Ankit: The Ghost Hunter in Hindi Horror Stories by Dikshant Nagpure books and stories PDF | अंकित: द घोस्ट हंटर

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अंकित: द घोस्ट हंटर

एपिसोड 1: हड्डी चुराने वाला ज़ॉम्बी



भाग 1 — कब्रिस्तान में सन्नाटा नहीं था


रात के दो बज रहे थे। शहर से बाहर पुराना कब्रिस्तान, जिसे कोई नाम तक नहीं जानता था, अँधेरे में दबा हुआ था। आसमान में चाँद था, पर उसकी रोशनी ज़मीन तक आते-आते किसी चीज़ में फँस जाती थी। कब्रों के पत्थर सफेद नहीं, बल्कि मटमैले दिख रहे थे। मानो किसी ने उन पर राख बिखेर दी हो।

अंकित एक कब्र के सिरहाने घुटनों के बल बैठा था। उसके हाथ में एक छोटी सी टॉर्च थी, पर वह उसे जला नहीं रहा था। उसे रोशनी की ज़रूरत नहीं थी — कम से कम बाईं आँख से नहीं। उसने पट्टी खोल रखी थी। चाँदी-सी चमकती पुतली हवा में झाँक रही थी, कब्रों के नीचे की दुनिया को देख रही थी।

इंस्पेक्टर शर्मा उसके पीछे खड़ा था। हाथ में नौ-एमएम की पिस्टल, पसीने से तर। उसने पुलिस की नौकरी में तीस साल देखे थे — हत्याएँ, झगड़े, दंगे, अपहरण। पर इस कब्रिस्तान में जो महसूस हो रहा था, वह कभी नहीं हुआ था। यहाँ हवा में कुछ और ही था। कोई भारीपन, जैसे ज़मीन के नीचे कोई साँस ले रहा हो।

"अंकित," शर्मा ने धीमी आवाज़ में कहा, "अब तो बता दे। आखिर है क्या यहाँ?"

अंकित ने उत्तर नहीं दिया। उसकी बाईं आँख नीली-हरी रोशनी के धागे बुन रही थी। धागे कब्रों के बीच से गुज़रते, जड़ों में उलझते, और फिर एक जगह पर एकत्र हो जाते — वहाँ जहाँ सबसे पुरानी कब्र थी। उस पर नाम नहीं था। सिर्फ एक तस्वीर खुदी थी, जो समय ने मिटा दी थी।

"वहाँ," अंकित ने उँगली उठाई। उसकी आवाज़ अजीब थी — भारी, धीमी, जैसे कोई और उसके गले से बोल रहा हो। "वहाँ कुछ रहता है। दिन में सोता है। रात में जागता है। भूखा है।"

"भूखा? भूत भूखे होते हैं?"

"ये भूत नहीं है, इंस्पेक्टर। ये कुछ और है।"

तभी आवाज़ आई।

पहले तो लगा कोई सूखी टहनी तोड़ रहा है — कड़क। फिर दूसरी — कड़क। फिर तीसरी। पर यह टहनी नहीं थी। यह हड्डी थी। हड्डी टूटने की आवाज़, पर टूटने के बाद कोई चीख नहीं, कराह नहीं। सिर्फ चबाने की आवाज़। चट-चट-चट। जैसे कोई पापड़ खा रहा हो, पर यह पापड़ नहीं था। यह मनुष्य की हड्डी थी।

शर्मा ने टॉर्च उस दिशा में घुमाई। रोशनी उस पर पड़ी।

पहले तो शर्मा को लगा वह कोई बूढ़ा मजदूर है — झुका हुआ, पतला, टेढ़ी पीठ। लेकिन जैसे-जैसे रोशनी स्थिर हुई, उसने देखा कि उस आदमी का कोई मांस नहीं था। कोई चमड़ी नहीं थी। सिर्फ हड्डियाँ थीं, पर हड्डियाँ भी अजीब — कोई बड़ी, कोई छोटी, कोई मोटी, कोई चपटी, जैसे दर्जनों लाशों को चीरकर निकाली गई हों और फिर गोंद से चिपका दी गई हों। हर जोड़ पर एक नीली चमक थी, जैसे अंदर बिजली की कीड़े घूम रहे हों।

आदमी का चेहरा — अगर उसे चेहरा कहा जा सकता था — वह खोपड़ी थी। पर कोई सामान्य खोपड़ी नहीं। नाक की हड्डी नहीं थी। जबड़े में दाँत नहीं थे — बल्कि छोटी-छोटी उँगलियों की हड्डियाँ पंक्तिबद्ध थीं। और आँखें... आँखों की जगह दो घुटने के जोड़ चमक रहे थे। बिल्कुल गोल, बिल्कुल सफेद, बीच में एक काला बिंदु जो हरकत कर रहा था, देख रहा था।

शर्मा ने पिस्टल निकाल ली। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ में उसने पुलिस वाला गुरूर रखा — "पुलिस! रुक जा! हाथ ऊपर कर!"

प्राणी ने मुँह खोला। अन्दर से हड्डियाँ खड़खड़ाईं। एक धीमी, कर्कश आवाज़ निकली — जैसे कोई पुराना रेडियो बंद होने से पहले आखिरी बार कश-कश करे। और फिर वह बोला।

"हड्डी... दो... अपनी हड्डी... दो..."

शर्मा ने गोली चला दी।

गोली सीधे प्राणी के सीने में लगी। हड्डियाँ छितरा गईं — पर बिखरी नहीं। टूटे हुए टुकड़े हवा में तैरने लगे, और फिर जैसे चुम्बक लगा हो, वापस अपनी जगह पर चिपक गए। प्राणी हिला, डगमगाया, लेकिन गिरा नहीं। उसने अपनी छाती पर हाथ फेरा और सारी हड्डियाँ फिर से जुड़ गईं।

"गोली काम नहीं कर रही!" शर्मा चिल्लाया।

अंकित वहीं खड़ा था, हिला नहीं। उसकी बाईं आँख में वह देख रहा था जो शर्मा नहीं देख सकता था — इस प्राणी के सीने के भीतर, हड्डियों के ढेर के बीच, एक पतली सी पसली थी। बाकी हड्डियों से बिल्कुल अलग। वह धीरे-धीरे चमक रही थी, पर कमज़ोर चमक से। जैसे कोई डेढ़ वोल्ट का बल्ब बुझने वाला हो। और उसके चारों तरफ हड्डियों का जाल था — दरारें, छेद, टूटन।

"इंस्पेक्टर, रुको। गोली इसकी अपनी हड्डी को नहीं लगेगी। बाकी सब चुराई हुई हैं। यह मरेगा नहीं — जब तक वह असली हड्डी न टूटे।"

"कौन सी असली हड्डी?" शर्मा की आवाज़ फट रही थी।

अंकित ने इशारा किया — सीने के बाईं तरफ, तीसरी और चौथी पसली के बीच, ठीक वहाँ जहाँ इंसान का दिल होता है। "वहाँ। पतली सी। जैसे बच्चे की पसली। वही इसकी जान है।"

प्राणी ने रुककर अंकित की तरफ देखा। उसकी घुटने-जैसी आँखों में कुछ चमका। हैरानी। समझ। डर?

"तुम... देख सकते हो," वह बोला। इस बार आवाज़ साफ़ थी। दर्द भरी। "तुम वो आदमी हो... जिसने खामोशी के किरायेदार को मारा। तुम्हारी बाईं आँख... अलग है।"

अंकित ने कोई जवाब नहीं दिया। वह एक कदम आगे बढ़ा।

"मैं तुम्हारी हड्डियाँ नहीं चुराऊंगा," प्राणी ने कहा। "तुम्हारी हड्डियाँ... दूसरी दुनिया का असर है उन पर। मुझे सिर्फ आम इंसानों की चाहिए। जिनके दर्द की यादें हड्डियों में बसी हुई हैं।"

"वो सतरह लोग जो गायब हैं — वे कहाँ हैं?" शर्मा ने फिर से पिस्टल तान दी।

प्राणी ने मुँह खोलकर एक गहरी, लंबी साँस ली। उसके मुँह से हड्डियों की चरमराहट निकली — और साथ में एक हल्की सी चीख। कई चीखें। सतरह चीखें। सब एक साथ, जैसे कोई रेडियो बंद होने से पहले सभी चैनल एक साथ बजा दे।

"वो मेरे अंदर हैं," प्राणी ने कहा। उसकी आवाज़ अब फूट रही थी। "उनकी हड्डियाँ मेरे शरीर का हिस्सा बन चुकी हैं। उनके दर्द... मेरे दर्द बन गए हैं। हर रात मैं उनका दर्द महसूस करता हूँ। जिसकी कभी टूटी थी, उसका टूटना। जिसकी कभी सुई लगी थी, उसका चुभना। यही मेरी भूख है। और यही मेरी सज़ा है।"







भाग 2 — हड्डियों की कहानी

पुलिस स्टेशन के स्पेशल सेल में सुबह के चार बजे भी लाइटें जल रही थीं। दीवारों पर सतरह लोगों की तस्वीरें लगी हुई थीं — रामकुमार, सोनिया, प्रकाश, मीरा, विनोद, रजनी, जफर, सरिता, बलविंदर, अर्चना, गौतम, फातिमा, संजय, मंजू, चंदन, रेखा, श्याम। हर तस्वीर के नीचे एक हड्डी का नाम लिखा था — कशेरुका, अंगुलिका, जबड़ा, पसली, कलाई, टखना, घुटना, कूल्हा, कंधा, कोहनी, रीढ़, छाती, गर्दन, उरोस्थि, भुजा, जंघा, पिंडली।

अंकित एक कुर्सी पर उल्टा बैठा था, पीठ से कुर्सी का सहारा लिए, फाइलें पलट रहा था। उसकी बाईं आँख पर फिर से पट्टी बँधी थी। इंस्पेक्टर शर्मा सामने खड़े चाय पी रहे थे — बिना चीनी की, कड़वी, जैसी वह हमेशा पीते थे। एक और आदमी कमरे के कोने में बैठा था — सब-इंस्पेक्टर महेंद्र, जो फोरेंसिक का काम देखता था। पतला-दुबला, चश्मे वाला, हाथ में हमेशा एक नोटबुक और एक बॉलपेन।

"अंकित, समझा कुछ?" महेंद्र ने पूछा। उसकी आवाज़ में हमेशा एक जिज्ञासा होती थी, जैसे वह हर चीज़ का फॉर्मूला निकालना चाहता हो।

अंकित ने एक फाइल उठाई — रामकुमार की। "देखो, महेंद्र भाई। रामकुमार मजदूर है। दस साल पहले कमर टूटी थी। ऑपरेशन हुआ, ठीक हो गया, पर बारिश में दर्द होता है। वह दर्द कहाँ रहता है? उसकी रीढ़ के जिस हिस्से में चोट लगी थी, वहाँ हड्डी में एक छोटा सा गैप है — जो कभी नहीं भरा। उसी गैप में उसका दर्द बसा हुआ है, एक याद की तरह।"

शर्मा ने चाय का कप रखा। "तो ये ज़ॉम्बी उस दर्द को खाता है?"

"हाँ। लेकिन सिर्फ दर्द नहीं। वह हड्डी खाता है — जिस हड्डी में दर्द बसा है। वह हड्डी चुराता है, अपने शरीर में लगा लेता है। फिर उस हड्डी के साथ उसका दर्द भी उसे मिल जाता है। और जितना ज़्यादा दर्द वह खाता है, उतना ही ज़्यादा उसे भूख लगती है। यह एक लूप है।"

महेंद्र ने नोटबुक में कुछ लिखा। "लेकिन वह असली हड्डी जो उसके सीने में है, वह किसकी है?"

अंकित ने एक पल सोचा। "उस आदमी की जो कभी ज़िंदा था। जो बहुत कमज़ोर हड्डियों के साथ जी रहा था, और मर गया। मौत के बाद किसी चीज़ ने उसे यह शक्ति दे दी — दूसरों की हड्डियाँ चुराने की। पर हर चुराई हुई हड्डी उसकी अपनी असली हड्डी पर दरार डालती है।"

शर्मा ने माथे पर हाथ रखा। "कितनी दरारें होंगी अब तक?"

"सैंतीस। अलग-अलग शहरों से। हर गायब इंसान के साथ एक हड्डी गायब थी — पर सिर्फ वे लोग गायब हुए जिनकी हड्डी उसने चुराई थी, बाकी के घरों से सिर्फ हड्डी गायब थी, इंसान नहीं। इसका मतलब, यह सिर्फ उन्हीं को अगवा करता है जिनके पास कम से कम दो ऐसी हड्डियाँ हों जो पहले टूट चुकी हों। एक हड्डी चुराता है तो इंसान गायब नहीं होता, बस बेहोश हो जाता है। दो हड्डियाँ चुराता है तो इंसान भी उसके अंदर चला जाता है। सतरहों लोगों से उसने दो-दो हड्डियाँ चुराई हैं।"

महेंद्र की कलम रुक गई। "तो वे लोग... उसके अंदर हैं? ज़िंदा हैं?"

