aabhisaar in Hindi Fiction Stories by prabha pareek books and stories PDF | अभिसार

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अभिसार

अभिसार

पत्नी की  मृत्यु के बाद परिजनों ,मित्रों सभी को लग रहा था कि लक्ष्मी कांत जी अकेले हो गए |क्योंकि घर में तीन छोटी बेटियाँ एक दुधमुँहा बेटा एक छोटा अविवाहित भाई भी था| उनकी सेवा करने के लिए नौकरों की  कमी नहीं थी| चिंता थी अति वृद्ध माँ की  देखभाल की और पत्नी की  शुद्ध सात्विक रसोई की  ‘उसका क्या होगा’ |

एक बहन थी जो उनसे उम्र में काफी बड़ी थी भाई के दु:ख के समय आई थी| माँ की  हालत उस पर भाई की उजड़ी ग्रहस्थी देखकर जितने दिन वो रह सकती थी रहीं | अपने साथ लाई एक कम उम्र की  महिला कल्याणी को कह कह कर काम करवा लेती थीं | भाई की  बिखरी ग्रहस्थी  कुछ संभल पाई थी| कल्याणी एक फुर्तीली महिला थी|  सब काम वह  जल्दी सीख  जाती | समझदार  इतनी कि किसी भी काम के लिए उसे दोबारा नहीं कहना पड़ता था| लक्ष्मी कांत जी के ससुराल वाले चिंतित तो थे पर कुछ करना भी उनके बस में नहीं था |सबसे छोटे बच्चे को नानी अपने साथ ले गई थी| लक्ष्मीकांत जी की पत्नी की मरणोपरांत  की  सारी क्रिया पूरी| हुई बहन भी अब ससुराल जाने के लिए अपना सामान बांधने लगी थी| अपने भाई के छोटे छोटे बच्चों पर और माँ  की  वृद्धावस्था को देखते हुए बहन अपने साथ जिस कल्याणी को लाई थी उसको भाई के घर कुछ और दिन रहने का आग्रह किया |कल्याणी ने कहा था कि अगर  घर मालिक कहते है तो ही वो रुकेगी| दग्ध हृदय लक्ष्मी कांत जी ने बहन के पास खड़े हो कर अंदर बैठी कल्याणी को  सुनाकर  अपना निर्णय देते हुए कहा था| अभी इस घर को तुम्हारी जरूरत है|

इतना सुनना था कि कल्याणी ने अपना सामान अंदर रख लिया| हवेली के बीच वाले माले में लक्ष्मीकांत जी के कमरे के एकदम सामने वाले कमरे में कल्याणी ने उस दिन अपना सामान रखा| उस दिन तो वह उसे दूसरे कमरे में जाने को नहीं कह पाये पर आगे भी वो ये हिम्मत नहीं कर पाये| लक्ष्मीकांत जी कुछ सोच कर चुप्पी लगा गए | रात को देर से देखते कल्याणी सारा काम खतम कर सोने को आती, न जाने सुबह कब उठती उनको तो उसका कमरा बाहर से बंद ही दिखता|

   घर के सबसे ऊपरी मंजिल पर रसोई घर था| सारे दिन कल्याणी वहीं बनी रहती | बच्चे  भी वहीं छत पर पढ़ते, खाना खा कर  सो जाते| वहाँ बैठ कर कल्याणी सारे घर का काम बिना बोले संभाल लेती| उसे सब जानकारी रहती|  कौनसा  बच्चा कब स्कूल जाता, कब वापस आता| उन की स्कूल ड्रेस प्रेस करके तैयार रखती| लक्ष्मी  कांत जी की  बूढ़ी माँ को समय से खाना  भिजवाना|  माँ  के  लिए रखी महिला से सारे समाचार लेती | रात को सोने से पहले माँ को संभाल कर सोने जाती | एक थैली में भर कर लाए कपड़ों से लंबा समय कैसे निकलता| लक्ष्मी कांत जी कभी  बिन कहे  ही  अपनी पत्नी की साड़ी , स्वेटर, शाल चप्पल, आदि  सामान उसके कमरे के बाहर रख देते| लक्ष्मीकांत जी ने कितनी ही बार किसी वस्तु की  आवश्यकता के बारे में जानना चाह पर कल्याणी ने कभी कुछ नहीं मांग| बस दिया गया सामान बिना प्रतिक्रिया दिए रख लेती |

