pankho ka boz - 2 in Hindi Women Focused by Amardeep Kumar books and stories PDF | पंखों का बोझ - 2

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पंखों का बोझ - 2

The Reluctant Heir.           2
                         विरासत का बोझ
यह वो जगह थी जहाँ हर कोई मोक्ष की तलाश में आता था।
संजना मिश्रा आज यहाँ अपनी इच्छाओं का गला घोंटने आई थी।
घाट पर सुबह की धुंध अभी पूरी तरह छंटी नहीं थी। गंगा की लहरें किनारे से टकरा रही थीं — धीरे, लगातार, बिना किसी से पूछे। मंदिरों की घंटियाँ और नाविकों की आवाज़ें मिलकर एक ऐसा शोर बनाती थीं जो किसी तरह शांत भी लगता था।
"हेलो दोस्तों! मेरा नाम है शत्रु और आज मैं आपको लेकर आया हूँ दुनिया के सबसे पुराने शहर... वाराणसी! पर क्या आपको पता है, इस शहर के दो और नाम भी हैं? अगर पता है तो अभी नीचे कमेंट करो..."
एक 22-23 साल का लड़का अपनी ही धुन में बोल रहा था — हाथ में भारी कैमरा, कार्गो पैंट, ढीली टी-शर्ट। दुनिया जैसे उसके लिए एक बड़ा सा content था, जिसे बस record करना था।
अचानक उसका पैर फिसला। वो संभला, लेकिन जूते के फीते खुल गए।
"अरे यार..." उसने इधर-उधर देखा और नज़र संजना पर पड़ी। बिना एक पल सोचे, उसने कैमरा उसकी तरफ बढ़ा दिया। "एक्सक्यूज़ मी, क्या आप दो मिनट इसे होल्ड कर सकती हैं? शू-लेसेस..."
संजना ने यंत्रवत कैमरा थाम लिया।
लड़का झुका, फुर्ती से जूते बाँधे, खड़ा हुआ। "थैंक यू! वैसे मैं शत्रु हूँ। और आप?"
इससे पहले कि संजना कुछ बोल पाती —
"संजना! यहाँ आओ।"
रवि मिश्रा। उनकी आवाज़ में वो कड़क थी जो आदेश और प्यार के बीच की बारीक लकीर पर चलती थी। वो लगभग बीस लोगों के एक टूरिस्ट ग्रुप को lead कर रहे थे।
"माफ़ कीजियेगा," संजना ने शत्रु से कहा और पिता की ओर बढ़ गई।
शत्रु भी उत्सुकता में उसी ग्रुप के पीछे हो लिया।
रवि मिश्रा ने गर्व से ग्रुप की ओर देखा। "देवियों और सज्जनों, आज टूर शुरू करने से पहले मैं आपको किसी खास से मिलवाना चाहता हूँ। यह मेरी बेटी है, संजना। इसने अभी-अभी 12वीं में पूरे राज्य में दूसरा स्थान प्राप्त किया है।"
तालियाँ बजीं। संजना के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान थी — जैसे कोई पुराना मुखौटा, जो इतनी बार पहना जा चुका था कि अब चेहरे से अलग नहीं होता था।
तभी पीछे से शत्रु ने हाथ उठाया। "वाह अंकल! वैसे फर्स्ट डिवीज़न तो मेरा भी आया था — क्या मुझे डिस्काउंट मिल सकता है?"
पूरा ग्रुप हँस पड़ा। रवि मिश्रा भी मुस्कुराए — जो कम होता था।
"बिल्कुल बेटा। नियम मानोगे, तो डिस्काउंट भी मिलेगा।"
फिर वो अपने 'गाइड मोड' में आ गए।
तारीखें। नियम। तथ्य। एक के बाद एक।
संजना देख रही थी — धीरे-धीरे ग्रुप का ध्यान भटक रहा था। किसी ने फोन निकाल लिया, कोई गंगा की तरफ मुड़ गया। रवि मिश्रा बोल रहे थे, लेकिन अब कोई सुन नहीं रहा था।
वो जानती थी समस्या क्या है। आज का tourist तारीखें नहीं, कहानियाँ सुनना चाहता है।
तभी रवि जी को खाँसी का ठसका लगा और वो रुके।
सन्नाटा छा गया।
संजना ने एक पल झिझका। फिर एक कदम आगे बढ़ाया।
"वाराणसी सिर्फ एक जगह नहीं है।"
उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी। लेकिन उसमें एक ठहराव था जिसने सबका ध्यान खींच लिया।
"यह वो जगह है जहाँ समय भी ठहर जाता है।"
उसने घाट की ओर इशारा किया। "आप जानते हैं इसे काशी क्यों कहते हैं? एक बार भगवान शिव ने ब्रह्मा जी का पाँचवाँ सर काट दिया था। उस पाप से मुक्ति के लिए वो तीनों लोकों में भटके — लेकिन वो कपाल उनके हाथ से नहीं छूटा। यहाँ आकर, इसी मिट्टी पर, वो गिरा। इसीलिए इसे 'कपाल मोचन' भी कहते हैं। कहते हैं यहाँ आने पर बंधन वैसे ही गिर जाते हैं — जैसे शिव के हाथ से वो कपाल गिरा था।"
जो लोग फोन देख रहे थे, अब मंत्रमुग्ध होकर उसे सुन रहे थे।
शत्रु ने चुपचाप कैमरा ऑन कर दिया था।
"तो जब आप इन गलियों में चलें," संजना ने कहा, "तो यह मत सोचिये कि आप एक शहर देख रहे हैं। यह सोचिये कि आप एक ऐसी कहानी का हिस्सा बन रहे हैं जो हज़ारों सालों से लिखी जा रही है।"
पिंड-drop सन्नाटा।
फिर ज़ोरदार तालियाँ।
रवि मिश्रा की आँखों में चमक थी। उन्होंने बेटी की तरफ देखा और गर्व से कहा — "देखा? मैंने अपनी बेटी को बेटे की तरह पाला है।"
संजना मुस्कुराई।
लेकिन उस मुस्कान के पीछे एक सवाल था जो वो कभी ज़ोर से नहीं पूछ पाई थी — पापा, अगर मैं बेटा होती, तो क्या तब भी आप मुझे रोकते?
ग्रुप आगे बढ़ गया। शत्रु ने कैमरा बंद किया और धीरे से संजना के पास आया।
"आप guide हैं?" उसने पूछा।
"नहीं।"
"तो फिर?"
संजना ने एक पल घाट की तरफ देखा। गंगा बह रही थी — बिना किसी की इजाज़त के, बिना किसी शर्त के।
"बस... यहीं फँसी हूँ।"
शत्रु ने कुछ नहीं कहा। लेकिन उसने कैमरा फिर से ऑन कर दिया — इस बार संजना की तरफ नहीं, घाट की तरफ।
जैसे वो समझ गया हो कि कुछ चीज़ें record नहीं होतीं। बस महसूस होती हैं।