mamtamayee maa in Hindi Women Focused by Sunita Bapna books and stories PDF | ममतामयी माँ

Featured Books
  • ఎవరు....? - 8

    Part - 8 ఇబ్రహీపట్నం మద్యాహ్నం 2 గంటల సమయం ఒక ఇంట్లోని 30 ఏళ...

  • యంత్రం వెనుక మనసు - 9

    ఆర్య అయాన్‌ను తీసుకొని ఇంటికి వచ్చాడు. "అన్నయ్యా! ఏమైంది? నా...

  • వెన్నెల పూలు - 20

    వెన్నెల పూలు ఏ స్పైసీ హాట్, రొమాంటిక్, సస్పెన్స్ అండ్ సైకలాజ...

  • వెన్నెల పూలు - 19

    వెన్నెల పూలు ఏ స్పైసీ హాట్, రొమాంటిక్, సస్పెన్స్ అండ్ సైకలాజ...

  • మాయ గడియారం

    రుద్రపూర్ అడవుల మధ్యలో వందల ఏళ్ల నాటి ఒక పాడుబడిన కోట ఉంది....

Categories
Share

ममतामयी माँ

                 ममतामयी माँ

शीर्षक लगते हुए मन में आया मेरी मामतमायी  माँ लिखूँ ,तब मेरे अन्तर्मन ने मुझे टोका कि इतनी विराट ममता कि धारिणी  को मेरी कह कर सीमित क्यूँ करूँ| जिसके  कण कण में प्रेम ,सहानुभूति , करुणा, प्यार , ममत्व भरा हो उसे मेरी कह कर उस विरत व्यक्तित्व को सीमा में बब्ध्न तो उनके प्रति अनादर होगा|

हाँ में बात कह रही हूँ श्रीमति उमराओ भंसाली जी कि ,जिनकी पूतरी होने का मुझे सौभाग्य प्रपट हुआ|में परम पिता परमेश्वर कि बहुत ही आभारी हूँ और प्रथर्णा करती हूँ के उनके व्यक्तित्व के कुछ अंश मेरे में आ जाये तो मेरा जीवन धनी हो जाएगा |  कहाँ से शुरू करूँ ,मन में विचारों का अनवरत प्रवाह है,सागर समान माँ  को श्ब्डो एमईआई बीएएनडीएचएएनए केवाईए एसएएचजे एचएआई स्वर्गीय सेठ श्री धनरुप मल जी की ज्येष्ट पुत्री,जेआईएसएनई पीओओआरई पश्चिम  बंगाल की परीक्षा में(बीना किसी औपचारिक शिक्षा के ) में सर्वोतम अंक प्राप्तकर गोल्ड मेडल प्राप्त किया था, मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री मगराज जी साहेब की महज 17 वर्ष की उम्र में परिणय सूत्र में बांध गई |मेरे पिताजी की ये दूसरी शादी थी |पहली शादी त्रिपोलिया के स्व: माणक चंदसा भण्डारी की सुपुत्री से हुआ था | उनको टी बी की बीमारी थी जो उनके परिवार वालो ने बताया नहीं था |उनकाओ पीहर में छोटा बाइसा के नाम से पुकारा जाता था | छोटा बाइसा ने पहली रात को मेरे पिताजी को कह दिया की मुझे आपकी पत्नी होने का सौभ्ज्ञ मिला है पर में अपनी बीमारी के कारण आपके संसर्ग में नहीं आऊँगी | पिताजी उस समय बनारस में law की पढ़ाई कर रहे ठेसों शादी के कुछ दिन बाद चले गए | छोटा बाइसा ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी |परंतु पिताजी के आग्रह के कारण उन्होने कौशिश करके लिखना चालू कियाउर पिताजी को पत्र लिखने का नियम बना लिया |उस जममाने में जहां पर्दा प्रत थी और किसी से बात तक करने की सुविधा न थी ,ऐसे में पत्र लिखने में पारंगत होना उनके असीम प्रेम और एटीएम बल को दर्शाता  है | पिताजी ने उनके प्रेम पत्रों को एक सुंदर से कलाम दान मे रखे हुए थे | में उनकी सबसे छोटी पुत्री ने उन पत्रों को पढ़ा है | आप पिताजी का उनके प्रति प्रेम का इससे अंदाजा लगा सकते है |उनके अथाह प्रेम की कसौटी उनके कलाम दान में पड़े प्रेम पत्र ही नहीं थे अआफिस में उंक्की एक बड़ी सी फोटो फ्रेम में लगी थी ,जिस पर पिताजी दूसरी शादी के बाद भई बरसों तक नियम से धूप करते थे |

