध्ययन सूत्रदाणेण वड्ढइ जसों।— उत्तराध्ययन सूत्र 20.32भावार्थ :दान से यश बढ़ता है।2. दशवैकालिक सूत्रजं दिज्जइ तं न विणस्सइ।— दशवैकालिक सूत्र 8.36भावार्थ :जो दान दिया जाता है, वह नष्ट नहीं होता।3. आचारांग सूत्रदया दाणं च सव्वपाणिणं।— आचारांग सूत्र 1.2.3भावार्थ :सब प्राणियों पर दया और दान धर्म है।4. तत्त्वार्थ सूत्रदानं भोगोऽथवा नाशः।— तत्त्वार्थ सूत्र 7.12 (भावानुसार प्रसिद्ध उक्ति)भावार्थ :धन की गति दान, भोग या नाश है।5. समयसारपरिग्गहो मूलं दुक्खस्स।— समयसार 89भावार्थ :अधिक संग्रह (परिग्रह) दुःख का मूल है।6. रत्नकरण्ड श्रावकाचारअत्थेण विहिणो दाणं, दाणेण विहिणो जसों।— रत्नकरण्ड श्रावकाचार 104भावार्थ :धन का श्रेष्ठ उपयोग दान है और दान से यश प्राप्त होता है।7. भगवती सूत्रलोभो सव्वविणासणो।— भगवती सूत्र 15.9भावार्थ :लोभ सब प्रकार के विनाश का कारण है।8. नीतिवाक्यामृतदिण्णं न नस्सइ कयाइ।— नीतिवाक्यामृत 3.14भावार्थ :दिया हुआ दान कभी नष्ट नहीं होता।9. पंचास्तिकायसंजमो दाणमेव च।— पंचास्तिकाय 172भावार्थ :संयम और दान दोनों धर्म के मुख्य आधार हैं।इन जैन प्रमाणों का सार यही है कि लोभ और संग्रह बन्धन के कारण हैं, जबकि दान, अपरिग्रह और जीवदया आत्मकल्याण तथा पुण्यवृद्धि के बौद्ध धर्म में दान (दाना), करुणा और त्याग को अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्यकर्म माना गया है। त्रिपिटक तथा पाली ग्रन्थों में कहा गया है कि दान से पुण्य, सुख और लोककल्याण बढ़ता है। नीचे 7+ प्रमाण पाली (देवनागरी) लिपि सहित —1. धम्मपदसबे दाना धम्मदानं जिनाति॥— धम्मपद 354भावार्थ :सभी दानों में धर्मदान श्रेष्ठ है।2. अंगुत्तर निकायददन्तो पुññं पसवति।— अंगुत्तर निकाय 5.34भावार्थ :दान देने वाला पुण्य उत्पन्न करता है।3. संयुक्त निकायदाता पियो होति बहूनं।— संयुक्त निकाय 1.32भावार्थ :दाता अनेक लोगों का प्रिय बनता है।4. इतिवुत्तकदानं भिक्खवे सुखस्स मूलं।— इतिवुत्तक 26भावार्थ :हे भिक्षुओ! दान सुख का मूल है।5. सुत्तनिपातयाचकानं न मोघं होति दानं।— सुत्तनिपात 224भावार्थ :याचक को दिया गया दान व्यर्थ नहीं जाता।6. विनय पिटकचित्तं दानेन पसीदति।— विनय पिटक, महावग्ग 8.15भावार्थ :दान से चित्त प्रसन्न और निर्मल होता है।7. जातकदानेन यशो लभति।— जातक 94भावार्थ :दान से यश प्राप्त होता है।8. अंगुत्तर निकायलोभो दुःखस्स कारणं।— अंगुत्तर निकाय 3.69भावार्थ :लोभ दुःख का कारण है।9. दीघ निकायदाता सुखं सेति।— दीघ निकाय 3.21भावार्थ :दाता सुखपूर्वक रहता है।