"बेहोश हैं। उनकी आत्माएँ उन हड्डियों से चिपकी हुई हैं जो उसने चुराई हैं। जब तक वे हड्डियाँ उसके शरीर में हैं, तब तक वे लोग न जी रहे हैं, न मरे हैं। बस... रुके हुए हैं।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। शर्मा ने खिड़की खोली, बाहर की हवा ली। सुबह के चार बज चुके थे, पर अभी अंधेरा ही था। कौवे बोलना शुरू कर चुके थे, पर उनकी आवाज़ें भी इस कमरे में अजीब लग रही थीं — जैसे कोई और बोल रहा हो।

"तो अब क्या?" शर्मा ने पूछा।

"अब हम उसके पास वापस जाएँगे," अंकित ने कहा। "लेकिन गोलियाँ नहीं ले जानी। नमक, लोहा, और एक चीज़ और।"

"क्या?"

अंकित ने अपनी गर्दन से एक छोटा सा लॉकेट निकाला। उसे खोला तो अंदर हड्डी का एक छोटा सा टुकड़ा था — एक पसली का टुकड़ा, बहुत छोटा, काँच जैसा चमकता।

"यह क्या है?" महेंद्र ने करीब से देखा।

"नेहा की हड्डी का टुकड़ा। हॉस्पिटल ने दिया था, जब वह मरी। स्मृति चिह्न के तौर पर। उसकी बाईं तीसरी पसली, जो कार हादसे में टूट गई थी। इस हड्डी में नेहा का दर्द है। और उसका दर्द... सबसे तेज़ है। अगर मैं उस ज़ॉम्बी के सामने इस हड्डी को तोड़ दूँ, तो उसका दर्द इतना तीव्र होगा कि ज़ॉम्बी की अपनी पसली पर मौजूद सैंतीस दरारें एक साथ फट जाएँगी। और वह बिखर जाएगा।"

"लेकिन इससे वे सतरह लोग?" शर्मा ने पूछा।

"वे सतरह लोग भी बिखर जाएँगे, क्योंकि उनकी हड्डियाँ भी उसके साथ टूटेंगी।" अंकित ने लॉकेट बंद किया। "इसलिए मैं यह तरीका इस्तेमाल नहीं कर सकता। मुझे कोई दूसरा रास्ता निकालना होगा।"

भाग 3 — दूसरा रास्ता

दूसरा रास्ता अंकित को अगले दिन शाम को पाँच बजे मिला, जब वह अपने कमरे में अकेला बैठा था। कमरा छोटा था — एक चारपाई, एक मेज, एक अलमारी, और दीवार पर नेहा की एक तस्वीर। तस्वीर में वह हँस रही थी, दाँत दिखाकर। वही हँसी जो अंकित ने आखिरी बार देखी थी जब वह हॉस्पिटल में बेहोश पड़ी थी, और फिर कभी नहीं उठी।

अंकित ने अपनी बाईं आँख की पट्टी खोली और तस्वीर को देखा। स्पेक्ट्रल विज़न से तस्वीर हिलने लगी — हिलती नहीं थी, पर उसके रंग बदलने लगते थे। भूरा, पीला, हरा, नीला। हर रंग एक याद थी — नेहा का स्पर्श, उसकी बातें, उसकी चुप्पी, उसकी चीख।

तभी उसे एक बात समझ में आई।

उसने फोन उठाया और शर्मा को फोन लगा दिया। "इंस्पेक्टर, मुझे ज़ॉम्बी से दोबारा मिलना है। अकेले।"

"पागल हो गया है? वह तुझे मार डालेगा।"

"नहीं मारेगा। उसने खुद कहा — मेरी हड्डियाँ उसे चाहिए नहीं। मैं उसके लिए बेकार हूँ। लेकिन मैं उससे बात कर सकता हूँ। उसकी असली हड्डी को समझ सकता हूँ। शायद उसे मुक्ति दिला सकूँ।"

शर्मा ने पाँच सेकंड सोचा। "ठीक है। लेकिन मैं साथ रहूँगा, दूर से। और अगर कुछ गड़बड़ हुई तो मैं पूरा मैगजीन खाली कर दूँगा, भले ही गोली काम न करती हो।"

"ठीक है।"

उस रात, ठीक बारह बजे, अंकित फिर से उसी कब्रिस्तान में था। शर्मा दो सौ गज दूर एक टीले पर बैठा था, दूरबीन से देख रहा था। उसकी पिस्टल उसके घुटने पर रखी थी।

अंकित ने एक बार फिर बाईं आँख खोली। धुँधली नीली-हरी रोशनी में पूरा कब्रिस्तान नहाया हुआ था। और वही काला घूमता हुआ धब्बा — उसी पुरानी कब्र पर। अंकित उसके पास गया। पाँच कदम दूर रुका।

"भगवानदास," उसने कहा।

कालापन हिला। हड्डियाँ खड़खड़ाईं। धीरे-धीरे वह प्राणी उठा — पहले घुटनों के बल, फिर पैरों पर। उसकी हड्डियों की चमक कम हो गई थी। वह और भी कमज़ोर लग रहा था।

"तुम... मेरा नाम जानते हो?"

"मैंने पुलिस रिकॉर्ड खंगाले। चार साल पहले मरे डॉक्टर भगवानदास, हड्डियों के स्पेशलिस्ट। तुम्हारा अस्पताल शहर के पश्चिमी हिस्से में था। गरीबों का मुफ्त इलाज करते थे। सब तुम्हें संत कहते थे।"

प्राणी का पूरा शरीर काँप उठा। "संत... मैं संत नहीं था। मैं एक मूर्ख था। जिसने अपनी हड्डियाँ नहीं बचा सकता था, वह दूसरों की हड्डियाँ क्यों जोड़ रहा था?"

"तुमने हज़ारों लोगों को चलाया।"

"और खुद टूट गया। मेरी पत्नी रोज़ कहती थी — 'अपना भी ख्याल करो।' मैं नहीं सुनता था। जब गिरा तो किसी ने मेरा हाथ नहीं पकड़ा। अस्पताल के बिस्तर पर अकेला मरा। मेरी पसली — यह पतली सी पसली — मेरी माँ के पेट से चली आई थी, कमज़ोर। और मैंने कभी उसे मज़बूत नहीं किया। बस औरों की मज़बूत हड्डियाँ देखता रहा, जलता रहा।"

अंकित ने एक साँस ली। "डॉक्टर साहब, क्या आपको पता है कि मैं क्यों आपसे बात कर रहा हूँ?"

"बचाने के लिए? मारने के लिए?"

"समझाने के लिए। आपके अंदर सतरह लोग हैं। वे आपकी तरह दर्द में हैं। आप उनका दर्द खा रहे हैं, पर उन्हें खाने से आपका अपना दर्द कम नहीं हुआ है, है न? बल्कि बढ़ा है।"

प्राणी चुप रहा।

"क्योंकि दर्द बँटने से कम नहीं होता, डॉक्टर साहब। दर्द बढ़ता है। आप एक मरीज़ का दर्द लेकर अपने अंदर रख लेते हो, तो दर्द दोगुना हो जाता है। आपने सैंतीस लोगों का दर्द लिया है। अब तक आपको सैंतीस गुना ज़्यादा दर्द हो चुका है। यही आपकी भूख है — और यही आपकी मौत भी है।"

प्राणी ने अपनी हड्डियों से बनी छाती पर हाथ रखा। उसकी चमकती हुई आँखें — वे घुटने के जोड़ — अब और भी ज़्यादा चमक रहे थे, पर वह चमक दर्द की थी, रोशनी की नहीं।

"तो क्या करूँ? तुम बताओ, घोस्ट हंटर। मैं उन हड्डियों को बिना तोड़े कैसे बाहर निकालूँ?"

अंकित ने अपनी बाईं आँख बंद कर ली। फिर उसने अपने गले का लॉकेट खोला, नेहा की हड्डी का टुकड़ा बाहर निकाला, और उसे प्राणी के सामने रख दिया — ज़मीन पर, एक कब्र के पत्थर पर।

"यह मेरी नेहा की हड्डी है," अंकित ने कहा। उसकी आवाज़ फट रही थी, पर उसने रोक लिया। "यह टूटी हुई है। पहले से टूटी हुई। लेकिन इसका दर्द अब भी इसमें बसा है। आप इसे खा सकते हैं, अगर आपको भूख है। लेकिन यह दर्द दूसरों जैसा नहीं है। यह दर्द मेरा है। और यह दर्द इतना गहरा है कि आपकी पूरी सैंतीस दरारें एक बार में फट सकती हैं।"

प्राणी ने हड्डी के टुकड़े की तरफ देखा। वह चमक रहा था — एक गहरी सुनहरी रोशनी से, नीली-हरी नहीं। नेहा की रोशनी।

"लेकिन मैं नहीं चाहता कि आप इसे खाएँ," अंकित ने कहा। "मैं चाहता हूँ कि आप इसे छूएँ। बस छूएँ। और फिर इसमें से दर्द को बाहर निकालें — खाने के लिए नहीं, बल्कि छोड़ने के लिए। क्योंकि यह दर्द मैं अब और नहीं सह सकता। मैंने नेहा के मरने के बाद से यह दर्द अपने अंदर रखा है। शायद अगर आप इसे बाहर निकाल दें, तो आपको पता चले कि दर्द को छोड़ना भी एक तरीका है, उसे खाने के अलावा भी।"

भाग 4 — छूटना

प्राणी ने बहुत देर तक हड्डी के टुकड़े को देखा। फिर उसने अपनी हड्डी की उँगलियाँ बढ़ाईं — वे उँगलियाँ जो दूसरों की हड्डियों से बनी थीं — और बड़े ही धीरे से उस हड्डी को छुआ।

कुछ नहीं हुआ।

प्राणी ने अंकित की तरफ देखा। "धोखा?"

"थोड़ा और ज़ोर से। इसे खोलने की कोशिश करो। जैसे तुम किसी मरीज़ का फ्रैक्चर खोलते हो — धीरे से, बिना और नुकसान किए।"

प्राणी ने आँखें बंद कीं — जहाँ उसकी आँखें थीं, वहाँ घुटने के जोड़ बंद हो गए। और फिर उसने हड्डी के टुकड़े को दोनों हाथों में लिया। धीरे से, बहुत धीरे से, उसने उसे निचोड़ा नहीं, बल्कि सुना। जैसे डॉक्टर स्टेथोस्कोप से सुनता है। हड्डी की आवाज़ — कभी टूटने की, कभी जुड़ने की, कभी चुप रहने की।

तभी हड्डी के टुकड़े से एक हल्की सी चीख निकली। नेहा की चीख नहीं, बल्कि उस दर्द की चीख जो अंकित ने चार साल तक अपने सीने में रखी थी। वह चीख ऐसी थी जैसे कोई पानी के अंदर बोल रहा हो — दबी हुई, पर बहुत तेज़।

और फिर वह चीख धीरे-धीरे कम हुई। हड्डी का टुकड़ा चमका — एक बार, दो बार — और फिर बुझ गया। अब वह सिर्फ एक साधारण हड्डी का टुकड़ा था। बिना दर्द के। बिना याद के।

प्राणी ने अपनी आँखें खोलीं। उनमें पानी था — हड्डियों से पानी नहीं निकलता, पर उसकी चमक गीली हो गई थी।

"मैंने... मैंने दर्द बाहर निकाल दिया," उसने फुसफुसाकर कहा। "बिना खाए। बस उसे जाने दिया।"

अंकित ने सिर हिलाया। "अब तुम वही करो जो तुमने इस हड्डी के साथ किया — उन सतरह लोगों की हड्डियों के साथ करो। उनके दर्द को बाहर निकालो, खाओ मत। जाने दो।"

प्राणी ने अपनी छाती पर हाथ रखा। उसकी असली पसली — वह पतली, कमज़ोर — धीरे-धीरे चमकने लगी। और उसके चारों तरफ जो हड्डियाँ चुराई हुई थीं, वे एक-एक करके ढीली होने लगीं। गिरने नहीं लगीं, बल्कि खिसकने लगीं — जैसे कोई बंधन टूट रहा हो।

प्रत्येक हड्डी के साथ एक धुँधली परछाई निकली — वे सतरह लोग। बेहोश, लेकिन ज़िंदा। उनके शरीर हड्डियों के साथ निकले और ज़मीन पर एकत्र होने लगे। प्राणी के शरीर से हड्डियाँ खिसकती गईं, और जैसे-जैसे वे खिसकतीं, प्राणी का अपना शरीर छोटा होता गया। सात फुट से पाँच, पाँच से चार, चार से तीन। अंत में सिर्फ एक बूढ़े आदमी की आकृति रह गई — पारदर्शी, हड्डियाँ नहीं बल्कि हल्की रोशनी की।

भगवानदास।

वह अपने घुटनों पर गिर गया। उसके सामने सतरह लोग बेहोश पड़े थे। उसकी अपनी असली पसली — अब उसके सीने में नहीं बल्कि हाथ में — एक कमज़ोर सी, छिद्रों वाली पसली, जो बच्चे की थी।

"मैंने उनका दर्द ले लिया था," भगवानदास ने कहा, "पर देना नहीं जानता था। तुमने सिखाया, बेटा।"

अंकित ने अपनी बाईं आँख से उसे देखा। प्राणी की ऊर्जा अब धीरे-धीरे ऊपर उठ रही थी — कब्रिस्तान से बाहर, आसमान की तरफ।

"डॉक्टर साहब, आपको जाना होगा।"

"पता है। पर पहले यह लो।" भगवानदास ने अपनी उस असली पसली को हाथ में लिया और उसे अंकित की तरफ बढ़ा दिया। "यह मेरी कमज़ोरी थी। अब तुम्हारी ताकत बने। इसे अपनी बाईं आँख पर रख लेना — तुम्हें और साफ दिखेगा।"

अंकित ने वह पसली ले ली। वह हाथ में हल्की थी, बर्फ़ जैसी ठंडी, पर जैसे ही उसने उसे अपनी बाईं आँख की पट्टी के नीचे रखा, वह पिघल गई — आँख में समा गई। अब उसकी बाईं आँख और भी तेज़ चमकने लगी। पहले वह सिर्फ भूत देख सकता था, अब हड्डियों के अंदर के दर्द तक देख सकता था।

भगवानदास की आत्मा मुस्कुराई। वह धीरे-धीरे पारदर्शी हो गई, और अंत में हवा में घुल गई। उसके जाने के साथ ही कब्रिस्तान की वह भारी हवा हल्की हो गई। झाड़ियाँ हिलना बंद हो गईं। चाँद की रोशनी अब ज़मीन तक आ गई थी।

भाग 5 — सुबह

अगली सुबह, सात बजे, सारे शहर की खबर थी — सतरह गायब लोग अपने-अपने घरों के बाहर बेहोश पाए गए। सबकी हड्डियाँ सलामत थीं। सब ज़िंदा थे। रामकुमार अस्पताल में उठा तो रोने लगा — उसे अपनी कमर में कोई दर्द नहीं था। सोनिया स्कूल गई तो उसने मास्टर जी से कहा — "मैंने एक बूढ़े डॉक्टर को देखा, वह मेरी कलाई सहला रहा था।" किसी को कुछ याद नहीं था। बस एक सपना — एक बूढ़े आदमी का, जो हड्डियाँ जोड़ रहा था, तोड़ नहीं रहा था।

इंस्पेक्टर शर्मा पुलिस स्टेशन में अंकित के सामने बैठा था। उसने चाय का दूसरा कप रखा और कहा, "अब बता, आगे क्या?"