अब पिताजी की दूसरी शादी की प्रथम रात का थोड़ा विवरण न दिया जाए तो  इस कहानी  के सिरे न मिल पाएगें| पिताजी ने पहली रात में बता दिया की ये शादी

“मेनें यह शादी  मेरे माताजी और पिताजी  के दबाव के कारण की है, और मैं  अपनी पहली पत्नी से बहुत प्यार करता हूँ और शायद मैं तुम्हें अपना प्रेम न दे पाऊँगा |”

 पिताजी ने जो कहा उसको शालीनता से सुनना  और सहज रहना क्या किसी भी नवविवाहिता के लिए सहज है ???? आज की भाषा में इससे अधिक भीषण व्रजपात क्या हो सकता है ! पर मेरी माँ (अब मेरी माँ लिखने की जुर्रत कर सकती हूँ) ने बहुत ही शालीनता से और सहजता से लिया और कहा आप मेरे पति परमेश्वर है और आपके सेवा करना मेरा परम धर्म है,और  मैं अपने पतिव्रत धर्म का पूरी निष्ठा से पालन करूंगी |

इतना संयम, धैर्य, समता और आत्मबल की धनी देवी की उपमा  से सुशोभित  करने में मन जरा सा भी नहीं हिचकता है |

  माँ ने उसे सहजता से लिया और उन्होने छोटा बाइसा की फोटो को साफ करना और धूप बत्ती करना चालू कर दिया |ईर्ष्या, द्वेष, उलाहना की जगह  श्रद्धा और स्नेह का प्रतिदान करना ,ये  सिर्फ असाधारण नारी  ही कर सकती है | अंतोतगत्वा  माँ अपने सहज स्नेहशील बर्ताव , परिवार के प्रति अनेक अड़चनों के बावजूद अपने कर्तव्य पालन करने में तत्परता से धीरे मेरे पिताजी का कुछ ध्यान पाने में सफल हुई और छोटा बाइसा की फोटो आफिस से मुंशी जी के कमरे में आ गई | मेरी शादी 18 साल में हुयी थी तब तक छोटा बाइसा की जगह वहाँ पर बरकरार रही |

 मेरे दादाजी श्वसुर होने का  पूरा रुआब निभाते थे| तीसरी मंजिल में उनका कमरा था सो सुबह सुबह उसकी सफाई कर जब नीचे आती थी तो दादासा कहते ‘महारानीसा माहला उतर गया’|

(मेरे दादाजी की किसी भी तरह निंदा नहीं कर रही हूँ, ये उस समय का चलन था |)

 खड्गपुर में पली सेठ धनरूप मल सा भण्डारी की बड़ी पुत्री जिसको पूरे वेस्ट बंगाल में सिलाई में गोल्ड मेडल मिला था, अपनी जिंदगी को जोधपुर के माहौल में पूरी तरह ढाल लिया| सुबह के कार्यक्रम की लंबी लिस्ट में गाय का गोबर उठाना छेने थापना से चालू होकर सफाई,सास ससुर और परिवार की सेवा करना , में और क्या क्या हो सकता है में आपकी कल्पना शक्ति पर छोड़ देती हूँ। कभी शिकायत नहीं करके, स्त्री और पतिव्रता धर्म की मिसाल मुझे और कोई नज़र नहीं आती|

