■ यह कैसा अहसास■ भाग 01
Written by H K Bharadwaj
__________________________________________________________________________________________बात उन दिनों की है जब मेरी नई नई शादी हुई थी। मेरे पिता जी अपनी ड्यूटी के चक्कर में पड़े हुए थे, अतः उनका हमारे परिवार की ओर ध्यान लगभग कम ही था अतः हमारा सयुंक्त परिबार दादीअम्मा के पीहर में रहता था।पिताजी बैसे भी दादा जी के सानिध्य में हमें छोड़कर अपनी ड्यूटी पर जा चुके थे।दादाजी दिन भर चौपाल पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ाते रहते थे,इस गांव के घर जवाँई होने के नाते सभी लोग उनका सम्मान करते थे,।दादा जी के दो बेटे थे एक बड़े जो मेरे पिता जी थे और दूसरे बेटा मेरे चाचाजी थे,चाचाजी की दो बेटियां थी और मैं अपने पिता की तीन सन्तानों में सबसे बड़ा था। अतः सभी चाचा,चाची,दादा दादी और अपनी माताजी का मैं लाडला था,।इसलिये दादाजी ने मेरा विवाह वचपन में ही जब में सिक्स क्लास में पडता था तब मेरे पिताजी की इच्छा के विपरीत उन्होंने मेरा विवाह मेरी ही समकक्ष आयु की एक लड़की से सम्पन्न करा दिया।उस समय वाल सुलभ प्रवृर्ति होने के कारण उस विवाह का कोई अर्थ मेरे लिये कुछ भी नहीं था ।अतः पांच वर्ष बाद द्विरागमन होने पर वधु का आना घर पर हुआ, इसी बीच मेरी सासू मां टायफाइड रोग से ग्रसित हो गई थी अत: पत्नी को उनके पीहर भेज दिया गया ।इस तरह पत्नी का अपने पीहर में अधिक समय गुजरने और वहां के कार्य मे लगातर लगे रहने पर उनका स्वास्थ बिगड़ गया और उनको भी कुछ समय बाद टायफायड का रोग हो गया और इस तरह उनकी लापरवाही और लगातार कार्य के बोझ के कारण उनका टायफाइड विगड़ने के कारण उनकी मृत्यु भी, टायफाइड से ही हो गई। समय बीतता गया ,मेरी आगे की पढ़ाई प्रारम्भ थी। इसी बीच एक ऐसी घटना मेरे सामने घटी जो अविश्वासनिय और भय को उतपन्न करने बाली थी ,उस घटना का असर मेरे किसोर मन पर वेहद प्रभाव छोड़ गया।घटना कुछ इस तरह थी , कि गाँव की एक जवान महिला ने अपने पारवारिक कारणों से एक नीम का बृक्ष जो कि गाँव से कुछ दूर रास्ते में था,उस पर चढ़ कर फांसी लगा कर आत्म हत्या कर ली।उस स्त्री की लाश को देख कर मेरे किसोर मन मस्तिष्क पर इतना प्रभाव पड़ा कि मुझे अपने कमरे में अकेला रहने पर डर लगने लगा था। जब भी मैं अकेला होता तो उस महिला का वही बीभत्स चेहरा , बड़ी बड़ी बाहर को उबली पड़ी आँखें ,मुहँ से निकली लम्बी जीभ ,जो अक्सर मेरे आँखों के आगे कौंध जाया करती थी,।और फिर अगले पल मेरे अंदर कुछ ऐसा अजीव सा डर उतपन्न हो जाया करता था कि ,मै कहीं अकेले जाने में मुझे वहुत डर लगता,कुछ समय तक मेरी यही दशा रही धीरे धीरे समय गुजरता गया,किन्तु उस घटना को मै अपने दिमांग से नही निकाल सका था समय गुजरता गया सब कुछ धीरे धीरे सामान्य हो रहा था किंतु मस्तिष्क के कोने में छिपी उस घटना की तस्बीर आज भी मेरे अंदर अंकित थी, इसलिये मैने वह गाँव से वाहर जाने बाला रास्ता जिस पर वह नीम का वृक्ष था बन्द ही कर दिया था।अकेले और रात्री के समय तो आना जाना बिल्कुल निकल ने के बारे में तो विचार ही त्याग दिया था ।हाँ दिन में भी मैं अकेला उधर जब भी उस रास्ते पर होकर जाना जरूरी होता तो मैं अक्सर वहाने बना कर घर बालों से टाल मटोल कर दिया करता था।या फिर दूसरी ओर घूमकर फेर से दूसरी ओर की रास्ता पर होकर निकल जाता था।इस तरह डर के कारण उस रास्ते से निकलना मेरा लगभग बन्द हो चुका था, ।इस तरह दिन कुछ और गुजरे लोग उस घटना को अब भूल चुके थे ,धीमें धीमें सब कुछ सामान्य होता जारहा था ।मैं भी दिन में अपने सहपाठियों के साथ टोली के साथ उधर से एकाध वार आने जाने लगा था ।