अंकित ने अपनी बाईं आँख पर पट्टी बाँधी। पर अब पट्टी के नीचे से हल्की सी चमक आ रही थी — पहले से ज़्यादा। "अभी-अभी सिग्नल मिला है, इंस्पेक्टर।"

"कैसा सिग्नल?"

"मेरी बाईं आँख। वो अब सिर्फ भूत नहीं दिखाती। हड्डियों के अंदर का दर्द भी दिखाती है। और शहर के पूर्वी हिस्से में... बहुत दर्द है। किसी को बहुत चोट लगी है। कोई मरा नहीं है, पर उसका दर्द इतना तेज़ है कि मैं यहाँ बैठे हुए भी उसे महसूस कर सकता हूँ।"

शर्मा ने चाय खत्म की। "तो चलते हैं।"

"अभी नहीं। यह दर्द आम नहीं है। यह कोई ज़ॉम्बी नहीं है, कोई भूत नहीं है। यह कुछ और है। पहले मुझे इसके बारे में पढ़ना होगा।"

अंकित ने अपना झोला उठाया, उसमें से एक पुरानी किताब निकाली — उसके दादा की, जो अलौकिक चीज़ों पर रिसर्च करते थे। किताब का नाम था — "प्रेत, पिशाच और परछाईं: एक अध्ययन"। उसने किताब खोली और एक पन्ने पर उँगली रखी। उस पन्ने पर लिखा था — "परछाईं चुराने वाला व्यापारी: सायापहर में मिले, अपनी परछाईं न दें, न लें।"

अंकित ने किताब बंद कर दी और शर्मा की तरफ देखा। "अगला केस मिल गया।"

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एपिसोड 2 — परछाईं का व्यापारी

भाग 1 — बिना साये वाले लोग

सुबह के आठ बज रहे थे। सूरज पूरब से निकलकर सिटी सेंटर के ग्लास की इमारतों पर चमक रहा था। पर उस चमक के बीच एक अजीब सी बात थी — फुटपाथ पर चलते हुए लोगों के पैरों के नीचे कोई कालापन नहीं था। परछाईं नहीं थी। सिर्फ सफेद ज़मीन, सिर्फ धूप, बिना साये के।

पहला मामला सामने आया था कल रात। एक बिजनेसमैन, सुरेश मेहरा, अपने ऑफिस से निकला तो उसकी अपनी परछाईं गायब थी। उसने सोचा लाइट का इफ़ेक्ट है। घर जाकर शीशे के सामने खड़ा हुआ — बल्ब जलाया, टॉर्च लगाई, मोबाइल की फ्लैश भी लगाई — परछाईं नहीं बनी। वह दीवार पर हाथ लगाकर देखता रहा, उसकी उँगलियों का साया तक नहीं बन रहा था। वह चीखा। उसकी चीख ने पूरी बिल्डिंग जगा दी।

सुबह तक ऐसे पाँच लोग मिल चुके थे। सबकी परछाईं गायब। सबने बताया कि कल शाम को वे सिटी सेंटर के एक पुराने हॉल में गए थे — किसी एग्जीबिशन के लिए। हॉल में कोई नाम नहीं था, कोई बैनर नहीं था। बस एक दरवाजा था, खुला हुआ। अंदर एक आदमी बैठा था — साधारण सी कुर्ता, पक्की दाढ़ी, हाथ में एक पुरानी सी घड़ी। उसने कहा था — "एक इच्छा पूरी करूँगा, बदले में तुम्हारी परछाईं लूँगा।"

किसी ने उसे पागल समझकर इग्नोर कर दिया। पाँच लोगों ने हाँ कह दी। उनकी इच्छाएँ अलग-अलग थीं — पैसा, नौकरी, प्यार, बदला, सुंदरता। अगले ही पल उनकी परछाईं गायब हो गई। और इच्छाएँ पूरी भी हो गईं — एक को प्रमोशन मिला, एक के बैंक अकाउंट में पैसे आए, एक को उसकी एक्स ने फोन किया। पर हर कोई परछाईं गायब होने के बाद अजीब हो गया। जैसे उनकी पहचान धीरे-धीरे पिघल रही हो।

भाग 2 — अंकित पहुँचा

पुलिस स्टेशन के स्पेशल सेल में अब तीसरा केस था। इंस्पेक्टर शर्मा ने मेज पर पाँचों लोगों की तस्वीरें टेप कर दी थीं। हर तस्वीर के नीचे एक शब्द लिखा था — 'परछाईं गायब'। महेंद्र फोरेंसिक वाला कोने में बैठा कुछ खोज रहा था। अंकित अभी तक नहीं आया था।

"कहाँ है वह?" शर्मा ने चिढ़कर कहा।

"आता होगा," महेंद्र बोला। "तुम जानते हो वह रात में जागता है। भूतों का शिकारी भूतनी का चौकीदार — ऐसे ही थोड़े होता है।"

शर्मा ने उसे घूरा। "महेंद्र, कृपया संभलकर बात कर। वह हमारा केस सुलझाता है।"

"बस मज़ाक कर रहा हूँ, सर।"

तभी दरवाज़ा खुला और अंकित अंदर आया। बाईं आँख पर पट्टी, गले में वही लॉकेट, कंधे पर झोला। इस बार उसकी चाल पहले से अलग थी — पैर ज़मीन पर ज़ोर से पड़ रहे थे, जैसे कोई भारी चीज़ उठाए हुए हो। पर उसके हाथ में कुछ नहीं था।

"देर क्यों हुई?" शर्मा ने पूछा।

"कब्रिस्तान गया था। भगवानदास की कब्र पर। उसने मुझे अपनी पसली दी थी, याद है? उस पसली को समझने में समय लगा।" अंकित ने अपनी बाईं आँख की पट्टी खोली। पुतली में पहले से ज़्यादा चाँदी थी, और उसके चारों तरफ एक हल्की नीली लकीर थी — जैसे बिजली का तार घूम रहा हो। "अब मैं सिर्फ भूत नहीं देख सकता। हर इंसान की परछाईं में छिपी ऊर्जा भी देख सकता हूँ।"

महेंद्र ने नोटबुक उठाई। "परछाईं में ऊर्जा होती है?"

"हर इंसान की परछाईं उसके अंदर की उन चीज़ों को दिखाती है जो वह नहीं दिखाना चाहता — डर, लालच, कमज़ोरी, वो सपने जो अधूरे रह गए। परछाईं कोई छाया नहीं है, महेंद्र भाई। यह इंसान का दूसरा चेहरा है। और इस शहर में कोई ऐसा है जो ये चेहरे चुरा रहा है।"

शर्मा ने पाँचों लोगों के बयान अंकित की तरफ सरका दिए। "पढ़ ले। सबने एक ही बात कही — पुराना हॉल, अनजान आदमी, कुर्ता, दाढ़ी, पुरानी घड़ी, एक इच्छा के बदले परछाईं।"

अंकित ने बयान पढ़े। फिर उसने अपनी बाईं आँख बंद कर ली और दीवार की तरफ मुँह किया। "वह हॉल कहाँ है?"

"पुराना टाउन हॉल, जो बंद पड़ा था। कल रात अचानक खुल गया। आज सुबह जब हम पहुँचे तो दरवाज़ा फिर से बंद था, ताला लगा था। अन्दर कोई नहीं।"

"रात का इंतज़ार करो। आज रात वह फिर खुलेगा।"

भाग 3 — रात का हॉल

रात के ग्यारह बज रहे थे। अंकित, शर्मा, और दो सिपाही — सुरेंद्र और मनोज — पुराने टाउन हॉल के सामने खड़े थे। इमारत सत्तर साल पुरानी थी, जब अंग्रेज़ थे तब बनी थी। अब इसकी दीवारों से प्लास्टर उखड़ रहा था, खिड़कियाँ टूटी हुई थीं, पर दरवाज़ा एकदम नया लग रहा था — लकड़ी का, बिना ताले का, बस एक चिकनी सतह।

"तोड़ें?" सुरेंद्र ने पूछा। वह जवान सिपाही था, छह फुट का, हाथ में डंडा लिए।

"नहीं। यह तब खुलेगा जब कोई अपनी इच्छा लेकर आएगा।"

"तो हम क्या करें?"

"अंदर जाएँ। बिना इच्छा के। बस देखें।"

शर्मा ने सुरेंद्र और मनोज को बाहर रहने को कहा। वह और अंकित अकेले दरवाज़े के पास गए। अंकित ने अपनी बाईं आँख की पट्टी हटाई और दरवाज़े को देखा। उस पर कोई ताला नहीं था, पर उसकी आँख ने एक पतली सी रोशनी दिखाई — जैसे कोई जाल बिछा हो, धागों से बना।

"इस दरवाज़े को कोई खोल नहीं सकता," अंकित ने कहा। "यह खुद खुलता है — जब सही वक्त हो। और आज रात सही वक्त है, क्योंकि चाँद पूरा है।"

अंकित ने दरवाज़े पर हाथ रखा। उसकी बाईं आँख से निकली चाँदी की रोशनी उसकी उँगलियों से होकर दरवाज़े के लकड़ी में घुस गई। लकड़ी में दरारें पड़ने लगीं — सीधी नहीं, बल्कि गोल-गोल, जैसे किसी ने पेंसिल से चक्कर लगाए हों। दरारें बढ़ीं, जुड़ीं, और फिर दरवाज़ा अपने आप खुल गया। अन्दर अंधेरा था — ऐसा अंधेरा जो टॉर्च की रोशनी को भी निगल रहा था।

"चलो," अंकित ने कहा और अंदर चला गया।

शर्मा ने एक बार पीछे मुड़कर सुरेंद्र को इशारा किया — 'बाहर रहो' — और फिर अंकित के पीछे हो लिया।

हॉल के अंदर का हाल कुछ और ही था। बाहर से टूटी-फूटी इमारत, अंदर से बिल्कुल साफ़-सुथरा। फर्श पर संगमरमर बिछा था, दीवारों पर सोने के काम वाली तस्वीरें लटकी थीं, छत पर क्रिस्टल का झाड़-फ़ानूस टिमटिमा रहा था। बीचों-बीच एक लकड़ी की कुर्सी पर एक आदमी बैठा था। कुर्ता पक्का, दाढ़ी सफ़ेद, हाथ में घड़ी — एक पुरानी जेब घड़ी, जिसकी सुइयाँ उल्टी चल रही थीं।

"आओ, आओ," उस आदमी ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई डर नहीं था, कोई गुस्सा नहीं था। बस एक थकी हुई मिठास थी। "बहुत दिनों बाद कोई मेरे पास बिना इच्छा लिए आया है। बैठो।"

अंकित नहीं बैठा। वह सीधा उस आदमी के सामने खड़ा हो गया। "तुम वो हो जो परछाईं चुराता है?"

"मैं चुराता नहीं, बेटा। मैं लेता हूँ — बदले में कुछ देकर। यह व्यापार है। मैं व्यापारी हूँ।"

"तुम भूत हो?"

"भूत तो वे होते हैं जो मर चुके होते हैं। मैं कभी पैदा ही नहीं हुआ था। मैं उसी दरार से निकला हूँ जहाँ से इच्छाएँ और परछाईं दोनों आती हैं — इंसान के दिल की।"

शर्मा ने पिस्टल निकाल ली। "हाथ ऊपर कर।"

व्यापारी मुस्कुराया। उसने हाथ उठाया, पर पिस्टल की तरफ नहीं, बल्कि घड़ी की तरफ। उसने घड़ी की सुई घुमाई — एक बार, दो बार। और अचानक शर्मा की पिस्टल उसके हाथ से गिर गई। नहीं, गिरी नहीं, बल्कि पिघल गई। धातु ज़मीन पर पसर गई, जैसे तेज़ गरमी में मक्खन।

"हथियार यहाँ काम नहीं करते, इंस्पेक्टर साहब। यहाँ इच्छाएँ चलती हैं। और तुम दोनों के पास मेरे लिए कोई इच्छा नहीं है। फिर भी तुम आए। क्यों?"

