कमरे में फैली सन्नाटे की चादर को सिर्फ बाहर के तूफान का शोर चीर रहा था। इंस्पेक्टर समीर ने मेज पर अपनी पिस्तौल रख दी थी। उनकी नजर दीवान साहब की पथराई आंखों से हटकर फिर से उस 'काली रानी' पर टिक गई, जो खून से सनी थी।
"दरवाजा अंदर से बंद था... खिड़कियों पर लोहे की मजबूत जालियां हैं," समीर मन ही मन बुदबुदाए, "तो फिर कातिल हवा में गायब हो गया?"
"मैंने कहा था न साहब!" केयरटेकर शर्मा जी कांपती आवाज में बोले, "यह किसी इंसान का काम नहीं है। वह तिजोरी... वह तिजोरी कोई मामूली लोहे का डिब्बा नहीं है। उसमें इस पुस्तकालय के पुराने इतिहास के पाप और एक अदृश्य शक्ति कैद है। दीवान साहब ने आज शाम ही उस तिजोरी की लिपि को सुलझाया था। यह उसी शक्ति का प्रकोप है!"
"शट अप, शर्मा जी!" अद्वैत गुस्से में चीख पड़ा। उसका चेहरा डर और आक्रोश से लाल था। "यह अंधविश्वास बंद कीजिए! मेरे दादाजी का कत्ल हुआ है। किसी ने कमरे में घुसकर यह किया है।"
समीर ने अद्वैत की तरफ तीखी नजरों से देखा। "अद्वैत, तुम जब से कमरे में आए हो, तुम्हारे हाथ कांप रहे हैं। और तुम्हारे कोट पर ये पानी की बूंदें कहां से आईं? तुम तो हॉल में बैठे थे न? या फिर तुम बाहर खिड़की के पास..."
"आप मुझ पर शक कर रहे हैं?" अद्वैत पीछे हटा। "मैं तो दीवान साहब से अपनी कंपनी के कर्ज के लिए पैसे मांगने आया था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसलिए मैं बाहर गैलरी में गया था। पर मैंने खून नहीं किया!"
तभी कोने में खड़े प्रोफेसर अय्यर एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ आगे आए। उन्होंने अपने चश्मे को ठीक किया और दीवान साहब के हाथ में मौजूद कागज के टुकड़े को देखा—'मोहरा जब शह देता है, तो राजा को मरना ही पड़ता है।'
"बड़ी गहरी बात है, इंस्पेक्टर," प्रोफेसर अय्यर की आवाज बेहद शांत थी, जो इस माहौल में और भी डरावनी लग रही थी। "
"प्रोफेसर साहब, अपनी फिलॉसफी बाद में झाड़िएगा," समीर ने कड़क आवाज में कहा। "आप यहां क्या करने आए हैं, मुझे अच्छी तरह मालूम है। आप उस तिजोरी के रिसर्च के पीछे सालों से पागल हैं।"
माहौल तब और तनावपूर्ण हो गया जब डॉक्टर मीरा ने दीवान साहब की नब्ज छोड़कर कहा, "इंस्पेक्टर, एक अजीब बात है। दीवान साहब के गले पर काली रानी से वार तो हुआ है, लेकिन वह घाव इतना गहरा नहीं है कि इंसान मर जाए। उनकी मौत किसी भयानक सदमे या हार्ट अटैक से हुई लगती है। मानो उन्होंने मरने से पहले कोई ऐसी चीज देख ली हो जो आम इंसान बर्दाश्त न कर सके।"
तारा जो दरवाजे के पास रो रही थी, उसने अचानक डॉक्टर मीरा की तरफ देखा। "डॉक्टर, आप ही तो १५ मिनट पहले दीवान साहब को एक दवा देने आई थीं न? आपने कहा था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है।"
"हां, पर मैंने सिर्फ हार्ट की रेगुलर दवा दी थी!" डॉक्टर मीरा का लहजा बदल गया।
सब एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे थे। गूंगा रसोइया आर्यन हॉल के दरवाजे पर खड़ा सब देख रहा था, उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, लेकिन उसकी मुट्ठियां कसकर बंद थीं।
ठीक उसी पल, पुस्तकालय की सारी लाइटें एक साथ गुल हो गईं। पूरा केबिन घने अंधेरे में डूब गया। बाहर बिजली का एक ऐसा जोरदार कड़ाका हुआ जिसने पूरी पहाड़ी को हिलाकर रख दिया।
पर उस कड़ाके के साथ ही, कमरे का तापमान अचानक बर्फ जैसा ठंडा हो गया। सबके मुंह से सांस लेते वक्त भाप निकलने लगी। इंस्पेक्टर समीर ने अपनी टॉर्च जलाने की कोशिश की, पर टॉर्च ऑन नहीं हुई। अंधेरे में सिर्फ सबकी तेज होती सांसों की आवाज आ रही थी।
अचानक, उस शांत कमरे में पुस्तकालय के पुराने लकड़ी के फर्श पर किसी के चलने की आवाज आई—खच... खच... खच...
