Baarah Barash ka Intzaar - 1 in Hindi Short Stories by kusum kumari books and stories PDF | बारह बरश का इंतज़ार - 1

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बारह बरश का इंतज़ार - 1

कुसुम सामने बैठे शीशे में खुद को घूरे जा रही थी। उसने खुद को देखा ! लाल साड़ी, बड़े-बड़े झुमके, माथे पे बिंदी, खुले बाल जो कमर तक थे, हाथों में चूड़ियाँ ! वो खुद को देख ही रही थी जब पीछे से एक तीखी आवाज़ आई ! 

“ये क्या, तुमने मेकअप क्यों नहीं किया? चेहरा देखो कितना काला लग रहा है। एक तो पहले से ही रंग दबा हुआ है !  और तुम हो कि चेहरे पे कुछ लगाती ही नहीं हो! बस इसलिए कितनी बार रिजेक्ट हो चुकी हो ! सब यही कहते हैं, रंग दबा हुआ है!
गर मेरी बात मानकर क्रीम लगा ली होती ! थोड़ा ध्यान चेहरे पर भी दे दिया होता !  तो अब तक शादी हो जाती तेरी! पता नहीं तुझे भी क्यों अपने पापा का रंग-रूप लेना था!”

कहते हुवे असीमा जी अंदर आ गईं ! और कुसुम का चेहरा पकड़कर ड्रैसिंग टेबल पर रखे फाउंडेशन को लेकर कुसुम के चेहरे पर थोपने लगीं।

असीमा जी ने खुद भी अपने चेहरे की अच्छे से लिपा-पोती की हुई थीं ! 50 की उम्र में भी वो 30 की लगती थीं। सब उन्हें कुसुम की बड़ी बहन कहते थे।

कुसुम ने अपनी माँ को देखा !  जिनके तीखे नैन-नक्श और गोरा रंग  बहुत खूबसूरत थीं वो।
थोड़ी देर बाद कुसुम ने खुद को सामने लगे आईने में देखा ! तो खुद को पहचान नहीं पाई।
उसका असली रंग तो कहीं दिख ही नहीं रहा था। ऐसा लग रहा था उसके चेहरे पर कोई नया चेहरा लगा दिया गया हो।

उसने कसकर अपनी मुट्ठियाँ बंद कर लीं और एक गहरी साँस ली।
उसने कुछ नहीं कहा और चुपचाप बस खुद को आईने में देखती रही।

एक सवाल जो हमेशा उसके ज़ेहन में रहता था ! 
क्या खूबसूरत होने की परिभाषा यही है कि आपको गोरा होना होगा?
अगर यही सच है तो कृष्ण जी को ‘भुवन सुंदर’ क्यों कहते थे वो भी तो साँवले थे!

क्या कभी कोई उसे उसके असली रंग और उसके किरदार के साथ पसंद नहीं कर सकता?
क्या वो जैसी है, वैसे ही कोई उसे स्वीकार नहीं कर सकता?

और तभी उसके कानों में एक आवाज़ गूँज उठी —
“तुम्हें खुद को बदलने की ज़रूरत नहीं है। You are beautiful — तुम जैसी हो वैसी ही अच्छी लगती हो कुसुम!
जाओ और अपना चेहरा धोकर आओ — ये क्रीम लगाकर तुम भूतनी लग रही हो।”

लेकिन मम्मी ने कहा कि काला रंग खूबसूरत नहीं  लगता है ! इसलिए उन्हें मेरे चेहरे पर ये क्रीम लगा दिया !  कुसुम ने रोनी सूरत के साथ सुबकते  हुवे कहा था ! 

“ ओय किटी किया फालतू की बातें तुमने अपना दिमाग मैं बैठा के रखा है ! कि सुंदर होने के लिए गोरा होना जरूरी है !  ये सब बकवास है ! और और सावले रंग की तो अपनी ही  एक खूबसूरत होती है ! तुझे पता भी है कृष्ण जी को क्या बोलते हैं ! 

क्या बोलते हैं ? कुसुम ने बड़ी मासूमियत से आखे मटकाते हुए पूछा था ! 

“ भुवन सुंदर “ कहते हैं उन्हें इसका अर्थ जानती हो ! 

“  नहीं “ 

ओह हो किटी तुम सच मैं  बेवकूफ हो ! तुम्हें कुछ नहीं पता ! इसका अर्थ होता है जगत में सबसे सुंदर ! और पता है कृष्णा जी का रंग केसा था ! 