अंकित ने अपनी बाईं आँख खोली। व्यापारी को देखा — और उसने जो देखा, उससे उसकी साँस रुक गई।

व्यापारी के पीछे एक विशाल परछाईं थी। पर वह उसकी अपनी परछाईं नहीं थी। वह हजारों परछाइयों का एक ढेर था — एक-दूसरे पर चढ़ी हुई, कराहती हुई, चीखती हुई। हर परछाईं एक इंसान की थी, जिसने कभी अपनी इच्छा पूरी करने के लिए उसे बेच दिया था। अब वे परछाईं व्यापारी के पीछे बँधी हुई थीं, और उनके द्वारा वह दुनिया में हस्तक्षेप करता था।

"तुमने कितनी परछाईं ली हैं?" अंकित ने पूछा।

"अब तक? एक हज़ार तिरासी। सात सौ साल में। हाँ, मैं बूढ़ा हूँ। हर परछाईं के बदले मैंने एक इच्छा पूरी की। कोई छोटी, कोई बड़ी। कोई पैसा चाहता था, कोई मौत। मैंने सब दिया। पर असली चीज़ तो परछाईं है, साहब। परछाईं के बिना इंसान धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। पहले उसकी यादें जाती हैं, फिर उसकी पहचान, फिर वह खुद। और अंत में वह सिर्फ एक खोल रह जाता है — चलता-फिरता, पर बिना किसी अंदर के।"

"ये पाँच लोग जिनकी परछाईं तुमने कल ली — उनका क्या होगा?"

"सात दिन में उनकी यादें चली जाएँगी। चौदह दिन में वे अपना नाम भूल जाएँगे। इक्कीस दिन में वे मुझमें समा जाएँगे — जैसे ये सब।" उसने पीछे की ओर इशारा किया। हजारों परछाईं चिल्लाईं।

भाग 4 — सौदा

अंकित एक कदम और आगे बढ़ा। "उन पाँचों को वापस कर। और इन एक हज़ार तिरासी को भी।"

व्यापारी हँसा। "वापस? यह कोई दुकान नहीं है कि सामान लौटा दूँ। परछाईं एक बार मिल गई तो वापस नहीं मिलती। जैसे खोया हुआ वक्त।"

"तो फिर तुम्हें रोकने का क्या तरीका है?"

"तरीका है। मुझे एक परछाईं दो — अपनी। उसके बदले मैं ये सारी परछाईं छोड़ दूँगा। एक के बदले हज़ार। अच्छा सौदा है।"

शर्मा ने अंकित का हाथ पकड़ा। "मत सुन इसकी। यह झूठ बोल रहा है।"

"नहीं, इंस्पेक्टर, मैं झूठ नहीं बोलता। मैं व्यापारी हूँ। मैंने जो वादा किया, वह निभाया। इन पाँचों को मैंने इच्छा दी, और उनकी परछाईं ली। यह सौदा था। अब तुमसे सौदा कर रहा हूँ — अपनी परछाईं दो, बाकी सब छोड़ दूँगा।"

अंकित चुप था। उसकी बाईं आँख में व्यापारी के पीछे की परछाइयाँ साफ़ दिख रही थीं। वे सब चीख रही थीं, पर आवाज़ नहीं थी। सिर्फ हाव-भाव थे। हाथ जोड़े हुए, माथे पर हाथ रखे, घुटनों पर गिरे हुए। वे माँग रहे थे — छुड़ाओ, बचाओ।

"मैं अपनी परछाईं नहीं दूँगा," अंकित ने कहा।

"तो फिर ये पाँचों सात दिन में खत्म हो जाएँगे। और मैं कल और परछाईं लूँगा, परसों और। जब तक पूरा शहर साया नहीं बन जाता।"

अंकित ने अपनी बाईं आँख से व्यापारी के सीने में झाँका। वहाँ कोई हड्डी नहीं थी, कोई दिल नहीं था। बल्कि एक घड़ी थी — वही जेब घड़ी, जो उसके हाथ में थी, पर उसका असली रूप। घड़ी के अंदर सूइयाँ उल्टी चल रही थीं, और हर बार जब एक परछाईं उसमें समाती थी, सूई एक कदम आगे बढ़ जाती थी। एक हज़ार तिरासी कदम बढ़ चुके थे।

"तुम्हारी घड़ी," अंकित ने कहा। "अगर वह रुक जाए, तो क्या होगा?"

व्यापारी का चेहरा पहली बार बदला। उसकी मुस्कान गायब हो गई। "घड़ी नहीं रुक सकती।"

"अगर मैं उसे तोड़ दूँ?"

"तो मैं नहीं रहूँगा। और ये सारी परछाईं बिखर जाएँगी — कुछ वापस अपने मालिकों के पास, कुछ हवा में, कुछ कभी नहीं। निश्चितता नहीं है।"

"निश्चितता तो तुम्हारे पास भी नहीं है। तुम सिर्फ एक सौदागर हो, भगवान नहीं।"

अंकित ने अपनी बाईं आँख की पूरी शक्ति लगा दी। उसकी पुतली से चाँदी की रोशनी निकलकर सीधे घड़ी पर जा लगी। घड़ी की काँच में दरार पड़ी। एक, दो, तीन — दरारें बढ़ने लगीं। व्यापारी चिल्लाया — पहली बार उसने चीख निकाली, और वह चीख इंसानी नहीं थी। वह हजारों चीखों का मिश्रण थी, उन सभी की जिनकी परछाईं उसने ली थी।

"रुक! मैं सौदा बदलता हूँ!"

अंकित ने रोशनी कम नहीं की। "बोल।"

"तुम्हारी पूरी परछाईं नहीं — सिर्फ उसका एक टुकड़ा। जितना एक उँगली के बराबर हो। उसके बदले मैं ये पाँचों परछाईं लौटा दूँगा, और एक हज़ार तिरासी में से सौ सबसे पुरानी भी छोड़ दूँगा।"

"सौ नहीं। सब।"

"यह असंभव है। सब छोड़ दिए तो मैं खत्म हो जाऊँगा।"

"तो खत्म हो जा। तूने सात सौ साल लोगों का साया चुराया है। अब बस कर।"

व्यापारी ने घड़ी को दोनों हाथों से पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ पिघलने लगी थीं — परछाईं की तरह। उसने आखिरी कोशिश की — "आधी परछाईं दो। बस आधी। और मैं तुम्हें एक चीज़ दूँगा जो तुम्हारी बाईं आँख को और ताकत देगी।"

"क्या चीज़?"

"तुम्हारी माँ की परछाईं का टुकड़ा। वह मेरे पास है। वह कभी मरी नहीं, बस गायब हो गई थी — क्योंकि उसने अपनी परछाईं मुझे बेच दी थी।"

भाग 5 — सच

अंकित ठिठक गया।

उसकी माँ — अंकित दस साल का था जब उसकी माँ एक दिन बिना कुछ बताए घर से निकली और वापस नहीं आई। पुलिस ने ढूँढा, रिश्तेदारों ने ढूँढा, कोई पता नहीं चला। उसके पिता ने बताया कि वह पागल हो गई थी। पर अंकित को कभी यकीन नहीं हुआ। और अब यह व्यापारी कह रहा था कि उसकी माँ ने अपनी परछाईं बेच दी थी।

"झूठ बोल रहा है तू," अंकित ने कहा, पर उसकी आवाज़ काँप रही थी।

"सच है। तेरी माँ का नाम कविता था। वह तेरे जन्म के बाद से उदास रहती थी। उसे लगता था कि वह एक अच्छी माँ नहीं है, क्योंकि वह तुझसे प्यार नहीं कर पा रही थी — जैसा करना चाहिए था। उसने मुझसे एक इच्छा माँगी — 'मुझे अपने बेटे से प्यार करने की ताकत दो।' मैंने उसकी परछाईं ले ली, और उसे प्यार दे दिया। पर प्यार परछाईं के बिना अधूरा था। वह तुझे छू तो सकती थी, पर उसका स्पर्श ठंडा था। वह तुझे देख सकती थी, पर उसकी आँखों में तू बस एक धुंधला सा शक्ल था। एक दिन वह चली गई। क्योंकि परछाईं के बिना कोई भी लंबे समय तक अपनों के साथ नहीं रह सकता।"

अंकित के हाथ काँप रहे थे। उसकी बाईं आँख की रोशनी कम हो गई थी। शर्मा ने उसका कंधा पकड़ लिया। "अंकित, यह तेरी कमज़ोरी दिखा रहा है। संभल जा।"

"मैं संभल हूँ, इंस्पेक्टर।" अंकित ने गहरी साँस ली। "व्यापारी, मेरी माँ की परछाईं का टुकड़ा कहाँ है?"

"मेरे पास। सुरक्षित। अगर तू अपनी आधी परछाईं देगा, तो मैं वह टुकड़ा तुझे दे दूँगा। और तू अपनी माँ को आखिरी बार देख सकेगा — उसकी परछाईं में।"

अंकित ने अपनी बाईं आँख बंद कर ली। फिर उसने अपने गले का लॉकेट खोला — नेहा की हड्डी वाला — और उसे अपनी हथेली में रख लिया। "सुन, व्यापारी। मैं तुझसे कोई सौदा नहीं करूँगा। मैं तेरी घड़ी तोड़ दूँगा, चाहे मेरी माँ की परछाईं खत्म हो जाए। क्योंकि मेरी माँ ने अपनी परछाईं तुझे दी थी — यह उसकी गलती थी, मेरी नहीं। और मैं उसकी गलती सुधारने के लिए अपनी गलती नहीं करूँगा।"

व्यापारी ने घड़ी ज़मीन पर पटक दी। वह टूट गई। काँच के टुकड़े बिखर गए। सूइयाँ रुक गईं। और फिर — एक भयंकर आवाज़ — जैसे हज़ारों दरवाज़े एक साथ खुल रहे हों। व्यापारी के पीछे की सारी परछाईं आज़ाद हो गईं। वे इधर-उधर भागने लगीं, कुछ दीवारों में समा गईं, कुछ फर्श में, कुछ सीधे आसमान की तरफ उड़ गईं।

पाँचों नई परछाईं अपने मालिकों के पास लौट गईं — उन पाँच लोगों के पास जो बिना साये के थे। एक हज़ार तिरासी में से करीब आठ सौ परछाईं अपने मूल मालिकों के पास लौट गईं — जो सात सौ साल में कभी मर चुके थे या अभी जी रहे थे। बाकी दो सौ अस्सी तीन परछाईं हवा में उड़ गईं, टुकड़े-टुकड़े हो गईं, जैसे धुआँ।

और व्यापारी — वह पिघलने लगा। पहले उसका कुर्ता गायब हुआ, फिर उसकी दाढ़ी, फिर उसका चेहरा। अंत में सिर्फ एक पुरानी घड़ी रह गई — टूटी हुई, बिना सुइयों के। और उसके बगल में एक छोटा सा काला टुकड़ा पड़ा था — इंसान की उँगली के बराबर — एक परछाईं का टुकड़ा। अंकित की माँ का।

भाग 6 — आखिरी मुलाकात

अंकित ने वह टुकड़ा उठाया। वह उसके हाथ में ठंडा था, पर धीरे-धीरे गर्म होने लगा। उसने उसे अपनी बाईं आँख के सामने रखा। परछाईं के टुकड़े से एक आकृति उभरी — एक महिला, पतली, थकी हुई, पर मुस्कुराती हुई।

"बेटा," उसने कहा। उसकी आवाज़ हवा की तरह थी — हल्की, दूर से आती हुई।

"माँ?"

"मैंने तुझे छोड़ा था, पर तू कभी मेरा नहीं छूटा। मैं तुझसे प्यार करती थी, पर कर नहीं पा रही थी — जैसे करना चाहिए था। इसलिए मैंने वह सौदा किया। गलती की।"

"तुम अब कहाँ हो?"

"जहाँ सब परछाईं जाती हैं, जब उनके मालिक मर जाते हैं। एक जगह — अंधेरा, पर डरावना नहीं। बस... खाली। पर अब तूने मुझे आज़ाद कर दिया। मैं कहीं भी जा सकती हूँ।"

"यहाँ रहो। मेरे पास।"

"नहीं, बेटा। परछाईं ज़िंदा लोगों के पास रहती हैं। मैं तो बस एक टुकड़ा हूँ। मुझे जाने दे। पर याद रखना — मैंने तुझसे प्यार किया था। बस दिखा नहीं सकती थी।"

आकृति धीरे-धीरे पिघल गई। टुकड़ा हाथ में हल्का होता गया और अंत में गायब हो गया। अंकित के हाथ में कुछ नहीं बचा, सिर्फ नेहा की हड्डी का लॉकेट था।

शर्मा ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "चल, यहाँ से निकलते हैं।"

अंकित ने अपनी बाईं आँख पर पट्टी बाँध ली। "हाँ। अब यह हॉल कभी नहीं खुलेगा। व्यापारी खत्म हो गया।"

भाग 7 — अगली सुबह

सुबह की खबर में बताया गया कि पाँचों लोगों की परछाईं वापस आ गई थी। वे खुद भी हैरान थे — उन्हें याद था कि उन्होंने एक इच्छा माँगी थी, पर उनकी इच्छाएँ भी वापस पलट गई थीं। प्रमोशन रद्द हो गया, पैसे गायब हो गए, एक्स का फोन बंद हो गया। पर उन्हें इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा। उनके पास उनकी परछाईं थी — और परछाईं के साथ उनकी पहचान, उनकी यादें, उनका दर्द।

इंस्पेक्टर शर्मा स्टेशन में अंकित के सामने बैठा था। दोनों चुप थे। फिर शर्मा ने कहा, "तेरी माँ... तूने उसे देखा। कैसा लगा?"