मानो कोई अदृश्य व्यक्ति बुकशेल्फ़ की तरफ से चलकर ठीक दीवान साहब की मेज की तरफ बढ़ रहा था। लेकिन कमरे में कोई रोशनी नहीं थी, न ही कोई आकृति दिखाई दे रही थी।
सब डर के मारे दीवार से सट गए। तारा के मुंह से एक दबी हुई चीख निकल गई।
उसी क्षण, इंस्पेक्टर समीर के कान के बिल्कुल पास से एक ठंडी हवा का झोंका गुजरा, मानो किसी ने उनके कान में बर्फीली सांस ली हो।मेज पर रखी शतरंज की बिसात पर से लकड़ी का मोहरा हिलने की आवाज आई—खटक!
ठीक उसी सेकंड एक जोरदार हवा का झोंका खिड़की से टकराया और लाइटें वापस आ गईं।
जब लाइटें आईं, तो कमरे में कोई तीसरा नहीं था। सब अपनी-अपनी जगह पर थर-थर कांपते हुए खड़े थे। समीर का तार्किक दिमाग इस भूतिया बात को मानने को तैयार नहीं था, लेकिन उन्होंने जो सुना और महसूस किया था, वह कोई भ्रम नहीं था।
वे तुरंत मेज की तरफ दौड़े। जब उन्होंने शतरंज की बिसात देखी, तो उनके होश उड़ गए।
जो खून से सनी 'काली रानी' मेज पर आड़ी पड़ी थी, वह अब बिसात के बिल्कुल बीचों-बीच 'सफेद राजा' के बिल्कुल सामने सीधी खड़ी कर दी गई थी! इतना ही नहीं, काली रानी के आधार पर लगे खून से सफेद राजा के मोहरे पर भी खून का एक दाग लग चुका था।
समीर ने चारों तरफ देखा। सभी लोग एक-दूसरे से दूर, दीवार के पास खड़े थे। लाइट जाने के उन २० सेकंड में कोई भी मेज तक नहीं पहुंच सकता था, क्योंकि चलने की आवाज बुकशेल्फ़ की तरफ से आई थी।
तुममें से किसी ने मेज को छुआ?" समीर ने सबके हाथ चेक किए, पर किसी पर खून नहीं था।
शर्मा जी कांपते हुए बोले, "यह उसी अदृश्य शक्ति का काम है!"
तभी समीर की नजर मेज की खुली दराज पर गई। अंदर शतरंज का एक और मोहरा था—सफेद वजीर जिस पर किसी के ताजे खून की उंगली का निशान छपा था।
समीर ने मुड़कर देखा, तो दीवार पर जमे कोहरे के बीच किसी ने उंगली से एक नया संदेश लिख दिया था:
"अगली चाल... सफेद वजीर की।"