अगली बार जब लक्ष्मी कांत जी की  बहन घर आई कल्याणी का सहयोग देख कर वों उसे वापस चलने को कह ही नहीं पाई| इतना जरूर है कि लक्ष्मी कांत जी हर महीने उसके  वेतन  के नाम से कुछ रूपयै  अलग रखते थे| इसकी  जानकारी कल्याणी को हुई तो उसने कहलवाया था कि ‘उसे इसकी  आवश्यकता नहीं है|  घर का सामान उसकी एक आवज से आ जाता ,किसी भी बच्चे के हाथ से सूची लिखवा कर लक्ष्मीकांत जी को भिजवा देती |

 वर्षों बीते माँ भी अपनी उम्र पा कर चल बसी, उनकी  मृत्यु पर एक बहु के द्वारा करने वाले सभी काम कल्याणी ने किये |  जिसके   लिए कल्याणी को जो करना होता चुप चाप बिना जताए कर देती |बड़ी बेटी के विवाह योग्य होने पर एक दिन रसोई के सामान की  सूची के नीचे लिखवाया एक जवाईं कि तलाश भी करनी  है|

उस दिन पहली बार लक्ष्मी कांत जी के मन  में कल्याणी के लिए आदर के साथ अन्य मीठा सा भाव जगा  था| उस दिन उन्होंने कहलवाया कि आज दोपहर का भोजन ऊपर रसोई  के बाहर जहाँ सब करते हैं वहीं भोजन करेंगे| कल्याणी काम करते करते उत्साह से प्रतीक्षा कर रही थी| लक्ष्मी कांत जी के आने की  आहट  पा  कर कल्याणी ने भोजन परोसा और थाली बाहर भिजवाई |कल्याणी स्वयं बाहर नहीं आई, लक्ष्मी कांत जी को भोजन करते समय कल्याणी के दो पाँव दरवाजे की  झिर्री से नजर आ रहे थे|  दोनों तरफ से चुप्पी थी  एक एक करके बच्चों के विवाह हो गए| बेटा  बाहर जा कर नोकरी करने लगा  उसे पिता के व्यापार में  कोई  रुचि नहीं थी| बेटे  नें कभी कल्याणी को माँ तो नहीं कहा पर वह तो उनके लिए माँ से कम कभी नहीं रही ,पर लक्ष्मीकांत जी के लिए वो क्या थी ये सवाल कल्याणी के मन में सदा उठता था| लक्ष्मीकांत जी अब करीब  65 वर्ष के ऊपर के हो चुके थे| कल्याणी को अपनी जन्म तारीख याद नहीं पर वो भी उतनी ही उम्र की  नजर आती थी| उस दिन लक्ष्मीकांत जी दुकान से जल्दी आ गए थे| साथ आए नौकर के साथ कल्याणी ने चाय भिजवाई पर नाश्ता देना भूल गई थी |इसलिए नाश्ता पकडाने तेजी से नीचे उतर रही थी कि कैसे पाँव फिसला  कि वह गिर पडी | कल्याणी के  सर पर गंभीर चोट आई थी| कल्याणी को कुछ  लोगों की  मदद से अस्पताल ले गए| उस दिन लक्ष्मीकांत जी कल्याणी के लिए अस्पताल में ही रुके रहे| नौकर बार बार उन्हें  घर जा कर आराम करने का आग्रह करता रहा, उन्होंने कल्याणी  को एक  मिनट के लिए भी अकेला नहीं छोडा | अस्पताल में उसके अच्छे से अच्छे इलाज के निर्देश दिये जा रहे थे | दो दिन बड़ी परेशानी  से निकले| एक अन्य खान बनाने वाले से खाना  बनवाकर खाया | आज कल्याणी को कुछ ठीक लग रहा था | लक्ष्मीकांत जी ने देखा दवाई के लिए कल्याणी को उठने में भी  तकलीफ हो रही थी| उठने में कल्याणी को  तकलीफ को देखते हुए लक्ष्मी कान्त जी ने बिना संकोच  के कल्याणी को कमर से सहारा दे कर उठाया| कल्याणी उस समय अत्यंत पीड़ा में थी| इसलिए उसके चहरे के कोई भाव लक्ष्मीकांत जी नहीं पढ़ पाये | कल्याणी को खाना खिलाकर लेटा देने के बाद लक्ष्मीकांत जी  पास की स्टूल पर बैठ गए| कल्याणी  ने कुछ इशारा किया जिसे वो नहीं समझे और वेसे ही बैठे रहे | दो दिन के बाद कल्याणी को  अस्पताल से छुट्टी मिलने का दिन तय हुआ | उसी दिन  बेटा भी एक दिन के लिए मिलने आने वाला था| बहु ने कल ही आकर  घर संभल लिया था | आज अस्पताल से घर जाने के लिए कल्याणी को कपड़े बदलने थे | पुराने कपड़ों पर खून के दाग कुछ ज्यादा ही देख कर लक्ष्मीकांत जी नौकर के साथ घर आए| उन्होंने पहली बार कल्याणी वाले कमरे में प्रवेश किया| अगरबत्ती की  महक से कमरा महक रहा था |

