लेखिका: दीपक शर्मा
ड्यूटी रजिस्टर में अपने हस्ताक्षर के साथ मैं ने अपना अराइवल टाइम दर्ज किया : दो बजे।
मेरे नाम के आगे मेट्रन ने रिकवरी रूम लिख रखा था।
मैं वहीं पहुंच ली।
सिस्टर सुशीला की पहरेदारी में बेड नम्बर दो पर एक बच्ची बेसुध लेटी थी। रूम के बाकी दो बेड खाली थे।
“कैसा आपरेशन था?” मैं ने पूछा।
“स्पलिट ब्रेन सर्जरी! पेशंट के कौर्पस कोलौज़्म पर छुरी- कैंची चलायी गई है,” सुशीला हंसी।
“कौर्पस कोलौज़्म?” नौ साल की मेरी नौकरी में इस आपरेशन का पहला केस मेरे सामने आया था, “मिर्गी रही इसे? चार्ट देखें?”
“ज़रुर देखो। मैं तो चली,” सुशीला ने अपना पर्स और स्वैटर उठाया और ड्यूटी छोड़ने से मिली राहत के अंतर्गत दरवाज़े की ओर लपक ली।
चार्ट पर मैं ने अपनी नज़र दौड़ाई।
डाक्टर इंचार्ज: डाक्टर सरोज बाला।
पेशंट का नाम : कांता
आयु : तेरह वर्ष
रोग : पैरौक्सिमल मैलफ़ंक्शन औव सेरिब्रल नर्व सैल्ज़
आपरेशन : सर्जिकल रिमूवल औव एपिलेपटो जीनिक ब्रेन टिश्यू
मैं जान गई मिर्गी की वजह से पेशंट की जिन नर्व सैल्ज़ में बिगाड़ रहा था, उन्हें हटा दिया गया है— उस कौर्पस कोलौज़्म से,जो दो हिस्सों में बंटे हमारे दिमाग को जोड़ने वाली उन पचास करोड़ नर्व फ़ाइबर्ज़ के जाल का नाम है।
पेशंट की नब्ज़ गिनने पर संख्या आयी : पचपन।
तापमान लिया तो थर्मामीटर का पारा सत्तानवे अंक पर जा रुका।
दोनों अंक मैं ने चार्ट पर चढ़ा दिए और अपना जासूसी उपन्यास उस के बुक मार्क पर खोल लिया।
हत्या की पूर्वापरता और कारण का पता लगाने हेतु नायक के साथ मैं भी आगे बढ़ने लगी। पीछे जाने के लिए। वह समय औंधा रहा था। समकालिक अपने समय के पार विगत, पूर्वव्यापी पृष्ठभाग को पकड़ने हेतु।
“सिस्टर,” पेशंट पर एनेस्थीज़िया का प्रभाव समाप्त हो गया लगता था।
“बताओ,” मेरा उपन्यास चौंकाने वाली स्थिति में पहुंच चुका था। अपनी सुरागरसानी के अंतर्गत जिस पात्र को नायक ने दोषी ठहराया था, वह सर्वथा अकल्पित रहा था। नायक हंस रहा था, ‘कांटे छितराने वाले को अपने पांव नंगे नहीं रखने चाहिए….’
“बेहोशी में मैं कुछ बोली क्या?”
झूमा- झूमी खेल रही पेशंट की आवाज़ लड़खड़ाई।
बीच- बीच में उस की दिशा से कुछ ध्वनि तरंगें हवा में तैरती ज़रूर रही थीं लेकिन मैं ने उन्हें पकड़ा न था।
“हां,” एक गुदगुदाहट मेरे शरीर में दौड़ ली और अपने उपन्यास से अपनी नज़र हटा कर मैं ने उस पर जमा दी।
“क्या कहा था मैं ने?”
“बहुत कुछ,” छूट रही अपनी हंसी मैं ने अपने कंठ में दबा ली।
“अपने पिता के बारे में?”
“अभी लौट कर बताती हूं,” कहानी गढ़ने से पहले उस के परिवारजन से मिलना ज़रूरी था।
मेरे कदम अस्पताल के लाउंज की ओर बढ़ लिए।
वहां कई लोग बैठे थे लेकिन मुझे देखते ही एक द्वय मेरी ओर बढ़ लिया।
ज़रूर उन की निगाह लाउंज से दिखाई दे रही रिकवरी रूम के दरवाज़े पर टिकी रही थी।
द्वय के पुरुष की आयु साठ और पैंसठ के बीच रही होगी और स्त्री की तीस और पैंंतीस के बीच।
“मिर्गी वाली लड़की क्या अभी तक बेहोश है?” पुरुष से पहले स्त्री मेरे समीप पहुंची। देर तक रोते रहने के कारण उस की आंखें सुर्ख लाल थीं।
“हां,” मैं ने झूठ बोला, “अभी तो डाक्टर लोग आप से कुछ पूछना चाह रहे हैं….”
