Yah Kaisa Ahasas - 3 in Hindi Horror Stories by H.k Bhardwaj books and stories PDF | यह कैसा अहसास - भाग 3

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यह कैसा अहसास - भाग 3

■ यह कैसा अहसास ■ भाग 03

Written by H K Bharadwa

___j______________________________________________________________________________________उस सर्वांग सुन्दरी के जाते ही  मेरा मन एक दम दुखी हो गया था।मेरा दिल वार बार रोने को होता तो भी मै किन्तु रो नहीं पा रहा था, पता नही उस अपूर्व सुंदरी में यह क्या और कैसा सम्मोहन था।जो मुझे वार बार उसकी याद आ रही थी,।        एक पल को भी मेरा मन उसका विछोह नही सह पा रहा था,मन मे कई तरह के प्रश्न उठ रहे थे।अब वह कब आयेगी? अथबा क्या वह अब कभी भी नहीं आयेगी ?         मै अभी सोच ही रहा था कि मेरे कमरे मे फिर वही खनकदार हंसी अचानक गूँज उठी, ।मै वेहद उत्सुकता के साथ उसे देखने की इच्छा से, इधर उधर बार बार देखने लगा। लेकिन वह मुझे अभी दिखलाई नही दे रही थी, ।इस से  मै और भी अधिक व्याकुल हो कर अपने बैड पर आधा लेट गया, और लम्बी लम्बी स्वांस खीच ने लगा,       मानो  मैं रेत की एक विशाल दरिया में ताबड़ तोड रेस लगाकर के आया हूँ ।कुछ देर मैं उसी स्तिथि मे पडा रहा,।            वह अब तक मुझे दिखलाई नही पड़ी थी अत: मुझे अब  लगने लगा कि वह नही हंसी होगी वल्कि, वह मेरा वहम होगा, ।अत: मैं  अब नाउम्मीद होकर बैड पर दूसरी  ओर तकिए से मुहूँ छुपा कर लेट गया,।मन मे उस से मिल ने की तीव्र उत्कंठा  भी थी किन्तू यह सम्भब नहीं था। अत: मै मन मार कर सोने का उपक्रम करने लगा, ।अगले पल आँख  बन्द करते ही मुझे नीद ने घेर लिया। मै अभी सुसुप्ताव्स्था में  ही था की मुझे फिर वही अनौखे "अहसास" के आभास की अनुभूति हुई।कि कोई मेरे नजदीक आया और मेरे बराबर में लेट कर अपनी कोमल कोमल नाजुक सी उंगलियों से और हथेलियों से मेरे बालों को सहला रहा है,।चूंकी  मेरे सिर में  अब दर्द भी हो रहा था और मुझें  एसा लग रहा था कि कोई मेरे सिर को अपने कोमल हाथों से दबाये या सिर के ऊपर मालिस कर दे।         मैंने अपने सिर के ऊपर अक्समात अपना हाथ रखा , और अगले पल मेरे हाथ किसी के कोमल हाथों से टकराये ।मै कौतूहल से भरा उछल पड़ा , और उठने को हुआ कि उसने मेरी कमर में हाथ डाल कर कहा। "वस यूँ  ही लेटे रहो,मै तुम्हरा सिर अब दबा देती हूँ"।वह खनकती आवाज में हसीं।मै मंत्र मुग्ध सा अपने कानो से उसकी  जलतरंग सी झंकार जैसी आवाज में खो चुका था, ।अत: अब उसकी बात मानने के अलाबा और कोई विकल्प ही नहीं वचा था मेंरे पास ,मै पुन: उसी तरह लेट गया ।         अब वह मेरे इतने करीब आ चुकी थी कि उसका कोमल संग मर्मर का तरासा बदन मेरी रगो को अपनी गर्मी से इतना पिघला रहा था की मुझे वह स्तिथि असहनीय और बेकाबू हो चुकी थी ।और अब मेरी सभी नशों में वहता हुआ रक्त अव खौलता  हुआ लाबा बन  कर बाहर निकलआना चाहता हो।"प्लीज अब रहने दो "।  मैने उस से अनुरोध किया। " क्यों यह सब अच्छा नहीं लगा " ? ।वह फिर खिल खिलाकर हँसी ।"अच्छा .....तो लगा पर , यह सब करने की अभी हमारी उम्र नहीं है"।मै थोडा शरमा कर बोला।" क्यों तुम सोलह के नहीं हो"। वह  फिर मुश्कराती हुई बोली।" हाँ,.....पर यह.... सब कुछ ....ठीक नहीं है,......दादी अम्मा कहती है, कि जब लडकी की शादी हो जाये तो... उसे यह सब अपने पति के साथ,... यह सब ...हाथ पैर दबाना आदि  सेवायें उसी के साथ करनी चाहिये "। मैंने उस से समझाते हुए कहा।किन्तु उस पर मेरी बात का कोई प्रभाव नहीं हुआ,वह पूर्व की तरह वही आसहनीय हरकतें करती रही।" तुम रहती  किस तरफ हो "।अचानक मेने उससे पूँछा ।" यह अपना ही तो गांव है,उस दिन तुम बारात देखने गये थे, और मै तुम्हे वहाँ पर मिली थी,तुम्हारा दोस्त मुन्ना तुम्हे अकेला छोड कर भाग आया था, याद है कि  नहीं "।