अब हमारे पिताजी को भी याद कर लेते है हमारे पिताजी दाdaaजी के परम भक्त  कर्तव्यनिष्ठ पुत्र थे |दादाजी को सट्टा खेलेने का शौक था सो रोज सुबह तैयार होकर जाना और भँवर जी को आवाज दे कर कहना कि कल थोड़ा नुकसान हो गया था सो इतने रुपये भेज दो। हमारे पिताजी माँ को कहते और हमारे माँ अपने गहने गिरवी रख कर (पिताजी के ननिहाल में ) रुपये ले कर आती थी,जो दादासा को दे दिये जाते थे। ये मैंने मेरे बचपन में देखा था | यहाँ इस संदर्भ में एक बात  बताना बहुत जरूरी है की जब भी माँ अपने पीहर जाती थी तो नानीसा उन्हे पूरे साल के कपड़े गहने बनवाती थी| हमारी माँ  उनमें से अपनी नन्द को भी बाँट देती थी और भी जो लेना देना करना होता था उसी में से कर देती | कमाने वाले सिर्फ पिताजी और पूरा परिवार, सो माँ ने अपने लिए कभी कुछ भी नहीं लिया |

 पिताजी his highness के वकील थे सो राजपूतों में उठना बैठना होता था। दिन भर काम तो फिर रात में पार्टियां होती थी| पिताजी जहां तक होता था बाहर खाना नहीं खाते थे|देर रात घर आते तो माँ सिगड़ी में कोयला डालती रहती थी,जिससे उनको गरम खाना  और उसी वक्त फुल्के बनाती थी| पिताजी ने अपनी पूरी जिंदगी गरम फुल्का ही खाया |

पिताजी ने 18 साल की उम्र में पूरे परिवार का खर्चा उठाने लगे थे |  सयुंक्त परिवार में दादासा दादीसा बड़े काकीसा, छोटे काकसा काकीसा और उनकी बेटियाँ ( बड़े काकासा का देहावसान लीला बाइसा छोटी सी थी ,तब हो गया था ) और राम रसोड़ा था | आप इस बाता  अंदाज लगा ले की एक नौकर रोज आटा पीसाने जाता था , और एक समय में करीब 4-5 किलो आटा लग जाता था।  पिताजी ने कभी भी घर गृहस्थी में दाखल नहीं दी, उनका काम कमा कर माँ को पैसे  थमा देना था और माँ ने जिंदगी भर ये काम किया |

जैसे जैसे समय बीतता गया जिम्मेदारियाँ भी बढ़ती गयी बच्चो की शादियाँ भी करनी थी, वह  जिम्मा भी माँ ने बखूबी उठाया | पिताजी को कुछ भी पता नहीं होता था| दिल्ली में हेम चंद जी मासासा से उधार में गहने बन जाते थे, फिर धीरे धीरे उसका भुगतान माँ करती रहती थी |

यादों के झरोखे मे जो आता जा रहा है लिख रही हूँ|

कहानी यहाँ खत्म नहीं होती है |हम सबकी शादी के बाद बच्चे भी मेरे और दीदी के जोधपुर मे हुए। जापा  का पूरा काम माँ करती थी। नजर न लग जाये  सो कूटना पीसना सब खुद करती थी,दोपहर में जब कोई नहीं होता था|

 मेरी शादी 1962 में हो गई थी और ये वापिस इंग्लैंड चले गए मैं उनके साथ न जा पायी  सो एक साल फिर मेरा जोधपुर में शांति दीदी और पावता में बीटा। सितम्बर महीने मे कॉलेज जाना चालू किया और B Sc किया 1963 में मेरे पतिदेव वापिस इंडिया आगाए और मैं इनके  साथ झाकराखंड चली गई | मेरे बारे में बताना इसलिए जरूरी है क्योंकि मेरी माँ की जिम्मेदारियाँ भी बढ़ती गई|

1964 जुलाई में नीरा का जन्म हुआ जोधपुर 4-5 महीने  रही| फिर सितम्बर में समीरा का जन्म हुआ तो मेरे पास जोधपुर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था |सो फिर जोधपुर आ गई मेरे जोधपुर जाते ही पिताजी  लखपत भाईसा और इंद्रा भाभी ने नीरा को अपने पास रखना चालू कर दिया और तय कर लिया नीरा सुनीता के साथ नहीं जाएगी| ये दो बच्चो को कैसे संभालेगी | नीरा तो वहाँ पूरी घुल मिल गयी|