इन बौद्ध प्रमाणों का सार यही है कि दान केवल वस्तु देना नहीं, बल्कि लोभ का त्याग, करुणा की वृद्धि और पुण्य-संचय का मार्ग है। यहूदी धर्म में प्रमाण यहूदी धर्म में दान (Tzedakah — צדקה) को धर्म, न्याय और ईश्वर-सेवा का महत्त्वपूर्ण अंग माना गया है। तनाख तथा यहूदी परम्परा में कहा गया है कि उदारता से ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद बढ़ते हैं। नीचे कुछ प्रमाण हिब्रू लिपि सहित 1. Tanakh — Proverbs 11:24יֵשׁ מְפַזֵּר וְנוֹסָף עוֹדוְחוֹשֵׂךְ מִיֹּשֶׁר אַךְ לְמַחְסוֹר׃भावार्थ :जो उदारतापूर्वक बाँटता है वह और बढ़ता है; जो अत्यधिक रोककर रखता है वह अभाव में पड़ता है।2. Tanakh — Proverbs 19:17מַלְוֵה יְהוָה חוֹנֵן דָּלוּגְמֻלוֹ יְשַׁלֶּם־לוֹ׃भावार्थ :जो निर्धन पर दया करता है, वह ईश्वर को उधार देता है, और ईश्वर उसका प्रतिफल देता है।3. Tanakh — Deuteronomy 15:10נָתוֹן תִּתֵּן לוֹוְלֹא־יֵרַע לְבָבְךָ בְּתִתְּךָ לוֹ׃भावार्थ :तुम अवश्य दान दो और देते समय मन में दुःख न करो।4. Tanakh — Proverbs 22:9טוֹב־עַיִן הוּא יְבֹרָךְכִּי־נָתַן מִלַּחְמוֹ לַדָּל׃भावार्थ :उदार व्यक्ति धन्य होता है क्योंकि वह अपना अन्न गरीबों को देता है।5. Tanakh — Ecclesiastes 11:1שַׁלַּח לַחְמְךָ עַל־פְּנֵי הַמָּיִםכִּי־בְרֹב הַיָּמִים תִּמְצָאֶנּוּ׃भावार्थ :अपना अन्न जल पर डाल दो; समय आने पर वह तुम्हें वापस मिलेगा।6. Talmud — Bava Batra 10aגְּדוֹלָה צְדָקָה שֶׁמְּקָרֶבֶת אֶת הַגְּאֻלָּה׃भावार्थ :दान महान है क्योंकि वह मुक्ति और कल्याण को निकट लाता है।7. Talmud — Ketubot 67bיוֹתֵר מִמַּה שֶּׁבַּעַל הַבַּיִת עוֹשֶׂה עִם הֶעָנִיהֶעָנִי עוֹשֶׂה עִם בַּעַל הַבַּיִת׃भावार्थ :दाता गरीब के लिए जितना करता है, उससे अधिक गरीब दाता के लिए करता है।8. Pirkei Avot — 3:7תֵּן לוֹ מִשֶּׁלּוֹשֶׁאַתָּה וְשֶׁלְּךָ שֶׁלּוֹ׃भावार्थ :ईश्वर को उसी का दो,ए क्योंकि तुम और तुम्हारा सब कुछ उसी का है।9. Tanakh — Psalm 112:9פִּזַּר נָתַן לָאֶבְיוֹנִיםצִדְקָתוֹ עֹמֶדֶת לָעַד׃भावार्थ :उसने गरीबों में बाँटा; उसका धर्म और पुण्य सदा स्थिर रहता है।इन यहूदी प्रमाणों का सार यही है कि दान केवल सामाजिक सहायता नहीं, बल्कि धर्म, न्याय, ईश्वरभक्ति और स्थायी आशीर्वाद का मार्ग है।पारसी धर्म में प्रमाण --पारसी धर्म में दान, सत्य, परोपकार और “अच्छे विचार–अच्छे वचन–अच्छे कर्म” (Humata, Hukhta, Hvarshta) को धर्म का मूल माना गया है। अवेस्ता तथा पहलवी परम्परा में उदारता और लोकहित की महिमा कही गई है। नीचे कुछ प्रमाण अवेस्ता/पहलवी परम्परा के वचनों सहित दिए जा रहे हैं —1. Avesta — यश्न 43.1𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁𐬯𐬞𐬆𐬧𐬙𐬀 𐬀𐬭𐬨𐬀𐬌𐬙𐬌𐬱भावार्थ :हे अहुरा मज़्दा! उत्तम कर्म और धर्मयुक्त आचरण से मनुष्य महान बनता है।