Let's go somewhere far away...! - 21 in Hindi Fiction Stories by Arun Gupta books and stories PDF | चलो दूर कहीं..! - 21

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चलो दूर कहीं..! - 21

चलो दूर कहीं.. 21

 रात के लगभग ग्यारह बजे थे। भोपाल–दिल्ली हाईवे अंधेरे के विशाल समुद्र में एक चमकती हुई रेखा जैसा दिखाई दे रहा था। दूर-दूर तक फैली काली सड़क पर ट्रकों की हेडलाइटें जुगनुओं की कतार की तरह टिमटिमा रही थीं। कहीं-कहीं ढाबों की पीली रोशनी सन्नाटे को चीरती हुई यात्रियों को अपनी ओर बुला रही थी। सड़क के दोनों ओर खेत और पेड़ों की परछाइयाँ अंधेरे में गुम थीं, मानो किसी रहस्य को छिपाए खड़ी हों। हवा में डीजल, मिट्टी और रात की ठंडक का मिला-जुला एहसास था। कभी किसी तेज रफ्तार बस का हॉर्न सन्नाटे को तोड़ देता, तो कभी किसी ट्रक के इंजन की घरघराहट दूर तक सुनाई देती। आसमान में टिमटिमाते तारे और सड़क पर दौड़ती रोशनियाँ ऐसा भ्रम पैदा कर रही थीं मानो धरती और आकाश समानांतर यात्रा कर रही हो..! 

और इसी हाइवे पर अनवरत फर्राटा भरते असंख्य गाड़ियों में एक कार रोहन का भी था। वह भोपाल से दिल्ली लौट रहा था, और खूद गाड़ी चला रहा था। उसे जोरों की भूख लगी थी लेकिन सड़क किनारे बने ढाबों में गाड़ियों की लंबी लंबी कतारें देख वह आगे बढ़ता रहा और एक ढाबे में गाड़ियों के कम भीड़ को देखकर रुका.. उसने समय देखा रात के 12 बज रहे थे। वह खाली जगह में गाड़ी पार्क करके बाहर निकला तो ठंडी हवा के झोंके के साथ एक जानी पहचानी सी खुशबू उसके नथूने से टकराते ही उसके बदन में सिहरन सी उत्पन्न हुई,वह मन ही मन बुदबुदाया," प्रतीक्षा यहां.. ?अरे नहीं..नहीं.. भला प्रतीक्षा यहां कैसे हो सकती है..? उसे गायब हुए तीन महीने बीत गए..अब तक उसका कोई सुराग कहां मिला..?" सोचते हुए उसने अपने गर्दन को झटका और ढाबा के अंदर जाने के लिए कदम बढ़ाया ही था कि एक सुमधुर आवाज सुनकर ठिठका," तू भी मुझे भूल गया न रोहन..?" 

इस अनजान जगह में अपना नाम सुनकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न था,उसने ढाबे के धुंधली रोशनी में इधर उधर नजर दौड़ाते हुए हैरानी भरे स्वर में कहा," कौन है.. सामने क्यों नहीं आता..? सामने आओ..!" 

रोहन के चीख को सुनकर ढाबे का लड़का दौड़ते हुए उसके पास आया और बोला,"क्या हुआ साहब..उस भिखारिन ने आपको भी परेशान किया क्या..? छोड़िए न उसे आप अंदर आइए..!" 

रोहन ने उस लड़के के बात को बीच में काटते हुए कहा,"भिखारिन..?" 

"हां साहब भिखारिन है..न जाने कहां से भटक कर आ गई है और सारे कस्टमर को परेशान कर रही है...!" 

"किधर है वो..?" 

"वो उस गाछ के नीचे है.. उसके साथ एक बड़ा भयानक कुत्ता है साहब.. मुझे तो उसका रंग-ढंग अच्छा नहीं लगता साहब..! छोड़िए न साहब क्यों बेकार में उस भिखारन के पीछे इतना माथा पच्ची कर रहे हैं.. चलिए खाना है तो खा लिजिए..हमारा दुकान बढ़ाने का समय हो रहा है..!" 

रोहन जैसे उस लड़के के बात को सुना ही न हो..वह उस गाछ की ओर बढ़ चला। जैसे जैसे वह उस गाछ के करीब पहुंच रहा था ठंडी हवा के झोंके के साथ वही खुशबू उसे बैचैन कर रही थी। उसे विश्वास हो चला था कि हो न हो ये भिखारन प्रतीक्षा ही हो.. प्रतीक्षा जिंदा है ये सोचकर ही उसका मन अपार हर्ष से प्रफ्फुलित हो उठा ..उसका वो  रुप लावण्य, उसका खिला चेहरा, मोतीयों से चमकते दांत, इठलाती - बलखाती सीना ताने नवयुवती की मनमोहक तस्वीर उसके मन-मस्तिष्क में तैर रहा था।