“डा. सरोज बाला?” पुरुष ने पूछा।
पुरुष की गालें हूबहू उसी जगह से पिचकी हुईं थीं जिधर से मेरे बाबूजी की।
जबड़ों के ऐन ऊपर।
क्या उस ने भी अपनी दाढ़ें उखड़वा रखीं थीं? मेरे बाबूजी की तरह?
अपने बाबूजी को देखे- सुने मुझे लगभग डेढ़ वर्ष होने जा रहे थे। लेकिन खोखली उनकी गालों से निकली वह दुगदुगी अभी भी मेरे साथ बराबर बनी रहती, ‘हमारा- तुम्हारा रिश्ता उस रेल- मुंशी के रहते कायम नहीं रह सकता….’
“आप रिटायर हो चुके हैं?” मैं ने पूछा। मेरे बाबूजी को रिटायर हुए इस नवंबर को पांच साल हो जांएगे।
“हां। लेकिन पहले यह बताइए लड़की का आपरेशन ठीक हो गया न? उसे होश कब तक आएगा? डाक्टर सरोज बाला उसे देख चुकीं क्या?” पुरुष के स्वर में प्रबल चिंता का आवेश था।
“डा. सरोज बाला को आप कैसे जानते हैं?” मैं ने पूछा। हमारे रेलवे अस्पताल की वह सब से पुरानी डाक्टर रहीं।
“वह मुझे बहुत मानती हैं। मेरा बहुत लिहाज़ करती हैं। उन्हीं के आश्वासन पर हम ने यह आपरेशन करवाया है।”
“आप रेलवे में काम करते थे?” मैं ने पूछा। मेरे बाबूजी डाकघर में सौर्टर रहे। डाक को छांटते और व्यवस्थित किया करते।
“हां,पार्सल विभाग में था। मेरी सभी बेटियां इसी रेलवे अस्पताल में पैदा हुईं थीं। डा. सरोज बाला के हाथों….”
“वह दूसरे डाक्टर हैं जो पेशंट की मां से मिलना चाहते हैं,” मैं ने कहा।
“मैं हो आऊं, बाबूजी ?” स्त्री की व्यग्रता फड़फड़ायी।
“हां बेटी। क्यों नहीं?”
मेरे कदम विपरीत दिशा में घूम लिए। स्त्री मेरी बगल में लाउंज पार करने लगी।
“आप अपने पिता के साथ रहती हैं?” लाउंज का रास्ता तय होते ही मैं ने स्त्री को घेर लिया, “अपने पति के साथ नहीं?”
“मेरे पति एक दूसरी औरत के पास रहते हैं। मेरी बेटी की मिर्गी भी इसीलिए शुरू हुई। हर कोई उस से पूछता, ‘तेरे पिता तुझे अपने पास क्यों नहीं रखते?’ और जवाब में उस के हाथ- पैर थरथराने लगते। झटके खाने लगते। फिर वह बेहोश होने लगी। बेहोशी में बहुत बिलखती। बहुत चिल्लाती। शुरू में कुछ पलों के लिए। फिर बढ़ते- बढ़ते आधे- आधे घंटे तक अपने होश खोए रहती….”
“आप के पति दूसरी औरत क्यों रखे हैं?” मैं हंसी।
“बोलते हैं, मैं तुम्हारा खर्चा नहीं उठा सकता। लड़की का खर्चा नहीं उठा सकता। मुझे नौकरी वाली पत्नी चाहिए….”
“तो कौन मुश्किल है?” मैं फिर हंस दी, “आप नौकरी कर लो….”
“कौन सी नौकरी कर लूं? सात बहनें रहीं हम। और सब से बड़ी मैं। जिसे सब से जल्दी ब्याह दिया गया। हमारे बाबूजी बेचारे किस- किस को कहां- कहां तक पढ़ाते? जब भी,जहां भी अपनी बिरादरी में उन्हें ब्याहने लायक कोई लड़का दिखाई दिया, पट से उन्हों ने अगले नंबर की लड़की अपनी उस से ब्याह दी….”
मेरे बाबूजी हमें ब्याहने में सुस्त रहे। खूूब सुस्त। चुस्त रहे तो हमें स्कूल भेजने में। हमें पढ़ाने के मामले में । परिणाम, हम पांचों की पांचों बहनें अपने पैरों पर खड़ी हैं। ब्याह के बिना। सब से बड़ी बाबूजी वाले डाकघर में लगी है। दूसरे नंबर की एक प्राइमरी स्कूल में टीचर है। तीसरे नंबर की, मैं, इधर अस्पताल में तैनात हूं। चौथे नंबर की एक ब्यूटी पार्लर में काम करती है और पांचवी एक एयरलाइंस में बुकिंग क्लर्क है।
“आप को किस से ब्याहा?”
