सुबह के लगभग 8 बज रहे थे।दिल्ली जैसे बड़े शहर में जो कभी न रुकना वाले शहर के नाम से जाना जाता है।सड़क पर लोगों के कदमों की आवाज और गाड़ियों की रफ्तार की आवाज गूंज रही थी।सूरज अपने पूरे शबाब से हर जगह अपने किरणें फैला रहा था।कोई अपने घर में बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार कर रहा था तो कोई अपने ऑफिस, कॉलेज, दफ्तर,और अपने अपने काम पर जाने को तैयार हो रहा था।
इन ही शोर-शराबे की शहर दिल्ली के वसंत कुंज जहां की शांति दिल्ली की भागदौड़ से अलग है, में एक मकान स्थित था।वो तीन मंजिला मकान बंगलो नुमा बनावट से बना था।उसकी बाहर की दीवारें नीली और सफेद रंग की थी और हर जगह पिलर लगा था ,सिंह निवास।
उसी मकान में सिंह फैमिली डायनिंग एरिया में डायनिंग टेबल पर बैठ कर ब्रेकफास्ट कर रहे थे।
एक 25 साल की लड़की जिसका ध्यान नाश्ता को छोड़कर लैपटॉप पर इकोनॉमिक्स के ग्राफिक्स पर ज्यादा था।काली और लंबे घने बाल जिसका उसने पोनीटेल बनाया था।काली आँखें जिनमें चमक तो है पर एक अजीब सी उदासी भी दिखती है, फेयर स्किन , गुलाबी और एम शेप होंठ ,नाक सीधी और छोटी और चेहरा किसी एंजेल से कम नहीं ।उसने फॉर्मल ग्रीन कुर्ती और ब्लू जींस पहनी थी।और उसके सामने टेबल पर इकोनॉमिक्स के किताब और नोट से भरा उसका बैग।ये है ईशा सिंह , रिसर्चर ऑफ इकॉनमिक्स ,असिस्टेंट प्रोफेसर दिल्ली यूनिवर्सिटी की।
वो अपने प्लेट में रखे ब्रेड के टुकड़े को उठा ही रही थी कि उसकी मां दिशा सिंह (47 साल की देखने में बिल्कुल ईशा की तरह ,अगर अभी उनकी उम्र ईशा जितनी होती तो ईशा की कॉपी लगती।मगर उनके बाल कहीं कहीं से सफेद हो चुके थे कहीं से काले।वो इस घर को संभालती थी।एक हाउसमेकर थी।उन्होंने गुलाबी रंग की सारी पहनी थी और बाल का जुड़ा कर के सही से समेटे हुई थी) उन्होंने उसके सामने एक लड़के की फोटो रख दिया।उन्होंने अपनी बेटी से थोड़ी घबराती हुई बोली,
"बेटा ये फोटो देख।विराज भाटिया एक हेमेटोलॉजिस्ट है।एक बार इससे मिल लो आज शाम तेरे यूनिवर्सिटी के पास वाले कैफे में मिलने को तैयार है।"
ईशा फोटो पर एक नजर डालती है फिर अपने हाथ में लिए ब्रेड के टुकड़े को प्लेट में रख कर प्लेट सामने से सरका देती है। जैसे वो बात को टाल रही हो।वो अपने निराशा भरे नजरों से अपनी मां के आंखों में देखती है।उसको अपनी मां पर गुस्सा तो बहुत आ रहा था इस समय मगर वो खुद को बहुत मुश्किल से संभालती है।और अपनी मां को जवाब देती है ,
"मुझे शादी नहीं करनी।"
सीधा जवाब पर इतनी ठंडी के पूरा माहौल शांत हो गया।उसके पापा राघव सिंह(जो 55 के थे।एक कॉरपोरेट कंपनी में हेड मैनेजर की पोस्ट पर।वो भी दिखने में कम हैंडसम नहीं थे।उनके सफेद बाल भी उनकी स्मार्टनेस को बढ़ा रही थी ।उन्होंने थ्री पीस सूट पहना था।और ईशा उनकी लाडली)राघव सिंह का हाथ अपने प्लेट में रुक गया।उन्होंने एक नज़र दिशा जी को देखा।आंखों से ही इशारा कर के बोले,