“ सांवला कुसुम ने तुरत जवाब दिया ! “ 

तो फिर तुम खुद को बदसूरत कैसे केह सकती हो ! और ईस  रंग को कोई कैसे बदसूरत बोल सकता है ! एक बात याद रखना किटी ! लोग तुम्हें तब स्वीकार करेंगे जब तुम खुद खुदको स्वीकार करोगी ! समझी ! और तुम खूबसूरत हो सिर्फ चेहरे से नहीं बल्कि चरित्र से ! ख़ुद से  प्यार करो किट्टी ! फिर सब तुमसे प्यार करेंगे ठीक है ! 

और एक प्यारी सी हशी की आवाज़ गूँज उठी उसके कानों में।
कुसुम ने कसकर अपनी आँखें बंद कर लीं।
नहीं ! वो उस बारे में नहीं सोचेगी, जो पीछे छूट गया वो छूट गया।

और माँ की आवाज़ लगाने पर वो उठकर बाहर चल दी।
बाहर जाकर देखा तो एक लड़का, दो औरतें और दो आदमी बैठे थे !  जो उसे ही देख रहे थे।

कुसुम ने हाथ जोड़े और जाकर एक सामने के सोफ़े पर बैठ गई।
उसने बस हल्की सी नज़र उठाकर लड़के को देखा  जो आँखें सिकोड़कर उसे देख रहा था।
कुसुम ने झट से अपनी नज़रें नीचे कर लीं।
वो अच्छे से समझती थी इन नज़रों का मतलब।

उसकी माँ ने फिर से उसकी एडिट की हुई फोटो भेजी थी लड़के वालों को।
उसने अपनी माँ को देखा और एक गहरी साँस ली और नज़रें गड़ा लीं।
वो इन सबसे दूर चली जाना चाहती थी ! सब कुछ छोड़कर बहुत दूर, जहाँ वो इंतज़ार कर सके।

किसका?
उसका नहीं…

कुसुम ने सिर झटक दिया !  वो जाना चाहती है ! क्योंकि वो थक चुकी है इन सबसे।
वो तंग आ चुकी है माँ के तानों से, लोगों के रिजेक्शन से सब से।

कुछ देर बाद कुसुम अपने कमरे में आई।
कपड़े बदले और अपनी अलमारी से एक किताब निकाली।
कानों में हेडफोन लगाए और जाकर बालकनी में बैठ गई।

और जैसे ही उसकी नज़रें सामने वाले बंद घर पर गईं  तो बस नज़रें वहीं टिक गईं।
और किताब हाथों में भींच गई।
उसे भी नहीं पता चला कि वो कब तक उस घर की दूसरी मंज़िल पर बने, अपने कमरे के ठीक सामने वाले कमरे को घूरती रही।

तभी धम्म से दरवाज़ा खुला ! 
तो कुसुम ने अपनी नज़रें वहाँ से हटा लीं।
उसकी आँखें जलने लगी थीं।

उसने नज़रें घुमा कर सामने देखा !  तो उसकी माँ गुस्से में हाथ बाँधे फुफकारते हुए उसे ही देख रही थी।
उसने धीरे से अपना हेडफोन उतार दिया।

“वो तो महारानी यहाँ हैं ! आराम से गाने सुन रही हैं! तुझे पता भी है क्या हुआ?
अरे लड़के वालों ने फिर से तुझे रिजेक्ट कर दिया!”

पता नहीं …वो बोलती जा रही थी 
पर कुसुम का ध्यान अपनी माँ पर नहीं था।
वो बस आँखें बड़ी किए, धड़कते दिल के साथ सामने वाले घर को देख रही थी ! 
क्योंकि उसके गेट के सामने एक कार खड़ी थी।

और जैसे ही कार का गेट खुला, उससे एक शख़्स बाहर आया।
उस शख़्स को देखकर कुसुम के होंठ फड़फड़ाए ! 