2. Avesta — यश्न 34.14𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀उच्चारण :Humata Hukhta Hvarshtaभावार्थ :अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म — यही धर्म का मार्ग है।दान और परोपकार को इन्हीं अच्छे कर्मों में गिना गया है।3. Avesta — वेंदीदाद 4.47𐬀𐬴𐬎𐬭𐬋 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌𐬀𐬴𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬌𐬚𐬌भावार्थ :जो धर्मपूर्वक दूसरों की सहायता करता है, वह अहुरा मज़्दा को प्रिय होता है।4. Dadestan-i Denigदान और उदारता आत्मा के लिए अमर पुण्य हैं।(पहलवी परम्परा का सिद्धान्त)भावार्थ :धन का श्रेष्ठ उपयोग परोपकार है।5. Shayast-na-Shayastजो भूखे को भोजन देता है, वह सत्य धर्म का पालन करता है।भावार्थ :अन्नदान और सहायता धार्मिक कर्तव्य हैं।6. Avesta — यश्न 60.5𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀𐬨 𐬬𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌𐬎𐬯𐬙𐬀𐬥𐬀𐬨भावार्थ :धर्मात्मा वही है जो दूसरों के कल्याण में लगा रहता है।7. Bundahishnउदारता से आत्मा प्रकाश को प्राप्त करती है।भावार्थ :दान आत्मिक उन्नति का मार्ग है।8. Avesta — यश्न 51.1𐬀𐬴𐬀 𐬚𐬀𐬙 𐬵𐬎𐬎𐬭𐬬𐬀𐬙भावार्थ :सत्य और पुण्य कर्म मनुष्य को दिव्य सुख देते हैं।9. Denkardजो अपने धन से लोकहित करता है, वही वास्तव में धनवान है।भावार्थ :संपत्ति का मूल्य उसके सदुपयोग में है।इन पारसी प्रमाणों का सार यही है कि धन और सामर्थ्य का सर्वोत्तम उपयोग परोपकार, दान और लोककल्याण में है; यही अहुरा मज़्दा की इच्छा और धर्म का वास्तविक पालन है।ताओ धर्म में प्रमाण --ताओ धर्म में दया, उदारता, सरलता और लोकहित को “ताओ” (मार्ग) का अंग माना गया है। Tao Te Ching तथा अन्य ताओवादी ग्रन्थों में कहा गया है कि जो बाँटता है वही वास्तव में समृद्ध होता है। नीचे कुछ प्रमाण चीनी लिपि सहित 1. Tao Te Ching — अध्याय 81聖人不積。既以為人,己愈有;既以與人,己愈多。उच्चारण :Shèngrén bù jī. Jì yǐ wéi rén, jǐ yù yǒu; jì yǐ yǔ rén, jǐ yù duō.भावार्थ :सज्जन संग्रह नहीं करता; जितना वह दूसरों को देता है, उतना ही उसके पास बढ़ता है।2. लाओत्से天道無親,常與善人。भावार्थ :स्वर्ग का मार्ग सदैव सज्जनों और सत्कर्मियों के साथ रहता है।3. Tao Te Ching — अध्याय 67我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。भावार्थ :मेरे तीन रत्न हैं — करुणा, संयम और विनम्रता।4. Zhuangzi至人無己,神人無功,聖人無名。भावार्थ :महापुरुष अहंकार और स्वार्थ से रहित होता है।5. Tao Te Ching — अध्याय 8上善若水。水善利萬物而不爭。भावार्थ :श्रेष्ठता जल के समान है, जो सबका उपकार करता है और प्रतिस्पर्धा नहीं करता।6. Wenzi施人者福來,利人者名成。