"तुम को अभी इस समय ये बात निकालना जरूरी था।"
उनकी आंखों से साफ नजर आ रहा था कि वो आगे क्या होने वाला है?अच्छे से जानते है।पर दिशा जी को कोई फरक नहीं पड़ा।उन्होंने दृढ़ता से ईशा को कहा,
" देख बेटा ये उसी बीमारी का डॉक्टर है, एक बार मिल ले वो तुझे समझेगा तेरे बीमारी को समझेगा।ऐसे ही तूने नव रिश्ते को टाल दिया है।अब तेरी एक नहीं चलेगी।"
बोलते बोलते दिशा जी के आंखों में पानी आ गया ।जैसे वो अब अपनी बेटी की जिद से थक गई हो।ईशा ने अपनी मां के आंख में उदासी को देखती है फिर कुछ देर शांत रहने के बाद गहरी सांस ले कर बोली,
"मां आपको पता है मुझे क्या प्रॉब्लम है।मुझे शादी नहीं करनी ।मैं खुद पर निर्भर हूँ ,मुझे किसी की जरूरत नहीं ।"
वो हर एक बात पर जोर दे रही थी।जैसे अपने फैसला उसने सुना दिया हो।राघव जी कभी ईशा को देखते जो अपने दिल की बात को छुपाने की कोशिश में थी ।कभी अपनी पत्नी दिशा जी को जो अपने बेटी के जिंदगी के आने वाले कल के लिए बेचैन थी।उन्होंने एक गहरी सांस ली मगर कुछ बोले नहीं।वो जानते थे कि अभी कुछ भी बोलना बेकार है ।
उसकी मां ईशा की आंखों में अपने आंसू से भरे आंखों से देखते हुए ।जिसे वो रोकने की पूरी कोशिश कर रही थी बोली,
"एक बार मिलने में क्या जाता है ?अगर सही नहीं लगा तो कोई बात नहीं।पहले ही क्यों मना कर रही हो।"
उन्होंने देसी मां वाला रोना, रोना शुरू कर दिया,
"कोई नहीं समझता मुझे इस घर में।मैं ही हूं ,जो सब के लिए पागल बनी रहती हूं।ना इसके पिता को मेरी परवाह है ना ही बेटी को।"
ईशा बेचारी क्या करती ? अपनी मां के आंसुओं के चक्कर में फंस गई।उसने हार मानते हुए कहा,
"अच्छा दो जी भी डॉक्टर है उनका नंबर मैं मिल लूंगी ।लेकिन अगर समय मिला तो और मेरे पास टाइम नहीं है।यूनिवर्सिटी में एग्जाम प्रिपरेशन कराना है।"
इतना सुनना था कि दिशा जी के आंखों के आंसू कहां गायब हुए पता भी नहीं चला।उनके चेहरे पर तुरंत ख़ुशी चमक उठती है।वो खुशी -खुशी ईशा के मोबाइल में नंबर दे देती है।जब ईशा कॉलेज के लिए घर से निकल जाती है।तो उसके राघव जी अपनी कुर्सी से उठ कर म दिशा जी को देखते हुए ,
"क्या जरूरत है दिशा उसके साथ जबरदस्ती करने की। उसे अपनी जिंदगी का फैसला खुद करने दो और वो खुद का फैसला कर सकती है।वो दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर है और आत्मनिर्भर है।उसे किसी की जरूरत नहीं।वो जो चाहती है उसे करने दो। उसे परेशान करने की जरूरत नहीं।"