वह खिलखिलाती हुई बोली।मेरे शरीर में उस दिन की वह याद ताजा होने पर भय की झुर झुरी चड गयी, अब मुझें पहिले जैसा भय का अनुभव होने लगा था।" तुम्हारा घर उधर है....है, पर मैने उधर कोई घर नहीं देखा "।मै कुछ सोचता हुआ उस से बोला।वह थोडा मेरी ओर देख कर मुश्कराई  और बोली ।" उधर ही मेरा घर है चलो, किसी दिन  मैं जरुर दिखाने तुम्हें ले चलूंगी "।वह अव मेरे वक्ष स्थल पर उगे घनें बालों मेंअपना हाथ फिरा रही थी । अचानक मेरी दादीअम्मा मेरे कमरे के गेट  को जोर जोर से पीटने लगीं ।"अरे .....हरेन बेटा ....दरबाजा खोल "।और वह जोर से चिल्लाईं।मै अब दादी अम्मा की आवाज सुन किंकर्तव्यविमूढ़ सा  हो चुका था।          और  इसी के साथ मै अब अपनी शर्म और वदनामी के डर से चिंतित था,कि मेरी हिम्मत दरबाजा खोल ने की भी नहीं हो रही थी,किन्तु बाहर से लगातर दरबाजा पीटा जा रहा था ।मै मायूस नजरों से उस सुन्दर लडकी की ओर देखे जारहा था।अचानक मैंने उस से कहा " अब क्या करें यार तुम्हीं बताओं " ।उसने मुझे कोई जवाव ना देकर विचित्र नजरों से घूरा ,और अब वह मेरे पास से उठकर खडी हो चुकी थी,और फिर वह एकाएक मेरे कांन के नजदीक अपना मुहूँ ले जाकर बोली।" देखो आप अपनी दादीमाँ  को  मेरे बारे मे कुछ मत बताना वह मुझे अच्छी तरह पहिचानती है "।उसने .....मुझे झूठ बोल ने को प्रेरित किया ।पर दादी माँ मुझें हमेशा सत्य बोलने की ही शिक्षा दिया करती थीं, "झूठ मत बोलना बेटा ""झुठ बोलना पाप है "!वह मुझें हमेशा  यही शिक्षा दिया करती थी।" अरे हारेंन क्या सो रहा है "।उन्होने पुन:जोर से चिल्ला कर आवाज लगाई ।" सुनों मै जाती हूँ, तुम उन्हें मेरे बारे मे कुछ नही बोलना " । वह लम्बे लम्बे डग भरते हुए खिडकी के पास गई और मुझे बायबाय करती हाथ हिलाती वाहर  निकल गई ।उसके जाते ही मैने उठ कर दरबाजा खोल दिया।दादी माँ  कमरे मे घुस कर छूठते ही बोली।" हरेन तेरे कमरे में यह कैसी महक आ रही  है "।दादीअम्मा ने आते ही मेरी ओर प्रश्न किया।" जी वह... वह... वो ...हैना "।मेरे मुहूँ से अस्फुट शब्द निकले। और मै नीचे सर झुका कर निरूत्तर किसी अपराधी की भांति खड़ा हो गया था। आज मैं बचपन से किशोर आयु मे आ चुका था,वस पहिली बार झूठ  बोला, वह भी दादी माँ  की नजर मे।मै अंदर ही अन्दर वहुत दु:खी हो चुका था ।"उस झूठ के कारण" ।अचानक दादी अम्मा मेरे नजदीक आई और मेरा सिर को सूंघती हुई बोली।" तेरे बालों में एसा तेल किस ने डाला, यह  इतनी तेज खुशबू का है, एसा तेल यहाँ अपने गावँ में कहीं भी नहीँ मिलता है " ?। मै आत्मवोध के कारण दुखी हो रोने लगा।" दादीअम्मा मूझे  माफ़  करदो, मै आपको सब कुछ बता दूँगा"।मै अपनी गलती का प्रायश्चित करता हुआ बोला। और उनके आँचल से लिपट कर किसी छोटे बच्चों की मानिन्द सिसक पडा।            मेरी इस दशा को देख दादीमाँ मुझे झट से अपने सीने से लगाकर मेरा मूहूँ  चूमने लगी,सच में मेरी माताजी पिताजी के साथ सर्विस पर रहती थी,अता मुझे बचपन से ही दादा दादी की छत्र छाया में जो कुछ ममता मिली थी वह दादीअम्मा से ही मिली थी , अत: मैं अब तक कभी भी उनसे कुछ छुपाने की हिम्मत नहीं कर पाया था ।अतः मेने वह सब कुछ घटना, शुरु से आखिर तक की पूरी की पूरी कहानी उन्हें बिना झिझक के वयां करदी।          बमेरी आप बीती सुन दादीअम्मा गम्भीर हो गईं वह मेरा हाथ पकड कर माता नवदुर्गा चामुंडा मन्दिर ले गई और फिर पुजारी  जी ने मुझे  यज्ञ कुंड से भभुती लगाई  और अपने कमण्डल का जल पिलाया।            तत्पश्चात कुछ मंत्रो का जाप करने के बाद उन्होने मुझ पर पुन: जल छिडक कर कुछ जल दादीअम्मा को हिदायत देकर एक पात्र मे दे दिया। शेशांक.......,अगले अंक 04 में क्रमशः,,........,।

written by h.k.bharadawaj