कमरे में एसी चल रहा था, फिर भी संजना की हथेलियां पसीने से तर थीं। फोन को इतनी जोर से पकड़ा हुआ था कि उंगलियों के पोर सफेद पड़ गए थे — जैसे अगर उसने ज़रा भी ढील दी, तो कुछ छूट जाएगा जो वापस नहीं आएगा।
"यार संजना, रिलैक्स कर!" दूसरी तरफ से रिया की आवाज़ आई — बेफिक्र, हल्की, उस किस्म की जो सिर्फ उन्हीं लोगों की होती है जिनके लिए दरवाज़े हमेशा खुले रहे हों। "तूने जी-तोड़ पढ़ाई की है। पिछले साल भी तूने टॉप किया था।"
"पता नहीं रिया... अजीब सी बेचैनी है।"
"किस बात की?" रिया हंसी। "तेरे पापा का इतना बड़ा बिज़नेस है — तू तो रानी है यार। सब सेट है।"
संजना खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। बाहर का आसमान दिखता था — खुला, बेहिसाब, किसी से कोई वादा न माँगता हुआ। वो आसमान जो उसके लिए बस कांच के उस पार तक ही सीमित था।
"यही तो नहीं चाहती मैं, रिया। मेरे भी कुछ सपने हैं।"
"तो काम के साथ-साथ पूरे कर लेना।" रिया ने आसानी से कह दिया।
उसे अंदाज़ा भी नहीं, संजना ने सोचा। कि जब दरवाज़े खुद-ब-खुद खुलते हों, तो ताले नज़र नहीं आते।
"मैं उन जगहों में फंस जाऊंगी जहाँ मेरी पूरी फैमिली फंसी है। वो बिज़नेस मुझे लोगों से दूर करता है। मुझे यहाँ से जाना है, रिया। बहुत दूर।"
"अच्छा बाबा, पहले ये फिलॉसफी छोड़ — रिजल्ट आ गया! लिंक खुल रहा है..."
संजना का दिल एक पल के लिए रुक सा गया। कमरे की हवा जैसे थम गई।
"संजना!" रिया की आवाज़ खुशी से चीख पड़ी। "कांग्रेचुलेशन्स! 90.8%! पूरे 90.8! तूने फोड़ दिया — रुक, मेरी मम्मी का फोन है, बाद में कॉल करती हूँ!"
फोन कट गया।
कमरे में सन्नाटा लौट आया — वही सन्नाटा, लेकिन अब उसका वज़न अलग था।
संजना ने कांपते हाथों से मार्कशीट देखी।
90.8%।
बाहर कहीं किसी घर से खाने की खुशबू आ रही थी। पड़ोस के बच्चे गली में शोर मचा रहे थे। दुनिया बिल्कुल सामान्य रफ्तार से चल रही थी — जैसे उसे पता ही न हो कि किसी के भीतर अभी कुछ टूटा है।
किसी और घर में यह जश्न होता। किसी और लड़की के लिए यह गर्व होता। लेकिन संजना मिश्रा के लिए, यह एक पूर्णविराम था — उस वाक्य का, जो उसने खुद के लिए लिखना शुरू किया था।
एक साल पहले की वो शर्त कानों में गूंजने लगी। पिता की आवाज़, शांत और स्पष्ट — उस किस्म की शांति जो प्यार से आती है, और इसीलिए और भी भारी होती है:
"संजना, अगर 95% से ज्यादा आए, तो मैं मान लूँगा। तेरी हर मदद करूँगा। लेकिन उससे कम आए... तो फिर वही करना होगा जो मैं कहूँगा। आखिर यह सब तेरे लिए ही तो है।"
95%। वो जादुई आंकड़ा। उसकी आज़ादी की चाबी — जो अब 4.2% की दूरी पर छूट गई थी।
पिंजरे का दरवाज़ा बस खुलने ही वाला था।
किस्मत ने फिर से ताला जड़ दिया।
तभी फोन बजा।
स्क्रीन पर नाम फ्लैश हुआ — 'पापा'।
संजना का गला सूख गया। उसने एक पल फोन को देखा — जैसे कोई उस दरवाज़े को देखे जो बंद होने वाला हो।
"हैलो... पापा।"
"संजना!" पिता की आवाज़ में भारी उत्साह था — वो उत्साह जो सच्चा था, और इसीलिए और भी तकलीफदेह। "90.8%! बेटा, हमारे पूरे खानदान में आज तक किसी के इतने नंबर नहीं आए। हमारे रिश्तेदारों के बच्चे तो 80 तक भी नहीं पहुँचते!"
संजना की आँखों से एक आंसू लुढ़का। पिता खुश थे — इसलिए नहीं कि उनकी बेटी के सपने पूरे हुए, बल्कि इसलिए कि उनकी नाक ऊंची हो गई थी। और वो इस फ़र्क को जानते भी नहीं थे — यही सबसे बड़ा दर्द था।
"लेकिन पापा..." आवाज़ भर्रा गई, "वो 95% वाली बात..."
"अरे बेटा, उदास क्यों होती है?" पिता ने बड़े प्यार से कहा — और उनके प्यार पर शक करना मुमकिन नहीं था, यही तो असल उलझन थी। "जो होता है, अच्छे के लिए होता है। शायद भगवान भी यही चाहता है कि तू हमारे साथ रहे। देख — सब सेट है। तू बस खुश रह।"
संजना ने फोन कस कर पकड़ लिया।
वो चीखना चाहती थी — पापा, मुझे समाधान नहीं चाहिए। बस एक बार... एक बार मेरे टूटे हुए सपने का अफ़सोस मनाइये। उसे 'अच्छे के लिए हुआ' कहकर खारिज मत कीजिये।
लेकिन उसके होंठों से बस इतना निकला:
"हाँ पापा... शायद आप ठीक कह रहे हैं।"
फोन कट गया।
कमरे में फिर वही खामोशी थी। एसी की हल्की घरघराहट। घड़ी की टिक-टिक। और संजना — बिल्कुल अकेली, उस कमरे के बीचोंबीच जो सब कुछ होने के बावजूद हमेशा थोड़ा खाली लगता था।
खिड़की से बाहर एक पक्षी आसमान में ऊँचा उड़ रहा था — बेपरवाह, बेरोकटोक, किसी शर्त के बिना।
संजना ने उसे तब तक देखा जब तक वो नज़रों से ओझल न हो गया।
आज वो जीत कर भी हार गई थी।
लेकिन क्या 4.2% का फासला किसी के सपनों का अंत तय कर सकता है?
उसने आँसू पोंछे। धीरे से। जैसे कोई किताब का वो पन्ना पलटता है जो पढ़ने में तकलीफदेह था — लेकिन जिसे पढ़े बिना आगे जाना मुमकिन नहीं।
उसने आँसू पोंछे, और खिड़की से दूर हट गई।
अब करने को बहुत कुछ था।