अंकित ने एक लंबा साँस लिया। "जैसे कोई पुराना ज़ख्म भर गया हो। पर उसकी जगह कोई और दर्द नहीं आया। बस... खालीपन भर गया।"

"तो अब आगे?"

अंकित ने अपनी बाईं आँख पर हाथ रखा। पट्टी के नीचे से हल्की सी चमक आ रही थी — अब वह पहले से भी ज़्यादा तेज़ थी। "मुझे एक और सिग्नल मिल रहा है। शहर के उत्तरी हिस्से में — एक पुरानी हवेली। वहाँ कोई रात में रोता है। पर आवाज़ आदमी की नहीं है।"

"तो फिर किसकी है?"

"पता नहीं। पर जानना है।"

अंकित ने झोला उठाया और दरवाज़े की तरफ बढ़ गया। शर्मा ने पीछे से आवाज़ लगाई — "पर अभी तो सुबह है।"

"परछाईं का व्यापारी सुबह में नहीं मिलता था। यह नया शिकार रात का है। मैं तैयारी करूँगा। तुम इंतज़ार करो।"

और अंकित धूप में निकल गया — बिना परछाईं के नहीं, उसकी अपनी परछाईं साफ-साफ उसके पीछे चल रही थी, जैसे कोई साथी हो।

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एपिसोड 2 समाप्त








एपिसोड 3 — भेड़िये का श्राप

भाग 1 — पूर्णिमा की रात

शहर के उत्तरी हिस्से में एक पुरानी हवेली थी — राठौर हवेली। सौ साल पहले बनी, अब खंडहर। लोग कहते थे कि यहाँ रात में भेड़िये चिल्लाते हैं, पर इस इलाके में भेड़िये नहीं होते। फिर भी, हर पूर्णिमा पर हवेली से एक अजीब सी आवाज़ आती — न चिल्लाहट, न गुर्राहट, बल्कि एक दबी हुई कराह, जैसे कोई इंसान और जानवर के बीच फँसा हो।

पिछले तीन महीने में इस हवेली के आसपास छह लोग गायब हो चुके थे। सबकी लाशें बाद में मिलीं — पर लाशें नहीं, बल्कि उनके कटे हुए कपड़े और खून के छींटे। शरीर का कोई हिस्सा नहीं मिला था। पुलिस ने केस बंद कर दिया था। इंस्पेक्टर शर्मा ने अंकित को बुलाया।

अंकित उस रात हवेली के सामने खड़ा था। उसकी बाईं आँख पर पट्टी थी, पर वह हवा को सूंघ रहा था — एक नई आदत, जो भगवानदास की पसली मिलने के बाद आई थी। उसे गंध से पता चलता था कि कहाँ कोई अलौकिक चीज़ छिपी है। और इस हवेली से जो गंध आ रही थी, वह कभी भी नहीं सूंघी थी। जंगली जानवर की तरह, पर उसमें इंसानी पसीने की मिलावट थी। और लोहे की गंध — खून की।

"इंस्पेक्टर," अंकित ने धीमी आवाज़ में कहा, "तुम अंदर मत आना। यह कुछ अलग है।"

शर्मा ने पिस्टल निकाल ली थी — नई पिस्टल, पुरानी पिघल गई थी व्यापारी के हॉल में। "मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ सकता।"

"यहाँ गोली नहीं चलेगी। यह भूत नहीं है, यह कोई परछाईं नहीं है। यह कोई जानवर है — पर जानवर नहीं।"

"तो क्या है?"

"वेयरवुल्फ। भेड़िया-मानव। जो पूर्णिमा पर अपना रूप बदलता है। और आज पूर्णिमा है।"

ठीक तभी, हवेली के अंदर से एक चीख आई। इंसानी चीख, मदद के लिए। अंकित दौड़ा। शर्मा भी, भले ही उसने कहा था न आने को।

अंदर अंधेरा था, पर अंकित की बाईं आँख ने पूरा कमरा रोशन कर दिया। हवेली का मुख्य हॉल खाली था — सिर्फ टूटी कुर्सियाँ, जालों से ढकी झूमरें, और फर्श पर खून के धब्बे। चीख दूसरी मंजिल से आ रही थी। वे सीढ़ियाँ चढ़े।

ऊपर एक बड़ा कमरा था — जैसे ड्राइंग रूम। बीचों-बीच एक आदमी घुटनों के बल बैठा था, उसकी पीठ पर गहरे नाखून के निशान थे। उसके सामने एक विशालकाय आकृति खड़ी थी — सात फुट से ऊँची, शरीर पर काले-भूरे बाल, हाथों की जगह पंजे, मुँह से लार टपक रही थी, और आँखें पीली, चमकती हुई। उसने अंकित और शर्मा की तरफ देखा — और गुर्राया। गुर्राहट इतनी तेज़ थी कि शीशे टूट गए।

"पुलिस! रुक जा!" शर्मा चिल्लाया, पर उसकी आवाज़ काँप रही थी।

वेयरवुल्फ ने एक छलांग लगाई — सीधे शर्मा पर। अंकित ने उसे धक्का दिया, शर्मा बच गया, पर अंकित खुद वेयरवुल्फ की चपेट में आ गया। पंजा उसकी बाँह पर लगा — तीन गहरी खरोंचें, खून निकल आया। पर वेयरवुल्फ ने अंकित को छोड़ा नहीं। उसने अपना मुँह खोला और अंकित के कंधे पर दाँत गड़ा दिए।

दर्द असहनीय था। अंकित चिल्लाया। उसकी बाईं आँख तेज़ चमकी — चाँदी की रोशनी निकलकर वेयरवुल्फ के चेहरे पर लगी। वेयरवुल्फ चिल्लाया, पीछे हटा, और फिर खिड़की तोड़कर बाहर भाग गया। अंकित फर्श पर गिर पड़ा। उसके कंधे से खून बह रहा था, पर खून सामान्य लाल नहीं था — उसमें चाँदी जैसी चमक थी। और घाव के आसपास की त्वचा काली पड़ने लगी थी।

भाग 2 — श्राप

अगली सुबह अंकित अस्पताल में उठा। उसके कंधे पर पट्टी बँधी थी, पर डॉक्टर ने कहा कि घाव भर गया है — जो तीन दिन में भरना चाहिए था, वह रात भर में भर गया। अजीब बात यह थी कि पट्टी हटाने पर वहाँ कोई निशान नहीं था। सिर्फ तीन पतली सी सफेद लकीरें, जैसे बिजली के निशान।

"तुम्हारा शरीर तेज़ी से रिकवर कर रहा है," डॉक्टर ने कहा। "कभी ऐसा देखा नहीं।"

अंकित को पता था। यह वेयरवुल्फ का काटना था — या तो वह मर जाता, या श्रापित हो जाता। वह मरा नहीं था। तो अब वह श्रापित था।

शर्मा उसके पास बैठा था। चेहरा पीला। "अंकित, तेरे खून की जाँच आई है। उसमें कुछ... जानवर वाला डीएनए मिला है। भेड़िये का।"

"मुझे पता है। मैं वेयरवुल्फ बन जाऊँगा। अगली पूर्णिमा पर।"

"नहीं। कोई इलाज है?"

"है। उस वेयरवुल्फ को मारना जिसने मुझे काटा। वह 'अल्फा' है। उसे मारूंगा तो श्राप खत्म हो जाएगा। पर उसे मारना आसान नहीं है। वह सिर्फ पूर्णिमा पर बाहर आता है, और उस समय वह अपनी सबसे ताकतवर अवस्था में होता है। चाँदी की गोली से मरता है। हमारे पास चाँदी नहीं है।"

"मैं मँगवाता हूँ।"

"उससे पहले, इंस्पेक्टर, मुझे यह पता लगाना है कि यह वेयरवुल्फ कौन था। वह कोई जानवर नहीं है। वह किसी इंसान का श्रापित रूप है। जो इंसान दिन में सामान्य रहता है, और रात में भेड़िया बन जाता है।"

अंकित ने अस्पताल छोड़ दिया — डॉक्टर के मना करने के बावजूद। वह सीधे पुलिस स्टेशन गया, और महेंद्र से पिछले छह महीने में गायब हुए सभी लोगों की फाइलें मँगवा लीं। उसने पैटर्न ढूँढा — सभी गायब लोग उसी इलाके के रहने वाले थे, और सबके शरीर के टुकड़े उस हवेली के आसपास मिले थे। पर एक बात अटपटी थी — हर लाश के पास एक छोटा सा चाँदी का सिक्का रखा होता था। जैसे कोई निशानी छोड़ रहा हो।

"यह कोई आम वेयरवुल्फ नहीं है," अंकित ने कहा। "यह कोई है जो अपने श्राप पर काबू रखता है। वह जानबूझकर ये सिक्के छोड़ रहा है। शायद कोई संदेश।"

महेंद्र ने सिक्कों पर गौर किया। "ये सिक्के सौ साल पुराने हैं। राठौर राजघराने के।"

"तो वेयरवुल्फ इसी हवेली का कोई पुराना निवासी है।"

भाग 3 — राठौर का इतिहास

अंकित और शर्मा उसी शाम हवेली के पिछले हिस्से में एक छिपी हुई लाइब्रेरी में घुसे। वहाँ उन्हें एक पुरानी डायरी मिली — जिसके पन्ने सड़ चुके थे, पर कुछ हिस्से पढ़े जा सकते थे। डायरी किसी "कुंवर विक्रमादित्य राठौर" की थी, जो सौ साल पहले इस हवेली में रहता था।

डायरी में लिखा था:

"मैंने वह भेड़िया मारा था, पर उसने मुझे काट लिया। अब मैं हर पूर्णिमा पर उसी राक्षस में बदल जाता हूँ। मैंने अपने परिवार को दूर भेज दिया, ताकि उन्हें नुकसान न पहुँचाऊँ। पर आज रात मैं फिर बदलूँगा। और कल सुबह मैं अपने हाथों में खून देखूँगा। मुझे कोई मार डाले। चाँदी की गोली से। मैंने अपने ताबूत में एक चाँदी की पिस्तौल रखी है।"

अंकित ने डायरी बंद कर दी। "विक्रमादित्य राठौर — वही वेयरवुल्फ है। पर वह सौ साल पहले मर चुका होगा।"

"भूत वेयरवुल्फ?" शर्मा ने पूछा।

"नहीं। श्राप उसकी आत्मा से चिपक गया। वह मरा नहीं, बल्कि अमर हो गया — एक लाश की तरह जो हर पूर्णिमा पर जागती है। और जिसे वह काटता है, वह भी वेयरवुल्फ बन जाता है। पर वे नए वेयरवुल्फ उसके गुलाम बन जाते हैं। जब तक वह अल्फा है, तब तक कोई आज़ाद नहीं हो सकता।"

"तो तू उसे मारेगा?"

"हाँ। अगली पूर्णिमा पर। पर उससे पहले, मुझे अपने अंदर बढ़ती हुई शक्ति को काबू करना होगा।"

भाग 4 — पहला बदलाव

तीन दिन बाद पूर्णिमा थी। पर उससे एक रात पहले, अंकित ने महसूस किया कि उसके अंदर कुछ जाग रहा है। वह अपने कमरे में अकेला था। चाँद खिड़की से दिख रहा था — पूरा नहीं, पर लगभग। उसकी उँगलियाँ मुड़ने लगीं, नाखून बढ़ने लगे। उसके कान नुकीले हो गए। उसे भूख लगी — कच्चे माँस की। उसने अपने आप को संभाला। बाथरूम के शीशे में उसने अपना चेहरा देखा — आँखें पीली हो रही थीं, दाँत बढ़ रहे थे। पर पूरा बदलाव नहीं हुआ, क्योंकि चाँद पूरा नहीं था।

"यह सिर्फ शुरुआत है," उसने खुद से कहा। "पूर्णिमा पर मैं पूरी तरह बदल जाऊँगा। तब तक मुझे उस अल्फा को ढूँढकर मारना होगा।"

उसने फोन किया शर्मा को। "इंस्पेक्टर, मुझे उस हवेली के आसपास के सारे पुराने नक्शे चाहिए। और राठौर परिवार के बारे में सब कुछ।"

शर्मा ने महेंद्र से कहा, और दो घंटे में पूरी फाइल तैयार थी। राठौर परिवार का आखिरी जीवित सदस्य एक बूढ़ी औरत थी — श्रीमती कमला राठौर, जो अब शहर के दूसरे छोर पर एक छोटे से मकान में रहती थी, नब्बे साल की, अकेली। अंकित उसके पास गया।

बूढ़ी औरत ने दरवाज़ा खोला तो उसकी नज़र अंकित की बाईं आँख की पट्टी पर पड़ी। "तुम वह हो जो भूत देखता है?"