सब कुछ सामन्य दिखाई देता था लोग उस हादसे को भूल गये थे। कुछ समय बाद गांव के जमीदार की पुत्री प्रियंवदा का विवाह था ।अतः उस रात बारात जोर शोर से बैंड बाजे के साथ गाँव की ओर चढ़ती हुई आ रही थी ।मेरे सभी हम उम्र दोश्त बारात को देखने जाने लगे रात्रि का पहला पहर था , अतः मैं और मेरा खास मित्र मुन्ना भी बारात को देखने के लिये लालाइत थे, हमारी टोली में तीन साथी थे एक छिद्दा जो पहले ही अकेला बारात को देखने की दर्शक मण्डली में पहुँच चुका था,।दूर से आती हुई वह कर्ण प्रिय बाजों की आबाज हम दोनों मित्रो को भी अपनी ओर आने के लिये उत्साहित कर रही थी अतः मुन्ना मेरे घर पर मुझ से मिलने आया और बोला।हरी चल बारात देख आएं।नहीं यार,मेरे समझ से उधर का रास्ता जाना रात में ठीक नहीं।मैने मुन्ना को अपने मन की छिपी बात बताई।अरे चल ना, तू यार डरपोक है,या ऐसे ही टालमटोल कर रहा है।मुन्ना मुझ से बिगड़ता हुआ बोला।देख यार उधर बो....वो... नीम का पेड़ है ना।मैंने अपने मन की शंका को मुन्ना को समझाने की कोशिश की।तो क्या है पेड तो गाँव में होते ही है,पर तूझे डरने की कोई जरूरत नहीं ,मै हूं ना.....।मुन्ना सीना तान कर बोला।पर वहाँ सुना ....है कि एक चुड़ैल रहती है।मेने अपने ह्रदय का छिपा डर निकाल कर मुन्ना को वताया ।अरे यार डर की कोई बात नहीं है,वहां वहुत गेस लालटेन जल रहीं है,।मुन्ना ने मेरे कान में धीरे से कहा।अतः थोड़ी हिम्मत बांध कर हम दोनों तैयार हो कर माचिस जेब मे रख कर चल दिये।बारात की दूरी अभी गांव से आधा किलोमीटर दूर थी किन्तु गांव में सड़के और गलिया उस समय कच्ची थी,और प्रकाश व्यबस्था का कोई साधन भी नहीँ था ।रास्ते मे कहीं कीचड़ तो कहीं पानी की गंदगी थी, हम दोनों मित्र इन बाधाओ को पार करते हुए अब उस नीम के पेड़ से कुछ दूर अभी रह गये थे,बारात के वेंड बाजों की आबाज हमारे कानों में स्पस्ट प्रिय लग रही थी साथ ही उसमे नृत्य करने बाली महिलाए, जो स्त्री वन कर पुरुष नाच रहै थे अव वह भी स्पस्ट दूर से दिख रहे थे, हम दोनों मित्र धीरे धीरे चलते हुये बारात को देखने की उत्सुकता में बड़े चले जारहे थे ।मैं आगे आगे था और मुन्ना मेरे पीछे चल रहा था अचानक हमारे सामने उस नीम के पेड़ से कोई धम्म की आवाज के साथ कूदा ।और मेरे सामने ठीक आधा फिट के फांसले पर खड़ा हुआ मुझे वह घूर ने लगा।अंधेरा होने के कारण उसकी शक्ल पहिचान से परे थी किन्तु उसके चेहरे पर लटकते बड़े बड़े बालो से उसकी पहिचान यह नहीं हो पा रही थी कि वह स्त्री है या पुरुष।वह सामने रास्ता रोके खडा हुआ, हमे कभी बाई ओर तो कभी दांई ओर देख रहा था। आगे रास्ता अबरुद्ध कर वह खड़ा था एक दीबार की भाँति......जब इस तरह हमे खड़े खड़े पांच मिनट से अधिक बीत चुके थे ।जब मुझसे नही रहा गया तो मैं हिम्मत कर उस से बोला।कौन.......।कोई उत्तर नहीं ।बस उसकी ओर से केबल एक ही क्रिया हो रही थी,वह यह कि वह अपना सिर वार वार कभी इधर तो कभी उधर घुमा रहा था।मैंने पुनः हौशला कर उस से पूँछा।कौन .......है।इसी बीच मेरा साथी मुन्ना मेरी शर्ट को पीछे से खींच कर घर की ओर भाग गया, ।मैं अब अकेला उस के सामने था अतः मेने एक बार और हिम्मत जुटा के पूछा,।कौन हैं? ।परिणाम वही ,पहिले जैसा। अब मै भी पीछे की ओर बापिस लौटने को हूआ,किन्तु मेरे पैर अब आगे ना पीछे बड रहे थे मानों किसी ने मुझे वान्ध रखा हो, और तभी मैने देखां मेरे मुँह पर बारात की गैस बाली लालटेन का प्रकाश मेरे मुहँ पर पडा ,और अगले पल मेरी आँखे स्वत: मुंदती चली जा रहीं थी और मेरे समक्ष एक वला की खूवसूरत स्त्री एक दुल्हन बनी गहनों में लदी हुई मुश्करा रही थी उसके हाथ में एक ताजा गुलाब का सुर्ख रंग का मोहक फूल था और मै पल भर मे अचेत हो गया ।शेष भाग 02 में । Written By H.K.Bharadawaj