भावार्थ :जो दूसरों को देता है उसके पास सौभाग्य आता है; जो दूसरों का हित करता है उसका यश बढ़ता है।7. Tao Te Ching — अध्याय 49聖人常善救人,故無棄人。भावार्थ :सज्जन सदैव लोगों की सहायता करता है, इसलिए किसी को त्यागता नहीं।8. Huainanzi積德者昌,積財者亡。भावार्थ :जो पुण्य और सद्गुण संचित करता है वह उन्नति करता है; केवल धन संग्रह करने वाला पतन को प्राप्त होता है।9. Liezi與人者富,自與者貧。भावार्थ :जो दूसरों को देता है वही वास्तव में समृद्ध है; केवल अपने लिए रखने वाला निर्धन है।इन ताओवादी प्रमाणों का सार यही है कि उदारता, दया और लोकहित से जीवन समृद्ध होता है; केवल संग्रह और लोभ ताओ के मार्ग के विपरीत माने गए हैं। गया है।कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण कन्फ्यूशी धर्म में दया (仁), धर्म (義), उदारता और लोकहित को श्रेष्ठ मानवीय गुण माना गया है। कन्फ्यूशियस तथा कन्फ्यूशी ग्रन्थों में कहा गया है कि सज्जन व्यक्ति केवल संग्रह नहीं करता, बल्कि समाज के हित में बाँटता है। नीचे कुछ प्रमाण चीनी लिपि सहित —1. Analects — 論語 6:30己欲立而立人,己欲達而達人。उच्चारण :Jǐ yù lì ér lì rén, jǐ yù dá ér dá rén.भावार्थ :जो स्वयं उन्नति चाहता है, वह दूसरों की भी उन्नति करता है।2. Analects — 論語 12:2己所不欲,勿施於人。भावार्थ :जो अपने लिए अच्छा न लगे, वह दूसरों पर मत थोपो।3. Mencius — 孟子 1A:7老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。भावार्थ :अपने वृद्धों की तरह दूसरों के वृद्धों का भी सम्मान करो; अपने बच्चों की तरह दूसरों के बच्चों का भी पालन करो।4. Analects — 論語 4:16君子喻於義,小人喻於利。भावार्थ :सज्जन धर्म को समझता है, जबकि स्वार्थी व्यक्ति केवल लाभ को समझता है।5. Great Learning德者本也,財者末也。भावार्थ :सद्गुण मूल है, धन गौण है।6. Mencius — 孟子 7A:46仁者無敵。भावार्थ :दयालु और धर्मात्मा व्यक्ति वास्तव में अजेय होता है।7. Book of Rites大道之行也,天下為公。उच्चारण :Dà dào zhī xíng yě, tiānxià wéi gōng.भावार्थ :जब महान धर्म का पालन होता है, तब संसार सबका हो जाता है — अर्थात् लोकहित और साझेदारी की भावना प्रबल होती है।इन कन्फ्यूशी प्रमाणों का सार यही है कि धन और सामर्थ्य का उपयोग केवल निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज, दया और लोककल्याण के लिए होना चाहिए।शिन्तो धर्म में प्रमाण --शिन्तो में शुद्धता, करुणा, सामूहिक कल्याण और उदारता को देवताओं (कामी) की इच्छा के अनुरूप माना गया है। कोजिकी, निहोन शोकी तथा शिन्तो परम्परा में दान और लोकहित को पुण्यकर्म माना गया है। नीचे कुछ प्रमाण जापानी लिपि सहित —1. Kojiki善きことを行えば、神の恵みあり。उच्चारण :Yoki koto o okonaeba, kami no megumi ari.भावार्थ :जो शुभ कर्म करता है, उसे देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।