"हाँ। और अब वेयरवुल्फ भी।"

"अंदर आ जा, बेटा। मैं तुझे सब बताती हूँ।"

उसने बताया कि विक्रमादित्य उसके दादा के बड़े भाई थे। एक बार शिकार पर गए थे, तो एक अजीब भेड़िये ने उन पर हमला कर दिया। उन्होंने भेड़िये को मार डाला, पर खुद काट लिए गए। फिर श्राप शुरू हुआ। परिवार ने उन्हें हवेली में कैद कर दिया। हर पूर्णिमा पर वह बदलता, और सुबह अपने कमरे में बेहोश पड़ा मिलता। एक दिन वह गायब हो गया। सबको लगा वह मर गया, पर उसका शरीर कभी नहीं मिला।

"वह मरा नहीं है," अंकित ने कहा। "वह हवेली के नीचे किसी तहखाने में सो रहा है। और हर पूर्णिमा पर जागता है।"

"तो तू उसे मारेगा?"

"हाँ। पर उससे पहले, मुझे अपने श्राप को काबू करना होगा। वरना मैं खुद उसका गुलाम बन जाऊँगा।"

भाग 5 — तहखाने में युद्ध

अगली रात पूर्णिमा थी। चाँद गोल और चमकीला। अंकित ने अपनी बाईं आँख की पट्टी हटा रखी थी। वह जानता था कि जैसे ही अंधेरा गहराएगा, वह बदलना शुरू हो जाएगा। उसके पास समय कम था।

उसने शर्मा को बाहर रहने को कहा, और अकेले ही हवेली के तहखाने में उतर गया। सीढ़ियाँ बहुत पुरानी थीं, पत्थर की, और नीचे अंधेरा घना था। पर उसकी बाईं आँख ने सब दिखा दिया — तहखाने के बीच में एक पत्थर का ताबूत था, जिसका ढक्कन आधा खुला था।

अंकित ने ताबूत के अंदर देखा। वहाँ एक आदमी पड़ा था — सूखा हुआ, ममी जैसा, पर उसकी आँखें बंद नहीं थीं। वह सो नहीं रहा था, वह जाग रहा था। बस चाँद का इंतज़ार कर रहा था।

जैसे ही चाँद की रोशनी तहखाने की एक दरार से अंदर पहुँची, ताबूत में पड़ा आदमी उठा। उसकी त्वचा फटी, हड्डियाँ चटकीं, और वह बदलने लगा — एक विशाल भेड़िये में, सौ साल पुराने, आँखों में खून, मुँह से आग जैसी साँस।

विक्रमादित्य राठौर — असली वेयरवुल्फ।

अंकित के पास चाँदी की कोई गोली नहीं थी। पर उसके पास अपनी बाईं आँख थी, और अब उसके अंदर आधा-अधूरा भेड़िया भी जाग रहा था। वह बदलने लगा — उसके हाथ पंजे में बदले, दाँत बढ़े, कद बढ़ा। पर उसने अपना मानसिक संतुलन बनाए रखा। वह पूरी तरह से जानवर नहीं बना — आधा इंसान, आधा भेड़िया। उसकी बाईं आँख पहले से भी तेज़ चमक रही थी, चाँदी की रोशनी से, जो वेयरवुल्फ के लिए जहर थी।

विक्रमादित्य ने छलांग लगाई। अंकित ने बचने की बजाय सीधा उसके सीने पर अपने पंजे मारे। दोनों भेड़िये आपस में भिड़ गए — नाखून, दाँत, गुर्राहट, खून। अंकित कमज़ोर था, क्योंकि उसने अभी-अभी श्राप पाया था, जबकि विक्रमादित्य सौ साल से इसी रूप में था। पर अंकित के पास एक फायदा था — उसकी बाईं आँख की चाँदी जैसी रोशनी, जो वेयरवुल्फ की त्वचा को जला रही थी।

उसने अपनी बाईं आँख पूरी ताकत से खोली। रोशनी की एक किरण सीधे विक्रमादित्य के मुँह में घुस गई। वेयरवुल्फ चिल्लाया — दर्द से नहीं, बल्कि उस याद से जो सौ साल से उसे जकड़े थी। अंकित ने उसी वक्त अपने पंजे से उसका दिल निकाल लिया। दिल काला था, सड़ा हुआ, पर उसके बीच में एक छोटी सी चाँदी की गोली थी — जो विक्रमादित्य ने खुद कभी अपने सीने में लगा ली थी, पर मरा नहीं था।

गोली निकालते ही विक्रमादित्य का शरीर धूल में बदल गया। उसकी आत्मा — एक बूढ़े, थके हुए आदमी की — अंकित के सामने आई, मुस्कुराई, और गायब हो गई।

भाग 6 — श्राप खत्म, पर बदलाव बाकी

अंकित का भेड़िया रूप धीरे-धीरे पिघल गया। वह फिर से इंसान बन गया, पर उसके कंधे पर वही तीन सफेद लकीरें थीं — और उसकी बाईं आँख अब पहले से भी तेज़ चमक रही थी। श्राप खत्म हो गया था — क्योंकि अल्फा मर चुका था। अंकित अब पूर्णिमा पर वेयरवुल्फ नहीं बनेगा।

पर कुछ बदलाव रह गए थे। उसकी सूंघने की शक्ति बहुत तेज़ हो गई थी। वह अंधेरे में देख सकता था — बिना अपनी बाईं आँख के भी। उसकी ताकत बढ़ गई थी, और उसके घाव बहुत तेज़ी से भरते थे। भगवानदास की पसली, परछाईं के व्यापारी से मिली माँ की परछाईं का टुकड़ा, और अब भेड़िये की शक्तियाँ — ये सब उसकी बाईं आँख में समा गए थे।

शर्मा तहखाने में आया। "खत्म?"

"हाँ। अब कोई और नहीं मरेगा।"

"तू ठीक है?"

"हूँ। पहले से भी ज़्यादा।"

उस रात के बाद, अंकित ने अपने नए शरीर का इस्तेमाल केस सुलझाने में किया। एक बार एक बच्चा कुएँ में गिर गया — अंकित ने भेड़िये जैसी ताकत से पत्थर उठाकर उसे बाहर निकाला। एक बार एक आत्मा रात में कब्रिस्तान में मिली जो केवल भेड़िये की गंध से पहचानी जा सकती थी — अंकित ने उसे ढूँढ निकाला। हर केस सुलझाने के साथ उसे लगता था कि श्राप का असर कम हो रहा है — पर पूरी तरह नहीं। शायद भेड़िये की शक्तियाँ अब उसका हिस्सा बन चुकी थीं, चाहे श्राप खत्म हो जाए।

एक रात, वह अपने कमरे में बैठा था, तो उसकी बाईं आँख ने एक और सिग्नल दिखाया — एक नीली चमक, शहर के पूर्वी हिस्से से। वहाँ कोई बहुत पुराना खतरा था। कोई ऐसा जो सदियों से सो रहा था, और अब जाग रहा था।

अंकित ने अपना झोला उठाया और शर्मा को फोन किया। "इंस्पेक्टर, अगला केस। पूर्वी हिस्से में एक पुराना मंदिर है। वहाँ से आवाज़ आ रही है — जैसे कोई ज़मीन के नीचे बोल रहा हो।"

"भूत?"

"नहीं। कुछ और। मुझे जाँचना होगा।"

शर्मा ने आह भरी। "तू कभी थकता नहीं?"

"अब नहीं। अब मुझमें एक भेड़िये की ताकत है, एक डॉक्टर की पसली है, और एक परछाईं का टुकड़ा है। थकान का कोई मतलब नहीं रहा।"

और अंकित रात में निकल पड़ा — उसकी परछाईं उसके पीछे, उसकी बाईं आँख आगे रास्ता दिखाती हुई।

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एपिसोड 3 समाप्त






एपिसोड 4 — ज़मीन के नीचे बोलने वाला

भाग 1 — मंदिर के नीचे की आवाज़

शहर के पूर्वी हिस्से में एक पुराना मंदिर था — भोलेनाथ का, जिसे लोग भूल चुके थे। सौ साल पहले बना, अब इसकी दीवारों पर गिरजा घिर आया था, और मुख्य द्वार पर ताला लगा था। पर पिछले एक हफ्ते से, आसपास के लोग कुछ सुन रहे थे — रात में, ठीक बारह बजे, ज़मीन के नीचे से एक आवाज़ आती थी। आवाज़ किसी के बोलने की नहीं थी, बल्कि साँस लेने की। भारी, धीमी, जैसे कोई बहुत बड़ा जानवर हजारों साल से सो रहा हो और अब जाग रहा हो।

पहले तो लोगों ने सोचा कि भूत है। पर जब पास के तीन मकानों की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं, और एक रात पूरी गली हिल गई — बिना भूकंप के — तो पुलिस बुलाई गई। इंस्पेक्टर शर्मा ने अंकित को फोन किया।

अंकित उस रात मंदिर के बाहर खड़ा था। उसने अपनी बाईं आँख की पट्टी हटा रखी थी। आँख न केवल चाँदी की चमक रही थी, बल्कि उसके चारों तरफ एक काली परछाईं भी घूम रही थी — जो उसकी माँ के परछाईं के टुकड़े की देन थी। और उसकी सूंघने की शक्ति — भेड़िये वाली — ने उसे बता दिया था कि मंदिर के नीचे कुछ सड़ा हुआ है, कुछ बहुत पुराना, और बहुत भूखा।

"इंस्पेक्टर," अंकित ने कहा, "यह भूत नहीं है। यह ज़ॉम्बी नहीं है। यह कोई परछाईं नहीं है। यह कुछ ऐसा है जो इस ज़मीन के नीचे तब से दबा है जब से यह मंदिर बना था — शायद उससे भी पहले।"

शर्मा ने टॉर्च जलाई। मंदिर की दीवारों पर पुरानी नक्काशी थी — अजीब सी आकृतियाँ, जो न तो देवताओं की लगती थीं, न राक्षसों की। उनके हाथों में कुछ ऐसे औज़ार थे जैसे आधुनिक मशीनें हों। "यह क्या है?" शर्मा ने पूछा।

"कोई प्राचीन भाषा है। महेंद्र से कहो तस्वीरें लेकर रिसर्च करे। पर अभी, मुझे अंदर जाना है।"

"अकेला?"

"तुम्हारी पिस्टल यहाँ काम नहीं करेगी। और मेरे पास अब तीन शक्तियाँ हैं — चार, अगर अपनी बाईं आँख को गिनूँ। मैं संभल लूँगा।"

अंकित ने मंदिर का ताला तोड़ दिया — भेड़िये की ताकत से। अंदर अंधेरा था, लेकिन उसकी आँखें (दोनों) अब अंधेरे में देख सकती थीं। गर्भगृह में एक टूटी हुई शिवलिंग थी, और उसके नीचे एक गोल छेद — जैसे कोई विशाल कीड़ा ज़मीन में घुसा हो। छेद से नीचे हवा आ रही थी — गर्म, दुर्गंध भरी।

अंकित ने छेद में झाँका। उसकी बाईं आँख ने नीचे एक विशाल गुफा दिखाई। और गुफा के बीच में... कुछ साँस ले रहा था। वह कूद गया।

भाग 2 — गुफा और कैदी

नीचे गुफा थी — प्राकृतिक नहीं, बल्कि बनी हुई। दीवारों पर वही अजीब नक्काशी थी, और फर्श पर पत्थर की जंजीरें पड़ी थीं। जंजीरों के बीच में एक आदमी बैठा था — या कम से कम आदमी जैसा कुछ। उसका शरीर तो इंसानी था, पर उसकी त्वचा पर सैकड़ों छोटे-छोटे छेद थे, जिनमें से हल्की हरी रोशनी निकल रही थी। उसकी आँखें बंद थीं, पर उसके मुँह से वही भारी साँस आ रही थी। और उसके चारों तरफ हवा घूम रही थी — जैसे कोई पंखा चल रहा हो, पर पंखा नहीं था।

अंकित ने उसे देखा। उसकी बाईं आँख ने बता दिया — यह कोई भूत नहीं था, कोई वेयरवुल्फ नहीं था। यह एक राक्षस था — असली वाला। जो कभी दूसरे आयाम से आया था, और यहाँ कैद कर दिया गया था।

उस आदमी ने आँखें खोलीं। वे सफेद थीं — बिल्कुल सफेद, बिना पुतली के। "तुम आखिर आ गए," उसने कहा। उसकी आवाज़ सामान्य थी, पर उसके साथ ही गुफा की दीवारों में कंपन होने लगा।

"तुम कौन हो?" अंकित ने पूछा।

"मैं कोई नहीं। मैं वह हूँ जो इस ज़मीन के नीचे दबा है। हज़ार साल से। उन लोगों ने मुझे यहाँ कैद किया, जो तुम्हारे पूर्वज थे। उन्होंने मेरी ताकत को पत्थरों में बंद कर दिया। पर अब वह ताकत कमज़ोर पड़ गई है। मैं फिर से बोल सकता हूँ। जल्द ही मैं उठ सकूँगा। और जब उठूँगा, तो पूरा शहर खत्म हो जाएगा।"

"तो मैं तुझे उठने नहीं दूँगा।"

"तू मुझे रोक नहीं सकता। तू सिर्फ एक इंसान है — भले ही तेरे पास कुछ शक्तियाँ हों। मैं उन शक्तियों से पैदा हुआ हूँ। मैं अंधकार हूँ, जो रोशनी से पहले था।"