“रेलवे के एक डाक- मुंशी से।”
“उस दूसरी औरत के पास नौकरी है क्या?” मैं पांच- सात मेॅ पड़ गई। अकस्मात।
“वह एक नर्स है,” स्त्री की आवाज़ धीमी पड़ गई, “शायद इसी रेलवे अस्पताल में….”
“क्या नाम है?” एक कंपकंपाहट ने मुझे अपनी मूठ में ले लिया।
“गेंदा रानी। क्या आप उसे जानती हो?”
“आप यहीं रुको,” उस के साथ चलना मेरे लिए मुश्किल हो गया, “मैं अभी आप को बुलाती हूं।”
“ठीक है,” वह तत्काल रुक गई।
रिकवरी रूम में पेशंट पूरी तरह जाग चुकी थी।
“सिस्टर, प्लीज़ बताइए, मैं अपनी बेहोशी में क्या बोली थी?” मुझे सामने पाते ही वह अधीर हो उठी।
“अपनी बेहोशी में आप बोलती हो?” मैं ने प्रकृतिस्थ होने की चेष्टा की।
“हां,” वह मुस्कराई, “मां मुझे मेरे हर दौरे के बाद बताया करती हैं। अपनी बेहोशी में मैं बहुत अनाप-शनाप बोल जाती हूं….”
“गेंदा रानी कौन है?” मैं ने अपने को दांव पर रख दिया।
“वह एक बुुरी औरत है जिसे मेरे पिता पिछले डेढ़ साल से हमारे घर ला बिठाएं हैं। मैं ने गेंदा रानी के बारे में कुछ बोला क्या?”
“तुम्हारे पिता उसे आप लोग के घर पर क्यों ला बिठलाएं हैं?” अपने गिर्द रस्सी मुझे कस कर ताननी रही।
“क्योंकि मेरे पिता को अपनी तनख्वाह पूरी नहीं पड़ती। उन्हें उस की तनख्वाह भी चाहिए। अपनी फ़िज़ूलखर्ची के लिए….”
“वह फ़िज़ूलखर्च हैं?” एक विराम मेरे भीतर उतरने लगा। चक्करदार जिस चक्रदोले की पुलक मुुझे पिछले डेढ़ वर्षों से निरंतर झुलाती रही थी, वह मेरी तनख्वाह से पेंग लेती रही? प्रेम से नहीं?
“बहुत फ़िज़ूलखर्च हैं। पहनने- ओढ़ने को उन्हें तरह- तरह के कपड़े चाहिएं। खाने- पीने को भांति- भांति के पकवान। सजने- सजाने को किस्म- किस्म के लोशन- पाउडर….”
वह सच कह रही थी। अपने ही खाने, पहनावे और बांकपन को ध्यान में रख कर मेरा वह डाक- मुंशी अपना दिन शुरू करता। अपना दिन खत्म करता। उस की ठुमक और शौकीनी,उसकी खरीदारी और फब के लिए उमंग निश्चित रूप से उस के जेब-खर्च में अन्तर्विष्ट होनी असंभव थी।
“घबराओ नहीं,” मैं ने पेशंट की गाल थपथपाई, “सच्चाई जैसे ही गेंदा रानी की निगाह से गुज़रेगी, वह उसी दिन आप लोग का घर छोड़ देगी। उस से अलग हो जाएगी।”
“कांता की बेहोशी टूट गई?”जभी डा.सरोज बाला अपने एक दल के साथ
रिकवरी रूम में आन दाखिल हुईं। पीछे पीछे रहे पेशंट के नाना और मां।
“जी, मैडम,” मैं ने उन का स्वागत किया।
“आपरेशन ठीक हो गया न?” पेशंट के नाना अभी भी बहुत अधीर थे।
“बिल्कुल ठीक हुआ है,” डा. सरोज बाला मुस्करा दीं, “कांता पूरी तरह होश में है। इसे मिर्गी के दौरे अब उसे कभी दिक नहीं करेंगे….”
“आप की बहुत मेहरबानी डा. साहिबा,” पेशंट के नाना रोने लगे।
“हां,” मैं ने पेशंट की मां के कान में स्वीकारा, “मैं गेंदा रानी हूं।”
“मैं ने सब पता लगा लिया है,” वह मेरे कान में फुसफुसाई।
“लेकिन मैं अकेली रहती हूं। आप के पति के साथ नहीं….”
वचन दे रही थी मैं? उन मां- बेटी को?
वचन ले रही थी मैं? अपने आप से ? आप्त वचन!
क्यों कि मुझे अपने बाबूजी को फिर से अपने पास बुलाना है!!