 हम जहां रहते थे वहाँ खानो के अलावा कुछ न था| 

 

 1969 में निर्भय वहीं जोधपुर में हुआ और मैं दोनों बच्चो को लेकर कालरी आ गई | नीरा को स्कूल में डाल दिया था तो समीरा  को भी  जोधपुर भेज दिया | यानि फिर निर्भय भी

 

 

यानि संक्षेप में ये कहा जा सकता है की मी तीनों बच्चे जोधपुर में ही पाले | मेरे पास सिर्फ गर्मी की छुट्टियों में आते थे | संयुक्त परिवार का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है  मुझे कभी भी ये महसूस नहीं हुआ की उनके वहाँ रहने से किसी को भी तकलीफ हाती थी बल्कि मेरे बच्चो को तो उनको जोधपुर ही उनका असली घर लगता था |सारे परिवार का भरपूर प्यार मिला था| मेरी गाथा कुछ ज्यादा ही लंबी हो गई|

  वक्त के साथ धीरे धीरे सब अपनी अपनी गृहस्थी में रम पर हम सब का final destination जोधपुर ही होता था |

 मन की वात्सल्य हमें हमेशा बांधे रहता था/|सबको पापड़, मिर्र्च, बडियाँ और पचकुटा तो भेजा जाता तो था ही, फिर भी हमारी फरमाइश भी पूरे दिल से पूरा कार्रति थी |आज हम लोग सब समर्थ है, पर फिर भी हम जो मन करती थी उसका अंश मात्र भी नहीं कर सकते हैं | कभी माथे पर शिकन या थकान कुछ भी नहीं
जबकि उन को क कई शारीरिक व्याधियाँ थी पर proxivon खा कहा कर काम करती जाती थी| पिताजी के समय से उमंग गेस्ट हाउस राजेंद्र भाई साहिब ने चालू कराया था | उसको संभल्ने में मन पारगांठ हो गई थी |पिताजी के देहावसान के बाद उनहों अकेले उसको ज्यादा अच्छी तरह संभाला। जिंदगी में पहली बार माँ का आत्मविश्वास जागा था और उन्होने बचत भ करने लगी थी/ बड़े रुवाब से कहती थी मेरी कमाई है| उन्होने कभी भी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया था |जिंदगी भर सबको देती ही रही |  तीनों बहू  को पूरा सम्मान और प्यार दिया |कभई कभी तो मैं कति थी की आप अपनी बेटियों से ज्यादा प्यार अपनी बहुओं को करती हो|

17थ सीटब्बर को विक्रांत का जन्म दिन था सो जयपुर आने के लिए समान बांध लिया था पर उसी रात उनकी तबीयत खराब हो जाए और उमराव सा और कमला भाभी ने उन्हें अस्पताल भर्ती करा दिया | हम लोग सब जयपुर से गए और उनको जयपुर ले आए | उन्हे pseptosomia हो गया था और चंदू भाईसा ने कहा की अब ये जी नहीं पाएगी इसलिए उन्हे ICU से केबिन में रख दिया | भाई का कहना था ये परिवार में जे है इन्हे परिवार के सामने ही जाने दो |  सुबह से मान की याददस्त कुछ कम होने लगी थी मुझे बुला कर अटक अटक कर बिला टैटू मिथु को बुलले में अब न जीउङी,  ये उनका हतभागी की वो समय से नहीं पाहुच पायी । शाम को बोली बंद हो गए तो मुझे इशारे से बुलाया की सबको कहाँ खिला दे(उस वक्त चंडू भाईसा भाभी दो दिन पहले आए  थे सो मेरा किचन ही चालू था | आठ बजे मन त

को बताया की सबने खाना खा लिया है तो उनके चेहरे की वो संतोषमय  मुस्कान आज  भी मेरे दिल मे बसी है। यानि की उनके कारण कोई भोखा न रह जाए उसकी चिंता थी

माँ आपको शत शत नमन। स्वर्ग से आशीर्वाद दो की आपके विशाल और विराट व्यक्तित्व का कुछ अंश हममे भी आ जाये !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

सुनिता बापना,जयपुर