वह जब उस गांछ के पास पहुंचा तो वहां सन्नाटा पसरा था और धुंधली रोशनी थी, सड़क पर आते जाते गाड़ियों के हेडलाइट से वहां तेज रोशनी फैल जाती थी..! रोहन ने बड़े ध्यान से उस गाछ के नीचे पसरे सन्नाटे को घूरा .. और उसे एहसास हुआ मानो जैसे वह किसी गहरे कुएं में गोता लगा रहा है, उसे सारी चीजें घुमती हुई सी प्रतीत हो रही थी.. और फिर एहसास हुआ जैसे किसी ने एकाएक ब्रेक लगा दिया हो.. एक झटके से उसकी तंद्रा टुटी और वह पसीने से तरबतर आंखें फाड़े सामने खड़ी प्रतीक्षा को घूर रहा था..वह किसी छाया की भांति खड़ी थी। उसके बदन पर एक सफेद धोती लिपटा था..हवा के झोंके से नीलाम होते लाज को बचाने के लिए वह धोती के छोर को पकड़े जोर से अपने छाती से दबाए थी..! उसकी नजरें झुकी हुई थी,बाल बिखरे हुए थे, चेहरा मुरझाया हुआ था..उसका गठीला बदन सुखकर कांटा हो गया था। उस नवयौवना और रुप लावण्य की मल्लिका जिसके स्मरण मात्र से उसका रोम रोम प्रफ्फुलित हो उठता था,उसका यह हाल देखकर उसकी रुह कांप उठी..! उसमें इतनी हिम्मत न थी कि वह उससे कुछ पूछ सके..!

दोनों चुप थे। थोड़ी देर बाद कुछ संयत होने पर रोहन ने उसके समीप जाकर थरथराते स्वर में कहा,"प्रतीक्षा तुम जिंदा हो..हम सबने तो तुझे मरा हुआ मान लिया था।" 

"मौत को मात देकर यहां तक पहुंची हूं रोहन.. बड़ी दर्दनाक कहानी है कभी फुर्सत से बताऊंगी.. तुम इस तरह यहां मिलोगे इसकी आशा न थी.. खैर ये बताओ क्या हमें साथ में ले चलोगे..?" 

"और कौन है तुम्हारे साथ..?" 

रोहन का इतना पूछते ही उसने गाछ के दुसरे ओर छुपकर बैठे लोगों की ओर इशारा करके बोली," रवि,सुमी और अनाह है..!" 

प्रतीक्षा के इशारा करते ही वह उनके समीप पहुंचा और ध्यान से उन्हें देखते हुए कहा,"लगता है ये भी तुम्हारे तरह वक्त के मारे है.. चलो पहले खाना खाते हैं फिर चलेंगे..!" 

अनाह जो अबतक सिर झुकाए बैठा चुपचाप दोनों की बातें सुन रहा था, नजरें उठाकर रोहन को देखा तो ठीक उसी वक्त एक गाड़ी के हेड लाइट की तेज रोशनी अनाह पर पड़ी..उसका विचित्र बनावट को देखकर रोहन पीछे खिसकते हुए थरथराते स्वर में कहा," ये कौन सा जानवर है..?"

रोहन के स्थिति देख प्रतीक्षा को समझते देर न लगी कि अनाह को देखकर ये घबराया हुआ है.. अगर इसने शोर मचाया और अन्य लोग यहां जुट गए तो अनाह मुसीबत में फंस जाएगा, ये ख्याल आते ही वह तुरंत रोहन के पास पहुंची और बोली," ये अनाह है रोहन..इसी ने मुझे बचाया है..! अगर ये न होता तो मैं आज तुम्हारे सामने खड़ी न होती ..! इससे डरने की जरूरत नहीं है, इसे दोस्त समझो..!"

"मैंने आज तक ऐसा जानवर नहीं देखा.. आखिर ये कौन सा जानवर है?" 

रोहन के प्रश्न का प्रतीक्षा उत्तर देती उससे पहले ही अनाह ने कहा,"हेलो मिस्टर रोहन.. मैं कोई जानवर नहीं आपके जैसा इंसान हूं लेकिन आपसे थोड़ा इंटेलिजेंट हूं...!" 

कहते कहते अनाह के सिर के बीचोंबीच की आंखें जल उठी और जब वह प्रकाश पुंज रोहन पर पड़ा तो उसे एहसास हुआ जैसे वह अपना सुध-बुध खोता जा रहा है... और उसका नियंत्रण जैसे अनाह के पास ट्रांसफर होता जा रहा है...! रोहन चुपचाप खड़ा ये सब होता महसूस करता रहा लेकिन कुछ न कर सका.. मानो जैसे उसके सारे इंन्द्रियों पर अनाह ने नियंत्रण कर लिया हो..!

                                                   क्रमशः...