चारों तरफ हर चीज सलीके से रखी थी| दीवार पर उनके बेटे बहु और पुत्री जवांई  कि तस्वीर देख कर लक्ष्मीकांत जी को अचरज हुआ
कपड़े तलाश करते समय अलमारी में  एक दम सामने रखी  लक्ष्मीकांत जी ने  अपनी तस्वीर देखी |बच्चों के विवाह के समय जो भी गहन उपहार स्वरूप कल्याणी को दिया था  वो वहीं तस्वीर के सामने रखा था| उन्होंने ध्यान दिया की  उनकी तस्वीर के एक दम सामने सिंदूर की डब्बी खुली रखी हुई  थी |न जाने क्या सोच कर उन्होंने वो डब्बी अपनी जेब में रख ली |  दिल  में बहुत कुछ चल रहा था |कल्याणी के कपड़े निकाल कर थैले में रखे|  लक्ष्मीकांत जी ने नोटिस भी किया कि आज नौकर उन्हें अजीब नजरों से देख रहा था| उन्हें लगा  शायद ये उनका वहम हो ,ये सोचकर उन्होंने विचार को झटक दिया| अस्पताल पहुँच कल्याणी को छुट्टी दिलाने की   कार्यवाही पूरी करी| लक्ष्मीकांत जी ने थैला रखा और कल्याणी से कहा कपड़े बदलने हैं  मैं नर्स को भिजवा  रहा हूँ| कह कर बाहर चले गए| अंदर आकर कंघा निकाल कर बाल बनाने को दिया |वो लगातार कल्याणी  को निहार रहे थे| बाल बनाने के बाद कंघा लेने के बहाने नजदीक आए और सिंदूर की  डब्बी कल्याणी के सामने रख दी| लक्ष्मीकांत जी ने के हाथ में सिंदूर की  डब्बी देख कर कल्याणी समझ गई |उसने गहरी नजरों से उनको निहार दोनों मौन थे| कल्याणी ने सिर झुका  कर आँखें बंद कर ली| लक्ष्मीकांत जी ने चुटकी सिंदूर कल्याणी कि मांग में भरा  और साथ लाया गजरा  कल्याणी को पकडा  दिया|  कल्याणी के लिए ये अभिसार सपने जैसा था| उसने लक्ष्मीकांत जी के चरण छु कर बस यही  कहा कि “आज मेरा जीवन धन्य हुआ”| घर में बेटा  बहु प्रतीक्षा कर रहे हैं| नौकर द्वारा बेटे को समाचार मिल चुका था| कल्याणी को पिता के साथ देख कर बेटा बहु प्रसन्न थे शायद  आज उनके मन  पर जो बोझ था वो भी आज कम हो गया था|

प्रभा पारीक