राघव जी की बात सुन कर दिशा जी को ऐसा लगा कि कोई उन्हें नहीं समझ रहा।वैसे भी वो राघव जी के सामने खुद को पूरी तरह ढीला छोड़ देती थी।उन्होंने अपने कंधे नीचे झुकते हुए और रोते हुए क्योंकि राघव जी के सामने वो तुरंत इमोशनल हो जाती ।बोली,
"छोड़ दूं उसे अकेले जिंदगी बिताने के लिए,तड़प कर जीने के लिए, अपने बीमारी से अकेले लड़ने के लिए, हम आखिर उसके साथ जिंदगी भर नहीं रह सकते ।एक ना एक दिन हमें इस दुनिया से जाना है।"
दिशा जी सुबकते हुए बोली,
"फिर हमारे पीछे उसे कौन देखेगा?कौन प्यार करेगा?अगर कोई अच्छा इंसान मिल रहा है,तो क्या गलत है।मेरी बात सविता जी से हो गई है ।उन्हें भी कोई ऐतराज नहीं है कि ईशा की बीमारी से।वो उसे खुशी-खुशी अपनी बहु बनाने के लिए तैयार है।"
अब वो फूट फूट कर रोने लगी इनके कंधे हिलने लगे।राघव जी ने दिशा जी के कंधों पर अपने भारी पर प्यार से भरे हाथ रखे और एक झटके में अपने सीने से सटा लिया।राघव जी एक हाथ से दिशा जी के बालों में उँगलियाँ घुमा कर बाल सहलाते हुए और दूसरे हाथ से उनका पीठ सहलाते हुए उन्हें शांत कराने लगे,
"शांत हो जाओ तुम रो नहीं सकती उसका हौसला है हम अगर हम रोएंगे तो उस पर क्या बीतेगी ।वो हमारी बेटी है वो सब संभाल लेगी ।"
दिशा जी अपने पति के सीने में अपने चेहरे को छुपा लिया।राघव जी को अपने दोनों हाथ से कस कर पकड़ कर रोने लगी ।राघव जी ने दिशा जी को शांत कराने लगे। कभी उनके बाल सहलाते तो कभी उनसे प्यार भरी बात करते।दिशा जी अपने पतिदेव की बाहों में शांत हो कर रोना बंद कर दिया और इसी तरह उनके सीने से गले लग कर बोली,
"मैं यहीं चाहती हूं ।जिस तरह आप मुझे संभालते है आप मुझे प्यार करते है ।उसी तरह हमारी बेटी को भी कोई प्यार करे,कोई समझे।"
उधर दिल्ली यूनिवर्सिटी के इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट के एम.ए. के स्टूडेंट्स को ईशा क्लास में खड़ी हो कर लेक्चर दे रही थी
"जनसंख्या वृद्धि दर देश के विकास के गति को कम करने का काम करते हैं,इसे नियंत्रित करना बहुत इंपोर्टेंट है,अगर इसी प्रकार से जनसंख्या की वृद्धि हुई तो देश में खाद्य की कमी होगी ,रोजगार की पूर्ति नहीं हो पायेगी ।"
उसने क्लास खत्म किया।और अपने केबिन में कुर्सी पर बैठ कर मन में विचार करने लगी।
"क्या करूं? समझ नहीं आ रहा है।मां क्यों नहीं समझती ?मैं किसी की जिंदगी नहीं बर्बाद कर सकती।मुझे कमी किस चीज की है?अच्छी खासी इनकम है ।इतना क्षमता रखती हूं कि खुद की जिंदगी अपने हिसाब से चल सकती हूं।फिर भी मां ने बस एक ही रात लगा रखा है,शादी शादी।"
उसके आंखों में आंसू आ गए । जिसे वो गिरने से रोकने की पूरी कोशिश कर रही थी ।मगर वो रुके नहीं।उकसे आंखों से आंसू बह कर गालों और उसके सामने रखे खुले फाइलों पर गिर पड़े ।