अंकित ने अपनी बाईं आँख से उसके शरीर के अंदर देखा। वहाँ कोई हड्डी नहीं थी, कोई दिल नहीं था। बल्कि एक काला बादल था — जो धीरे-धीरे फैल रहा था। हर साँस के साथ वह बादल बड़ा हो रहा था। जब वह पूरी गुफा को भर देगा, तो यह राक्षस आज़ाद हो जाएगा।

"तुझे रोकने का एक तरीका है," अंकित ने कहा। "वही जिससे तुझे हज़ार साल पहले रोका गया था। ताकत से नहीं, बल्कि उस चीज़ से जो तू कभी समझ नहीं पाया — बलिदान से।"

राक्षस हँसा। "बलिदान? मैंने हज़ारों का बलिदान देखा है। वह मुझे और मज़बूत करता है।"

"मैं अपने बलिदान की बात नहीं कर रहा। मैं उन लोगों के बलिदान की बात कर रहा हूँ जिन्होंने तुझे यहाँ कैद किया। उन्होंने अपनी जान नहीं दी — उन्होंने अपनी इच्छाएँ दीं। उन्होंने अपने सपनों को त्याग दिया, ताकि तू सपने देखना बंद कर दे। और वह त्याग आज भी इन पत्थरों में बसा है।"

अंकित ने अपने हाथों को दीवार पर लगाया। उसकी बाईं आँख से चाँदी की रोशनी निकली और दीवारों की नक्काशी में घुस गई। नक्काशियाँ जीवित हो उठीं — वे आकृतियाँ हिलने लगीं, उनके मुँह खुल गए, और उनसे आवाज़ें निकलने लगीं — हज़ार साल पुरानी, फुसफुसाहटें। वे कह रही थीं — "हमने अपनी इच्छाएँ दीं, ताकि यह कभी न उठे। अब तुम अपनी इच्छा दो, ताकि यह मर जाए।"

अंकित समझ गया। इस राक्षस को मारने के लिए उसे अपनी सबसे बड़ी इच्छा को त्यागना होगा। और उसकी सबसे बड़ी इच्छा थी — नेहा को वापस पाना।

भाग 3 — त्याग

अंकित ने अपनी गर्दन से नेहा की हड्डी वाला लॉकेट निकाला। वही हड्डी जो भगवानदास के ज़ॉम्बी को रोकने के काम आई थी, वही जिसमें नेहा का दर्द बसा था। उसने लॉकेट खोला और हड्डी के टुकड़े को अपनी हथेली में रखा।

"मेरी सबसे बड़ी इच्छा," उसने कहा, "यह है कि नेहा मेरे पास वापस आ जाए। मैं हर रात उसे देखने का सपना देखता हूँ। मैं उसकी आवाज़ सुनने के लिए तरसता हूँ। पर आज, मैं यह इच्छा त्यागता हूँ। मैं नेहा को जाने देता हूँ — पूरी तरह से। ताकि यह राक्षस मर जाए।"

राक्षस चिल्लाया — "नहीं! तू यह नहीं कर सकता! तेरी इच्छा ही तेरी ताकत है!"

अंकित ने हड्डी के टुकड़े को ज़मीन पर रखा, और अपने दाहिने पैर से उसे कुचल दिया। हड्डी चूर-चूर हो गई। और उसी पल, राक्षस के शरीर में दरारें पड़ने लगीं। उसकी हरी रोशनी बुझने लगी। उसकी आँखें — वे सफेद पुतलियाँ — टूट गईं। वह चीखा — एक ऐसी चीख जो हज़ार साल से दबी थी — और फिर धीरे-धीरे पिघल गया। उसकी जगह सिर्फ एक काले धब्बे का निशान रह गया।

पूरी गुफा हिली। पत्थर गिरने लगे। अंकित ने ऊपर जाने के लिए दौड़ लगाई, पर रास्ता बंद हो रहा था। तभी उसकी भेड़िये वाली ताकत ने काम किया — उसने छलांग लगाई, दीवार पर पंजे गड़ाए, और ऊपर के छेद तक पहुँच गया। बाहर निकलते ही मंदिर ढह गया — पर अंकित बच गया।

शर्मा बाहर दौड़ा। "तू ठीक है?"

"हूँ। पर नेहा की हड्डी चली गई। मैंने उसे त्याग दिया।"

शर्मा चुप हो गया। फिर बोला, "कभी-कभी छोड़ना ही सबसे बड़ी जीत होती है।"

भाग 4 — नई शुरुआत

तीन दिन बाद, अंकित अपने कमरे में बैठा था। नेहा की तस्वीर दीवार पर टंगी थी — वही हँसती हुई तस्वीर। पर अब उसे देखकर अंकित के सीने में वह पुराना दर्द नहीं उठता था। बस एक हल्की सी याद थी, जैसे सूरज ढलने के बाद आसमान पर रह जाने वाला रंग।

उसने तस्वीर को नीचे उतारा, एक डिब्बे में रखा, और अलमारी में बंद कर दिया। उसने त्याग किया था — अब नेहा उसकी इच्छा नहीं रह गई थी। वह उसकी याद थी, पर उसे पाने की भूख नहीं।

तभी उसकी बाईं आँख ने एक और सिग्नल दिखाया — पर इस बार वह चमक अलग थी। पीली, गर्म, जैसे सुबह की धूप। वह सिग्नल किसी खतरे का नहीं था, बल्कि किसी नई शुरुआत का। अंकित ने खिड़की खोली और बाहर देखा। सड़क पर एक लड़की खड़ी थी — अठारह-उन्नीस साल की, हाथ में एक पुरानी किताब। उसने अंकित की तरफ देखा और मुस्कुराई।

अंकित नीचे उतरा। "तुम कौन हो?"

"मेरा नाम रिया है। मैं तुम्हारे दादा की शिष्या हूँ। उन्होंने मुझे तुम्हारे पास भेजा है — कहा है कि तुम्हें अकेले नहीं रहना चाहिए। और एक नई दुनिया का दरवाजा खुलने वाला है।"

"कैसी दुनिया?"

"वो दुनिया जहाँ से ये सारी अलौकिक चीज़ें आती हैं। तुम्हारी बाईं आँख उस दुनिया का हिस्सा है। और अब तुम्हें वहाँ जाना होगा — समन होगा।"

अंकित ने अपनी बाईं आँख पर पट्टी बाँधी। "कब?"

"कल रात। तैयार रहना।"

और रिया चली गई — उसकी परछाईं उसके पीछे नहीं थी। क्योंकि वह खुद परछाईं थी।

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एपिसोड 4 समाप्त







एपिसोड 5 — दूसरी दुनिया का शिक्षा 

भाग 1 — समन से पहले की रात

रिया तीन दिन पहले गायब हो गई थी।

अंकित को उसकी कमी खल रही थी। वह परछाईं जैसी लड़की — जो उसके दादा की शिष्या थी, जिसकी अपनी कोई परछाईं नहीं थी, जो सिर्फ उसे दिखती थी — एकाएक नहीं मिली। उसका कमरा खाली था, उसकी किताबें वहीं पड़ी थीं, पर वह नहीं थी। अंकित ने अपनी बाईं आँख से पूरा शहर छान मारा — उसकी परछाईं तक का कोई निशान नहीं था।

इंस्पेक्टर शर्मा उसके कमरे में बैठा था। "पता नहीं चला?"

"नहीं। वह गायब हो गई है — पूरी तरह। ऐसा लगता है मानो वह कभी थी ही नहीं। पर मुझे पता है वह थी। उसने मुझे बताया था कि वह मेरे दादा की शिष्या है। और उसने कहा था कि एक दिन वह चली जाएगी, पर उसने यह नहीं बताया था कि कैसे।"

शर्मा ने अपनी चाय का घूंट पिया। "तो अब क्या करेगा?"

"इंतज़ार। मेरी बाईं आँख कह रही है कि कल रात कुछ होगा। कोई समन होगा — मेरा।"

"किसका समन?"

"पता नहीं। पर मैं तैयार हूँ।"

अगली रात, ठीक बारह बजे, अंकित के कमरे की दीवारों पर अजीब निशान बनने लगे — चमकते हुए, नीले, गोल-गोल। फर्श से धुआँ उठने लगा, और एक आवाज़ आई — बूढ़ी, थकी हुई, पर दूर से: "अंकित... तुम्हारी सहायता चाहिए... रिया यहाँ है... आओ..."

अंकित ने अपनी बाईं आँख खोली। धुआँ एक दरवाज़े में बदल गया। उसने शर्मा की तरफ देखा। "यहाँ रुको। अगर मैं सात दिन में वापस नहीं आया, तो समझ जाना कि मैं फँस गया हूँ। तब मेरे दादा की किताब से एक अनुष्ठान करना — महेंद्र को बताना, वह समझ जाएगा।"

"तू पागल है? मैं तुझे अकेले नहीं जाने दे सकता।"

"तुम्हारी पिस्टल वहाँ काम नहीं करेगी। और तुम वापस आने का रास्ता भूल जाओगे। मैं अकेला जाऊँगा।"

शर्मा ने उसका कंधा दबाया। "वापस आना।"

अंकित मुस्कुराया — एक बार — और धुएँ के दरवाज़े में समा गया।

भाग 2 — वह दुनिया

जब उसने आँखें खोलीं, तो वह किसी और ही जगह था।

आसमान बैंगनी था, दो चाँद — एक लाल, एक हरा। ज़मीन काली थी, और उस पर उगने वाले पेड़ों की पत्तियाँ नहीं थीं, सिर्फ काँटे थे जो हिलते थे जैसे साँस ले रहे हों। हवा में गंधक की बू थी। दूर एक विशाल महल था — काला, नुकीला, जैसे कोई रीढ़ की हड्डी ज़मीन से चिपकी हो।

अंकित के पास उसका झोला नहीं था, न टॉर्च, न पानी। सिर्फ उसके कपड़े और उसकी बाईं आँख। उसने आँख खोली तो उसे दिखाई दिया कि यह दुनिया जीवित है — ज़मीन के नीचे नसें थीं, जैसे किसी विशाल शरीर की। पेड़ों की जड़ें हड्डियों की तरह थीं।

वह चलने लगा। कुछ देर बाद उसे एक पत्थर मिला, जिस पर नक्काशी थी — वही अजीब लिपि जो मंदिर में थी। पर उसके नीचे कुछ लिखा था — हिन्दी में, पुरानी हिन्दी: "जो यहाँ आए, वह अपना रूप छोड़कर आए। जो अपना रूप रखे, वह यहाँ का हो जाए।"

अंकित समझ गया — इस दुनिया में कोई भी इंसान अपने पूरे रूप में नहीं रह सकता। उसे बदलना होगा। पर उसने सोचा — अगर मैं भेड़िया बन गया, तो मैं अपना मानसिक संतुलन खो दूँगा। और अगर मैं कुछ और बन गया, तो शायद वापस नहीं आ पाऊँगा। उसने अपने अंदर की भेड़िये की ताकत को दबा दिया। उसे नहीं जगाया। वह इंसान ही रहा — पर उसकी बाईं आँख पहले से भी तेज़ चमकने लगी, जैसे कोई बैटरी चार्ज हो रही हो।

तभी उसे एक चीख सुनाई दी — रिया की।

भाग 3 — बूढ़ा आदमी

अंकित चीख की तरफ दौड़ा। वह एक छोटी सी पहाड़ी के पास पहुँचा, तो उसने देखा कि एक गड्ढे के अंदर रिया बैठी थी — बेहोश, पर साँस ले रही थी। उसके ऊपर कोई जाल था — ऊर्जा का, जो चमक रहा था। अंकित ने उस जाल को हाथ लगाया तो बिजली का झटका लगा — पर उसकी भेड़िये वाली ताकत बंद थी, इसलिए उसे ज़्यादा चोट नहीं आई। पर जाल नहीं टूटा।

तभी पीछे से एक आवाज़ आई — "यह जाल सिर्फ ताकत से नहीं टूटता, बेटा। यह समझ से टूटता है।"

अंकित ने पीछे मुड़कर देखा। वहाँ एक बूढ़ा आदमी खड़ा था — लंबा, दुबला, सफेद दाढ़ी, और उसकी आँखों में वही चाँदी की चमक थी जो अंकित की बाईं आँख में होती थी। पर उसकी एक आँख नीली थी, एक हरी। उसने साधारण सा कुर्ता पहना था, और हाथ में एक लकड़ी की छड़ी थी।

"आप कौन हैं?" अंकित ने पूछा।

"मैं इस दुन्या का एक बूढ़ा मूर्ख हूँ। नाम है — चिरायु। मैं यहाँ उन लोगों को सिखाता हूँ जो गलती से इस दुनिया में आ जाते हैं। पर तुम गलती से नहीं आए हो। किसी ने तुम्हें बुलाया है। वह लड़की — यह तुम्हारी साथी है?"