“अंकित…”

और बस जमी-सी सामने देखती रही ! 
वहाँ एक और गाड़ी आकर रुकी ! उनके गेट खुले। घर का मेन गेट खुला, दोनों वाहन अंदर गईं।
घर का गेट खुला, सामान निकाले ! जाने लगे और अंदर रखे जाने लगे।
सामने वाले घर से लगातार खटपट की आवाज़ आ रही थी,
और कुछ देर बाद सामने उसी कमरे से आवाज़ आने लगी।

और एक झटके से बालकनी का गेट खुल गया और पैंट की जेबों में हाथ डाले अंकित बाहर आया।
कुसुम बूत बनी सामने देखे जा रही थी वो अपनी जगह पर जमी-सी बैठी रह गई।

आज पूरे 12 सालों बाद उसने उसे अपनी आँखों के सामने देखा था।
अब तक वो उसे बस फ़ोटो में देखती आई थी।
आज इतने सालों बाद उसे आँखों के सामने देखकर उसका दिल जैसे अपने बस में नहीं था ! 
वो तेज़ी से “ धक-धक-धक “  कर रहा था ! 
उसकी सासे उसके काबू मैं नहीं थी ! 

15 साल के अंकित में और इस 27 साल के अंकित में कितना अंतर आ गया था  ! 
वो थोड़ा और लंबा हो गया था, थोड़ी दाढ़ी भी रखी हुई थी।
हमेशा बिखरे रहने वाले बाल, जो उसकी पलकों को ढकते थे,
अब सेट होकर पीछे सिमटे हुए थे।
चेहरा पहले से और साफ़ हो गया था।

कुसुम अपने ही ख़यालों में गुम थी और उसे भी पता नहीं चला
कि कब से वो सामने एक हाथ की दूरी पर खड़े उस लड़के को घूरे जा रही है।

“ओय्य्य!”
उसे एक आवाज़ सुनाई दी, तो कुसुम मानो अपने होश में आई।
वो झट से खड़ी हो गई।

अंकित उसको देखकर हाथ हिला रहा था।
कुसुम को यक़ीन नहीं हो रहा था कि वो उसको देखकर हाथ हिला रहा है।
उसने काँपते हाथों से उँगली खुद की ओर की,
जैसे पूछ रही हो !  “क्या तुम मुझसे बात कर रहे हो?”

और अंकित ने मुस्कुराते हुए सिर हिला दिया।
उसकी मुस्कान !  कुसुम तो जैसे सब भूल गई।

“हेलो मैडम! कहाँ खो गई?
ये मैं हूँ अंकित! भूल गई क्या मुझे?”

कुसुम उसकी आवाज़ सुनकर हड़बड़ा गई।
उसने लड़खड़ाते हुए कहा “ 
“न-नहीं वो मा..मैं तु..तुम्हें… मैं तुम्हें कैसे भूल सकती हूँ अंकित!
इन बारह् सालों में तो जैसे तुम कहीं गए ही नहीं थे मेरे ज़ेहन से…”

“ओय्य, क्या हो गया तुम्हें?

इतना लड़खड़ाते हुए क्यों बात कर रही हो?
बचपन में तो तुम्हारी ज़ुबान कैंची की तरह चलती थी!”
अंकित मुस्कुराते हुए बोला और बालकनी की रेलिंग पकड़कर
कुसुम की बालकनी की ओर झुक गया।

कुसुम के क़दम अपने आप पीछे हट गए।
ये लड़का…
उसे ऐसा लगा जैसे वो बालकनी में झुककर उसे देखने की कोशिश नहीं कर रहा,
बल्कि उसके अंदर झाँक रहा है।

कुसुम के पीछे से एक तेज़ आवाज़ आई ! 
तो कुसुम झटके से पीछे मुड़ी और चिल्लाई 
“आई माँ!”

फिर उसने घूमकर एक नज़र अंकित को देखा
और कमरे के अंदर भाग गई।

अंकित उसे जाते हुए देखता रहा —
जाते हुए कुसुम की पीठ को,
और फिर उसके ओझल होने के बाद हिलते पर्दों को…

उसने एक लंबी साँस ली,
आँखें बंद कीं
और चेहरा अपनी हथेलियों पर झुका लिया,
धीरे से बुदबुदाया —
“कुसुम…”

कुसुम जैसे ही कमरे में आई,
उसने एक गहरी साँस ली ! 
जैसे तब से उसने अपनी साँसें रोक रखी हों।
वो जाकर धम्म से अपने पलंग पर बैठ गई।

वो बुदबुदाई 
“अंकित… इतने सालों बाद यहाँ क्या कर रहा है?
क्यों लौटकर आया है वो वापस? किसलिए?
कितनी मुश्किल से मैंने खुद को संभाला है —
ये लड़का दोबारा मेरी ज़िंदगी में हलचल मचाने क्यों आया है?
क्यों… आखिर क्यों…”

कुसुम ने अपना सिर पकड़ लिया।