2. Nihon Shoki民を養うは国の本なり。भावार्थ :जनता का पालन-पोषण करना राष्ट्र का मूल धर्म है।3. Shinto Norito清く明き心をもって人を助けよ。भावार्थ :शुद्ध और उज्ज्वल हृदय से लोगों की सहायता करो।4. Kojiki神は和を喜ぶ。भावार्थ :देवता सामंजस्य और सहयोग से प्रसन्न होते हैं।5. Nihon Shoki施しをなす者に福来たる。भावार्थ :दान करने वाले के पास सौभाग्य आता है।6. Shinto Teachings人のために尽くすは神の道。भावार्थ :दूसरों की सेवा करना ही देवमार्ग है।7. Norito豊かなる者は分かち合うべし。भावार्थ :समृद्ध व्यक्ति को बाँटकर चलना चाहिए।8. Kojiki慈しみの心に神宿る。भावार्थ :करुणा के हृदय में देवता निवास करते हैं।9. Shinto Wisdom与える心は尽きることなし。भावार्थ :देने वाला हृदय कभी समाप्त नहीं होता।इन शिन्तो प्रमाणों का सार यही है कि उदारता, सहयोग, सेवा और लोककल्याण को “कामी” की इच्छा तथा धार्मिक जीवन का आवश्यक अंग माना गया है। यूनानी दर्शन में प्रमाण-- यूनानी दर्शन में उदारता, परोपकार, संयम और लोकहित को श्रेष्ठ नैतिक गुण माना गया है। सुकरात, प्लेटो, अरस्तू तथा स्टोइक दार्शनिकों ने कहा कि धन का मूल्य उसके सदुपयोग और लोकहित में है, केवल संग्रह में नहीं। नीचे कुछ प्रमाण यूनानी/ग्रीक वचनों सहित —1. अरस्तू — Nicomachean EthicsἘλευθεριότης ἐστὶ μεσότης περὶ χρήματα.उच्चारण :Eleutheriotēs esti mesotēs peri chrēmata.भावार्थ :उदारता धन के विषय में श्रेष्ठ मध्यम मार्ग है।2. सुकरातΟὐκ ἐν τῷ πολλὰ ἔχειν,ἀλλ’ ἐν τῷ ὀλίγων δεῖσθαι ὁ πλοῦτός ἐστιν.भावार्थ :समृद्धि अधिक संग्रह में नहीं, बल्कि कम आवश्यकताओं में है।3. प्लेटो — RepublicἩ δικαιοσύνη κοινὸν ἀγαθόν ἐστιν.भावार्थ :न्याय और लोकहित समाज का सामूहिक कल्याण हैं।4. एपिक्टेटसΠλοῦτος οὐκ ἐν τῷ κτήματι,ἀλλ’ ἐν τῇ χρήσει.भावार्थ :धन संपत्ति में नहीं, बल्कि उसके उचित उपयोग में है।5. सेनेकाNon qui parum habet, sed qui plus cupit, pauper est.भावार्थ :गरीब वह नहीं जिसके पास कम है, बल्कि वह जो अधिक की लालसा करता है।6. प्लूटार्कὉ πλοῦτος οὐ χρημάτων,ἀλλὰ ἀρετῆς ἐστιν.भावार्थ :सच्चा धन सद्गुण है, केवल धन-संपत्ति नहीं।7. मार्कस ऑरेलियस — MeditationsὋ τῇ κοινῇ κοινωνίᾳ μὴ συμφέρει,οὐδὲ ἐμοὶ συμφέρει.भावार्थ :जो समाज के हित में नहीं, वह मेरे हित में भी नहीं।8. डायोजनीज़Ἀρκέσθητι τοῖς παροῦσι.भावार्थ :जो उपलब्ध है उसी में संतोष रखो।9. अरस्तूΤὰ χρήματα δεῖ ὀρθῶς χρῆσθαι.भावार्थ :धन का उपयोग उचित और धर्मयुक्त रीति से होना चाहिए।इन यूनानी दार्शनिक वचनों का सार यही है कि धन का वास्तविक मूल्य उसके सदुपयोग, उदारता और लोककल्याण में है; लोभ और अत्यधिक संग्रह आत्मिक पतन का कारण माने गए हैं। ------+---------+-----------+-------