"हाँ। उसे पहले भेजा गया था। मैं उसे बचाने आया हूँ।"

"तो पहले मुझे बताओ — तुमने अपने अंदर के जानवर को क्यों दबा दिया? तुम्हारे अंदर एक भेड़िया है, बहुत ताकतवर। उसे जगाते तो यह जाल आधे में टूट जाता।"

"क्योंकि अगर मैं उसे जगाऊँगा, तो मैं खुद पर काबू खो दूँगा। और इस दुनिया में अगर मैं काबू खो दूँ, तो शायद वापस न आ सकूँ।"

चिरायु मुस्कुराया। "समझदार हो। बहुत कम लोग ऐसा सोचते हैं। तो चलो, मैं तुम्हें सिखाता हूँ कि बिना जानवर बने, सिर्फ इंसान बनकर, इस दुनिया में कैसे ताकतवर बना जाए।"

भाग 4 — शिक्षा

चिरायु ने अंकित को पहाड़ी के ऊपर एक छोटे से आश्रम में ले जाया। वहाँ पत्थर की कुटिया थी, और उसके सामने एक जलती हुई लोटा थी — पर आग नहीं थी, बल्कि नीली रोशनी थी जो हवा में तैर रही थी।

"यह इस दुनिया की ऊर्जा है," चिरायु ने कहा। "तुम्हारी दुनिया में इसे 'प्राण' कहते हैं। यहाँ इसे 'याम' कहते हैं। यही सब कुछ है — पेड़, पत्थर, राक्षस, सब याम से बने हैं। और तुम्हारी बाईं आँख इस याम को देख सकती है, छू सकती है, बदल सकती है। पर तुमने अब तक सिर्फ उसे देखा है, कभी बदला नहीं। क्योंकि तुम दूसरी ताकतों पर निर्भर थे — हड्डी, परछाईं, भेड़िया। अब उन सबको त्याग कर देख। सिर्फ अपनी बाईं आँख से।"

"मैं त्याग कर चुका हूँ — नेहा की हड्डी त्याग दी थी।"

"वह त्याग अलग था। वह इच्छा का त्याग था। अब तुम्हें अपनी पहचान का त्याग करना होगा। यहाँ आकर तुम 'घोस्ट हंटर' नहीं रहे। तुम सिर्फ एक आदमी हो — जिसके पास एक आँख है। वही आँख तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है। उसका उपयोग करो, जैसे कोई शिल्पकार अपने औज़ार का उपयोग करता है। बिना गुस्से के, बिना डर के। बस ध्यान से।"

पहले दिन, चिरायु ने अंकित को सिखाया कि बिना हाथ लगाए याम को कैसे हिलाया जाए। अंकित ने अपनी बाईं आँख से एक पत्थर पर ध्यान केंद्रित किया। पत्थर हिला — थोड़ा सा। फिर गिर गया। अंकित थक गया।

"बहुत ताकत लगाई तुमने," चिरायु ने कहा। "याम को ताकत से नहीं, समझ से हिलाया जाता है। पत्थर को देखो — उसमें क्या कमी है? वह टूटा हुआ है, इसलिए वह दूसरे पत्थरों से अलग है। उसकी कमी को समझो, तो वह खुद हिल जाएगा।"

अंकित ने फिर कोशिश की। उसने पत्थर के अंदर की दरारों को देखा — वही जो भगवानदास की पसली में देखता था, पर अब पत्थर में। उसने उन दरारों को अपनी आँख से छुआ — और पत्थर उठा, हवा में तैरने लगा। फिर अंकित ने उसे वापस रख दिया।

"अच्छा। अब अगला सबक।"

दूसरे दिन, चिरायु ने अंकित को सिखाया कि किसी जीवित प्राणी के याम को कैसे पढ़ा जाए। उसने एक छोटी सी छिपकली पकड़ी — जिसके तीन आँखें थीं और वह बैंगनी रंग की थी। "इसे देखो। यह डरी हुई है। इसके याम में एक कंपन है। उस कंपन को शांत करो — बिना उसे छुए।"

अंकित ने छिपकली की तरफ देखा। उसकी बाईं आँख ने उसके शरीर में एक हरी लौ दिखाई — डर की लौ। अंकित ने अपनी आँख से उस लौ को सहलाया — जैसे कोई बच्चे के सिर पर हाथ रखता है। लौ धीरे-धीरे शांत हुई। छिपकली ने अपनी तीनों आँखें बंद कर लीं और सो गई।

"अब तुम समझ गए," चिरायु ने कहा। "तुम्हारी बाईं आँख न तो हथियार है, न जादू। यह एक औज़ार है — समझने का। जो इंसान समझ से काम लेता है, वह सबसे ताकतवर होता है। चाहे उसके पास भेड़िये के पंजे हों या न हों।"

तीसरे दिन, चिरायु ने अंकित को रिया को बचाने का तरीका बताया। "वह जाल उसी याम से बना है, जो इस महल के राजा ने बनाया है। उस राजा का नाम यामातो है। वह इस दुन्या का सबसे ताकतवर राक्षस है। उसने रिया को इसलिए पकड़ा है, क्योंकि वह जानता है कि तुम आओगे। वह तुम्हारी बाईं आँख चाहता है।"

"तो मैं उससे लड़ूंगा?"

"लड़ाई नहीं, समझ। यामातो की कमज़ोरी यह है कि वह याम को समझ नहीं सकता — वह सिर्फ उसे खा सकता है। तुम उसे अपनी आँख से उसके अंदर का याम दिखाओ — जिसे वह कभी नहीं देख पाया। वह टूट जाएगा।"

"और रिया?"

"रिया को बचाने के लिए तुम्हें अपनी परछाईं का एक टुकड़ा उसके अंदर डालना होगा — क्योंकि वह खुद एक परछाईं है। तुम्हारे पास अपनी माँ की परछाईं का टुकड़ा है, जो तुम्हारी बाईं आँख में समाया है। उसका एक हिस्सा रिया को दे दो। वह फिर से जाग जाएगी।"

भाग 5 — यामातो का सामना

चौथे दिन, अंकित यामातो के महल की तरफ चल दिया। उसने अपने अंदर के भेड़िये को अब भी दबाए रखा था। वह सिर्फ इंसान था — पर उसकी बाईं आँख पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ चमक रही थी। वह याम को देख सकता था, समझ सकता था, और उसे हिला सकता था।

महल के दरवाज़े पर एक विशालकाय द्वारपाल खड़ा था — जिसका शरीर पत्थर का था, और उसके सीने में एक जलता हुआ दिल था। उसने अंकित को रोकने के लिए हाथ बढ़ाया। अंकित ने अपनी बाईं आँख से उसके दिल में देखा — वहाँ एक बहुत पुराना दर्द था, किसी ऐसे इंसान का जिसे यामातो ने कैद कर रखा था। अंकित ने उस दर्द को अपनी आँख से छुआ — और द्वारपाल का पत्थर का शरीर टूट गया, पर वह मरा नहीं। वह एक साधारण आदमी बन गया, रोता हुआ, और भाग गया।

अंकित अंदर गया। सीढ़ियाँ उतरता गया — एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात मंजिल नीचे। सातवीं मंजिल पर एक विशाल कमरा था, और उसके बीच में एक पत्थर की कुर्सी पर यामातो बैठा था — काला, चार हाथ, आँखों की जगह दो सफेद गोले। उसके सामने रिया एक काँच के ताबूत में बेहोश पड़ी थी।

"आखिर आ गया तू," यामातो ने कहा। उसकी आवाज़ से पूरा महल हिल गया। "मैंने सोचा था तू भेड़िया बनकर आएगा। पर तू आया है इंसान बनकर। बेवकूफ।"

"मुझे भेड़िया बनने की ज़रूरत नहीं है," अंकित ने कहा। "मेरी बाईं आँख ही काफी है।"

उसने अपनी बाईं आँख पूरी ताकत से खोली। आँख से एक किरण नहीं निकली, बल्कि एक लहर निकली — नीली, शांत, जैसे पानी में उठता हुआ घेरा। वह लहर यामातो के शरीर से टकराई। यामातो हँसा — "यह क्या? यह तो कोई चोट नहीं पहुँचाती।"

"यह चोट नहीं है। यह समझ है। मैं तुम्हारे अंदर का याम देख रहा हूँ — तुम कभी एक इंसान थे, जिसने अपना मानवता त्याग दी थी। तुम्हें कोई प्यार नहीं मिला, इसलिए तुमने प्यार को ही नकार दिया। पर तुम अब भी उस प्यार के लिए तरसते हो।"

यामातो की आँखों में पहली बार डर दिखा। "चुप! तू कुछ नहीं जानता!"

"मैं जानता हूँ क्योंकि मेरी आँख देखती है। तुम्हारे अंदर का याम बहुत पुराना है, और उसमें एक छोटा सा सफेद धब्बा है — वह तुम्हारी माँ का प्यार है, जो तुमने खो दिया। उसे वापस पाने के लिए तुमने यह सब किया। पर वह धब्बा अब भी है। देखो।"

अंकित ने अपनी बाईं आँख से उस सफेद धब्बे को दिखा दिया — जैसे कोई शीशा पकड़ा रहा हो। यामातो ने उसे देखा। उसकी आँखों से पानी निकला — काला नहीं, साफ। उसके चारों हाथ गिर गए। उसका शरीर पिघलने लगा, पर दर्द से नहीं, बल्कि मुक्ति से। वह गिर गया, और उसकी जगह सिर्फ एक छोटा सा सफेद पत्थर रह गया — उसकी माँ की याद का।

काँच का ताबूत टूट गया। रिया बेहोश थी, पर साँस ले रही थी। अंकित ने अपनी बाईं आँख से अपनी माँ के परछाईं के टुकड़े का एक छोटा हिस्सा निकाला और उसे रिया के माथे पर लगा दिया। रिया की आँखें खुल गईं। वह उठी — कमज़ोर, पर ज़िंदा।

"अंकित... तुम आ गए।"

"मैंने कहा था न, मैं तुम्हें बचाऊंगा।"

भाग 6 — वापसी नहीं, आगे की राह

रिया खड़ी हो गई। उसने अंकित की तरफ देखा — उसकी बाईं आँख अब स्थिर चमक रही थी, बिना किसी उतार-चढ़ाव के। "तुमने भेड़िये की शक्तियों का उपयोग नहीं किया?"

"नहीं। चिरायु ने मुझे सिखाया कि बिना जानवर बने भी ताकतवर कैसे बन सकते हैं। सिर्फ समझ से।"

"चिरायु? वह बूढ़ा ऋषि? मैंने उसके बारे में सुना था। वह इस दुन्या के सबसे पुराने निवासियों में से एक है। तुम भाग्यशाली हो कि वह तुमसे मिला।"

तभी चिरायु वहाँ आया — जैसे हवा से प्रकट हुआ। "अंकित, तुमने यामातो को हरा दिया। पर तुम वापस नहीं जा सकते।"

"क्यों?"

"क्योंकि तुम्हारी दुन्या का दरवाज़ा बंद हो गया है। जिसने तुम्हें बुलाया था — वह शक्ति अब नहीं रही। यामातो के मरते ही वह रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया। तुम अब इसी दुन्या के निवासी हो।"

अंकित का चेहरा सफेद पड़ गया। "पर मैं वापस जाना चाहता हूँ। मेरा शहर, मेरे केस, इंस्पेक्टर शर्मा — वे मेरा इंतज़ार कर रहे हैं।"

"एक तरीका है," चिरायु ने कहा। "इस दुन्या के सबसे ऊँचे पहाड़ की चोटी पर एक प्राचीन मंदिर है। वहाँ एक दर्पण है, जो दो दुनियाओं को जोड़ता है। पर वह दर्पण हर सौ साल में एक बार खुलता है — और अभी उसे खुलने में पंद्रह साल लगेंगे। उस दर्पण को समय से पहले खोलने के लिए तुम्हें इस दुन्या के सात सबसे शक्तिशाली राक्षसों को हराना होगा — हर एक से मिलकर, उनका याम समझकर, और उन्हें मुक्ति दिलाकर। तभी दर्पण खुलेगा।"

"पंद्रह साल? तब तक मेरी दुन्या में पंद्रह रातें ही बीतेंगी, क्योंकि समय अलग है। पर मैं वहाँ का समय भी जानता हूँ — पंद्रह साल यहाँ बहुत लंबा है।"

रिया ने उसका हाथ पकड़ा। "मैं तुम्हारे साथ रहूँगी। हम दोनों मिलकर उन सात राक्षसों को हराएँगे। और फिर वापस चलेंगे।"

चिरायु मुस्कुराया। "तब तक मैं तुम्हें और सिखाऊँगा, अंकित। तुम्हारी बाईं आँख और भी ताकतवर हो सकती है। और तुमने आज साबित कर दिया — तुम्हें भेड़िया बनने की ज़रूरत नहीं है। तुम इंसान बनकर ही किसी भी राक्षस से ज़्यादा ताकतवर हो सकते हो।"

अंकित ने गहरी साँस ली। उसने अपनी बाईं आँख पर पट्टी बाँध दी — जो अब प्रतीक थी, ज़रूरत नहीं। उसने रिया की तरफ देखा, फिर चिरायु की तरफ।

"तो चलिए। पहला राक्षस कहाँ है?"

चिरायु ने दूर पहाड़ियों की तरफ इशारा किया, जहाँ एक नीली चमक थी — एक और महल, एक और खतरा।

और अंकित — बिना भेड़िये के, सिर्फ इंसान, सिर्फ अपनी बाईं आँख के साथ — उस दिशा में चल पड़ा। रिया उसके पीछे थी। उसकी परछाईं दीवार पर नहीं बनी, क्योंकि इस दुन्या में सूरज नहीं था। पर उसके सीने में यामातो का सफेद पत्थर था, जो धीरे-धीरे गर्म हो रहा था — जैसे कोई नया दिल धड़कने लगा हो।

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एपिसोड 5 समाप्त


अंकित: द घोस्ट हंटर
पुस्तक समाप्त
आर्क 1 समाप्त
आर्क 2 जल्द आएगा…