Bisat Ka Aakhri Mohra - 3 in Hindi Thriller by Aarti Garval books and stories PDF | बिसात का आखिरी मोहरा - 3

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बिसात का आखिरी मोहरा - 3

कमरे के भीतर फैली सन्नाटे की चादर को सिर्फ बाहर के तूफान का शोर चीर रहा था। इंस्पेक्टर समीर ने अपनी पिस्तौल को कसकर पकड़ा और बेहद संजीदगी से कहा, "सुबह होने तक कोई भी अपनी जगह से नहीं हिलेगा।" 

कमरे का माहौल अब पहले से कहीं ज्यादा भारी और खौफनाक हो चुका था। दीवार पर जमे कोहरे के बीच किसी अदृश्य उंगली से लिखा गया वह संदेश—"अगली चाल... सफेद वजीर की"—सबके दिलों में खंजर की तरह उतर चुका था। हर कोई जानता था कि शतरंज में वजीर सबसे खतरनाक और तिरछी चाल चलने वाला मोहरा होता है। लेकिन इस बंद कमरे में 'सफेद वजीर' कौन था? और कातिल का अगला निशाना कौन बनने वाला था? यह सवाल हवा में तैर रहा था।

​समीर की पैनी नजरें हॉल में मौजूद हर शख्स के चेहरे के हाव-भाव को टटोल रही थीं। केयरटेकर शर्मा जी एक कोने में दुबक कर बैठ गए थे और थर-थर कांपते हुए लगातार हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे। दीवान साहब का भतीजा अद्वैत और डॉक्टर मीरा इस वक्त एक-दूसरे से सबसे ज्यादा दूरी बनाकर खड़े थे, मानो दोनों को एक-दूसरे के भीतर ही कातिल नजर आ रहा हो। डॉक्टर मीरा का चेहरा सफेद पड़ चुका था, और वे बार-बार अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ ढूंढने का नाटक कर रही थीं।

​तभी, कमरे के सबसे शांत कोने से प्रोफेसर अय्यर की आवाज गूंजी, जिसने सन्नाटे को तोड़ दिया। उन्होंने अपने चश्मे को ठीक किया और अपनी रहस्यमयी मुस्कान के साथ बोले, "सफेद वजीर... यानी बुद्धि, चालाकी और ज्ञान का प्रतीक। शतरंज की बिसात पर वजीर हमेशा सीधे रास्ते से नहीं, बल्कि तिरछी चालों से वार करता है, इंस्पेक्टर। इसका सीधा सा मतलब है कि कातिल का अगला शिकार वो शख्स है जो इस पुस्तकालय के इतिहास के बारे में बहुत कुछ जानता है, पर सीधे तौर पर सामने नहीं आ रहा। वह चुपचाप सब देख रहा है।"

​प्रोफेसर अय्यर की यह गहरी और दार्शनिक बात सुनते ही, दरवाजे के पास खड़ी तारा के चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ गया। वह बुरी तरह घबरा गई और पीछे हटते हुए मेज पर रखी चाय की केतली से टकरा गई। केतली फर्श पर गिरी और गरमा-गरम चाय चारों तरफ फैल गई। लेकिन जैसे ही चाय की धार नीचे बही, समीर की नजर एक ऐसी चीज पर पड़ी जिसने उनके होश उड़ा दिए।

​दीवान साहब की भारी नक्काशीदार कुर्सी के ठीक नीचे, फर्श पर किसी के जूते के कीचड़ वाले गीले निशान बने हुए थे। वे निशान कुर्सी से शुरू होकर सीधे पुस्तकालय की उस भारी, लोहे की सीलबंद तिजोरी की तरफ जा रहे थे, जिसके बारे में शर्मा जी ने कहा था कि वह अभिशप्त है।

​समीर ने बिना वक्त गंवाए अपनी टॉर्च की तेज रोशनी उन निशानों पर डाली। उनका दिल तेजी से धड़कने लगा। उन्होंने अपनी कड़क आवाज में पूरे कमरे को कंपाते हुए पूछा, "लाइट जाने से पहले मैंने आप सबके जूते देखे थे, यहाँ फर्श पर कोई निशान नहीं था। सबके पैर सूखे थे। तो फिर लाइट जाने के उन २० सेकंड के अंधेरे में, इन जूतों पर बाहर का ताजा कीचड़ कहाँ से आया? और कोई इस तिजोरी तक क्यों गया था? तुममें से कोई एक बहुत बड़ा झूठ बोल रहा है!"

​समीर का सवाल अभी हवा में गूंज ही रहा था कि अचानक, पुस्तकालय के पिछले हिस्से से किसी बहुत भारी चीज के गिरने की जोरदार आवाज आई। ऐसा लगा मानो किताबों की कोई विशाल अलमारी जमीन पर आ गिरी हो। उस धमाके से पूरा कमरा दहल उठा। तारा जोर से चीख पड़ी, और शर्मा जी के हाथ से माला छूट गई।

​अंधेरी रात के इस खौफनाक मोड़ पर, समीर को समझ आ गया कि शतरंज की यह खूनी बिसात अब और भी खतरनाक हो चुकी है। कातिल ने अपनी अगली चाल चल दी थी, और 'सफेद वजीर' का वक्त खत्म होने वाला था।